पद्मावत फिल्म पर परेशान राजस्थान के महज तीन फीसदी बच्चों को समुचित भोजन नसीब

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उमंग कुमार/

भारत के महज दस फीसदी बच्चों को ही जरुरी पोषण के हिसाब से सम्पूर्ण भोजन नसीब हो पाता है. देश के कुछ राज्य तो ऐसे भी हैं जहां यह प्रतिशत और भी कम है. इनमें से एक राज्य है राजस्थान जो आजकल फिल्म पद्मावत का पुरजोर विरोध कर रहा है. इस राज्य में महज तीन फीसदी बच्चों को ही यानी 100 में से मात्र तीन बच्चों को संपूर्ण भोजन उपलब्ध हो पाता है.

इस तथ्य की चर्चा आज कुपोषण पर जारी एसोचेम की एक रिपोर्ट के समय हुई जब विशेषज्ञों ने माना कि भारत को कुपोषण के कारण अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब चार फीसदी की क्षति होती है.

पिछले साल आये एक बिना लाभ के काम करने वाली संस्था CRY की रिपोर्ट बताती है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों में 90 फीसदी बच्चों को जरुरी भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय संगठन के सर्वेक्षण के आंकड़े को आधार मानकर इस संस्था ने बताया था कि छः महीने से लेकर 23 महीने तक के बच्चों के साथ यह समस्या अधिक है.

लेकिन यह किस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता. देश के पांच ऐसे राज्य जहां स्थिति सबसे अधिक खराब है और जहां बच्चों को समुचित भोजन नहीं मिल पाता, उनमें से चार राज्य उत्तर भारत के हैं. राजस्थान जो इस तालिका में सबसे नीचे है वहाँ महज तीन फीसदी बच्चों को ही समुचित भोजन उपलब्ध हो पाता है. सनद रहे कि पिछले कुछ महीनों से यह राज्य धार्मिक और जातिगत उन्माद के लिए ही चर्चा में रहा है और वहाँ के नीति-निर्माताओं के लिए कुपोषण कोई बड़ी समस्या नहीं प्रतीत होती.

राजस्थान के बाद सबसे बुरी स्थिति में उत्तर प्रदेश के बच्चे हैं. यहाँ पांच फीसदी बच्चों को ही समुचित भोजन उपलब्ध हो पाता है.

राजस्थान के बाद सबसे बुरी स्थिति में उत्तर प्रदेश के बच्चे हैं. यहाँ पांच फीसदी बच्चों को ही समुचित भोजन उपलब्ध हो पाता है. दिल्ली की स्थिति भी कुछ ख़ास सही नहीं है. देश की राजधानी में महज छः फीसदी बच्चों को ही समुचित भोजन नसीब होता है.

तमिलनाडू के बच्चे इस मामले में खुशनसीब है. यहाँ करीब 31 प्रतिशत बच्चों को समुचित पोषण के लिए जरुरी भोजन मिलता है.

रविवार को जारी एक शोध पत्र में कहा गया है कि भारत को कुपोषण के कारण अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब चार फीसदी की क्षति होती है. लेकिन, खाद्यान्नों के उत्पादन विविधता के साथ-साथ व्यापक पैमाने पर पोषक तत्वों से खाद्य पदार्थो को संपुष्ट करने से इसके विपरीत परिणाम आ सकते हैं. उद्योग संगठन एसोचैम और कंसल्टेंसी फर्म ईवाई की ओर से संयुक्त रूप से प्रकाशित एक शोध पत्र के मुताबिक, विविध प्रकार के कुपोषण के कारण चार फीसदी जीडीपी की क्षति होती है. रपट में कहा गया है कि महिलाओं और बच्चों पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है. दुनिया के करीब 50 फीसदी कुपोषित बच्चे भारत में हैं.

शोध पत्र में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों का जिक्र किया गया है, जिसमें छह से 59 महीने के करीब 60 फीसदी बच्चों को रक्तहीनता से पीड़ित बताया गया है.

रपट के मुताबिक, भारत में सिर्फ 10 फीसदी बच्चों को पर्याप्त भोजन मिल पाता है. महिलाएं और लड़कियों की स्थिति भी रोजाना पोषण की खुराक के मामले में ठीक नहीं है, जबकि उनके लिए राजग सरकार ने प्रमुख कार्यक्रम शुरू किए हैं.

15 से 49 साल उम्र वर्ग में 58 फीसदी गर्भवती और 55 फीसदी महिलाएं जो गर्भवती नहीं हैं, रक्तहीनता से पीड़ित हैं.

एसोचैम के महासचिव डी. एस. रावत ने कहा, “सरकार के लिए स्वास्थ्य संबंधी और सामाजिक असमानताओं को दूर करने वाली नीतियों को अमल में लाने की जरूरत है.” रपट के मुताबिक, मोटे अनाजों में चावल और गेहूं की तुलना में पांच गुना पोषक तत्व हैं और ये लागत प्रभावी फसलें भी हैं. इस तरह उत्पादन विविधता पर ध्यान देने से कुपोषण को दूर किया जा सकता है.

(आईएनएएस से इनपुट के साथ)

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