अमेरिका में कैसे पुस्तक प्रेम बढ़ा रही है सरकार

0
दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले की तैयारियां और उसका उत्साह एवं प्रचार जोरों पर हैं। लेखक, प्रकाशक, पाठक, विक्रेता मीडिया पर्सन सब दिल्ली के लिए कूच कर चुके हैं या फिर कूच करने की तैयारी में हैं। चूंकि इस पुस्तक मेले के साथ विश्व जुड़ा रहता है इसलिए सहज ख़याल आ जाता है विश्व के दूसरे देशों में किताबों का क्या हश्र या हाल होगा। अपने देश के शहरों में तो किताबें मिलती नहीं। यह सोच ही रहा था कि कई साल से अमेरिका में रह रही सपना जैन का यह सुखद अनुभव जानने को मिला। आप भी पढ़िए। लाइब्रेरी की बाहर से तस्वीर देखिये। ख़ुश होइए कि दूर देशों में ही सही किताबें ख़ुश और बची हुई हैं। शुक्रिया सपना जी !- शशिभूषण
————————————————————

सपना जैन/

भारत में रहते पुस्तकों के लिए तरसते और पुस्तक पीड़ा से मुझे यहां का एक मरहमनुमा अनुभव याद आता है। इन दिनों मैं अमेरिका प्रवास पर हूँ,और किसी भी अच्छी बात को अच्छा कहने में मुझे कोई हिचक नहीं चाहे वह किसी भी देश की हो।

बात भारत में किताबों की गिरती साख और उनकी अनुपलब्धता पर हो रही है। चलिये, मैं अपना सुखद अनुभव साझा करती हूं:

अमेरिका की सरकार ने पढ़ने की आदत को इतना महत्वपूर्ण माना कि 4 साल के बच्चे को भी लाइब्रेरी पहुंचा दिया। स्कूलों से हर उम्र के बच्चे को रोज़ स्टोरी बुक्स दी जाती हैं। रंग-बिरंगी, चित्रों से भरी किताबें …थोड़े बड़े हो जाओ तो रोज का एक रीडिंग लाग भरने को दे दिया जाता है। जो भी बुक पढ़ो उसका नाम और लेखक का नाम भरो। साल के अंत मे ज्यादा से ज्यादा बुक्स पढ़ने पर ईनाम।

यह भी अंकित कर दूं कि ये सब बुक्स मुफ्त हैं, और सबसे बड़ा कदम हर एरिया में बनीं शानदार सरकारी लाइब्रेरी। इन लाइब्रेरी में हर उम्र यानी एक से सौ साल तक के लोगों के लिये फ्री किताबें। हर विषय में किताबें मौजूद हैं। फ्री में कार्ड बनवा लीजिये। चाहे वहीं पढ़िए या बुक्स घर ले जाइये।

पढ़ने के लिए बैठने की जो व्यवस्था होती है वह किसी शानदार कैफ़े का अनुभव देती है। लाइब्रेरी की बिल्डिंग किसी फाइव स्टार मॉल सी नजर आती है।

बच्चों को लाइब्रेरी में आकर्षित करने के लिए छुट्टियों में कहानियों का सेशन या गेम्स की भी व्यवस्था होती है। इस सबका मकसद क्या है? सिर्फ़ यह कि हर हाल में किताबें पढ़ने की आदत डाल दी जाए। प्रत्येक साक्षर को …साक्षर को ही क्यों …किताबें तो एक वर्ष के बच्चे के लिए भी उपलब्ध हैं।

सोचती हूँ मार-मार के मुल्ला बनें या न बनें, अमेरिका में जो रहे वो पाठक जरूर बन जायेगा। और शायद लेखक भी। मेरा 7 साल का बेटा कुछ बचपन से भरी किताबें लिख भी चुका।

इसका सारा श्रेय इस काबिले तारीफ़ सिस्टम को ही जाता है। एक अच्छी आदत डालने के लिए, उसे मज़बूत करने के जितने जतन, सुविधायें और आकर्षण दिए जा सकते हैं, वो भरपूर हैं, और मैं इस बात का पूरी तरह अनुमोदन करती हूँ कि हर राष्ट्र को इससे सीख लेनी चाहिए।

बेशक़ इस लेख के बाद मुझे देशद्रोही करार दे दिया जाए पर एक बार विचार ज़रूर करें कि अगर गुटखा की तरह पढ़ने की लत लग जाये तो कौन माई का लाल जागरूकता को फैलने से रोक सकता है !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here