क्या नरेन्द्र मोदी गठबंधन की सरकार चलाने की तैयारी कर रहे हैं!

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उमंग कुमार/

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता नरेन्द्र मोदी आजकल अपने प्राकृतिक तौर-तरीकों से हटकर व्यवहार करते नज़र आ रहे हैं. क्या यह गठबंधन की सरकार बनाने की कवायद है?

हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की तारीफ की. मुद्दा था फानी चक्रवात से उत्पन्न हुई चुनौती को सही तरीके से निपटने का. उड़ीसा हमेशा से ऐसे समुद्री तूफ़ान और चक्रवात का शिकार होता आया है और पिछले कुछ सालों में राज्य सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसा तरीका ईजाद किया है जिससे कम से कम जानमाल का नुकसान हो.

खैर नरेन्द्र मोदी ने नवीन पटनायक की तारीफ की तब जब राज्य में लोकसभा और विधान सभा के चुनाव संपन्न हो गए हैं. चुनाव के दौरान तो दोनों दल एक दुसरे में अपने सारे हथियार आजमा लिए थे.

ठीक इसके एक दिन बाद मोदी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती के लिए भी कुछ हमदर्दी के बोल बोल दिए. जैसे यही कि समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस गुपचुप तरीके से मिलकर मायावती को धोखा देने की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि मायावती ने इससे निपटने में सख्ती दिखाई और लोगों से अमेठी और राय बरेली में बढ़चढ़कर कांग्रेस के लिए मतदान करने की अपील कर दी. अमेठी से कांग्रेस के उम्मीदवार स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी है तो पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी राय बरेली से चुनाव लड़ रही हैं.

सवाल यह है कि अचानक से नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्ति जो अपनी पार्टी में किसी नेता को भी तरजीह नहीं देता वो इन क्षेत्रीय दलों के लिए मीठे बोल कैसे बोलने लगा! क्या नरेन्द्र मोदी को लग गया है कि आने वाले दिनों में उनको इन क्षेत्रीय दलों की जरुरत पड़ने वाली है! क्या नरेन्द्र मोदी को यह अंदाजा लग गया है कि भाजपा तो दूर, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग भी 272 का जादुई आंकड़ा नहीं छूने जा रहा है!

हाल में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के बॉडी लैंग्वेज को ध्यान से पढ़े तो कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है. लखनऊ की एक सभा में अमित शाह अपनी ही पार्टी के एक अन्य नेता राजनाथ सिंह को ऐसे झुककर अभिवादन करते दिखे जैसा वो आजतक किसी और नेता के सामने नहीं देखे गए हैं. नरेन्द्र मोदी को छोड़कर.

इससे यह तो स्पष्ट हो ही रहा है कि भाजपा अब मान चुकी है कि अगर 2019 में वापस सत्ता में आते हैं तो इसके लिए अन्य नेताओं और क्षेत्रीय दलों से मिल मिलाकर ही चलना होगा. इसलिए शायद ये नेता क्षेत्रीय दलों से संबंध बढाने में लगे हैं.

पर मजेदार तथ्य यह है कि यह सब इन दोनों नेताओं के अब तक के दिखाए गए चरित्र से एकदम खिलाफ है. मजेदार यह देखना होगा कि क्षेत्रीय दल इन दोनों नेताओं के 2014 से अब तक दिखाए गए गरूर को तोड़ते हैं या सारे कड़वे अनुभव भुलाकर इनके साथ हो लेते हैं.

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