दिवाली के मौके पर विद्यार्थियों के नाम एक शिक्षक का पत्र

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प्रिय बच्चों,

मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि शिक्षक होने के कारण मुझे आप लोगों के बीच रहने का अवसर मिलता है। मुझे सबसे अधिक ख़ुशी मिलती है जब आप लोगों के बीच होता हूँ। सुबह- सुबह आपके खिले-खिले, खेलते चेहरों को देखकर मुझे जो आत्मबल और भावनात्मक श्रेष्ठता महसूस होती है मैं उसे शब्दों में नहीं लिख सकता। मुझमें इतनी क़ाबिलियत नहीं है। इतना ही कह सकता हूँ कि आप लोगों के बीच मुझे दुःख, अभाव और डर भूल जाते हैं। मुझे ऊँचाई और महानताएं अपनी ओर खींच लेती हैं । बड़ी-बड़ी बातें सोच सोचकर मेरी आँखों में आंसू आ जाते हैं। लोगों को लगता होगा, और ख़राब मनोदशा में मुझे भी मुग़ालता हो जाता है कि मैं आपको पढ़ाता-सिखाता हूँ। मगर सच्चाई यही है कि मैं सदा सीखने की जुगत में रहता हूँ।

मुझे यह उम्मीद उत्साहित करती रहती है कि आप बड़ी से बड़ी बात सोचें। महान से महान कल्पना करें। ऊंचे से ऊंचा सपना देखें। अपनी नज़र और दिल को इतना बड़ा रखें कि यह दुनिया कुटुंब लगे। आपके दिल में धरती के हर हिस्से के लिए खुली जगह हो। मैं इन सबका साक्षी बनूँ।

इस कामना के पीछे मेरा यही लोभ और आशा है कि मेरा दिल सदा जवान और मस्तिष्क उन्नत रहे। मेरे सदाचारों और प्रार्थनाओं को कभी बुढ़ापा या रोग या बाधाएं न लगे। मुझे लगता है मैं अपने विद्यार्थियों की श्रेष्ठता का सक्रिय गवाह रहूं। अच्छाइयों और बच्चों के लायक सदा बना रहूं। मेरे अज्ञान, दम्भ या भ्रम कभी मुझे विद्यार्थियों से दूर न होने दें। मैं चाहता हूं आप लोग सदैव मिलकर रहें। कोई ताकत आपको लड़ा न पाए। जो बनना चाहें वह बनें। लेकिन जो भी बनें उसमें प्रेम, मैत्री, करुणा को हमेशा प्रमुख जगह रहे।

आप नयी से नयी चीज़ बनाएं। पुरानी से पुरानी महानता के लिए उदार रहें। कठोर से कठोर आलोचना के लिए सहिष्णु रहें। मेरा यह यक़ीन बचाये रखने में मेरी सहायता करें कि कोई महानता कभी पुरानी नहीं होती, और महानताएँ परस्पर बंधु होती हैं। विद्यार्थियों, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए सिवाय आपके प्रेम, यक़ीन और सहारे के। मेरे जीवन के लिए मुझे इस महान देश से ख़ूब मिलता है। फिर भी मैं आपके बिना कुछ भी नहीं हूँ। आपकी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी है। मैं आपसे केवल यही मांगता हूं कि आप ऐसी दुनिया बनाने में उन सब बेहतर मनुष्यों की सहायता करें जिनके प्रयासों से मैं और आप सब इंसानियत, ईमानदारी और सिद्धांतों पर आजीवन अचल आगे बढ़ते रहेंगे।

बच्चो मैं आपकी महानताएँ देखना चाहता हूं, आपकी बनाई सुंदर दुनिया में विचरना चाहता हूं यह जानते हुए कि मेरी आँखें कमज़ोर होती जाएंगी। मेरे पांव निबल होते जाएंगे। लेकिन अभिलाषाएं विकल होती जाएंगी। बच्चो, मुझे आपकी आनेवाली दुनिया से बहुत प्यार है। प्रकृति मुझे सदैव आपके साथ नहीं रखेगी लेकिन मैं उसमें रहना चाहता हूँ। शुक्रिया आपका कि मैं आपके बीच हूँ। आपकी बेहतरीन और खूबसूरत ज़िन्दगी जिसे बचपन कहते हैं का हिस्सा हूँ। वादा कीजिये हम उम्दा जिएंगे, अहिंसा गहेंगे, दिल जीतेंगे !…आभार !!…ज़िन्दगी ज़िंदाबाद !!!…

आपका

शशिभूषण,
उज्जैन (म.प्र.)

(शशिभूषण खुद कथाकार हैं. दूरदर्शी आलोचक हैं. सोशल मीडिया को जो कुछ लोग अपनी सामयिक और तीक्ष्ण टिपण्णीयों से मौजूँ बनाये रखते हैं, शशिभूषण उनमें से एक हैं. केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक कार्यरत शशिभूषण अपने स्वभाव से ही शिक्षक हैं.)

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