पुस्तक-अंश: विकास या पर्यावरण के द्वन्द पर क्या था इंदिरा गाँधी का रुख?

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विकास, जन-साधारण और हाशिए पर रह रहे लोगों के बीच संतुलन की कोशिश शायद अभी सबसे मुश्किल चुनौती है.अगर इसके साथ लगातार ख़राब हो रही पर्यावरण की हालत और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे जोड़ दिए जाएँ तो चुनौती और बढ़ जाती है.

अभी जबकि नीतियाँ और सरकारें तेज़ी से पूँजीवाद और उसपर आधारित कुछ के विकास के लिए हाशिए और पर्यावरण संबंधी संसाधनों के ख़िलाफ़ युद्ध कर रही हैं और जनता उनके लिए वोटबैंक हो चुकी है, इंदिरा को और उनके फ़ैसलों को याद करना और ज़रूरी हो जाता है. 

इतने सालों पहले इंदिरा के लिए ये प्रमुख चिन्ताएँ थीं, ना कि चुनाव जीतना. स्टॉकहोम के पर्यावरण सम्मलेन में भाग लेने वाली, पर्यावरण के लिए अलग मंत्रालय बनाने वालीं, प्रोजेक्ट टाइगर के लिए जी-जान लगाने वाली और पक्षियों को देखते हुए बचपन की ओर लौट जाने वाली प्रधानमंत्री का सही मूल्याँकन सम्भवत: अभी बाक़ी है.

अनुवाद करते हुए, जिन पक्षों को जाना, प्रधानमंत्री इंदिरा की जिन सूक्ष्मताओं से परिचय हुआ, सब हैरत भरा था और कई बार गर्व के क़ाबिल भी. —अंचित (अनुवादक)

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यहाँ प्रस्तुत है जयराम रमेश की किताब “इंदिरा गांधी : प्रकृति में एक जीवन”के छठे अध्याय का एक अंश जो इंदिरा के पर्यावरण, हाशिए पर रह रहे लोगों और विकास, तीनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिशों की एक झलकी है.

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1980 में इंदिरा तीन बाँधों की समस्या से जूझ रही थीं- साइलेंट वैली, टिहरी और लालपुर. तीनों जगहों पर बड़े फ़ायदे और बड़े नुक़सान थे.

12 जनवरी को इंदिरा केरल में चुनाव प्रचार कर रही थीं. श्री पद्मनाभस्वामी मंदिरमें पूजा के बाद, एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में उनसे साइलेंट वैली के बारे में पूछा गया. उन्होंने जवाब दिया:

[…] सब केरल के आर्थिक विकास के बारे में बहुत चिंतित हैं. बिजली की भी ज़रूरत है.इस स्थिति को बेहतर करने के लिए सब कुछ होना चाहिए. रोज़गार बढ़े और बेहतर अवसर मिलें. ठीक इसी समय दुनिया में यह भी धारणा बन रही है कि यह सब पर्यावरण को ध्यान में रख कर होना चाहिए वरना आगे हमें ही दिक्कत होगी. आज साइलेंट वैली को लेकर दुनिया बहुत आक्रोशित है. मुझे बताया गया है कि हमें जो फ़ायदा होगा वह हमारे नुक़सान से ज़्यादा नहीं होगा. हमें देखना चाहिए कि जंगलों को मिटाए बिना काम हो जाए.

यह चुनावों के ठीक पहले एक बहादुरी भरा जवाब था – ख़ास कर तब जब प्रोजेक्ट से 240 मेगावाट सस्ती बिजली बनने की बात थी. साथ ही 10000 हेक्टेयर ज़मीन को सिंचाई के लिए पानी मिलता. कांग्रेस की प्रमुख विपक्षी लेफ़्ट पार्टियाँ इसके पक्ष में थीं और स्थानीय कांग्रेस नेता भी इसके लिए सहमत थे.

राष्ट्रीय चुनाव जीतने के दो दिन बाद, इंदिरा ने केरल के राज्यपाल जोथी वेंकटाचल्लाम को ख़त लिखा. 17 जनवरी को त्रिवेंद्रम में मिलने पर उन्होंने ख़ुद वह ख़त उन्हें दिया:

केरल के साइलेंट वैली प्रोजेक्ट को लेकर पहले भी कुछ बात हुई है. अब मुझे प्रेस से पता चला है कि केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर है. उसका कहना है कि केरल हाई कोर्ट ने अब काम पर रोक का ऑर्डर निरस्त कर दिया है.

यह क़ानूनी मसला नहीं है बल्कि पर्यावरण और संरक्षण की बात है. एक ऐसे जंगल को बचाना है जो दुनिया का एकलौता ट्रॉपिकल वर्षा जंगल है. दुनिया भर के जानेमाने लोग इस बारे में चिंता कर रहे हैं.

मेरा मानना है कि काम रुक जाना चाहिए. इस बारे में आने वाली सरकार से बात करना बेहतर होगा.

इंदिरा की पार्टी चुनाव हार गयी और लेफ़्ट डेमक्रैटिक फ़्रंट (एल.डी.एफ.) सत्ता में आया. ई.के.नयनार मुख्यमंत्री बने. आई.यू.सी.एन के डिरेक्टर-जनरल डेविड मनरो ने इंदिरा को 25 जनवरी को ख़त लिख कर साइलेंट वैली जंगलों को बचाने की बात की. इंदिरा ने 8 फ़रवरी को जवाब दिया:

मेरी भी यही चिंता है.

चुनाव के पहले मैंने राज्यपाल से काम रुकवाने को कहा था. अब वहाँ मार्क्सिस्ट सरकार है जो प्रोजेक्ट आगे बढ़ाना चाहती है. अगर हम उन्हें किसी दूसरी जगह से बिजली नहीं देंगे तो मुझे डर है कि हम जंगलों को नहीं बचा पाएँगे.

इंदिरा गांधी नयनार पर काम करने लगीं. उन्होंने उन्हें 6 मार्च को ख़त लिखा:

मैंने राज्यपाल को 16 फ़रवरी को ख़त लिख कर वैली का काम रोकने को कहा था. यह पर्यावरण के संरक्षण का मुद्दा है और ये दुनिया के इकलौते वर्षावन हैं. […]उसके बाद मुझे इस वर्षावन के वनस्पति विज्ञान के ऊपर एक रिपोर्ट भी मिली है. बटैनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की टीम ने मुझे बताया कि यहाँ एक अनछुआ जीनपूल है और ऐसे कई पौधे हैं जिनसे कई दवाइयाँ बन सकती हैं. मैं सलाह देना चाहूँगी कि इस प्रोजेक्ट पर तब तक काम रुका रहे जब तक इस मामले पर नयी सरकार के साथ बातचीत नहीं होती.

हमने केरल सरकार से कुछ सुना नहीं पर प्रेस में यह ख़बर आ रही थी कि केरल सरकार साइलेंट वैली के पक्ष और विपक्ष में मत ले रही थी और निर्णय से पहले केंद्र सरकार से बात करना चाहती है. अगर ऐसा है तो मुझे कहना होगा कि आप बहुत सही तरीके से इस मसले को देख रहे हैं. मैं यह सलाह देना चाहूँगी कि अधिकारियों के स्तर पर एक बातचीत होनी चाहिए. उसके बाद हमलोग भी बात कर सकते हैं.

दूसरी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया पर प्रधानमंत्री लगी रहीं. 5 मई को उन्होंने फिर से मुख्यमंत्री को लिखा:

मुझे आपका कोई जवाब नहीं मिला.मुझे प्रो. स्वामीनाथन से यह सुन कर अच्छा लगा कि उनकी, प्रो.मेनन की और कुछ अधिकारियों की आपसे और आपके सहयोगियों और अधिकारियों से लम्बी बात हुई. मैं मानती हूँ कि आप जानते हैं कि अगर इन जंगलों को किसी तरह भी और नुक़सान पहुँचा तो बड़ी दिक्कत होगी. साइलेंट वैली को नैशनल पार्क बनाने के लिए काम शुरू होना चाहिए. ऐसा वाइल्डलाइफ़ प्रटेक्शन ऐक्ट ऑफ़ 1972 के सेक्शन 35(1) के अधीन किया जा सकता है. इसमें केंद्र सरकार मदद कर सकती है और कुंदस, अट्टापडी, न्यू अमराबलम और साइलेंट वैली रिज़र्व फ़ॉरेस्ट (कुल इलाक़ा -38952 हेक्टर.) को मिला कर किया जा सकता है. इससे सभी तरह की घुसपैठ और कटाई रुक जाएगी.

हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट शुरू करने के बारे में ठीकठाक जानकारी मिलते ही काम शुरू किया जा सकता है. मुझे जानकारी मिली है कि वैज्ञानिकों का जमा किया हुआ डेटा हमें एक महीने में मिल जाएगा. फिर इस के आँकलन के लिए राज्य और केंद्र की एक मिली जुली सरकारी कमिटी बनाई जा सकती है ताकि सबसे अच्छा निर्णय लिया जा सके.

मुख्यमंत्री ने आख़िरकार 20 मई को जवाब दिया कि 1979 में विधानसभा द्वारा पास किया गया क़ानून साइलेंट वैली को बचाने के लिए काफ़ी था और वे आगे चलकर दूसरे उपायों पर ध्यान देने के लिए तैयार थे. लेकिन वे चाहते थे कि प्रोजेक्ट तुरंत शुरू हो. इंदिरा गांधी ने इसी ख़त पर लिखा:

हमें तुरंत दूसरे उपाय खोजने होंगे.

यह एक ऐसा मसला था जिसपर देश-दुनिया के संरक्षणवादी इंदिरा को लिख रहे थे. इनमें सलीम अली भी शामिल थे. आख़िरकार 2 जून के सलीम अली के एक ख़त पर इंदिरा ने लिखा:

अब इसपर बहुत बात हो रही है. तुरंत कोई कारवाई होनी चाहिए.

उनके लिए कारवाई का मतलब केरल के लिए बिजली का कोई और स्त्रोत खोजना था. वह तय कर चुकी थीं कि वह साइलेंट वैली प्रोजेक्ट को मंज़ूरी नहीं देंगी. 17 जुलाई को उन्होंने तीसरी बार ई.के.नयनार को यह बताया :

मेरे पास आपका 20 मई का ख़त है. मुझे पता है कि आप जल्दी से जल्दी अपने राज्य में बिजली की समस्या का समाधान चाहते हैं. मुझे उम्मीद है कि आप समझेंगे कि मैं क्यों बिना पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाए बिजली पैदा करने के तरीके खोजना चाहती हूँ. इस दिशा में बढ़ने के लिए हम वह सब करेंगे जो सम्भव है. साइलेंट वैली पर रिसर्च के लिए कई टीमों ने काम किया. इनमें, ‘बटैनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, बीरबल साहनी इन्स्टिटूट ऑफ़ पेलीयोबॉटनी, नैशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रीसॉर्सेज़ एंड सेंटर ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी ऑफ़ बॉटनी और यूनिवर्सिटी बॉटनी लैब्रॉटॉरी, मद्रास के सदस्य थे. इन्होंने अपनी शुरुआती रिपोर्ट जमा कराई है और इससे यह निष्कर्ष निकला है कि साइलेंट वैली, इस हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए सही जगह नहीं है. लेकिन मुझे पता है कि बिजली बनाने के लिए कोई और तरीक़ा खोजना होगा और अगर आपकी सरकार राज़ी हो तो हमलोग तुरंत इसपर बात करना शुरू करें. तब तक मुझे उम्मीद है कि साइलेंट वैली को नैशनल पार्क बनाने का काम तुरंत शुरू हो जाएगा.

आप अगली बार दिल्ली आने के बारे में मुझे सूचना दें ताकि हमलोग मिल कर इसपर बात कर सकें.

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री की बात मान ली. वे, राज्य के ऊर्जा मंत्री और अपने अन्य सहयोगियों के साथ प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों से 7 अगस्त को मिले. केरल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के अध्यक्ष, सी.के.कोचूकोशी उस बैठक का हिस्सा थे. बाद में, उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा:

हम काफ़ी समय तक इस मसले पर बात करते रहे और मुझे हैरत हुई कि प्रधानमंत्री ने इतना समय दिया[…] उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों की एक कमिटी बने और ख़ास शोध कर तीन महीने के भीतर एक रिपोर्ट जमा की जाए. हमारी सलाह थी कि कमीट एम.जी.के. मेनन की अध्यक्षता में बननी चाहिए. इसे मान लिया गया. हम त्रिवेंद्रम लौटते हुए यह मान चुके थे कि अभी के लिए तो प्रोजेक्ट रुक गया.

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(अंचित मुख्यतः कवि हैं और बीते दिनों मार्केस के अजर-अमर पात्रों पर लिखीं इनकी कविताओं ने सबका ध्यान खींचा था. सौतुक पर अंचित की कुछ बेहतरीन कविताएँ  उपलब्ध हैं. हाल ही में इन्होंने जयराम रमेश की किताब “इंदिरा गांधी : प्रकृति में एक जीवन” का हिंदी में अनुवाद किया है. यह पुस्तक ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हुई है. इस लिंक पर चटका लगाकर आप इस पुस्तक को खरीद सकते हैं.)

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अंचित से इनके मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.

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