कमजोर रह गया मध्य प्रदेश का अल्पेश

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अंकित/

अंकित

बीती सर्दियाँ भी सियासी हलचल की गवाह रही, उस वक़्त चुनाव गुजरात मे थे, इसबार मध्य प्रदेश और अन्य प्रमुख राज्यों में चुनाव हाल ही में सम्पन्न हुए हैं। गुजरात चुनाव का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि मध्यप्रदेश और गुजरात दोनो में काँग्रेस बड़ी मुस्तैदी से चुनाव लड़ रही है। और दोनो राज्यों में एक ही चाल को दो बार चला गया है। जो गुजरात मे अल्पेश ठाकोर थे, वही मध्यप्रदेश में हीरालाल अलावा।

काँग्रेस ने इस बात को अच्छे से समझ लिया था की जनता भाजपा से तो नाराज़ है लेकिन इतनी आसानी से काँग्रेस को विकल्प नहीं मानेगी। चुनाव से महीनो पहले दलित, पिछड़ो के नाम पर आंदोलन पैदा हुये फिर उस आंदोलन से नेता और फिर उन नेताओ ने खुद को वोट लेने और बीजेपी को टक्कर देने लायक साबित किया। गुजरात मे भाजपा को सीधी टक्कर देने के लिए आंदोलन से जो नेता निकले वो चुनाव आते आते तक वोट खींचने वाले बन गए और फिर जो हुआ वो चौंकने वाला भी नहीं था, चुनाव से कुछ दिन पहले अल्पेश ने काँग्रेस को समर्थन दे दिया। हालांकि इससे काँग्रेस की सरकार तो नहीं बनी लेकिन काँग्रेस ने खुद के खत्म होने वाली अटकलों पर विराम लगा दिया।

बिलकुल यही राजनैतिक चाल का अनुसरण हुआ मध्य प्रदेश चुनाव में। महीनो पहले दिल्ली एम्स मे अच्छी ख़ासी असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी कर रहे है हीरालाल अलावा नौकरी छोड़कर आदिवासी हितो की लड़ाई के लिए अपने गृहक्षेत्र निमाड़ पहुंचे।

इस क्षेत्र के लोगो की बुनियादी जरूरतों की लड़ाई हमेशा से चल रही है। ये आज भी सरकार से अपने हक के लिए लड़ रहे है।  दोनों ही बड़ी राजनितिक दल इनको अपना वोट बैंक मात्र बनाकर रखना चाहते हैं। हीरालाल अलावा के रूप मे इन लोगो को अपना मसीहा मिला।

वो आदिवासी युवा जो राजनीति की बुनियादी समझ रखता था, वो मोदी सरकार और आरएसएस की मानुवादी विचारधारा के खिलाफ खुलकर लड़ने के लिए तैयार था उसने हीरा अलावा को अपना नेता मान लिया और उसके साथ ही ‘जयस’ (जय आदिवासी युवा शक्ति) नामक संगठन की नीव रखी गई। जिसके झंडे के नीचे आदिवासी युवायो ने बड़े बड़े नेताओ को अपनी ताकत कई बार दिखाई और लोगो का भरोसा जीता। और वही काँग्रेस के इशारे पर ही पास के बड़े शहर इंदौर के कई समाजसेवी और प्रबुद्धजन जयस की ताकत बढ़ाने मे लग गए और मीडिया ने भी इनको तरजीह देनी शुरू की।

ये सब बिलकुल गुजरात मे हुई राजनीति के नमूने की तरह हो रहा था लेकिन जयस और गुजरात मे बने अल्पेश के संगठन मे एक बहुत ही महीन फर्क रह गया

ये सब बिलकुल गुजरात मे हुई राजनीति के नमूने की तरह हो रहा था लेकिन जयस और गुजरात मे बने अल्पेश के संगठन मे एक बहुत ही महीन फर्क रह गया, अल्पेश के संगठन ने अपने आपको एक दलित आंदोलन से उठाकर लोगो के बीच राजनीतिक विकल्प के रूप मे लाकर रख दिया लेकिन ये कमी म.प्र. मे जयस के साथ रह गई वो आंदोलन तो बड़ा बन गए लेकिन खुद को राजनीतिक या चुनावी विकल्प साबित नही कर पाये। अब वक़्त काँग्रेस का था, जयस आदिवासियों मे वो काम कर चुका था जिसकी ज़रूरत काँग्रेस को थी, बीजेपी के लिए ‘वोटबंदी’, जिसका सीधा फायदा काँग्रेस को ही होना था जो की11 दिसंबर को स्पष्ट हो जाएगा।

शायद काँग्रेस ने जयस पर लगाम शुरू से कस रखी थी इसीलिए सीट की मांग को लेकर ज्यादा रस्साकशी नहीं हुई 15 सीट की मांग करने वाले अलावा को एक सीट से संतुष्ट होना पड़ा। काँग्रेस को समर्थन देने पर जयस मे अंदरूनी उठापटक भी हुई लेकिन संगठन का नेत्रत्व शुरू से एक ही व्यक्ति के पास ही रहा तो उस उठापटक की आवाज़ बाहर कम ही आई। कुछ आदिवासी युवाओ ने हीरा अलावा का काँग्रेस मे जाने पर भी साथ नहीं छोड़ा और कुछ ने इसे आंदोलन के साथ धोखा कहकर खुदकों अलग कर लिया। जयस के नाम पर मात्र खुद की एक सीट लेकर आए अलावा मनावर विधानसभा क्षेत्र से लड़ रहे है। म.प्र. का अल्पेश गुजरात के अल्पेश जितना मशहूर तो हो नहीं पाया, हो सकता है काँग्रेस इतना ही मशहूर करना चाहती हो और यही कारण रहे की गुजरात मे पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन पर खुश हुये थे यहा शायद सरकार ही बना ले।

(अंकित मध्य प्रदेश में आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए हैं. चुनावी राजनीति में खासा दिलचस्पी है और पेशे से अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन सलाहकार हैं)

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