घृणा और मानव समाज

0

डॉ. विकास कपूर/

हमारे जीवन में घृणा का क्या स्थान है, इस मुद्दे की विस्तृत विवेचना मुंशी प्रेमचंद ने अपने एक लेख (जीवन और साहित्य में घृणा का स्थान) में की है। उनके मुताबिक क्रोध, घृणा आदि को दुर्गुण माना जाता है लेकिन यह जीवन के लिए नितांत आवश्यक हैं ।  इन्ही के भय से पाखंड, धूर्तता, अन्याय जैसी समाजिक दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा रहता है। प्रेमचंद यह भी कहते हैं की “घृणा एक स्वाभाविक मनोवृत्ति है और प्रकृति द्वारा आत्मरक्षा के लिए सिरजी गयी है।” इसी विचार को विस्तार देते हुए प्रेमचंद आगे लिखते हैं की “घृणा का उग्र रूप भय है, और भय का प्रचंड रूप ही साहस है”। अतः इस मूल्यवान प्रवृत्ति पर ही मानव अस्तित्व टिका है। लेकिन इस प्रवृत्ति का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और उस पर विवेक का नियंत्रण बना रहना चाहिए। समस्या तब खड़ी होती है जब हम इन प्रवृत्तियों का दुरुपयोग करने लगते हैं, या बुरे आचरण के स्थान पर हम उस व्यक्ति या समुदाय से ही घृणा करने लगते हैं जिसने कभी घृणित कार्य किया था। उस स्थिति में यह निंदनीय दुर्गुण बन जाता है।

नवनीत नीरव की कहानी ‘दुश्मन’ (पहल, जून-जुलाई २०२०) भी घृणा से उपजे साहस की बात करती है और बेहद बारीकी से घृणा के अस्तित्व को औचित्य का जामा पहना जाती है। ‘दुश्मन’ का केंद्रीय पात्र बिरजू सहनी मगरमच्छों के राष्ट्रीय अभ्यारण्य में फारेस्ट गार्ड है. उसका काम है जंगल के प्राणियों को मनुष्यों से (या मनुष्यों को जंगली जानवरों से) सुरक्षित रखना। बिरजू एक संवेदनशील कार्मिक है जिसके मन में प्रकृति के प्रति प्रेम है और जंगल के नियमों का उल्लंघन न करने का विवेक भी। यदा कदा जंगल के जानवरों को संभालते हुए उसे चोट लग जाती है तो वह उसे संतुलित तरीक़े से लेता है. मसलन, मगरमच्छ के एक बच्चे ने जब उसकी उंगली को चोटिल कर दिया तो बिरजू बोलता है, “इन बिचारों को कहाँ मालूम है साहब कि मैं इनके प्रति क्या भाव रखता हूँ। कुदरत ने इसे ऐसा ही बनाया है। खुद के बचाव के लिए।’’ लेकिन वही बिरजू जब उस जंगल में अपनी ब्याहता ‘मेहरी’ को एक कोबरा के दंश से नहीं बचा पाता है तो वह एकबारगी सुध-बुध खो बैठता है और ‘विक्षिप्त सा’ हो जाता है। तब बिरजू उस विषैले साँप को पकड़ कर एक पुराने घर में क़ैद कर देता है और प्रवेश द्वार पर चेतावनी के तौर पर ‘दुश्मन का घर’ लिख देता है।ज़ाहिरा तौर पर तो यह साहसी क्रिया है, लेकिन इस का प्रयोजन स्पष्ट नहीं हो पाता है. पाठक के मन में यह प्रश्न कौंधता है की जिस प्राणी को वह ‘दुश्मन’ कहता है, उसे बिरजू किस भावना के वशीभूत हो पाल रहा है. क्रोध? घृणा? सज़ा देने की अदम्य लालसा? सनातन बैर? या कुछ और?

यदि कहानी सीधी सपाट होती तो संभवतः इतनी बात ही निकल कर आती. परन्तु इस अभ्यारण्य में नौकरी करने से पहले बिरजू और उसकी नव-ब्याहता मेहरी एक ऐसे गाँव में रहते थे जहां जंगल का क़ानून लागू होता था. वहां भी बिरजू के साथ एक ऎसी ही घटना घटी थी जब अपने पिता तुलसी को उसने सरे आम पिटते और अपमानित होते देखा था. उस क्षण बिरजू का विवेक उसके क्रोध और घृणा पर अंकुश नहीं रख पाया था और उसने तुरंत लाठी छीन कर गाँव के रसूखदार परिवार के पुत्र का सर फोड़ डाला था। इस आवेशपूर्ण कृत्य के परिणामस्वरूप उसे मेहरी के साथ उसी रात गाँव छोड़ भाग जाना पड़ा था। यह वही भय है जो घृणा के उग्र स्वरूप द्वारा निर्मित होता है लेकिन आवेश ठंडा होने पर अनुभव होता है। रातों रात गाँव छोड़ कर भागे बिरजू और मेहरी को एक फारेस्ट रेंजर की मदद से अभ्यारण्य में आश्रय और नौकरी मिल जाती है। लेकिन उस एक घटना ने इस कहानी के नायक का जीवन उलट पुलट कर दिया था।

कहानी के अंतिम चरण में बिरजू का यह कहना की “…अगर थोड़ी हिम्मत कुछ साल पहले कर लेता तो…” उसका अपने क्षणिक आवेश के लिए पश्चाताप व्यक्त करता है जिसने उसे अपनों से दूर कर दिया। इस एक क्षण में कहानीकार ने इस बात की ओर एक झीना संकेत किया है की बिरजू का गाँव भी एक जंगल है जहाँ मनुष्य रूप में कुछ हिंसक जानवर भी रहते हैं. जिस प्रकार अपने क्षेत्र में घुस आये किसी निरीह प्राणी को मगरमच्छ या कोबरा नहीं छोड़ता उसी प्रकार बड़की दुआर का बाबू साहब भी…। यदि चप्पल, लाठी ले कर हिंसक पशु को खदेड़ियेगा तो वह पलट कर आक्रमण नहीं करेगा तो और क्या करेगा।

फिर उपाय क्या है? निरीह प्राणियों की तरह दुबक कर आँखें मूँद ली जाएँ? यदि ऐसा मान लिया जाए तब तो मानव समाज सचमुच दो तरह के लोगों में बँट जाएगा: एक वे जो शिकार करेंगे, और दूसरे वे जो शिकार बनेंगे। शायद एक तीसरा गुट और भी रहेगा जो कैमरा लिए निरंतर ‘रोमांच’ ढूँढता रहता है – मगर हस्तक्षेप करने के नाम पर जिसकी घिग्घी बंध जाती है। यह कहानी मानव समाज की भयावहता के इस रूपक को तो सफलतापूर्वक स्थापित करती है लेकिन जिस संकेत पर कहानी समाप्त होती है वह किंचित अस्पष्ट है। बिरजू किस हिम्मत की बात कर रहा था? साँप का फन कुचल देने की? या फिर दुश्मनी को प्रेम की तरह ताउम्र साथ लेकर चलने की? यदि बिरजू ने मंगल सिंह के बेटे पर लाठी न तानी होती तो उसे गाँव नहीं छोड़ना पड़ता और संभवतः मेहरी तब सकुशल होती। लेकिन क्या तब बिरजू के उत्पीड़ित मन में क़ैद सर्प रुपी प्रतिशोध उसके अंतस में अनवरत ”हिस्स्स्….फुफ्फ्फ्फ़’’ नहीं करता रहता? और क्या तब उसका वैवाहिक जीवन शांति से गुजरने पाता? क्या शोषित वर्ग ताउम्र फन उठाये पलटवार करने का अवसर तलाशता रहे? दुश्मन कहानी में इस हिंसक दौर से निपटने का संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलता, लेकिन प्रेमचंद के उस लेख में मिलता है। प्रेमचंद इस बात की वकालत करते हैं की समाज की कुरीतियों के प्रति हमारे मन में ‘प्रचण्ड’ घृणा होनी चाहिए जिसकी वजह से हम उनसे अपने को बचाते हुए ‘जान पर खेल कर भी’ अंतिम सांस तक उनसे लोहा लेने के लिए तत्पर रहें। अपने लेख में वे महात्मा गाँधी का उदाहरण देते हुए लिखते हैं, “महात्मा गांधी इसलिए अछूतपन को मिटाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं कि उन्हें अछूतपन से प्रचण्ड घृणा है।” ग़ौरतलब है कि यदि आप इस पूरे प्रकरण में से गांधी जी का उल्लेख हटा देंगे, तो ऐसा प्रतीत होने लगेगा की घृणा की आड़ में हिंसा भड़काने का प्रयास किया जा रहा है।

इस विश्लेषण का एक पक्ष और भी है। कोई इन्सान किसी दूसरे से कितनी घृणा कर सकता है? इस बात की पड़ताल अनेक लेखकों ने साहित्य के विभिन्न स्वरूपों में की है। विश्व साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिसमें घृणा की उर्वर भूमि से हिंसक अपराध जन्म लेते दिखाए गए हैं। और ऐसे भी, जिनमे किसी दुर्घटना या ज़ुल्म के प्रतिशोध के रूप में घृणित अपराध अंजाम दिए जाते हैं। सरसरी तौर पर निगाह डालें तो देखेंगे की एक बड़ी संख्या में फिल्म और टेलीविज़न कार्यक्रमों का मूल विचार इसी हिंसक प्रतिशोध के तंदूर में पक कर तैयार होता है – विशेष रूप से उन परिस्थितियों में जब पुलिस और न्यायपालिका किसी दबाव के चलते या सबूतों के अभाव में अपना कार्य करने में असफल होते हैं। अर्जेंटीना के एडुआर्डो साचेरी द्वारा लिखा The Question in Their Eyes (2005) (उनकी आँखों में दिखाई देते प्रश्न) ऐसा ही एक उपन्यास है जो मन में लम्बे समय तक पाली हुई घृणा के परिणामों की पड़ताल करता है। इसी उपन्यास पर आधारित एक अर्जेंटीनी फिल्म The Secret in Their Eyes (उनकी आँखों में छिपे रहस्य) के नाम से बनी जिसने पूरी दुनिया का ध्यान तब अपनी ओर खींचा जब 2009 में उसे विदेशी भाषा में बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म के ऑस्कर से नवाज़ा गया। दर्शकों और समीक्षकों से इसे इतनी सराहना मिली कि 2016 में बी.बी.सी. ने इसे सौ सर्वकालिक श्रेष्ठ फिल्मों में 91 स्थान पर रखा।  इसी फिल्म की एक अंग्रेज़ी रीमेक Secret in Their Eyes (2015) नाम से जूलिया रॉबर्ट्स, निकोल किडमैन और चुएटल ऐजिओफोर जैसे नामी कलाकारों को लेकर हॉलीवुड में दुबारा बनी थी जो चर्चित रही थी। यह फिल्म बिना किसी रूपक का सहारा लिए मानव मन को दीमक की तरह चट करती घृणा का प्रचण्ड रूप दिखाती है।

स्रोत-न्यूयोर्कर

इस फिल्म के केंद्र में 9/11 के पूर्वार्ध का वह भयाक्रांत अमेरिका है जिसने आतंकवाद और अराजकता का तांडव देखा था. फिल्म का कथानक तीन सहयोगियों के इर्द-गिर्द बुना गया है जो इस बेचैनी भरे माहौल में अमेरिकी संकल्पना को सुदृढ़ बनाने में अपना योगदान देने का भ्रम पाले काम कर रहे हैं. एफ.बी.आई. एजेंट रे कैस्टन (की भूमिका में चुएटल ऐजिओफोर) और उनकी सहयोगी पुलिस इन्वेस्टिगेटर जेस कॉब्ब (जूलिया रॉबर्ट्स) लॉस एंजेलेस में कार्यरत हैं और स्थानीय न्यायालय में हालिया नियुक्त सहायक विधिवक्ता क्लेयर स्लोन (निकोल किडमैन) से मिलने आते हैं. तभी रे कैस्टन और जेस कॉब्ब को सूचना मिलती है की मस्जिद के पीछे एक अनजान युवती की लाश मिलने की खबर मिली है और वे तुरंत जाकर मामले की तफ्तीश करें। मौक़े पर पहुँच कर रे देखता है की जिस कच्ची उम्र की युवती की अर्धनग्न लाश कूड़ेदान में ठूंसी पड़ी है वह और कोई नहीं जेस कॉब्ब की पुत्री कैरोलिन है. किसी निर्मम बलात्कारी ने उसे अपनी हवस का शिकार बना कर न केवल मार डाला था बल्कि चूने के घोल में उसकी देह को इस कदर धो डाला था जिससे कोई सुराग ही न बच सके. माँ होने के कारण जेस तो इसे देख स्तब्ध रह जाती है, साथ ही रे को भी इस बात का आघात लगता है की उसी दिन क्लेयर ने जेस के लिए कुछ उपहार खरीदने के लिए रे को साथ आने का निवेदन किया था लेकिन काम की व्यस्तता के चलते रे पहुँच नहीं सका था. इस लोमहर्षक मंज़र ने इन तीनों की ज़िन्दगी उस क्षण से बदल डाली। जेस क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में झुलसने लगती है, रे ग्लानि मिश्रित घृणा से ओत-प्रोत हो जाता है और क्लेयर इन दोनों मित्रों की मदद न कर पाने की लाचारी में उलझ जाती है. जेस को गहन अवसाद घेर लेता है और वह निर्णय करती है की लॉस एंजेलेस छोड़ कर अन्यत्र चली जाएगी। सामान बंधवाने और हाथ बंटाने पहुंचे रे कैस्टन को वहां क्लेयर की एक पुरानी पिकनिक फोटो मिलती है जिसमें अन्य लोगों के बीच खड़ा एक रहस्मयी सा अजनबी क्लेयर की और टकटकी बांधे देखता नज़र आ रहा है। इसे सुराग मान वे उस आदमी की खोज में लग जाते हैं। तमाम रेकॉर्ड खंगालने के बाद उसकी शिनाख़्त एन्जोर मारजिन के तौर पर होती है – जो बदक़िस्मती से उनके दफ्तर का एक पुराना और भरोसेमंद मुखबिर है। एक ऐसा मुखबिर जो आतंकवादी गतिविधियों के बारे में निरंतर संवेदनशील जानकारियाँ उपलब्ध करवाता रहा है। उस दुर्घटना वाले दिन भी उसी शख़्स के संकेत पर एफ.बी.आई. अफसरों ने एजेंट रे कैस्टन को मस्जिद के पीछे दबिश देने का निर्देश दिया था। जैसे ही विधिवक्ता कार्यालय और सुरक्षा जांच एजेंसी को पता चलता है की आतंकवादी जांच के काम में उनकी मदद करने वाले मुखबिर एन्जोर मारजिन पर जेस और रे को संदेह है तो वे उनके कार्य में रोड़े अटकाने लगते हैं। यहां तक की विभाग के एक ‘कर्तव्यनिष्ट’ अफसर द्वारा मस्जिद के आस-पास से एक ‘उपयुक्त’ नामधारी संदिग्ध इस मामले में जांच के लिए रे कैस्टन को सुझा भी दिया जाता है। ‘संदिग्ध’ अबान ग़ज़ाला नामक उस निर्दोष व्यक्ति को जेस और रे प्रारंभिक पूछताछ के पश्चात छोड़ देते हैं। एफ.बी.आई. एजेंट रे, उस ‘कर्तव्यनिष्ट’ अफसर से अंततः यह कबूल करवाने में सफल हो जाता है की गज़ाला को वास्तव में मारजिन को बचाने के लिए ऊपरी दबाव के चलते नामित किया गया था। दरअसल अमेरिका में 9/11 के उपरांत मुसलमान होना ही आतंकवाद से संपर्क का संदेह उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त माना जाता था। शक़, भय और अवचेतन में गहरी पैठी घृणा जब पूरी व्यवस्था को अपनी गिरफ़्त में ले लेती है तो एक आम नागरिक का दुःख गौण हो जाता है। मारजिन को यह एहसास है की वह तंत्र के लिए परम आवश्यक बन चुका है एन्जोर मारजिन की ढिठाई और बदतमीज़ी से जेस और रे का शक़ यक़ीन में बदलने लगता है की कैरोलिन के साथ हुई नृशंस वारदात में मारजिन का हाथ अवश्य है। क्लेयर स्लोन एक चाल खेलते हुए रे और जेस को उनकी कार्यशैली पर सरे-आम उलाहना देती है और मारजिन का मखौल उड़ाते हुए कहती है कि यह काम उसके बूते का नहीं हो सकता है। मारजिन भड़क कर बोल उठता है की उसने जैसा सुलूक कैरोलिन के साथ किया था वैसा सुलूक क्लेयर के साथ भी करेगा। इस पर रे क्रोधित हो उस पर टूट पड़ता है और उसे मार डालने को आमादा हो उठता है। जेस उसे रोकती है और कहती है की मौत ऐसे अपराध की उपयुक्त सज़ा नहीं हो सकती। न्यायपालिका और सुरक्षा जांच एजेंसी मिल कर जेस और रे पर दबाव बनाते हैं और पुख़्ता सबूतों के अभाव में एन्जोर मारजिन को रिहा करवा देते हैं। क्लेयर स्लोन चाहते हुए भी अपने वरिष्ठ अफसर की अवहेलना नहीं कर पाती और तीनों मित्रों के रिश्तों में खिंचाव सा आ जाता है।

वहां से छूटते ही एन्जोर मारजिन लापता हो जाता है। एक स्थान पर केवल उसकी वैन लावारिस खड़ी मिलती है और मारजिन का कोई सुराग नहीं मिलता। इस बीच स्थानीय पुलिस उस वैन को जला कर सारे सबूत हमेशा के लिए नष्ट कर देती है और मामले को बंद करने का निर्णय ले लेती है। रे का तबादला न्यू यॉर्क कर दिया जाता है और जेस अपने आप को सब तरफ से काट लेती है। अब वह एक निर्जन फार्म-हाउस पर रहती है और किसी से मिलती-जुलती नहीं। ऐसे  ही तेरह-चौदह वर्ष बीत जाते हैं। क्लेयर और रे के बीच कुछ कोमल सम्बन्ध पनपने से पहले टूट जाते हैं। लेकिन रे उस अनसुलझे मामले को भुला नहीं पाता है। इस उम्मीद पर की मारजिन नाम और पहचान बदल कर कहीं छुपा अवश्य होगा, वह तमाम छोटे-बड़े अपराधियों के अंतर्राष्ट्रीय डाटा-बेस रात-रात भर खंगालता रहता है। अपने मन में प्रेम की जगह घृणा और प्रतिशोध पाले, वह कर्तव्यनिष्ठ एजेंट तेरह साल तक, हर रात, अपनी जोखिम पर सरकारी तंत्र में सेंध लगा कर एक-एक कर, लगभग सात लाख अपराधियों के चेहरे और अपराधों की पत्री खंगालता है। इतने वर्षों के बाद भी रे की अंतरात्मा उसे बेचैन किये रहती है और वह अपने जीवन का हर पल इस मामले की तह तक पहुँचने में झोंक देता है। अंत में एक संभावित छद्म नाम तलाश कर वह क्लेयर की मदद लेने लॉस एंजेलेस लौटता है। वह देखता है की अब क्लेयर पदोन्नत हो कर ज़िला विधिवक्ता बन चुकी है और किसी और से शादी कर घर बसाने का मन बना चुकी है। अंततः रे की अगुआई में पुलिस क्ले बेकविथ नाम धारण कर छिटपुट अपराध करने वाले उस संदिग्ध शख़्स को पकड़ने में सफल हो जाती है, परन्तु जेस यह कह कर उसे भी छुड़वा देती है की वह आदमी मारजिन नहीं हो सकता।

क्लेयर अब रे के लिए चिंतित है और वह उससे इस निरर्थक तहकीकात को समाप्त कर, आगे का जीवन बिना कड़वाहट जीने का आग्रह करती है। एक शाम रे और क्लेयर साथ में जेस से मिलने उसके फार्म-हाउस आते हैं। उस बियाबान फार्म-हाउस में असमय बूढ़ी दिखने वाली उनकी सहकर्मिणी जेस भारी मन से यह स्वीकार करती है की उसने तेरह साल पहले उसी रात मारजिन को उसकी वैन से निकाल कर मार डाला था, जिस रात अधिकारियों ने उसे सबूत के अभाव में छुड़वाया था. स्वाभाविक रूप से तब उसके लिए यह बात ऍफ़.बी.आई. एजेंट रे कैस्टन और सहायक विधिवक्ता क्लेयर स्लोन को बताना संभव नहीं था। जेस उन दोनों के प्रति कृतज्ञ भी है और उनके जीवन के मूल्यवान वर्षों के व्यर्थ हो जाने के लिए शर्मिंदा भी।

भारी मन से दोनों सहयोगी जेस से विदा लेते हैं और वापस लौटने के मंतव्य से बाहर निकल जाते हैं। इतने में जेस एक तश्तरी में कुछ ले कर तेज़ क़दमों से फार्म-हाउस के पिछले हिस्से में अलग से बनाये एक कमरे की तरफ तेज़ी से जाती नज़र आती है। कुछ शंकित मन से, रे कैस्टन भी दबे पाँव उसके पीछे जाता है। भीतर उसे एक जेल-नुमा पिंजड़े में क़ैद एक आदमी दिखाई देता है जिसके सामने जेस, बिना कुछ बोले, कठोरता से वह तश्तरी सरका देती है। रे गौर से उस कृशकाय और थकी अवस्था वाले आदमी को देखता है तो एहसास होता है की वह एन्जोर मारजिन है। सूनी आँखों से टुकुर-टुकर देखता वह दुर्दांत अपराधी रे से नज़र मिलते ही सुबक उठता है और बड़ी कठिनाई से केवल इतना बोल पाता है,  “… बात करो मुझसे…!” जेस बिना कुछ बोले पूरी तरह से जड़ हो कर खड़ी है। मिश्रित भावनाओं से जूझता रे अपनी रिवाल्वर वहां रख कर जेस से केवल इतना कह पाता है की वह बाहर कब्र खोद रहा है और किसी भी सूरत में आज इस मामले को दफ़्न करके ही वापस लौटेगा। फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाया गया है की रे तत्परता से एक कब्र खोद रहा है, तभी भीतर से गोली चलने की आवाज़ सुनाई देती है। रे कैस्टन हाथ रोक कर विस्मित भाव से कमरे की ओर देखता है मानो तय नहीं कर पा रहा हो की विजय प्रचण्ड घृणा की होगी या शांतिदायक विवेक की। कुछ अंतराल के बाद जेस कॉब्ब का थका और मलिन चेहरा फ्रेम में दिखाई पड़ता है और रे राहत की साँस लेकर तेज़ी से हाथ चलाने लगता है।

यदि नवनीत नीरव की कहानी दुश्मन की तुलना बिली रे निर्देशित ‘सीक्रेट इन देयर आईज’ से करें तो कई समानार्थी बिंदु निकलेंगे. फिल्म में भी एक जंगल के क़ानून पर चलने वाला देश है, जहां हिंसक जंतु विचरण करते हैं. ठीक कहानी की तर्ज़ पर शहरी जंगल में अनुशासन बनाए रखने के लिए कुछ गार्ड नियुक्त किये गए हैं. उन में से एक के परिजन को एक सर्प रुपी अपराधी अपना शिकार बना लेता है। फिर वही घृणा और प्रतिशोध का लोमहर्षक विवरण। प्रेम के स्थान पर सर्प रुपी घृणा पालने की एक अनूठी चेष्टा और दुश्मन को घर में अनिश्चितकाल तक कैद करने का ‘साहस’ भी. जहां फिल्म कहानी से अलग दिशा पकड़ती है, वह है इस आजीवन कारावास-नुमा लम्बी घृणा को पालने की क़ीमत का विश्लेषण प्रस्तुत करने में. और संभवतः इस महत्वपूर्ण संकेत का अनावरण करने में की सरकारी तंत्र जब स्वयं घृणा पाल कर पक्षपातपूर्ण बर्ताव करने लगे तो एक पीड़ित व्यक्ति का जीवन एकाकी और प्रतिशोध शासित हो जाता है. ऎसी स्थिति में सभ्य समाज मुकम्मल तौर पर एक हिंसक जंगल बन जाता है. कहानी के नायक बिरजू सहनी के जीवन में यदि रे कैस्टन और क्लेयर स्लोन सरीखा (तात्पर्य किसी उच्च स्तरीय जांच एजेंसी और न्यायपालिका से है) सहानुभूतिपरक सहारा नहीं होगा तो उसका जीवन सर्प की निरर्थक रखवाली में ही बीतेगा।

________________________________________________________________________

डॉ. विकास कपूर राजस्थान के समर्पित रंगकर्मी के रूप में पहचान रखते हैं। अनेक प्रतिष्ठित नाट्य समारोह एवं रंग गोष्ठियों में शिरकत कर चुके हैं। नाट्य कला के साथ ही आपका साहित्य और सिनेमा से विशेष अनुराग है । जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। जोधपुर के रहने वाले  डॉ. विकास कपूर से उनके मोबाइल  +91-9462034715 या उनके ईमेल    [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here