चार साल में 3,800 करोड़ रुपये खर्च पर सरकार को नहीं मालूम गंगा कितनी हुई साफ़

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रीतू तोमर/

नरेन्द्र मोदी ने 2014 के अपने चुनावी अभियान में देश के नागरिकों को ढेर सारे सपने दिखाए. वो चाहें रोजगार हो, महिलाओं की सुरक्षा हो या हिन्दुओं के आस्था से जुड़े गंगा की सफाई का मामला हो. युवाओं को रोजगार देने और महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में बुरी तरह नाकाम रहे मोदी सरकार गंगा की सफाई करने में भी बुरी तरह असफल हुई है. आलम यह है कि एक आरटीआई के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसे यह भी नहीं मालूम कि गंगा पिछले चार साल में कितनी साफ़ हुई है.

पाठकों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने से पहले गंगा की सफाई को लेकर नरेंद्र मोदी ने बड़े बड़े वादे किये थे. उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर मोदी ने यहाँ तक कहा था, “न मैं यहां खुद आया हूं, न किसी ने मुझे लाया है, मुझे तो गंगा मां ने बुलाया है.”

अब योजनावीर नाम से मशहूर हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यकाल की शुरुआत में ही ‘नमामि गंगे’ नाम से एक परियोजना की घोषणा कर दी. केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती को इसको सफल बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई. उमाभारती के बाद अब इस ‘नमामि गंगे’ परियोजना का अतिरिक्त भार केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ढो रहे हैं.

गंगा की सफाई को लेकर पिछले चार साल में सरकार की कुल यही उपलब्धि रही है.क्योंकि सरकार को भी नहीं मालूम कि उसने इस मामले में अबतक क्या हासिल किया है. एक आरटीआई अर्जी के जवाब में सरकार साफतौर पर कह रही है कि उसे पता ही नहीं, गंगा अब तक कितनी साफ हुई है.

गंगा की सफाई को लेकर अभियान चला रहीं कार्यकर्ता जयंती, सरकार से पूछ रही हैं कि गंगा की सफाई का बिगुल बजाए एक अरसा हो गया है, लेकिन सरकार ने सफाई के नाम पर कुछ घाट चमका दिए हैं, लेकिन सरकार के पास क्या गंगा के घटते जलस्तर पर कोई जवाब है? गंगा में जमी गाद को हटाने के लिए सरकार कर क्या रही है? इसे हटाए बिना जलमार्ग का विकास असंभव है, क्योंकि गंगा जब तक अविरल नहीं होगी, निर्मल भी नहीं होगी.

सरकार गंगा की सफाई पर अब तक 3,800 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है.

हाल ही में एक आरटीआई अर्जी के जवाब से खुलासा हुआ कि सरकार गंगा की सफाई पर अब तक 3,800 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. तब सवाल उठता हे कि जमीनी स्तर पर सफाई कहां-कहां हुई? इतनी बड़ी रकम कहां-कहां और किन मदों में खर्च हुई?

आरटीआई याचिकाकर्ता एवं पर्यावरणविद् विक्रम तोगड़ कहते हैं, “आरटीआई के तहत यह ब्योरा मांगा गया था कि अब तक गंगा की कितनी सफाई हुई है, लेकिन सरकार इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं करा पाई.”

वह कहते हैं, “सरकार क्या इतनी बात नहीं जानती कि गंगा में गंदे नालों के पानी को जाने से रोके बिना गंगा की सफाई नहीं हो सकती. नमामि गंगा के तहत सरकार ने गौमुख से गंगा सागर तक का जो हिस्सा कवर किया है, वहां के हालात जाकर देखिए, काई, गाद और कूड़े का ढेर देखने को मिलेगा. इसी तरह आप गढ़गंगा यानी गढ़मुक्ते श्वर का हाल देख लीजिए। सफाई हुई कहां है और हो कहां रही है?”

पर्यावरणविद् कहते हैं कि गंगा को लेकर ‘पॉलिटिकल विल’ में इजाफा तो हुआ है, लेकिन इस काम को विकेंद्रीकृत किए जाने की जरूरत है. ‘एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रोच’ अपनाए जाने की जरूरत है.

वह कहते हैं, “गंगा में पानी की भी कमी है. इसकी सहायक नदियों का अतिक्रमण हुआ है. सफाई के नाम पर खर्च अधिक हुआ है लेकिन फायदा कहीं दिख नहीं रहा है. कचरे के निपटान की व्यवस्था करनी भी जरूरी है. इसके लिए ट्रेनिंग नेटवर्क तैयार करना होगा.”

पर्यावरणविद जयंती कहती हैं, “समस्या यह है कि अभी जो काम हो रहा है, उसका असर अगले तीन से चार साल में देखने को मिलेगा लेकिन तब तक और गंदगी एवं कूड़ा इकट्ठा हो जाएगा। सरकार को नेचुरल ट्रीटमेंट प्रोसेस को शुरू करने की जरूरत है लेकिन लगता है कि सरकार गंभीर ही नहीं है.”

वह कहती हैं, “सरकार ने 2020 तक 80 फीसदी गंगा साफ करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन अभी तक कितनी साफ हुई है, इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया है. 2019 में कितनी गंगा साफ करेंगे इसका हिसाब भी किसी और को नहीं, सरकार को ही देना है.”

–आईएएनएस

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