क्या भारत में महिलाओं को पढ़े-लिखे होने की सजा मिलती है?

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उमंग कुमार/

अक्सर लोग कहते पाए जाते हैं कि अगर महिलाओं की स्थिति सुधारनी है तो उन्हें पढ़ाया-लिखाया जाए. सरकार भी ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ जैसी योजना लेकर आई, यह सोचते हुए कि इससे समाज में महिलाओं की स्थिति सुधरेगी. लेकिन ऐसा नहीं है. इसके उलट अगर महिला अधिक पढ़ी-लिखी है तो उसके घरेलु हिंसा के शिकार होने कि संभावना बढ़ जाती है.

आईआईएम इंदौर में अर्थशास्त्र की सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्य कर रही पुरनजीत रॉय चौधरी ने हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार में साबित किया कि महिलाओं को बाल विवाह रोक देने या महज पढ़ा-लिखा देने से समाज में उनकी स्थिति नहीं बदलने वाली है.

इस मुद्दे को समझने के लिए उन्होंने पहले भारत और दुनिया के अन्य देशों में महिला श्रमशक्ति को उदाहरण बनाया. उन्होंने लिखा कि भारत दुनिया का ऐसा देश हैं जहां महिलाओं की श्रम शक्ति में सबसे कम भागीदारी है. वर्ष 2017 में, केवल 27 फीसदी महिलाओं के पास ही काम था या वे काम की तलाश में थीं. विश्व में ऐसे समूह का प्रतिशत करीब 50 है. यानी दुनिया भर में औसतन 50 प्रतिशत महिलायें या तो श्रम में भागीदारी कर रही हैं या काम की तलाश में हैं. इसके साथ एक और निराशाजनक तथ्य यह है कि अगर महिलाओं को रोजगार मिल भी जाता है तो उनकी कमाई और मजदूरी काफी कम होती है. ग्लोबल वेज रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार, महिलाओं की प्रति घंटा मजदूरी भारत में पुरुषों की तुलना में 34 प्रतिशत कम है. इस तरह के भेदभाव के मामले में भारत की स्थिति दुनिया के 73 देशों से खराब है. अक्सर ऐसा कहा जाता है कि भारत के श्रम बाज़ार में महिलाओं की कम भागीदारी की वजह बाल विवाह है. अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ एक्शन एड के एक अनुमान के अनुसार, दुनिया के कुल बाल विवाह का 33 प्रतिशत भारत में होता है. भारत की स्थिति ब्राज़ील, चिली, केन्या और पाकिस्तान जैसे कई अन्य विकासशील देशों की तुलना में भी खराब है.

बाल विवाह श्रम बाज़ार में महिलाओं की भागीदारी को दो तरीके से प्रभावित करता है. एक तो इससे महिलाओं की शिक्षा बाधित होती है जिसकी वजह से वे पिछड़ती जाती हैं. दूसरे बाल विवाह की वजह से महिलाओं पर कम उम्र में ही मातृत्व का बोझ आ जाता है. इसकी वजह से इन महिलाओं के जीवन का शुरूआती जीवन घरेलु काम और बच्चे की देख-रेख में खर्च हो जाता है. वो श्रम बाज़ार में भागीदारी के लिए जरुरी तैयारी करने में विफल रह जाती हैं. इन्हीं सारी वजहों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जाता है कि अगर देश की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी है तो ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ ताकि बाल विवाह जैसी समस्या से निजात मिल सके.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण 2005- 2006 के अनुसारवे महिलायें जो कम से कम अपनी पति के बराबर शिक्षित हैं उनको अपने पति से हिंसा झेलने की सम्भावना अधिक रहती है. अगर महिला अपने पति से कम पढ़ी लिखी है तो इसकी सम्भावना कम होती है

तो सवाल यह है कि क्या अगर देश से बाल विवाह की समस्या को ख़त्म कर दिया जाय तो श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ जायेगी? पुरनजीत रॉय चौधरी और गौरव धमीजा नाम के दो विशेषज्ञों ने इस मुद्दे की पड़ताल की और पाया कि सिर्फ बाल विवाह को रोकने से यह समस्या नहीं ख़त्म होने वाली.  इसके लिए भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण 2012 में 40,000 महिलाओं के राष्ट्रीय प्रतिनिधि घरेलू आंकड़ों का उपयोग किया और इससे यह नतीजा निकला कि  बाल विवाह और श्रम बाज़ार में महिलाओं की कम भागीदारी का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है.

हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखे अपने लेख में इन्होंने लिखा कि इसकी एक वजह ‘मेल बैकलैश’ इफेक्ट या कहें ‘पुरुष प्रतिक्रिया’ प्रभाव हो सकती है. इसके अनुसार महिला जितनी पढ़ी लिखी होगी उसी अनुपात में उसके साथ घरेलु हिंसा की सम्भावना बढ़ती जाती है. ऐसा इसलिए कि महिला के पढ़े-लिखे होने की वजह से आपसी रिश्ते के समीकरण में बदलाव आने लगता है. इसका नतीजा यह होता है कि पुरुष अपने पारंपरिक वर्चस्व को पाने के लिए हिंसा इत्यादि पर उतर आता है.

इसके लिए इन्होने समाजशास्त्री अबीगेल वेइटजमन के एक अध्ययन का हवाला दिया. यह अध्ययन पापुलेशन एंड डेवलपमेंट रिव्यु में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन के लिए अध्ययनकर्ता ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण2005- 2006 का आंकड़ा लिया और पाया कि वे महिलायें जो कम से कम अपनी पति के बराबर शिक्षित हैं उनको अपने पति से हिंसा झेलने की सम्भावना अधिक रहती है. अगर महिला अपने पति से कम पढ़ी लिखी है तो इसकी सम्भावना कम होती है.

बैकलैश इफ़ेक्ट सिद्धांत महिलाओं के शिक्षा पाने और घरेलु हिंसा के अधिक शिकार होने सीधा सम्बन्ध स्थापित किया है. दूसरे, रॉयचौधरी ने अपने अध्ययन के आधार पर यह लिखा कि पढ़ी-लिखी महिलाओं को घरेलु हिंसा और काम करने की आजादी का नहीं मिलने की सम्भावना अधिक है. इस तरह इस मेल बैकलैश सिद्धांत की वजह से बाल विवाह नहीं होने की स्थिति में जो फायदा एक महिला को मिल सकता था वह भी ख़त्म हो जाता है. इस तरह श्रम बाज़ार में महिलाओं के कम भागीदारी की समस्या बनी रहती है.

इसके आधार पर इनका कहना है कि श्रम बाज़ार में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सिर्फ बाल विवाह रोकने जैसे पारंपरिक प्रयास बहुत काम नहीं आने वाले. इन प्रयासों के साथ साथ सरकार को कुछ और भी नीतियाँ बनानी होगी जिसकी वजह से ये मेल बैकलैश को भी कम किया जा सके. इसके लिए महिलाओं को पंचायत, सरकार और अन्य जगहों पर आरक्षण देना होगा ताकि समाज में महिलाओं की पारंपरिक भूमिका ख़त्म हो सके.

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