किसान खेत की जगह दिल्ली में क्यों है!

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सतीश राय/

खेती के लिहाज से देखें तो अभी रबी का समय चल रहा है जब देश भर के किसान नई फसल का सपना देख रहे होते हैं। देश के बड़े हिस्से में गेहूँ की बुआई चल रही होती है। ऐसे समय में जब किसानों को अपने खेतों में होना चाहिए था तो ये दिल्ली में पुलिस के लाठी-डंडे खा रहे हैं। इस ठंड में पानी की बौछारें झेल रहे हैं। इन किसानों में बड़ी संख्या में दो राज्य- पंजाब और हरियाणा- से आए हुए हैं जहाँ इस मौसम में गेंहू की बुआई चरम पर होती है।

मैं एक किसान हूँ और इस समय के महत्व को समझता हूँ।  इस समय किसानों के पास खेती के अलावा किसी भी दूसरे काम के लिए एक दिन का समय निकाल पाना मुश्किल होता है, ऐसे में बहुत बड़ी संख्या में किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉली में छः महीने का राशन लेकर दिल्ली को घेर कर बैठे हैं।

दो बातें साफ हैं।  पहली की किसान समझ रहा है, ये कानून उन्हें तबाह कर देंगे।  दूसरी कि इस बार किसान आर-पार की लड़ाई की तैयारी से गए हैं।

इन कृषि कानूनों को लेकर सरकार का एक पक्ष है।  इनके अनुसार ये कानून किसान हित में हैं। पर किसानों को समझ आ रहा है कि ये कानून उनके लिए नहीं बल्कि चंद पूँजीपतियों को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं।

मसलन, इन कानूनों में किसानों का व्यापारी (जिसे वे अपना उपज बेचते हैं) या फर्म जिसके साथ वे कान्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग करेंगे, के साथ किसी विवाद की स्थिति में उनसे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का संवैधानिक अधिकार ले लिया गया है।

विवाद होने पर किसान सिर्फ तहसीलदार के पास शिकायत कर सकेगा। इसको हम ऐसे समझ सकते हैं, कल को किसी बहुत बड़े व्यापारी ने 10 गांव के किसानों से धान खरीदी और पेमेंट नहीं दिया तो इस कानून के तहत अब किसान उस व्यापारी या फर्म के खिलाफ कोर्ट नहीं जा पाएंगे।  उन्हें सिर्फ तहसीलदार से शिकायत करने का विकल्प मिलेगा। यह तो समझा जा सकता है कि तहसीलदार स्तर के अधिकारी से किसके पक्ष में खड़ा होगा।  अपनी जरूरत के मुताबिक बड़े पैसे वाले उस तहसीलदार से जैसा चाहे वैसा फैसला करवा सकते हैं।

देश के एक वर्ग को लगता है कि ये आंदोलन तो सिर्फ पंजाबी मूल के किसान चला रहे हैं और वे भी खालिस्तान समर्थक हैं। खालिस्तान समर्थक वाले आरोप इतने बेहूदा हैं कि इस पर बात करने की जरूरत ही नहीं है। इसलिए हम बात इसपर करते हैं कि क्या सच में सिर्फ पंजाब के किसान को ही इन तीन नए कृषि क़ानूनों से दिक्कत है!

मैं ये बात पूरे गर्व से स्वीकार करता हूं कि इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका पंजाब और हरियाणा के किसान निभा रहे हैं। जब देश भर के किसान जानते भी नहीं थे कि ये तीन कानून क्या हैं, तब सबसे पहले पंजाब और हरियाणा के किसान और वहां के किसान संगठनों ने इन क़ानूनों का विरोध करना शुरू किया।

पर इस आंदोलनों को पूरे देश के किसान और किसान संगठनों का विश्वास हासिल है। यहां तक कि भाजपा की पितामह संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का किसानों का धड़ा राष्ट्रीय किसान संघ भी इन तीन क़ानूनों के खिलाफ है। वहीं इनका स्वदेशी जागरण मंच ने भी इन क़ानूनों में बदलाव की बात कही है।

दरअसल, पूरे देश में पंजाब और हरियाणा वह राज्य हैं जहां वर्ष 1940 से मॉडल मंडी व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इन दोनों राज्यों के किसान अपनी फसलों की बिक्री के लिए इन व्यवस्थित मंडियों पर ही निर्भर हैं। इन मंडियों का संचालन बहुत बेहतर तरीके से होता है।  वहीं नए कृषि क़ानूनों की वजह से आने वाले सालों में ये मंडियों अपना अस्तित्व खो देंगी।

हमारे सामने बिहार का उदाहरण है, जहां 2006 में मंडी खत्म कर दी गई।  इसका नतीजा यह हुआ कि वहां के किसान अपनी धान पंजाब-हरियाणा में बेचने को मजबूर है। बिहार मक्का का बड़ा उत्पादक राज्य है, पर ओपन मार्केट (जिसकी वकालत वर्तमान सरकार कर रही है.) में उन्हें मक्का लागत मूल्य से भी कम में बेचना पड़ा।  मसलन, एक किलो मक्का पैदा करने की लागत ही 12.13 रुपये है।  बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मक्का अधिकतम 6-10 रुपया प्रति किलो ही बिका। अभी मध्य प्रदेश में मक्का की नई फसल अक्टूबर में आई, यहां के किसानों को 8 से लेकर 12/ किलो तक में अपना मक्का बेचना पड़ रहा है, जबकि केंद्र सरकार द्वारा समर्थन मूल्य 1860 घोषित है। साफ है किसानों की लागत भी नहीं निकल रही।

हम वापस बिहार पर आते हैं आखिर इतने नुकसान के बाद वहां के किसान आंदोलन क्यों नहीं कर रहे हैं। और अगर कर भी रहे हैं तो बड़े रूप में ये आंदोलन क्यों नहीं उभर रहे।

वर्ष 2011 की सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, बिहार के ग्रामीण बिहार में 65.58% परिवारों के पास भूमि नहीं है। बिहार की 38% भूमि असिंचित है। तिपहिया-चौपहिया कृषि वाहन केवल 2.49% परिवारों के पास हैं। सिंचाई की मशीनें केवल 5.15 परिवारों के पास हैं। बिहार के 70.88% ग्रामीण परिवारों की आमदनी का मुख्य स्रोत अनियमित मज़दूरी है। संभवतः बिहार के किसानों ने अपनी नियति स्वीकार ली है।

मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे राज्य के किसान मंडी की जगह व्यापारियों पर ज्यादा निर्भर हैं, इसलिए समझा जा सकता कि इन आंदोलन में उतने व्यापक तौर पर इन राज्यों के किसान शामिल होते क्यों नजर नहीं आते।  हालांकि ऐसा भी नहीं है कि इस आंदोलन में इन राज्यों से किसान शामिल नहीं हुए हैं। मध्य प्रदेश में नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले एक बड़ा जत्था दिल्ली गया है।  शिवकुमार शर्मा जी(कक्का जी) के नेतृत्व में इस पोस्ट के लिखे जाने तक किसान दिल्ली के लिए निकल रहे हैं।

वही राजस्थान से कई किसान संगठन पंजाब के रास्ते दिल्ली गए।  राजस्थान से ही कामरेड अमराराम के नेतृत्व में बड़ा किसान समूह दिल्ली गया है।  पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बहुत बड़ा दल बीते कई दिनों से दिल्ली-आगरा हाईवे पर मोर्चा संभाले हुए है। उत्तराखंड से भी किसानों के आने के समाचार हैं।

यहां हमें यह समझना होगा कि भौगोलिक दूरी के कारण भी हर प्रदेश से किसान इस तरह के आंदोलन में शामिल नहीं हो पाते।  मसलन, ओडिशा या पश्चिम बंगाल के किसानों का ट्रैक्टर-ट्रॉली में तो दिल्ली आना संभव नहीं है।

अतीत में हमने नासिक-मुम्बई लांग मार्च नाम से महाराष्ट्र के किसानों का बहुत सफल आंदोलन देखा। पर वह आंदोलन भी पूरे महाराष्ट्र के किसानों का ना होकर महाराष्ट्र के एक बड़े हिस्से के किसानों का ही था।

भारत में हर कुछ सौ किलोमीटर में किसानों के संघर्ष और परेशानियां बदल जाती हैं।  इसलिए किसी भी आंदोलन में पूरे देश का प्रतिनिधित्व संभव नहीं।  बहरहाल, इस आंदोलन का उजला पक्ष यह है कि पूरे देश के किसानों का विश्वास दिल्ली घेर कर बैठे किसानों पर है।

अंत में यह जरूर कहना होगा कि  इन तीन किसान विरोधी क़ानूनों जिन्हें बिना किसानों संगठनों से पूछे चोर दरवाज़े से लाया गया है उन्हें सरकार बिना शर्त  वापस ले।

आखिर किसान सिर्फ इसी मांग के लिए इस ठंढ में लाठी-डंडे कहा रहे हैं कि सरकार लिखित में यह गारंटी दे कि उन्हें उनकी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा।

क्या किसानों को इतना हक भी नहीं!

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(मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में रहने वाले सतीश राय पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान भी हैं। पिछले कई सालों से आप किसानों के मुद्दों को लेकर मुखर रहे हैं।)

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