दिवाली का त्योहार सबके लिए अच्छा गुजरता है सिवाय लक्ष्मी के वाहन के

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शिखा कौशिक/

दिवाली का त्यौहार बस बीता ही है. सबने जोर-शोर से इस उत्सव का आनंद लिया. लक्ष्मी के आगमन से जोड़कर देखे जाने वाले इस त्योहार से जुड़ा सबकुछ, सबके लिए आनंद और उल्लास वाला होता है सिवाय लक्ष्मी के वाहन यानि उल्लू के. दिवाली का समय इन पक्षियों के लिए सबसे बुरा होता है.

इस पर्व की आड़ में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो काला जादू कर लोगों के उज्जवल भविष्य बनाने का दावा करते हैं. इसके लिए वे लोग उल्लुओं का शिकार करते हैं. इस वजह से प्रत्येक दिवाली के मौके पर हज़ारो उल्लुओं की जान जाती है.

उल्लू को लेकर लोक में कई तरह की धारणाएं हैं. कुछ लोग इस पक्षी को शुभ मानते हैं तो कुछ लोग अशुभ. गृहस्थ और ग्रामीण जीवन के बहुत करीब रहने वाले इस पक्षी की फसलों की रक्षा में अहम भूमिका भी है पर इसे सामान्य पक्षी की तरह नहीं देखा जाता.

इन मान्यताओं का फायदा उठाकर कुछ तांत्रिकनुमा लोग उल्लुओं का शिकार करते हैं और फिर उनका कारोबार.

कुछ सालों पहले दी वाइल्डलाइफ ट्रेड मोनिटरिंग नेटवर्क (TRAFIC) नाम की एक संस्था ने इस पर अध्ययन किया था और पाया कि भारत में उल्लुओं की कई प्रजातियाँ पायी जाती हैं और इनमें से 13 का अवैध व्यापार होता है.

भारत में उल्लुओं की कई प्रजातियाँ पायी जाती हैं और इनमें से 13 का अवैध व्यापार होता है

इस संस्था की रिपोर्ट के अनुसार, “काले जादू में उल्लुओं के विभिन्न अंगों का उपयोग किया जाता है. ये अपने इस जादू की प्रकिया में जिन्दा उल्लुओं की खोपड़ी, पंख, कान, दिल, यकृत, गुर्दे, रक्त, आँखें,  चोंच इत्यादि का पूजा में इस्तेमाल कर लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं.”

इस मुद्दे पर कुछ अन्य विशेषज्ञों ने अध्ययन किया तो पाया कि ये तांत्रिक लोगों को यह बताकर गुमराह करते हैं कि उल्लू की बलि देने से वेस्वयं को  बीमारियों एवं बुरी आत्माओं से बचा सकते हैं. इसके लिए ये तांत्रिक बड़ी संख्या में इन पक्षियों का शिकार करते हैं.कान वाले उल्लूइन कुप्रथाओं का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं. वैसे तो यह अंधविश्वास सालों भर चलने वाला है पर तांत्रिको के द्वारा दीपावली के समय इनउल्लुओं की बलि देना सबसे शुभ माना जाता है.

ट्रैफिक इंडिया के प्रमुख साकेत बडोला ने मीडिया को बताया था कि ट्रैफिक इण्डिया की रिपोर्ट का उद्देश्य सरकार को और लोगों को इस अवैध व्यापार से अवगत करना था. उनके अनुसार उल्लुओं के शिकार और बलि देने की प्रक्रिया दशहरा से ही शुरू हो जाती है औरदीपावली आते-आते यह प्रक्रिया बहुत जोर पकड़ लेती है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि उल्लू छोटे कीड़े-मकोड़ों को खाकर, फसलों को बचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. भारत के वन्य जीव सरंक्षण अधिनियम के तहत उल्लुओं का व्यापार, शिकार अथवा उनके अंगों की तस्करी पूर्णतया प्रतिबंधित है. उल्लुओं की घटती संख्या को देखकर सरकार ने यह प्रतिबन्ध लगाया है लेकिन यह प्रतिबन्ध तभी काम करेंगे जब लोग जागरुक होकर ऐसे अंधविश्वास से किनारा करेंगे.

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