क्या भारत दुनिया को टीबी जैसी बीमारी ख़त्म करने में मदद करेगा!

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शिखा कौशिक/

पूरी दुनिया ने लक्ष्य रखा है कि टीबी को साल 2030 तक ख़त्म कर देना है. सयुंक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (SDG) के तहत यह लक्ष्य तय किया गया है. लेकिन इस लक्ष्य को पाने में सबसे बड़ी बाधा है भारत, जहां देश के नेता, लोगों को महाशक्ति और सुपर पॉवर बनाने का ख्वाब दिखाते रहते हैं.

 हाल ही में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘वैश्विक तपेदिक (टीबी) रिपोर्ट 2018’ के अनुसार, विश्व के कुल टीबी के मरीजों में से 27% भारत से हैं. यानि 2017 में दुनिया में जितने लोग टीबी की बीमारी से ग्रसित हुए उनमें 27 प्रतिशत भारत से थे. इस बीमारी से मरने वालों में भी भारत का योगदान कुछ इतना ही था. 2017 में पूरे विश्व में इस बीमारी से करीब 16 लाख लोगों की जान गई. द लैंसेट पैनल के अनुसार, साल 2017 भारत में इस बीमारी से मरने वालों की संख्या 4,21,000 थी.

दुनिया ने इस बीमारी से मुक्त होने के लिए 2030 का लक्ष्य रखा है वहीँ भारत ने अलग से 2025 का लक्ष्य रखा है. लेकिन चर्चित ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट की एक रिपोर्ट में कहा गया है ऐसा संभव नहीं है. अगर इसी रफ़्तार से प्रयास होते रहे तो 2045 तक यह लक्ष्य पाया जा सकेगा.

इस लैंसेट रिपोर्ट के लेखकों में एक ने भारत के द्वारा 2025 के निर्धारित लक्ष्य को ‘अति-महत्वाकांक्षी’ और ‘अवास्तविक’ करार दिया.

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के हालिया आंकड़ों के अनुसार, 2018 में कुल 83,707 मामले सामने आएइनमें से बमुश्किल 88 प्रतिशत मरीजों का सही समय पर इलाज शुरू हो पाया

लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार, टीबी के निदान, उपचार और रोकथाम के नए तरीकों को विकसित करने की जरुरत है. इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और  वित्तीय संसाधनों की जरुरत पड़ेगी. नए शोध को बढ़ावा देने की जरुरत होगी. बिना इस के, इस बीमारी को निर्धारित समय सीमा में पाना बहुत मुश्किल होगा.

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के हालिया आंकड़ों के अनुसार, 2018 में कुल 83,707 मामले सामने आए, इनमें से बमुश्किल 88 प्रतिशत मरीजों का सही समय पर इलाज शुरू हो पाया. 2018 में देश में कुल 2,733 में दवा प्रतिरोधी टीबी के मामले सामने आये. इन आंकड़ों से यह भी पता चला कि 4,493 बच्चे इस जानलेवा बीमारी से प्रभावित हुए.

आखिर कहाँ है समस्या?

भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं निजी क्षेत्र के द्वारा नियंत्रित होती हैं. सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था की हालत सरकार की लागातार अनदेखी की वजह से बिगड़ती जा रही है. ऐसे में अधिकतर मरीज इन निजी नर्सिंग होम, डॉक्टर और अस्पताल का रुख करते हैं. दिक्कत यह है कि सरकारी आदेश के बावजूद भी यह निजी क्षेत्र के डॉक्टर और अस्पताल, समय रहते सरकार को इत्तला नहीं करते. जबकि सरकार का आदेश है कि सारे टीबी के मामले नोटिफाई किये जाने चाहिए.

बंगलुरु में रहने वाली शोधकर्ता और जन स्वास्थ्य पर काम करने वाली डॉक्टर सिल्विया कर्पगम ने हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार से बात करते हुए इस विकराल समस्या के लिए निजी अस्पतालों को जिम्मेदार ठहराया. उनका कहना था कि “यदि निजी क्षेत्र, देश में लगभग 70 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने का दावा करते हैं, तो या तो वे टीबी के मामलों का निदान करने में विफल हो रहे हैं या इसकी रिपोर्टिंग नहीं कर रहे हैं.” सनद रहे कि इस बीमारी का आंशिक रूप से इलाज या गलत तरीके से इलाज किया जाना खतरनाक है. इससे मल्टीड्रग प्रतिरोधी (एमडीआर) टीबी का विकास होता है जिसका इलाज और भी मुश्किल हो जाता है.

उन्होंने यह भी बताया कि यदि निजी क्षेत्र वास्तविक आंकड़े प्रदान नहीं करता है, तो प्रभावी नीतियां कैसे बनाई जा सकती हैं? सरकार के पास वास्तव में टीबी के लिए एक बहुत अच्छा उपचार प्रोटोकॉल है, जिसका सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों द्वारा पालन किया जाना है.

टीबी पर लैंसेट कमीशन ने कहा था कि भारत में 2019 और 2045 के बीच लगभग 80 लाख टीबी से होने वाली मौतें रोकी जा सकतीं हैं अगर सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी को सही तरीके से सुनिश्चित करें.

अब सवाल है कि सरकार जो स्वास्थ्य सुविधाओं में निजी क्षेत्र को लागातार प्रोत्साहित कर रही है, क्या वो अब इनपर लगाम लागाएगी. क्या ऐसा कर के पूरी दुनिया को टीबी जैसी खतरनाक बीमारी को नियंत्रित करने में देश मदद करेगा! क्योंकि अगर भारत ऐसा करने में असफल रहता है तो दुनिया से भी टीबी का मिटना असंभव है.

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