कोविड-19: मीडिया पर लगाम से सरकारें लोगों की जान नहीं अपनी छवि बचाने की कोशिश में

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तस्वीर सेफन्यूज़रूम.ऑर्ग से आभार ली गई है।
तस्वीर सेफन्यूज़रूम.ऑर्ग से आभार ली गई है।

राजा रंजन/

भारत अभी कोविड-19 की दूसरी वेव से जूझ रहा है। लाखों लोग रोज कोरोना की जद मेन आते दिख रहे हैं तो हजारों की जान जा रही है। सरकारें नदारद हैं। अपने प्रिय जनों को ऑक्सिजन के लिए जूझते देखकर लोग ट्वीटर जैसे प्लैटफ़ार्म पर अजनबियों से मदद की गुहार लगा रहे हैं। जो सरकार लोगों की मदद करने में असफल है उसे यह बहुत नागवार गुजर रही है कि लोग खुलेआम मदद क्यों मांग रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने तो ऐसे लोगों को एफआईआर करने की धमकी तक दे डाली। केंद्र सरकार जिसके मुखिया देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हैं और वे पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहे थे। इस किरकिरी से बचने के लिए इनकी सरकार ने ट्वीटर पर दबाव बनाया और पचास के करीब अकाउंट को सस्पेन्ड करा दिया। ऐसे ही किसान आंदोलन के समय किसानों का समर्थन कर रहे कई सारे ट्वीटर हैंडल को सस्पैंड करा दिया जिसमें दी कैरवान नाम की मशहूर पत्रिका का ट्वीटर अकाउंट भी शामिल था। भारत में मीडिया को नियंत्रित करना कोई नया नहीं है और सरकार पर इस तरह के आरोप लगते रहे हैं।

हद तो तब हो गयी जब 26 अप्रैल को ऑस्ट्रेलिया में भारतीय दूतावास ने दी ऑस्ट्रेलियन अखबार को पत्र लिखकर एक लेख पर आपत्ति दर्ज कराई और रीजॉइन्डर प्रकाशित करने की मांग की गयी। दी ऑस्ट्रेलियन अखबार ने इसके पहले भारत में कोरोना की स्थिति पर दी टाइम मैगजीन में प्रकाशित एक लेख का पुनः प्रकाशित किया था।

कोरोना-काल में भारत सरकार द्वारा मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास कोई अनोखा नहीं माना जाएगा क्योंकि कई अन्य देशों में सरकारें अपनी असफलता छिपाने की कोशिश इसी तरह से कर रहीं हैं।

हर साल वैश्विक स्तर पर प्रेस की आजादी के संदर्भ में सूचना प्रकाशित करने वाली संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने इस साल प्रेस की आजादी को महामारी से भी जोड़कर देखा है। और स्पष्ट किया है कि कोरोना महामारी की वजह से जनता सूचना के अभाव से ग्रसित रही है। इस संस्था की तरफ से जारी आंकड़ों से पता चलता है कि कैसे पत्रकारिता को संपूर्ण रूप से 73 देशों में रोक दिया गया है।  इसके अनुसार करीब 59 देशों में पत्रकारिता को पंगु बना दिया गया है।

महामारी के दौर में हमने यह देखा कि कैसे फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार का चलन बढ़ गया है और इसको रोकने के लिए पत्रकारिता नाम की वैक्सीन ही एक कारगर जरिया है। लेकिन प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 के सूचकांक से स्पष्ट होता है कि इस महामारी के दौर में 180 देशों के 73% हिस्से में पत्रकारिता को पूरी तरह या आंशिक रूप से रोक दिया गया था।

इस साल भी स्कैंडिनेवियन देशों ने प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में अच्छा प्रदर्शन किया है। 2002 से वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम द्वारा यह बताया जा रहा है कि किसी एक देश में एक पत्रकार को कितनी आजादी प्राप्त है। इनके मूल्यांकन के पैमाने मीडिया की स्वतंत्रता की स्थिति के साथ-साथ वहां काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर आधारित होता है।

इस साल की रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर प्रेस की आजादी को लेकर चिंता जताई गई है। ईरान में मीडिया को कोविड-19 से होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग करने से रोका गया। हंगरी और अन्य जगहों पर पत्रकारों को महामारी पर रिपोर्टिंग करने की वजह से अपराधिक मुकदमे झेलने पड़े। मिस्र में महामारी से संबंधित सरकारी आंकड़ों के अलावा अन्य आंकड़ों पर विश्लेषण और रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी गई।

इन पाबंदियों से एक बात तो साफ है कि वैश्विक स्तर पर अधिकतर सरकारें चाहती हैं कि उनकी जनता जमीनी हकीकत से वंचित रहे और सरकारी मशीनरी तथा इसके सहयोगी संस्थाओं द्वारा किये जा रहे दुष्प्रचार को स्वीकार करती रहे।

इस महामारी के साथ फेक न्यूज़ का चलन भी बहुत तेजी से बढ़ा है। कोरोना वायरस की उत्पत्ति, किसी समुदाय को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना यह सब एक दुष्प्रचार था, जिसे खुद सरकारों का संरक्षण प्राप्त था।

कोविड-19 के दौर में सरकारों के दावे झूठे साबित होते दिख रहे थे इसी वजह से प्रेस को वैश्विक स्तर पर कोरोना की रिपोर्टिंग करने से रोका जा रहा है।

दूसरी तरफ इस संकट और संक्रमण काल में रिपोर्टिंग करना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। एक रिपोर्ट के अनुसार अब तक कुल 1060 मीडिया कर्मचारियों की वैश्विक स्तर पर मृत्यु कोरोना वायरस की वजह से हो चुकी है। भारत में पिछले 28 दिनों में कोरोना से 52 पत्रकारों की जान चली गयी। कोरोना वायरस से जुड़ी जरूरी खबरों को बाहर लाने के प्रयास में पत्रकारों पर जर्मनी और अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हमले हुए।

वापस भारत की तरफ लौटते हैं। क्या भारत में पत्रकारों को कोरोना वायरस के दौर में वह आज़ादी प्राप्त है जिसके जरिए वह स्वतंत्र तरीके से पत्रकारिता कर सके। पश्चिम बंगाल की मशहूर आनंद बाजार पत्रिका के पूर्व संपादक अनिर्बान चट्टोपाध्याय के इस्तीफे के बाद यह सवाल उठने लगे कि क्या भारत में महामारी की खबरों को प्रकाशित करने की आजादी है?

भारत में पिछले 28 दिनों में कोरोना से 52 पत्रकारों की जान चली गयी

पिछले साल हिमाचल प्रदेश की सरकार ने छह पत्रकारों के ऊपर मामले दर्ज कराए जब इन पत्रकारों ने प्रवासी मजदूरों के संदर्भ में रिपोर्टिंग की। इसी प्रकार तमिलनाडु में एंड्रू सैम राजापांडियन नाम के एक डिजिटल पत्रकार को गिरफ्तार किया गया सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके द्वारा उनके पोर्टल पर कोरोना वायरस से संबंधित कुछ लेख प्रकाशित किए गए थे।

मानव अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त मिचेल बैचलेट ने इस बात को लेकर चिंता जताई थी कि एशिया में कोविड-19 के दौर में अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया जा सकता है। उन्होंने भारत के अलावा और 12 देशों को अपने इस लिस्ट में रखा था और यह कहा था कि महामारी के दौर में यह देश सेंसरशिप का और मजबूती से इस्तेमाल कर सकते हैं। इस साल भारत की रैंकिंग प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 142वे स्थान पर है पिछले साल भी भारत इसी स्थान पर था। भारत का पड़ोसी मुल्क भूटान का स्थान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 67 वां है। आज के दौर में फेक न्यूज़ फैलने की दरअसल और सच्ची खबरों से 7 गुना ज्यादा है।  इस वक्त सिर्फ प्रेस की आजादी इस फेक न्यूज़ नामक वायरस के खिलाफ वैक्सीन की तरह काम कर सकती है।

इसी हफ्ते जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह कोविड का इलाज कराकर एम्स, दिल्ली से बाहर आए तो उन्होंने केंद्र और राज्यों सरकारों से निवेदन किया कि वे कोरोना से जुड़े आंकड़े न दबाएं। इससे फायदा यह होगा कि जनता समस्या की भयवाहता समझेगी तो सावधानी भी बरतेगी। सरकारों का बोझ कम होगा। इतनी साधारण सी बात क्या सरकारें समझेंगी?

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(राजा रंजन मध्य प्रदेश के भोपाल शहर मे रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं। इस लेख के साथ प्रकाशित बैनर तस्वीर सेफन्यूज़रूम.ऑर्ग से आभार ली गई है।)

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