बीएचयू के पुराने विद्यार्थियों ने भी अपने नए साथियों के पक्ष में मोर्चा खोल रखा है

0

सौतुक डेस्क/

संघर्ष के तीसरे दिन BHU के शिक्षक भी छात्राओं के साथ हुए जुल्म के खिलाफ उतर आये हैं. राम रहीम से अपना ध्यान हटाकर मीडिया भी विश्वविद्यालय में चल रहे छात्राओं की रिपोर्टिंग करने लगा है. विपक्षी दलों के नेता भी बयान जारी कर रहे हैं. यूँ तो यह छात्राओं और उनके सहपाठियों के संघर्ष का ही नतीजा है.  पर उनके कुछ अग्रज सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनकी आवाज बुलंद कर रहे थे. अपनी सीमाओं को देखते हुए सबको यहाँ लाना संभव नहीं है, पर सौतुक विश्वविद्यालय से पढ़ाई किये कुछ ऐसे ही पुराने विद्यार्थियों से बात की. इन बुलंद आव़ाज को आप भी पढ़िए..

प्रमोद कुमार  तिवारी, (गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत)

नाक ना होत तs मेहरारू मइला खइती सन (नाक नहीं होती तो स्त्रियां मल खा लेतीं). पूर्वांचल की यह लोकप्रिय कहावत है, जिसे लगभग रोज सुनते हुए मैं बड़ा हुआ. भ्रूण हत्या से लेकर बहू को जलाकर, जहर देकर और डायन बताकर भी खूब मारा जाता रहा और ‘यह तो होता ही रहता है’ यह मान कर हम चुपचाप देखते रहे. मेरी मातृ संस्था BHU जिसने मुझे साहित्य का संस्कार दिया, वहां भी मां, देवी, दीदी कही जाने वाली स्त्रियां दूर होते ही “माल” बन जाती थीं. लंकेटिंग कर के हास्टल लौटे कई वीर धीरोदात्त नायक ‘माल’ ताड़ने और उनके स्पर्श और मर्दन का शानदार वर्णन किया करते थे.  हॉस्टल वाली सड़क से लड़कियां रिक्शे पर भी गुजरने की बजाय 1-2 किलोमीटर घूम कर दूसरी सड़क से जाया करती थीं.
विश्वविद्यालय किसी भी समाज का मस्तिष्क होता है और वह समाज का वैसे ही नेतृत्व करता है जैसे हमारा दिमाग हमारे शरीर का. BHU के आंदोलन में मैं भोजपुरी क्षेत्र में बड़े बदलाव की आहट देख रहा हूँ. इसका गहरा संबंध इस क्षेत्र के सामंत वाद, दहेज प्रथा, जातिवाद और गरीबी से है. लड़कियों का बोलना, बदलना और आंदोलन करना मायने रखता है. देवी और दासी के बीच वे हाड़ मांस की इंसान भी हैं, बहुत लोगों को यह समझाना आज भी मुश्किल है. अगर बेहतर कल चाहते हैं तो इसे BHU से निकालकर पूर्वांचल के गांव-गांव तक ले जाने की जरूरत है. मैं भी BHU से और अपने क्षेत्र से टूट कर प्यार करता हूं परंतु इस जड़ता को तोड़ने के लिए हर हद तक जाने को तैयार हूँ. सड़न को बहुत छुपाने पर वह कैंसर बन जाता है। नश्तर मजबूरी है, जरूरी है. सलाम लड़कियों, शाबाश लड़कियों, डटे रहो.

 

दीपशिखा सिंह, (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कार्यरत)

विश्वविद्यालयी प्रशासन लुच्चों लफंगों को पकड़ने के समय तो पंगु बन जाता है लेकिन अपने अधिकारों और सुरक्षा की माँग कर रहे छात्रों के दमन में पूरी जोर आजमाइश करने लगता है. विश्वविद्यालयी साहब को क्या कहें! वे तो ख़ुद को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक इकाई समझ रहे हैं जिन्हें बदनाम करने के लिए देश विरोधी ताकतें साजिश रच रही हैं. इतना दंभ और विशिष्टताबोध कहाँ से लाते हो! हर रोग को आप पाकिस्तान, आतंकवाद, नक्सल, राष्ट्रदोह की चादर से नहीं ढँक सकते। और ये जुमले भी राजनीति में ही ठीक लगते हैं. शिक्षा व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा के मुद्दों पर इस तरह की बातें खुद ब खुद आपकी अकर्मण्यता बयाँ कर देती हैं. ये आप ही लोगों के घरों से आई हुई लड़कियाँ हैं, जो विश्वविद्यालय परिसर में अपनी सुरक्षा मुकम्मल कराना चाहती हैं. ये बस्तर की लड़कियाँ नहीं जिन्हें नक्सली कहकर पीटने और यौन हिंसा की अघोषित छूट मिली हुई है, ये एशिया के सबसे बड़े आवासीय परिसर की छात्राएं हैं जिन्हें सीसीटीवी और प्रकाश व्यवस्था की माँग पर पीटा गया है. तुम पूरी दुनिया में कहीं भी आवाज़ उठाओगी तो मारी जाओगी. यह मुख्यधारा के समाज में रहने वाले तुम्हारे घरवाले समझे या नहीं लेकिन तुम्हें समझना होगा और आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाना भी होगा.

 

विष्णु के अग्रहरी, (बनारस में ही निजी व्यवसाय)

पिछले एक दो सालों से बीएचयू के छात्रों के साथ वहाँ का प्रशासन जिस तरीके का व्यवहार कर रहा है, यह दुखद है. वहाँ के कमियों को उजागर करने वाली छात्रों की  हर बात को कुचलने का प्रयास किया जाता है. यह सही नहीं है. इसको लेकर वर्तमान में पढ़ाई कर रहे छात्रों और पुराने छात्रों में गुस्सा है. विश्व के तीसरे सबसे बड़े विश्वविद्यालय में छात्रों को और स्वस्थ माहौल की आवाश्यकता है जिसमे वे पढाई के साथ साथ और जरुरी चीजें सीख पायें.  एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्र पढाई के साथ और भी बहुत कुछ सीखने आता है.

कल रात की घटना एक तरह से अपराध की श्रेणी में आता है. विश्वविद्यालय प्रशासन का गैरजिम्मेदार रवैया कत्तई बर्दाश्त नहीं है. महिलाओं के साथ छेड़खानी की कोई यह पहली घटना नहीं है. पहले भी ऐसी घटनाएँ रिपोर्ट होती रही हैं. लेकिन हर बार उन घटनाओं को दबा दिया जाता है. यही वजह है कि कल रात की घटना हुई.

विश्वविद्यालय के कुलपति को राजनीति से प्रेरित देखना दुखद हैं. जब से वे BHU में आये हैं तब से पढ़ाई लिखाई की गतिविधिया कम और राजनीति से प्रेरित गतिविधियाँ अधिक देखने को मिल रही हैं.


बृजराज सिंह (दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट, आगरा में कार्यरत)

अभी जून में हम सभी हिंदी विभाग के पुराने छात्र-छात्राएं इकट्ठा हुए थे. अलग अलग शहरों से सिर्फ इसलिए आए थे कि कुछ घंटे फिर उस परिसर में रहेंगे, जिसने हमें ऐसा बनाया है. कितनी बातें हमने कीं, समय कम पड़ जाता है ऐसे अवसरों पर. कक्षा से ज्यादा उस परिसर से सीखा है हमने. कितना गर्व और विश्वास था हमें अपने विश्विद्यालय पर. लेकिन कल की घटना ने हमारा सर शर्म से झुका दिया है. कितनी छोटी सी मांग थी उन लड़कियों की, जिसे न मानने का कोई कारण ही नहीं दिखता. क्या अपने साथ छेड़खानी और अपमान के खिलाफ आवाज उठाना जुर्म है. ऊपर से बर्बर लाठीचार्ज और दमनात्मक रवैया शर्मसार करने के लिए काफी है. सिंह द्वार से वीसी आवास की दूरी महज 500 सौ मीटर है. मिलकर बात करने से क्या चला जाता, बजाय इसके कि आपके पुरुषवादी अहम को ठेस पहुंचती. पैदल भी जाते तो पांच मिनट से ज्यादा नही लगते. अपनी ही लड़कियां हैं, अभिभावक आपके ही भरोसे उन्हें यहां छोड़ जाते हैं. अपने खिलाफ होने वाले अन्याय का शांतिपूर्ण विरोध कर रही थीं और बस इतना चाहती थीं कि उनकी सुरक्षा का भरोसा दे दें आप. आप से इतना भी नहीं बना. आधी रात को पुलिस बुला कर पिटवाया. सुना है मैंने आप बड़े धरम-करम वाले हैं. आपका धर्म यही सिखाता है? नवरात्र का व्रत भी रखा होगा आपने, निश्चित ही कन्या पूजन भी करेंगे. लेकिन उन्हीं शक्ति की प्रतिरूपों पर इस नवरात्र की आधी रात में लाठी चार्ज करते समय ज़रा भी शर्म नहीं आयी आपको. दस साल रहे हैं हम उस परिसर में, इतनी शर्मिंदगी आज के पहले कभी नहीं उठानी पड़ी. यह बीएचयू के इतिहास का सबसे काला दिन है. ये लड़कियां हैं, बर्दास्त करने की हद तक सहतीं हैं. इनके बाहर आने का मतलब है कि पानी सर से ऊपर जा चुका है. अपने जो किया है उससे जाहिर होता है कि आप उन असामाजिक तत्वों के साथ हैं जो छेड़खानी करते है, जो लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं. अब इसकी माफी नहीं मिल सकती.

विवेक सिंह, (एम्स दिल्ली में कार्यरत)

BHU में छात्रों की जो परेशानी सामने आ रही है वो कोई नई बात नहीं है, ये हर आदमी जानता है. मेरे जैसे लोग जो इस संस्थान में पढ़ चुके हैं वो तो इससे बहुत अच्छे तरीके से वाकिफ हैं. लेकिन इस बार जिस तरह से छात्राओं ने इसे पेश किया है, वह बहुत ही पहले हो जाना चाहिए था.

ज़्यादातर समय मैं जब लड़कियों से अलग पढ़ने के बाद जब में BHU में आया तो लगा कि ये एक अलग दुनिया होगी. लेकिन यहाँ सलाखें ज्यादा मज़बूत थीं उनपर पॉलिश चढ़ी हुई थी. हम कहानियां सुनते थे कि जब छात्र संघ था तब लड़की लड़के के हॉस्टल के सामने से गुज़र कर सुरक्षित नहीं रह सकती थी. अब सिर्फ फर्क इतना था कि खिड़की से किसी लड़की को देखकर लड़के जानवरों की तरह झुण्ड बना लेते थे, चिल्लाते थे, पर हमला नहीं करते थे. प्रशासन के लिए लड़कियों की सुरक्षा करने का मतलब था उन लड़कों को परेशान करना जो लड़कियों के साथ घूमते हुए पाए गए या लड़के-लड़कियों के बाल, कपड़े, रहन-सहन पर पाबंदी लगाना.

इतने बड़े संस्थान में पढ़ने के बावजूद लड़की सिर्फ एक कमोडिटी सी होती है. इसमें संस्थान को कोई दोष नहीं, ये तो बचपन से दबाई हुई सेक्सुअलिटी की हिंसक अभिव्यक्ति है जो कहीं भी जाओ ऐसा ही दिखेगा.

अब जो हो रहा है वो चीज़ों को और सही ग़लत के साँचे में डालना. ब्लैक और वाइट के सिवाय कोई रंग ही नहीं रह गया है.  राष्ट्रवाद विश्वविद्यालय के अन्दर और मजबूती से जम गया है. जातिवाद तो BHU से कभी गया ही नहीं है, और –तो –और वो और रग रग में समा गया.

ये घटनाएं एक सिंड्रोम हैं, जो एक अविकसित और हिंसक समाज की ओर इशारा करती हैं. जहाँ परिभाषाएं इतनी सख्त और नुकीली हैं कि उनसे किसी की भी हत्या की जा सकती है.

चन्द्रिका, (जेएनयू में शोध कर रहे हैं)

बी.एच.यू. में जो लड़कियां सड़कों पर निकल आई हैं. वे लोकतंत्र के सपने को पूरा कर रही हैं. वे महामना के सपने को भी पूरा कर रही हैं, अगर महामना लोकतंत्र और आज़ादी के समर्थक थे तो. बी.एच.यू में जो उनके होने का वजूद है. जो लगभग खाली पड़ा हुआ वजूद है उसे वे भर रही हैं. सौ साल के गौरव का जो इतिहास वे गाते फिरते हैं उसमे वे अपनी भी कहानी जोड़ रही हैं. बी.एच.यू को जिस महानता के साथ पूर्वांचल में देखा जाता है वह एक सामंती महानता ही रही. छात्राओं के लिए वह पढ़ने की जगह तो रही पर कभी भी सम्मान से जीने की जगह नहीं रही है. यह हमने अपने वहां रहते हुए देखा है. ऐसे में वे सुरक्षा की ही मांग तो कर रही हैं और प्रशासन उन पर काठीचार्ज करवा रहा है. यह शर्मनाक है. शर्मनाक यह भी है कि गंगा को मां कहने वाले प्रधानमंत्री अपना रास्ता बदल कर निकल जाते हैं. जब बेटियां उन्हीं के नारों में उनसे सवाल करती हैं. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे ने भी अपना रास्ता बदल लिया है. लड़कियों ने नारे बदल दिए हैं. उसे सवाल बना दिया है. कि बचेगी बेटी तभी तो पढ़ेगी बेटी. ऐसे में मामूली सी मांग पर उन पर हिंसा करना वाकई शर्मनाक है. जो ठीक है वह है उनका निकलना. वे निकली हैं तो बी.एच.यू. की आधी आबादी के लिए एक उम्मीद निकली है. सत्ताओं का काम है उम्मीदों और अधिकारों को कुचलना. उम्मीदों का काम है फिर से उठना और उठकर आगे चलना.

 

अमित कुमार सिंह, (बिलासपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के बतौर कार्यरत) 

पिछले दो दिन से बीएचयू में छात्राओं के साथ जैसा सुलूक वहां के प्रशासन ने किया है, यह उस संस्थान की तथाकथित प्रगतिशीलता का ढंका हुआ चेहरा है, जो अचानक सामने आ गया है. लड़कियों के लिए इस संस्थान में लोकतंत्र का स्पेस हमेशा से ही कम रहा है. सामंती सोच को सही ठहराने वाली पीढ़ियों के बहुमत के बीच लड़कियों का आन्दोलन और उनकी जायज मांगें भी इसीलिए लोगों को गलत लगने लगती हैं. चापलूसी और चाटुकारिता की योग्यता से पद पा जाने वाले ऐसे प्रशासकों में विद्यार्थियों के बीच जाना अपनी प्रतिष्ठा कम करने और अहं को चोट पहुंचाने जैसा है. लेकिन, सबसे ज्यादा शर्म और अपराध की बात यह है, कि वहां के शिक्षकों के भीतर इतना भी नैतिक सहस नहीं बचा, कि जेनुइन मुद्दों पर भी वे अपने ही बच्चों का समर्थन कर सकें. इस आन्दोलन का परिणाम निष्कासन,निलंबन या लीपा-पोती कुछ भी हो, उन शिक्षकों को,जिनमे महिलायें और पुरुष,दोनों ही शामिल हैं, समय इस अपराध के लिए उन्हें दोषी के बतौर दर्ज करेगा.

बीएचयू के छात्र के रूप में मै, इन लड़कियों और उनका साथ दे रहे उन लड़कों, पत्रकार दोस्तों और जगह जगह से समर्थन करने वालों का शुक्रिया अदा करता हूँ. यह साथ,इस समय में बहुत जरूरी हैं दोस्तों.. बने रहिये..

 

(मुख्य तस्वीर दीपशिखा जी के वाल से ली गयी है)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here