बाँधों न नाव इस ठाँव बंधु: सामाजिक विद्रूप औऱ क्रूरताओं को सहजता से व्यक्त करती कहानी

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शशिभूषण/

‘बाँधों न नाव इस ठाँव बंधु’ शीर्षक को ऊपर ही ऊपर झुठलाती अकथ व्यथा कथा है।

विशिष्ट शैली में सिरजी गयी प्रेम-कथा जो मृत पुरुष को अ-मृत पुरुष सा बनाती हुई समाप्त होती है। कहानी अपने प्रभाव में इस प्रतीति का वचन सा देती है कि यह कल्पना की उपज नहीं। सर्वथा अनूठे कोण से लिखा गया व्यथासिक्त प्रेमाख्यान है ‘बाँधों न नाव इस ठाँव बंधु’। कहानी में पुरुष की मृत्यु, मृत्यु के संस्कारों, सामाजिक घटनाओं के साथ-साथ मृत पुरुष के बेटे द्वारा वर्णित किस्सा चलता है। यह क़िस्सा अंतरंग, मानवीय औऱ दार्शनिक दृष्टि संपन्न है।

बेटा, पिता के अंत:करण का सहयात्री है। उसके भाई पिता की संपत्ति का इंतज़ार कर रहे हैं। परिवार में संपत्ति के बँटवारे की दिखावटी सौजन्य से भरी हुई क्रूरता पसरी है। मँझला बेटा जो कहानी का नैरेटर है, पिता का आत्मीय है। पिता के बारे में वह गोपन जानता है। यह गोपन उसकी माँ भी नहीं जानती। यही गोपन कहानी की प्रेमकथा है। कहानी में माँ यानी पुरुष की पत्नी एक अन्य प्रकार का दुखान्त इतिवृत्त है।

पुरुष का एक पुराना मकान है। उसे उसने एक विधवा स्त्री की देख रेख में बनवाया है। विधवा स्त्री पुरुष की मित्र-सहचर है। उसने घर की देख भाल की है। पुरुष को सदैव नि: स्वार्थ प्रेमपूर्ण मानवीय ऊष्मा दी है। उसका अपना कुछ नहीं है। पुरुष ही उसका अवलंब है। वह धैर्य और प्रतीक्षा की प्रतिमूर्ति है। पुरुष की निष्काम साथिन और उसके सपनों के घर की बेशर्त निष्णात संरक्षिका है।

पिता उसे सबसे अधिक चाहते थे। स्त्री पिता की जिजीविषा थी। मँझला बेटा रोकना चाहता है फिर भी स्त्री चाभी पकड़ाकर चली जाती है

पुरुष जीवन के अंतिम दिनों में अपने मँझले बेटे से उसी पुराने मकान में ले जाने की गुज़ारिश करता है। वह स्त्री के पास जाना चाहता है। उसे लगता है मेरा सर्वस्व औऱ सर्वश्रेष्ठ वहीं हैं। बेटे को लगता है यह अव्यवहारिक है। माँ पर आघात होगा। समाज, पूरे परिवार को शर्मिंदगी में डाल देगा। विधवा स्त्री का नाम रूपा है। वह नाम के अनुरूप ही उज्ज्वल सुंदर है। गरिमामयी है। बेटे के मन में उस स्त्री के प्रति सम्मान है। वह उसके प्रति सहृदय है।

पुरुष की मृत्यु होने पर रूपा उसके घर आती है। वह बेटे को चाभियाँ सौंपती है। बेटा अपने पिता के प्रति प्रेम में चाहता है कि स्त्री उस घर में पूर्ववत रहे। वह जानता है स्त्री का कोई नहीं है। इस उम्र में वह कहाँ जायेगी ? पुरुष के परिवार के दूसरे लोग चाहते हैं कि स्त्री तुरंत चली जाये। भले रात है। पुरुष के घर वालों को लगता है कि स्त्री ने उनकी पारिवारिक संपत्ति का अनुचित उपभोग किया है। वह छली है। उसका कोई हक नहीं था। वह लालची है। यदि उसे घर से न निकाला गया तो वह षडयंत्र करके स्थायी काबिज़ हो जायेगी।

मँझला बेटा जानता है कि स्त्री ऐसा कुछ नहीं करेगी। लेकिन  उसका ही उस घर में नैसर्गिक हक़ है। वह पिता की प्रेमिका है। सुख-दुख की साथी है। पिता उसे सबसे अधिक चाहते थे। स्त्री पिता की जिजीविषा थी। मँझला बेटा रोकना चाहता है फिर भी स्त्री चाभी पकड़ाकर चली जाती है। उसे कुछ नहीं चाहिए। मानो पुरुष का प्रेम ही उसका अधिकार और प्राप्य था। वह उसे मिल चुका। स्त्री के इस प्रकार नि: स्वार्थ चले जाने के क्षण मँझले बेटे को पिता के नहीं रह जाने का वास्तविक दुख होता है। उसे रुलायी आती है। वह रोता है।

उर्मिला शिऱीष द्वारा रचित इस कहानी का शिल्प अनूठा है। भाषा में स्मृति और प्रेम की धारिता है। सामाजिक विद्रूप औऱ क्रूरताओं को सहजता से व्यक्त करती यह कहानी उदात्त प्रेम कहानी है। इस कहानी का प्रेम साहसिक और असंभव सा है लेकिन सहज मानवीय है। इस कहानी को हिंदी की श्रेष्ठ प्रेम कहानियों में शुमार किया जाना चाहिए।

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वनमाली सृजनपीठ द्वारा संपादित विशाल हिंदी कहानी संग्रह ‘कथादेश’ में प्रकाशित टिप्पणी

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शशिभूषण

फटा पैंट और एक दिन का प्रेम’ फेम शशिभूषण बेहतरीन कथाकार हैं। विराट जीवन की संभावनाओं के बीच एक किसी नुक्ते पर फँसा मनुष्य इनकी कहानियों में गरिमापूर्ण ढंग से वर्णित होता है। ये दूरदर्शी आलोचक हैं। सोशल मीडिया को जो कुछ लोग अपनी सामयिक और तीक्ष्ण टिपण्णी(यों) से मौजूँ बनाये रखते हैं, शशिभूषण उनमें से एक हैं। केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक कार्यरत शशिभूषण अपने स्वभाव से ही शिक्षक हैं। 

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