हार्वर्ड यूनिवर्सिटी: पैसा, शोहरत नहीं बल्कि संबंध हैं स्वास्थ्य और ख़ुशी का राज 

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Young couple with smartphones in their bed

विवेक बोधिसत्व/

डॉ. रोबर्ट वाल्दिन्गेर

आखिर वो कौन सी सबसे महत्वपूर्ण चीज है जो हमे जिंदगी में अच्छी सेहत और सच्ची ख़ुशी देती है? ये सवाल हम सभी के मन में आता है क्योकि हमारी जिंदगी का हर कदम इसी का जवाब ढूँढ रहा होता है. आखिर वो क्या तरीका है जिससे जीवन का आनंद लिया जा सकता है! अगर लोगों को इस बात का पता चल जाता तो लोग अपना आने वाला कल बेहतर बना सकते. कोई वस्तुनिष्ट जवाब नहीं मिलने के कारण लोग इसी ख़ुशी के लिए तमाम दिशाओं में प्रयास करते दिखते हैं. कुछ लोग दिन रात पैसा कमाने में लगे रहते हैं तो कुछ लोग मनोरंजन के साधन पर ही भरोसा जमाये रखते हैं. आजकल तो गैजेट जैसे मोबाईल ही इंसानों की दुनिया हो गई है. जिसको देखो उसी में रमा है.

जीवन को खुश और स्वस्थ रखने के  राज को जानने के लिए हार्वर्ड युनिवेर्सिटी के वैज्ञानिको ने अब तक का सबसे बड़ा और लम्बा शोध किया. यह शोध  ‘हार्वर्ड स्टडी ऑफ़ एडल्ट डेवलपमेंट’ 1938 में शुरू हुआ और अभी भी चल रहा है.

इस शोध की कहानी भी मजेदार हैं. 75 सालों से भी अधिक चले इस शोध में कुल 724 लोगो की जिंदगी का व्यापक अध्ययन किया गया जिसमे से आज सिर्फ 60 लोग ही जिन्दा है और अब उनकी अगली पीढ़ी को भी इस शोध में शामिल किया गया है जिसमे 2000 से अधिक लोग शामिल हैं. इतनी लम्बे अध्ययन के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने सैकड़ों शोध पत्र प्रकाशित किये हैं लेकिन अगर उन सबका सार पूछा जाय तो इस शोध के डायरेक्टर डॉ. रोबर्ट वाल्दिन्गेर पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं – अच्छे सम्बन्ध हमें खुश और सेहतमंद रखते हैं.”

कैसे किया गया इतना बड़ा शोध?

1938 में इस शोध के लिए दो समूहों का चयन किया गया – पहला समूह उन लोगो का था जो हार्वर्ड युनिवेर्सिटी में पढ़ रहे थे और उनके सामने एक बेहतर भविष्य था, दूसरा समूह बोस्टन के गरीब इलाके के उन लड़को का था जो प्रतिकूल परिस्थितियों में रह रहे थे. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने इन सबका निरंतर साक्षात्कार किया, उनका शारीरिक और मानसिक परिक्षण करते रहे, उनके खून के नमूने लिए, उनके ब्रेन स्कैन किये, उनके माँ-बाप से बात की, उनकी शादी के बाद उनकी पत्नियों से साक्षात्कार किया, उनकी बातचीत के विडिओ टेप का विश्लेषण किया, उनके बच्चो से भी बात की.

ये सारे प्रतिभागी आगे चलकर हर संभव मुकाम पर पहुचे – कुछ मजदूर बने तो कुछ डॉक्टर और इंजीनियर, कोई मानसिक बिमारी से ग्रसित हुआ तो कोई नशे से, और एक प्रतिभागी तो अमेरिका का राष्ट्रपति भी बना. आज भी ये शोध उसी तरह चल रहा हैं जिसकी वजह है शोधकर्ताओं की लगन, लगातार मिलने वाला फण्ड, भाग्य का साथ और जीवन के रहस्यों को जानने के हमारी लालसा !

क्या हैं इस शोध के सबसे बड़े सबक?

इस शोध के चौथे डायरेक्टर डॉ. रोबर्ट वाल्दिन्गेर जानेमाने मनोचिकित्सक हैं और वो बताते हैं की इस अध्ययन से पता चलता है की सामाजिक सम्बन्ध हमारे स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए बहुत जरूरी हैं और अकेलापन आपके जीवन की गुणवत्ता और लम्बाई उसी तरह कम कर सकता है जैसे कोई जानलेवा रोग. अकेलापन महसूस करने वाले लोग न सिर्फ अधिक दुखी रहते है बल्कि उनके स्वास्थ्य में भी बहुत तेजी से गिरावट आती हैं और उनका मस्तिष्क का क्षय भी जल्दी होता है. जो लोग वृध्दावस्था में भी अपने साथी के साथ बेहतर सम्बन्ध में होते हैं और छोटी-मोटी नोक-झोक के बाद भी सुरक्षित महसूस करते हैं उनकी याददाश्त भी उनका अधिक साथ देती हैं, मानसिक रूप से सक्रीय रहते हैं और उन्हें शारीरिक समस्याएं भी कम परेशान करती हैं.

लेकिन सिर्फ़ ढेर सारे दोस्त और सम्बन्धी रहने से ही बात नहीं बनती बल्कि उन संबंधो की गुणवत्ता ज्यादा मायने रखती है. सोशल मीडिया के इस दौर में ये बात बहुत प्रासंगिक है जब आभासी दोस्तों के संख्या हजारों में हैं और जो वास्तविक सम्बन्ध अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं उनके साथ बिताने वाला समय मोबाईल के स्क्रीन के साथ बिताया जाता है.

इसका मतलब ये है कि 50 की उम्र में आपका ब्लड कोलेस्ट्रोल स्तर और आपका बैंक बैलेंस आपके आने वाले 30 सालों की सेहत और ख़ुशी का सही अनुमान नहीं लगा पायेगा . मगर आप जीवन को खुशहाल बना सकते हैं अगर आप अपने परिवार, दोस्तों और समुदाय से बेहतर सम्बन्ध बना सकें. पैसा, संसाधन और शोहरत के पीछे आँख मूँद कर भागने से बचे और अपने संबंधो को समय दें. याद करें की पिछली बार किसी से दिल की बात कब की थी, कौन से ऐसे प्रिय दोस्त और सम्बन्धी हैं जिनसे बहुत अरसे से बात नहीं हुयी, अपने जीवन-साथी के साथ अकेले अन्तरंग बात-चीत कब हुई थी, किसी को शुक्रिया तो नहीं कहना हैं, किसी को माफ़ तो नहीं करना है, किसी से माफ़ी तो नहीं मांगनी हैं और कोई टूटा सम्बन्ध फिर से कैसे जोड़ना है ?

अच्छी जिंदगी, अच्छे संबंधो से बनती है !

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी कर विवेक बोधिसत्व आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स में कार्यरत है और नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन पर कार्य कर रहे हैं. आप सामजिक मुद्दों से गहरे जुड़े हैं.)

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