जानिये असली ‘पैडमैन’ को जिसपर आधारित है अक्षय कुमार की आनेवाली फिल्म  

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शिखा कौशिक/  

अरुणाचलम मुरुगानान्थम महज 14 की उम्र तक ही स्कूल गए और उसके बाद रोजी-रोटी के लिए मुख्यतः मजदूरी का ही सहारा रहा. लेकिन इसी शख्स को वर्ष 2016 में पद्मश्री से नवाजा गया. इसके पहले 2014 में टाइम्स मैगज़ीन के सबसे अधिक प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में इनका नाम आया और अब अक्षय कुमार खुद अरुणाचलम की कहानी को बड़े परदे पर उतारने के लिए आ रहे हैं. अक्षय की इस आनेवाली फिल्म का नाम है पैडमैन.

अरुणाचलम ने अपनी पत्नी की तकलीफ समझने के लिए खुद कई दिनों तक सेनेटरी पैड का इस्तेमाल किया और उसी मेहनत से एक ऐसा सस्ता और बढ़िया पैड डिजाईन तैयार किया जिसका कि न केवल उनकी पत्नी बल्कि अन्य लड़कियां और महिलायें भी लाभ उठा रही हैं.

अरुणाचलम मुरुगानान्थम अपनी पत्नी शांति के साथ

इस कहानी की शुरुआत होती है वर्ष 1998 से जब अरुणाचलम की नई-नई शादी हुई थी. एक बार ये लोग तमिलनाडू के कोयम्बटूर स्थित अपने घर पर थे जब अरुणाचलम ने देखा कि उनकी पत्नी शांति बाथरूम से निकलकर बाहर जा रही थी और उनके हाथ में कुछ था, जो वह अपने नए नवेले पति सी छिपाना चाहती थी इसलिए उन्होंने उसे अपने पीछे छुपा रखा था.

जब इन्होंने पूछा कि क्या छिपा रही हो तो जवाब कुछ ऐसा मिला कि ‘यह तुम्हारे मतलब का नहीं है’. अपनी पत्नी के इस जवाब से हैरान अरुणाचलम उनके पीछे गए और पाया कि वह कुछ गंदे कपडे का टुकड़ा हाथ में लिए हुए हैं और छिपाना चाहती हैं. सोचने पर उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि कैसे उनकी पत्नी समेत भारत में ढेरों महिलायें अपने माहवारी (पीरियड) में अस्वस्थ तरीके अपना रही हैं.

उनके शुरूआती प्रयास आसान नहीं रहे और वे कई बार फेल भी हुए. उनके बनाए पैड्स में कभी लीक होने की समस्या तो कभी कुछ और  आती रही पर उन्होंने ने हार नहीं मानी

जब उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि वह सेनेटरी नैपकिन क्यों नहीं इस्तेमाल करती हैं तो जो जवाब आया वो और तकलीफदेह था. उनकी पत्नी ने कहा कि अगर मैं सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करुँगी तो घर का दूध खरीदने का जो बजट है सब उसी में लग जाएगा.

एक अच्छे पति की तरह अरुणाचलम एक सेनेटरी नैपकिन का पैकेट खरीद कर लाये. इन्होंने भी इसे पहली बार ही देखा था. उत्सुकतावश इन्होंने देखना शुरू किया कि आखिर यह किस चीज से बनता है. इसी पड़ताल में इन्होने पाया कि जिस कपडे के इस्तेमाल से एक पैड तैयार होता है उसकी कीमत लगभग दस पैसे आती है. लेकिन इसी को बड़ी-बड़ी कंपनिया चालीस गुना दाम पर बेचती हैं. उस दिन अरुणाचलम ने यह तय किया कि वह अपनी पत्नी के लिए ऐसा ही पैड खुद से अपने घर में बनायेंगे.

उनके शुरूआती प्रयास आसान नहीं रहे और वे कई बार फेल भी हुए. उनके बनाए पैड्स में कभी लीक होने की समस्या तो कभी कुछ और आती रही पर उन्होंने ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी पत्नी और अपनी बहन से निवेदन किया कि वे उनका बनाया पैड इस्तेमाल करें ताकि इनको इसकी कमी पता चल सके. इन नए पैड की कमियों से परेशान, घर की महिलाओं ने कुछ दिनों बाद ही उनके इस रिसर्च/प्रयोग में सहयोग देने से मना कर दिया.

इसके बाद इन्होंने नजदीक के मेडिकल कॉलेज की लड़कियों से संपर्क किया. इन लड़कियों को इन्होंने कहा कि वे इस पैड को इस्तेमाल करने के बाद उन्हें लौटा दें ताकि इससे पता चल सके कि ये सही से काम कर रहे हैं कि नहीं. अरुणाचलम का इन लड़कियों से सम्बन्ध उनकी पत्नी शान्ति को नागवार गुजरा. उन्हें लगा कि वह लड़कियों से संपर्क करने के लिए इसे बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.

शांति इनको छोड़कर चली गयी और तलाक मांग लिया.

इनकी पत्नी जा चुकी थीं, अन्य लड़कियों ने मदद करने से इनकार कर दिया था. तब इन्होंने खुद अपने पर प्रयोग करना शुरू किया. उन्होंने अपने कपडे कपड़े में जानवरों के खून की थैली लगाना शुरू कर दिया और उसपर खुद वह पैड पहनते थे. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा है, “ उन पांच छः दिनों में मुझे जो तकलीफ हुई उसका बयान करना मुश्किल है और मैं दुनिया की हर महिला को नमन करता हूँ जो हर महीने इस तरह की परेशानी से गुजरती हैं.”

करीब दो साल के लागातार प्रयास के बाद अरुणाचलम को पता चला कि बड़ी कम्पनियां पैड में एक तरह के फाइबर का इस्तेमाल करती हैं. जिस मशीन से यह पैड बनाया जाता है वह लाखों की आती थी. इनके पास न पैसा था और न ही वे महिलाएं जो इतने महंगे पैड का प्रयोग कर सकें.

अरुणाचलम मुरुगानान्थम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से पद्मश्री सम्मान प्राप्त करते हुए

इसको देखते हुए इन्होने एक नई मशीन इजाद की जिसकी लागत 75,000 रुपये आई. इसके लिए मुम्बई के एक व्यापारी ने उनकी मदद की. उसके बाद करीब 18 महीने लगे. इन्होंने अब तक कुल 250 ऐसी मशीनें तैयार कीं जो कई राज्यों में भेजी गईं. इन राज्यों में मध्यप्रदेश,  उत्तर प्रदेश, बिहार इत्यादि शामिल हैं. इनका दावा है कि ये मशीनें अभी करीब 24 राज्यों में इस्तेमाल हो रही हैं जिससे सस्ता सेनेटरी पैड बनाया जा रहा है.

अरुणाचलम के अधिकतर ग्राहक या तो एनजीओ हैं या महिलाओं द्वारा ही बनाये गए स्वयं सहायता समूह. एक मशीन से करीब 200 से 250 पैड रोजाना तैयार होते हैं और उनको करीब ढाई रुपये की दर से बेचा जाता है.

आपको बता दें कि अभी भी अपने देश में 85 प्रतिशत से अधिक महिलायें सेनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं करतीं. पीरियड के दौरान ये महिलायें तरह-तरह के तरीके अपनाती हैं जिसमें पुराना कपड़ा, राख इत्यादि का प्रयोग है. पीरियड के दौरान साफ़ सफाई नहीं रखने और इससे होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी के अभाव में महिलाएं तरह-तरह की समस्याएं और बीमारियाँ झेलती हैं.

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