कैंसर से जूझ रहे हैं फिर भी दशकों से जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा है जारी

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जगदीश लाल आहूजा कैंसर से जूझ रहे हैं पर साढ़े तीन दशक से लंगर में गरीबों को भोजन कराने का काम निरंतर जारी है

आईएएनएस/

कारोबारी जगदीश लाल आहूजा 83 बरस के हैं और कैंसर से जूझ रहे हैं। फिर भी पिछले साढ़े तीन दशकों से गरीबों और जरूरतमंदों को निशुल्क भोजन कराने की निरंतरता बनाए हुए हैं। इतना ही नहीं अपने सामुदायिक कार्यो को जारी रखने के लिए उन्होंने अपनी कई सम्पति तक बेच दी है।

कैंसर के बावजूद भी नहीं रुकने वाले जगदीश लाल आहूजा का कहना है कि यह कार्य उनके जीवन का मिशन है।

आहूजा ने चंडीगढ़ में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) के गेट नंबर 2 के बाहर आईएएनएस से कहा, “मैं अपनी आखिरी सांस तक इस लंगर को जारी रखूंगा। यह मुझे सुकून देता है। ईश्वर ने मुझे यह करने के लिए चुना है और मैं इसे जारी रखूंगा।”

वह 1981 से चंडीगढ़ और इसके आसपास के क्षेत्रों में लंगरों का आयोजन कर रहे हैं

वह 1981 से चंडीगढ़ और इसके आसपास के क्षेत्रों में लंगरों का आयोजन कर रहे हैं। आहूजा ने पीजीआई के बाहर रोजाना लंगर लगाना शुरू किया, जहां 2001 से बड़ी संख्या में उत्तर भारत के सभी राज्यों से मरीज और उनके रिश्तेदार लंगर खा रहे हैं।

कई गरम कपड़ों में लिपटे आहूजा ने कहा, “मैं यह खुद कर रहा हूं। पिछले कुछ वर्षो में कई लोगों ने मुझसे जुड़ने के लिए मुझे पैसे और अन्य चीजों की पेशकश की लेकिन मैंने किसी से कुछ नहीं लिया। मैं अपने खुद के संसाधनों से यह करना चाहता हूं। मैंने सभी पेशकश को मना कर दिया। मुझे लगता है कि ईश्वर मुझ पर मेहरबान है कि उसने मुझे इस काम को जारी रखने के योग्य बनाया है।”

सामुदायिक कार्य करने की प्रक्रिया में आहूजा ने पिछले कुछ वर्षो में अपनी सात संपत्तियां बेच दी हैं।

उन्होंने कहा, “मैं पैसे की वजह से इस लंगर में रुकावट नहीं आने दूंगा। हाल के कुछ वर्षो में हमें संख्या कम करनी पड़ी है। पहले हम 1,800 लोगों को भोजन कराते थे, लेकिन अब यह संख्या लगभग 500 हो गई है।”

आहूजा का कहना है कि वह प्रतिकूल पारिवारिक परिस्थितियों की वजह से ज्यादा पढ़ाई नहीं कर सके।

आहूजा को निशुल्क लंगर का आयोजन करने की प्रेरणा अपनी दादी माई गुलाबी से मिली, जो अपने गृहनगर पेशावर (अब पाकिस्तान) में गरीब लोगों के लिए लंगरों का आयोजन करती थीं। भोजन में दाल, सब्जियां, चावल, चपाती, केले और हलवा शामिल हैं। बच्चों के लिए आहूजा की पत्नी निर्मल आहूजा गुब्बारे, कैंडी, बिस्किट और अन्य खाद्य सामग्री एसयूवी पिकअप में रखकर लाती हैं।

फल के बड़े व्यापारी आहूजा ने कोई साधारण जीवन नहीं जीया है। वह 1947 में बंटवारे के समय अपने जन्मस्थान पेशावर से विस्थापित हो गए थे। उस समय उनकी उम्र 12 वर्ष थी। वह अपने परिवार के साथ शरणार्थी के तौर पर पंजाब के मनसा आ गए। बचपन में वह जीवनयापन करने के लिए रेलवे स्टेशन पर नमकीन दाल बेचा करते थे। वह बाद में पटियाला चले गए और गुड़ और फलों का कारोबार शुरू कर दिया।

1950 के दशक में आहूजा चंडीगढ़ चले गए, उस समय उनकी उम्र 21 वर्ष थी। उन्होंने एक फलों का ठेला ले लिया और केले बेचने शुरू कर दिए।

वह कहते हैं, “यहां कोई अच्छी तरह से नहीं जानता था कि केलों को कैसे पकाया जाता है। मैंने यह शुरू किया और अच्छी कमाई करनी शुरू की।”

आहूजा को बाद में क्षेत्र का राजा कहा जाने लगा और वह करोड़पति बन गए

आहूजा को बाद में क्षेत्र का राजा कहा जाने लगा और वह करोड़पति बन गए।

उन्होंने कहा, “मैं किसी को भी खाली पेट जाने देना नहीं चाहता। मैंने अपने बचपन में बहुत मुश्किल दौर देखा है। मैं अभी भी वह दिन याद करता हूं। यदि मैं लोगों की परेशानी कम करने के लिए थोड़ा बहुत भी कर सकूं तो मैं करूंगा।”

आहूजा ‘पीजीआई भंडारे वाले’ और ‘लंगर बाबा ‘के नाम से मशहूर हैं। लंगर के लिए कतार हमेशा लंबी होती है। ऐसा कोई दिन नहीं होता, जब आहूजा पीजीआई स्थित लंगर स्थल ना आते हों।

पीजीआई में लगने वाला लंगर आहूजा द्वारा की जाने वाली एकमात्र सामाजिक गतिविधि नहीं है। वह वृद्धाश्रमों को भी आर्थिक मदद देते हैं, बच्चों में फल और कैंडी वितरित करते हैं। लोगों को गर्म कपड़े देते हैं और खुद को कई अन्य गतिविधियों में व्यस्त रखते हैं। उन्हें चंडीगढ़ प्रशासन, कई अन्य संगठन और लोग सम्मानित भी कर चुके हैं। खुद को वर्चुअली अशिक्षित कहने वाले आहूजा की कार में एक मोबाइल टैबलेट है, जिसमें उनकी बेटी ने उनके सामाजिक कार्यो के वीडियो और तस्वीरें अपलोड की हुई हैं।

आहूजा को इन कार्यो में अपनी पत्नी निर्मल का पूरा सहयोग मिला हुआ है।

(यह साप्ताहिक फीचर श्रृंखला आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम फाउंडेशन की सकारात्मक पत्रकारिता परियेजना का हिस्सा है।

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