अब मतदाताओं को सरकार के किये की जिम्मेदारी लेनी होगी

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उमंग कुमार/

भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के लिए यह बड़ा समय है. जीत का जश्न मनाने का. लेकिन इस जश्न में इन मतदाताओं को यह भी याद रखना होगा कि अब आपके मतदान का जो असर होगा उसमें कुछ भागीदारी आपकी भी होगी. भाजपा को भारी बहुमत देने के बाद अब मतदाता नज़र नीची करके यह नहीं कह सकते कि हमें विकास पसंद है. विकास के नाम पर इस बार न आपके नेता ने वोट माँगा और न आपने दिया है. जिस मुद्दे पर आपसे वोट माँगा गया है उसके परिणाम में नैतिक भागीदारी स्वीकारनी होगी.

भाजपा समर्थक अब ये दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान किया है या उन्हें भ्रष्टाचार से कोई दिक्कत है. उनको मालूम है कि इस दल के बड़े नेताओं पर फ़्रांस के साथ राफेल की खरीदारी करने में एक कॉर्पोरेट को मदद करने का बड़ा आरोप है. यह भी मालूम है कि इस दल ने राजनितिक चंदे में इलेक्टोरल बांड जैसी चीज लाकर पारदर्शिता कम की है. जब तक जांच न हो तब तक सत्य का पता नहीं लग सकता कि इन सारे फैसलों से देश को कितना नफ़ा या नुकसान हुआ है. इनके नेता इन जांचों से बचने की कोशिश कर ही रहे थे, कि अब समर्थकों ने अपने मतदान से जांच की मांग को भी ख़ारिज कर दिया है.

अब मतदाता यह भी दावा नहीं कर सकता कि अपना मतदान करते हुए राष्ट्रवाद या देश की सुरक्षा जैसा कोई मुद्दा जेहन में था. जगजाहिर है कि इसी सरकार के कार्यकाल में पुलवामा जैसे हमले हुए और 40 से अधिक जवान शहीद हो गए. इस सरकार ने डंके की चोट पर जांच बैठाने से मना कर दिया. लोगों के लिए आज भी ये कौतुहल का विषय है कि आतंकी सेना के काफिले तक पहुंचा कैसे? उरी और पठानकोट जैसे मामलों में गलती कहाँ हुई? इसी सरकार ने प्रज्ञा ठाकुर जैसे आतंक के आरोपी को भोपाल से अपना उम्मीदवार भी बनाया. अब प्रज्ञा ठाकुर संसद में भोपाल का प्रतिनिध्तिव करेंगी. इन सारी बातों के मद्देनज़र राष्ट्रवाद का बहाना भी खोखला होगा.

आगे भीड़ द्वारा किसी को सरेराह मार देने की जिम्मेदारी से भी बचने के लिए कम से कम नैतिक अधिकार तो नहीं मिलेगा. क्योंकि पिछले पांच साल में भाजपा ने इस मुद्दे पर कई बार अपना रुख स्पष्ट किया है. इसके नेता ऐसे हत्या के आरोपियों को माला पहनाते हुए हर अखबार, टीवी, और यहाँ तक कि वाट्सएप पर भी पहुँच ही चुके हैं. इसपर यह कहना नैतिक अपराध होगा कि ऐसी हत्याओं से मतदाताओं का कोई लेनादेना नहीं है.

रोजगार और कृषि जैसे मुद्दे पर अगर युवाओं और किसानों की और दुर्गति होती है तो भी मतदाताओं को नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए. क्योंकि इस सरकार ने जनता से जुड़े इन मुद्दों पर स्पष्ट रूप से बताया है कि उनकी प्राथमिकता क्या है! ऐसे में बेरोजगारी और किसान आत्महत्या पर मतदाताओं के लिए नहीं जानने या इस बचने का कम से कम नैतिक अधिकार तो नहीं ही होना चाहिए.

अगर ताकतवर नेता की चाह में इन मतदाताओं ने सरकार की वापसी कराई है तो खुली आँख से यह देखना होगा कि क्या या सरकार सच में बिना मीडिया मैनेजमेंट किये हुए चीन से नज़र मिला पाती है. क्या यह सरकार ईरान, अमेरिका जैसे देशों में भारत के हित की सुरक्षा कर पाती है! यह भी देखना होगा कि आगे हमारे सुरक्षाबलों पर हमले न हों.

अगर सत्तारूढ़ दल देश के लोगों के लिए नागरिक रजिस्टर लेकर आती है. अगर सरकार कश्मीर में धारा 370 हटाती है, अगर सरकार मंदिर-मस्जिद की राजनीति करती है और अगर इन मुद्दों की वजह से देश में अस्थिरता आती है तो इन मतदाताओं को जिम्मेदारी लेनी होगी कि वे ऐसा चाहते थे और इसीलिए उन्होंने नरेन्द्र मोदी को दोबारा सत्ता में पहुंचाया है. क्योंकि मोदी और भाजपा के अध्यक्ष ने चुनाव प्रचार में खुलकर अपने एजेंडा पर बात की है.

मतदाताओं ने भाजपा की राजनीति से जुड़े इन मुद्दों को अपनी तरफ से एक सर्टिफिकेट दिया है और अब उनके लिए खुलकर यह स्वीकार करने का समय है कि सरकार के किये में उनकी भी भागीदारी है.

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  1. शानदार लेख। मेरे मन के विचारों को आपने शब्द दिये है। कमोबेश यही बात आज हजारों लोगों के मन में उठ रही होगी। इसी तरह मार्ग दर्शन करते रहे। आभार।

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