वक्त रुकता नहीं कहीं टिक कर, इसकी आदत भी आदमी सी है

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह बीते 8 फरवरी को अगर जीवित होते तो अपना अठहत्तरवां जन्मदिन मना रहे होते. उनके जाने के सात सालों के समय पर नजर दौडाएं तो यकीन नहीं होता कि फिल्मों से ग़ज़लों का दौर भी उनके साथ ही चला गया.

ऐसा नहीं कि लोगो ने ग़ज़ल सुनना बंद कर दिया है. गजलों के शौकीन आज भी हैं और उनके पास बेहतरीन ग़ज़लों का खजाना पहले से कही बेहतर स्थिति में है. हिंदी फिल्मों में गजलों का चलन सिनेमा के आरम्भ से ही रहा है. समय-समय पर गीतों के साथ ग़ज़लों का प्रयोग कुन्दनलाल सहगल के जमाने से जारी है. गीतों के साथ ग़ज़लें लहर की तरह आती जाती रहीं. वर्ष 1982 में बी आर चोपड़ा की सलमा आगा और राजबब्बर अभिनीत फिल्म ‘निकाह’ की ग़ज़लों ने पुरे हिन्दुस्तान को सुरूर में डूबा दिया. यह सुरूर ऐसा था जिसने एक पीढ़ी को गजल की रुमानियत से रूबरू  कराया था.

बिरले होंगे जिन्होंने उस दौर में ‘ चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है ‘ नहीं सुना होगा. ग़ुलाम अली की हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक और पाकिस्तानी टोन के ब्लेंड में भीगी आवाज औसत श्रोताओं को पहली बार ग़ज़ल के संसार में ले गई.  देश का शायद ही ऐसा कोई घर बचा हो जिसकी चार दीवारी के भीतर उनके कैसेट न बजे हों.

ठीक इसी समय जगजीत सिंह अपनी पत्नी चित्रा के साथ अपने शिखर की यात्रा आरम्भ कर रहे थे. ‘होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो’ (प्रेमगीत) ये तेरा घर, ये मेरा घर (साथ साथ) लोकप्रियता की पायदान पर छलांगे भर रहे थे. यह वह मुकाम था जहाँ पहले से मौजूद फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी ग़ज़लों को  बड़ा ‘एक्सपोज़र’ मिलने वाला था. जगजीत की मखमली आवाज ने ग़ज़ल को ड्राइंग रूम से निकाल कर वैश्विक मंच दिलाया. होने को ग़ुलाम अली, बेगम अख्तर, मेहंदी हसन जैसे चोटी के गजल गायक थे, नामचीन भी थे, उनका अपना आभा मंडल था. लेकिन जगजीत ने ग़ज़लों को उर्दू के कठिन शब्दों से मुक्त कराकर इतना  सरल कर दिया कि वे साधारण संगीत प्रेमी की समझ के  भी दायरे में आ गईं.

जगजीत सिंह के जाने के बाद फिल्मों में ग़ज़लों का चलन जैसे थम सा गया है. ग़ज़लें नज़र तो आती हैं परन्तु अखबारों के कोने में. शौकीन अब भी है परन्तु उन्हें अपनी तरंग में  बहा ले जाने वाला शख्स नहीं है. ताज्जुब होता है कि कोई भी स्थापित गायक अब ग़ालिब, मीर, फैज़, इकबाल, दाग, दुष्यंत कुमार या निदा फाजली की अनसुनी ग़ज़लों को गाने का साहस क्यों नहीं करता?

ओशो के बारे में वरिष्ठ सिने समीक्षक श्री अजातशत्रु  ने टिपण्णी करते हुए लिखा था कि उन्होंने दर्शन और धर्म की क्लिष्ठ बातों को सरल शब्दों में आमजन तक पहुंचा दिया था। यही बात जगजीत के साथ गजलों के संदर्भ में भी कही जा सकती है। जगजीत ने खुद को तराशा था और उपरवाले ने उन्हें मखमली आवाज की नियामत बख्शी । जगजीत को लगातार सुंनने वाले बता सकते है कि वह सुरमई आवाज आदमी को भीड़ में अकेला कर देती है। एक साथ रूहानी ,रूमानी अनुभव महसूस करना है तो जगजीत को सुनते रहना जरुरी है .. खुद उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल में कहा था ‘ वक्त रुकता नहीं कही टिक कर, इसकी आदत भी आदमी सी है ….

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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