बजट से जुड़ी टेढ़ी-मेढ़ी बातें

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वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट पेश करते हुए

शिखा कौशिक/

जो लोग थोड़े बहुत भी सरकारी नीतियों में रूचि रखते हैं वे इस एक फ़रवरी के इंतज़ार में थे. हों भी भला क्यों ना , जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी और आखिर में गुजरात विधान सभा चुनाव के बाद सबको यह देखना था कि सरकार फ्रंट फुट पर खेलेगी या बैकफुट पर. कुल मिलाकर सरकार ने खेला बैकफुट पर. आईये देखें कैसे:

1- टूटी-फूटी हिंदी बोलना: भाषा पर अद्भूत नियंत्रण वाले अरुण जेटली न मालूम किन वजहों से टूटी-फूटी हिंदी भी बोल रहे थे. शायद देश की जनता से सीधे संपर्क करना चाहते हों लेकिन टाईप करने वाले ने कुछ गलती कर रखी हो. इस तरह किसानों, गरीबों से सीधा संवाद स्थापित करने का मजा जाता रहा.

2- जनता की नज़र में भला बने रहने के लिए जेटली को दो बार झूठ बोलना पड़ा: आज के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने दो बार झूठ बोला . पहला ये कि किसानों को रबी की फसल का डेढ़ गुना दाम मिल रहा है. समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना दाम. और इसी तर्ज पर खरीफ की फसल का भी डेढ़ गुना दाम दिया जाएगा. अगर रबी की फसल के हिसाब से ही खरीफ का भी डेढ़ गुना दाम देंगे तब तो किसानों का भगवान ही मालिक है. यह झूठ है. अगर किसानों को समर्थन मूल्य का दाम मिल रहा होता तो इतने सारे विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहे होते.

दूसरा झूठ यह कि उज्ज्वला योजना के तहत पांच करोड़ महिलाओं को मुफ्त एलपीजी सिलिंडर दिया जा रहा है. जेटली ने कहा कि अब यह लक्ष्य पांच करोड़ से बढाकर आठ करोड़ किया जा रहा है. यह गलत है और सरकार किसी को मुफ्त में एलपीजी कनेक्शन नहीं दे रही है. इन गरीब परिवारों से सरकार सोलह सौ रुपये लेती है. सरकार के लिए यह सोलह से रुपये भले कुछ न हो, इन गरीब परिवारों के लिए बहुत मायने रखती है.

3- कुछ अपने को नजरअंदाज करना पड़ा: सरकार ने जिस स्वच्छता अभियान के लिए कितना तो हंगामा मचाया. बड़े-बड़े नेता सड़क पर झाडू लगाते दिखे. तस्वीर खिंचवाते दिखे. उसी योजना को वित्त मंत्री बजट भाषण में याद करना भूल गए. और तो और अपने आखिरी बजट में उसी को कम पैसा आवंटित किया.

4- कुछ नाम शरमा के लिए: सरकार ने कई सारी जरुरी चीजों का तो नाम ही नहीं लिया या लिया भी तो ऐसे जैसे मजबूरी में ले रहे हों. सरकार के इस रवैये के शिकार रहे शब्द हैं: पोषण, जलवायु परिवर्तन, मनरेगा . ये ऐसे मुद्दे हैं जो सरकार के वर्तमान नीतियों में बड़ी भूमिका निभाते हैं.

5- पांच लाख का स्वास्थय बजट का गलत झुनझुना: एक जो सबसे बड़ा घपला इस बजट में होता दिखा है वह है स्वास्थय बीमा. जेटली ने गरीब लोगों को पांच लाख रुपये का स्वास्थय बीमा देने की घोषणा तो ऐसे की कि जैसे कल ही गरीबों का जीवन ही बदलने वाला हो. पांच लाख तो नहीं पर एक लाख का बीमा अभी भी मौजूद है पर इससे गरीबों के जीवन पर क्या असर पड़ा है ये सब जानते हैं. स्वास्थय बजट में इसके अनुसार कोई ख़ास बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. दूसरे यह मरीजों को कम, बल्कि बड़े निजी अस्पतालों को खुश करने के लिए ज़्यादा था. ,

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