17 स्वर्ण पदक जीतने के बाद बॉक्सर को कुल्फी बेचनी पड़ रही है, पढ़िए क्यों

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अनिमेष नाथ/

हरियाणा के 28 वर्षीय दिनेश कुमार, एक समय मंझे हुए मुक्केबाज़ हुआ करते थे, पर समय ने ऐसी काया पल्टी कि आज वे सड़कों पर कुल्फी बेचने पर मजबूर हैं.

दिनेश के मुक्केबाजी का करियर बहुत ही छोटा था लेकिन उन्होंने इस थोड़े समय में काफी शोहरत हासिल कर ली थी. दिनेश ने राष्ट्रीय खेलों में 17 स्वर्ण, एक रजत और पांच कांस्य पदक अपने नाम किये थे. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी देश का प्रतिनिधित्व किया था.

परन्तु परिवार की ख़राब आर्थिक स्थिति ने  एक झटके में उन्हें मुक्केबाजी के करियर से निकालकर कुल्फी बेचने पर मजबूर कर दिया.

दिनेश का करियर बतौर मुक्केबाज़ सन् 2001 में शुरू हुआ था. उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में जीत हासिल कर अपने राज्य एवं देश को गौरन्वान्वित किया था. पर परिवार की ख़राब स्थिति के कारण उनका अंतर्राष्ट्रीय चैंपियन बनने का सपना पूरा होने से पहले ही टूट गया और उन्हें पिता के कुल्फी बेचने के व्यापार में साथ काम करना पड़ा.

कुल्फी बेचने पर मजबूर दिनेश आज लगभग दुनिया के लिए अपरिचित से हो गए हैं. दिनेश को एक ठेले पर कुल्फी बेचते हुए देखा जा सकता है, जहाँ उनके ठेले पर “दिनेश कुल्फी” लिखा हुआ है. दिनेश कहते हैं कि उनके पिता ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय खेलों में भेजने के लिए काफी क़र्ज़ लिया था, परन्तु बीच में एक दुर्घटना के कारण दिनेश घायल हो गए और यहीं से कहानी पलट गई. इलाज पर काफी पैसा खर्च हुआ और परिवार कर्ज तले दबता चला गया.

कुल्फी बेचकर वे दिन में 250-300 रुपये प्रतिदिन कमा लेते हैं परन्तु इस आमदनी से ऋण चुका पाना नामुमकिन सा प्रतीत होता है

दिनेश के खाते में 20 मेडल जीतने की उपलब्धि है और बावजूद इसके ये ऋण चुकाने के लिए अपने पिता के साथ कुल्फी बेचते हैं.

कुल्फी बेचकर वे दिन में 250-300 रुपये प्रतिदिन कमा लेते हैं परन्तु इस आमदनी से ऋण चुका पाना नामुमकिन सा प्रतीत होता है. दिनेश के अनुसार उन्होंने 2012 में आखिरी प्रतियोगिता में भाग लिया था.

बॉक्सिंग रिंग में वापिस जाने की इच्छा को व्यक्त करते हुए दिनेश बताते हैं, कि उन्होंने इस खेल से संपर्क नहीं खोया है, उन्हें वही आत्मविश्वास वापस पाने के लिए बहुत सी ऊर्जा, प्रयास, और सबसे महत्वपूर्ण धन की आवश्यकता होगी.दिनेश और उनके परिवार ने अब सारी उम्मीदें खो दी हैं. सरकार से भी उन्हें किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता की उम्मीद नहीं है. इन परिस्थितियों में भी दिनेश कई बच्चों को बॉक्सिंग की कोचिंग देते हैं.

दिनेश के कोच ने सरकार से इनके लिए मदद की अपील भी की थी. उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार को बताया, “दिनेश एक बॉक्सर के रूप में बहुत फुर्तीले थे. दिनेश ने जूनियर प्रतियोगिताओं में भी पदक जीते हैं. चोट के कारण वे क़र्ज़ में डूब गए और उन्हें कुल्फी बेचने पर मजबूर होना पड़ा. अगर सरकार अभी भी दिनेश की मदद करती है तो वह कर्ज से मुक्त हो जाएगा और एक अच्छा बॉक्सर बर्बाद होने से बच जाएगा.”

यह एक ऐसी कहानी जो हमारे देश में खिलाडियों की दुर्दशा को बयाँ करती है. दिनेश जैसे कई खिलाड़ी हैं जो कि सरकार की उदासीनता के शिकार हैं.

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