ऑस्कर की उम्मीद है जल्लिकट्टु

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

कुछ अरसा पहले एक टीवी शो में सलमान खान ने ऑस्कर अवॉर्ड का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था कि वे इसकी परवाह नहीं करते! सलमान का ऐसा सोचना स्वाभाविक है। उनकी हर दूसरी फिल्म सौ करोड़ के क्लब में आसानी से शामिल हो रही है। बॉक्स ऑफिस पर सिक्कों की बरसात हो रही हो तो किसी भी अभिनेता को यह ग़लतफहमी हो सकती है कि वह सिने-जगत का स्टार है।

लेकिन क्या सलमान इस बात का विश्वास दिला सकते है कि बीस पच्चीस बरस बाद भी दर्शक उनकी फिल्मों को ढूंढ कर देखने का जतन करेंगे? साक्षात्कार लेने वाले उस टीवी के प्रस्तोता में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे इतना कड़वा सवाल सलमान जैसे सितारे से पूछ सके। सच यही है कि जो सिनेमा आज बन रहा है उसकी उम्र कुछ हफ़्तों की ही होती है। अधिकांश फिल्में सिर्फ पैसा वसूल करने और निर्माता के निवेश को बढ़ाने की रणनीति को ध्यान में रखकर ही निर्मित की जा रही हैं।

ऑस्कर निस्संदेह कलात्मक समृद्ध अमेरिकी फिल्मों को पुरस्कृत करने के लिए दिया जाता है। सिनेमा, मनोरंजन से इतर मनुष्य की कलात्मक और रचनात्मक प्रवृतियों को पोषित और सहेजने की चेष्टा का नाम भी है। ऑस्कर से सम्मानित अधिकतर फिल्में, फिर वे चाहे पचास बरस पुरानी ही क्यों न हो , इसी विचार को आगे बढ़ाती हैं। चूंकि इन फिल्मों के चयन में खासी पारदर्शिता का ध्यान रखा जाता है तो इन्हें वैश्विक स्तर पर दर्शकों की सराहना मिलती है।  अन्यथा ये फिल्में अनदेखी ही रह जातीं!

साठ के दशक से ही भारतीय फिल्मों को ऑस्कर के विदेशी भाषा खंड में हिस्सा लेने का मौका मिलता रहा है।  अफ़सोस की बात है कि इतने वर्षों में सिर्फ तीन मौके ऐसे आये है जब भारतीय भाषा की कोई फिल्म अंतिम चार में जगह बनाने में सफल हुई है।  वजह स्पष्ट है! भारतीय फिल्म निर्माता फिल्म के व्यावसायिक पक्ष को सबसे ऊपर रखते रहे हैं। उनके लिए कलात्मक पक्ष पर गौर करना कभी प्राथमिकता में नहीं रहा !

चुनांचे प्रतिवर्ष भारत से ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली फिल्में सरकारी नुमाइंदों की पसंद पर आधारित रही हैं।  ऐसा नहीं है कि भारतीय फिल्म निर्माता एकदम कलात्मक शून्य है या उनमें प्रतिभा की कमी है! लेकिन अधिकतर निर्माताओं का जोर सिर्फ  अपने निवेश को सुरक्षित रखने पर रहा है।

इस मामले में क्षेत्रीय सिनेमा ने हिंदी फिल्मों से ज्यादा जीवटता दिखाई है। मराठी, बंगाली या दक्षिण की फिल्मों ने भले ही ऑस्कर को प्रभावित न किया हो लेकिन उनकी कलात्मकता और विषय के चयन ने प्रमुख फिल्मोत्सवों में भारत का नाम अवश्य रोशन किया है।

अब 93 वे ऑस्कर समारोह में  भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए ‘जल्लिकट्टु’ (मलयालम) को चुना गया है। फिल्म के नाम से तमिलनाडु के लोक अंचल में होने वाले  ‘बैल दौड़’ की ग़लतफहमी हो सकती है। लेकिन यह कहानी केरल के पर्वतीय ग्रामीण कस्बे में एक भैंसे के कसाईखाने से भाग जाने की है।

वर्ष 2019 के टोरंटो फिल्म उत्सव में प्रीमियर होने के बाद इसका प्रदर्शन 24वें बुसान फिल्म फ़ेस्टिवल में भी किया गया। पचासवें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सव में प्रदर्शन के बाद निर्देशक लीजो जोस पेल्लिसेरी को ‘बेस्ट डाइरेक्टर’ की ट्रॉफी से नवाजा गया!

एक जानवर इस फिल्म का केंद्रीय बिंदु है लेकिन फिल्म हमें बताने की कोशिश करती है कि हरेक मनुष्य की  त्वचा के अंदर एक जंगली जानवर मौजूद है जो मौका मिलते ही अपना रूप दिखा देता है। मनुष्य को हिंसक पशु में बदलने में वक्त नहीं लगता। फिल्म इसी बात को सहज  तरीके से प्रकट करती है। फिल्म की फोटोग्राफी और संगीत का संयोजन गजब का है।

जब भी मौका मिले इस फिल्म को जरूर देखें। कुछ फिल्में आपका मनोरंजन नहीं करती बल्कि  आपको झकझोर कर जगाती हैं। जल्लिकट्टु अगर ऑस्कर के अंतिम चार में जगह बना लेती है तो सिनेमा के साथ यह देश के लिए भी गौरव का क्षण होगा! दुआ कीजिये कि यह फिल्म देश का मान बढ़ाए !

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 (रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं।)

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