समीक्षा: जीवन का एक नया सौंदर्य बोध गढ़ते युवा कवि सुमन कुमार सिंह

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फोटो: साभार 'द हिन्दू'

जितेन्द्र कुमार/

युवा कवि सुमन कुमार सिंह की कविताएँ मैं पिछले15 वर्षों से पढ़ते-सुनते आ रहा हूँ. मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्मे कवि ने किसान जीवन के ताप को सहते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त की है. भोजपुर(बिहार)के किसान आंदोलन से उनका संवेदनात्मक और वैचारिक लगाव रहा है. उच्च शिक्षा प्राप्त युवा के लिए अध्यापन से बढ़िया पेशा क्या होगा? सो वे बी. एस. डी.ए. वी. स्कूल आरा में अध्यापन करते हैं. कवि के जीवन में जद्दोजहद रहा है और है. उसका पारखी और संवेदनशील मन महसूस करता है कि सत्ता का केंद्रक भले राजधानी में हो, लेकिन उसकी प्रसारी शक्तियाँ गाँवों कस्बों तक फैली हुई हैं. जनता दमन का स्वाद चखती है तो चीखती भी है. वो दमन का प्रत्याख्यान रचती है. युवा कवि सुमन कुमार सिंह के अनुभवों का तादात्म्य संबंध किसान आंदोलन से रहा है. आमजन के आक्रोश को शालीनता से शब्द देता है. आक्रोश की आवाज सत्ता के गलियारे तक पहुँचती है क्योंकि सुमन में राजनीतिक चेतना है.

पता नहीं
यह देश मेरा है
कि तुम्हारा ठीया
जहाँ अपने ही गोश्त की
बोली लगाते लगाते
थका जा रहा है

शक्ति केंद्रक हर दूसरे दिन दुनिया में डुगडुगी पीटवाता है कि भारत युवाओं का देश है. लेकिन देश का युवा महँगाई, बेरोजगारी और गरीबी से त्रस्त है. उसके जीवन में ठहराव है बुनियादी जिंसो के दाम, शिक्षा-चिकित्सा के खर्च जिस तेजी से बढ़ रहे हैं उससे उससे सबसे अधिक युवा प्रभावित और परेशान है. सुमन कुमार सिंह ने इस स्थिति का बढ़िया बिंबन किया है. जितनी देर में युवा कवि की एक कविता पूरी होती है उतनी ही देर में गैस, नमक, चीनी, तेल, दूध, सब्जी कपड़ों आदि के दाम बढ़ जाते हैं. तथाकथित विकास की गति आम आदमी, किसान और बेरोजगारों के लिए ऋणात्मक हो चली है. सर्व समावेशी विकास नहीं है. विकास का लाभ मुट्ठी भर लोगों को हो रहा है. आम आदमी का विकास कॉरपोरेट घरानों, अधिकारियों, नेताओं के विकास के व्युत्क्रमानुपाती दिशा में अग्रसर है. लगता है विकास की यह प्रक्रिया आजादी के सारे सपनों को ध्वस्त करते हुए देश को मध्यकाल की दहलीज पर पहुँचा देगी. किसान समुदाय तेजी से उजड़ रहा है. वह न बीज खरीदने में सक्षम है न खेती के अत्याधुनिक औजार.

समकालीन कविता में किसान समुदाय का दुख दर्द अनुपस्थित होता जा रहा है. सिर्फ एक तोता रटंत है कि भारत किसानों का देश है और किसानों के विकास के बिना देश का विकास झूठा है. यह सत्ता का सिर्फ पाखंड रह गया है. अधिकतर समकालीन कवियों की अनुभूतियाँ किसानी जीवन संघर्षों से असंपृक्त हैं. सुमन कुमार सिंह की कविताएँ इसलिए भी ध्यान खींचती हैं कि उनकी कविताओं में बार बार किसान जीवन की त्रासदियाँ व्यंजित होती हैं

पता नहीं
खेती के अत्याधुनिक औजारों के साथ
मैं तोड़ रहा बंजर जमीन
कि खोद रहा कब्र
अपनी व अपने बीजों के लिए(तुम्हारे डिये से मैं)

इस के साथ ‘फिकर न करो’ कविता की कुछ पंक्तियाँ भी पढ़ी जा सकती हैं—

कब का बिक गया
इकलौता बरधा
टूट गया भंजहर
पड़ोसी का
आन पर कान कटाने को भी
क्या बचा अब

इसी कविता में एक और तस्वीर है जहाँ—

‘गोदामों में सड़ रहे अनाज/सीधे आएँगे हमारे हाथ/या फिर ह्विस्की के रैपर संग/मिलेगा सोम रस/

इस कड़ी में ‘मेरी जान बख्शो हजूर’ और ‘हम जो नहीं जानते’ जैसी कविताएँ भी पढ़ी जा सकती हैं. किसान चोरी चुप्पे बाजार जाता है. उसके सिर पर कर्ज का भार है. बाजार में जिंसे के दाम भाव पूछ कर घर वापस हो जाता है क्योंकि उसकी क्रयशक्ति घट गई है. वह अपनी बुनियादी सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो चुका है. युवा बेटियों के हाथ पीले करने भर बचत नहीं होती उसकी—

‘कौन नहीं जानता/कि पीले नहीं किये जा सकते/बेटियों के हाथ/कट्ठे भर बाजरे की खेती से’

तो सुमन कुमार सिंह की कविताएँ सीमांत किसान के जीवन की कठिनाइयों के बिंबों द्वारा उनके प्रति मानवीय संवेदना का सृजन करते हैं.

‘महज़ बिंब भर मैं’ डॉ सुमन कुमार सिंह का पहला कविता-संग्रह है. इसमें उनकी 57कविताएँ संकलित हैं. आजकल राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की आड़ में उदारीकरण की नीतियाँ जोर शोर से लागू की जा रही हैं. सुमन में राष्ट्रीय चेतना का अभाव नहीं है. वे किसी से कम देशभक्त भी नहीं हैं. लेकिन उदारीकरण की नीतियाँ राष्ट्रीय चेतना की संवेदना को कुंद कर रही हैं. राष्ट्रवाद का नारा लगाने और विदेशी कंपनियों को संवेदनशील रक्षा उद्योग और खुचरा व्यापार और दवा निर्माण क्षेत्र में शतप्रतिशत भागीदारी आमंत्रित करने में भारी अंतरविरोध है. वास्तविक राष्ट्रीय चेतना से संपन्न देश के युवा सुमन कुमार सिंह की तरह विचलित हैं. इस संदर्भ में सुमन कुमार सिंह की उल्लेखनीय कविता है”तुम तो”.वैश्वीकरण की नीतियाँ भारतीय गणतांत्रिक मूल्यों को नष्ट कर रही हैं-

‘सात समुद्र पार से आये अतिथि/खान-पान सम्मान से/अभिभूत/सुंदर स्वप्न पाले/ज्ञान-विज्ञान की गलबहियों में/फूले/खरीद बिक्री की करते नुमाइश/इनके हाथों में बिकता मत/.

इसी कविता की पंक्ति कविता-संग्रह का शीर्षक बनती है. कवि की देश के नियामकों से अपील है कि—‘मत छीनना इनका/अपना देश/इन छात्र-नौजवानों से/तुम्हें निवेदित करते/महज़ एक बिंब भर/बचा मैं/.’

छात्र-नौजवानों के प्रति संवेदनशील इस कविता की करुणा को समझा जा सकता है. इस कविता के साथ विकास और न्याय की पोल खोलती अन्य कविताएँ यथा-‘निरूत्तर’, ‘कुल्हाड़ी और पैर’, ‘रोटी’, ‘तेरी याद में’, ‘कर न करो’ आदि भी पढ़ी जा सकती हैं.

छात्र-नौजवानों के प्रति संवेदनशील इस कविता की करुणा को समझा जा सकता है. इस कविता के साथ विकास और न्याय की पोल खोलती अन्य कविताएँ यथा-‘निरूत्तर’, ‘कुल्हाड़ी और पैर’, ‘रोटी’, ‘तेरी याद में’, ‘कर न करो’ आदि भी पढ़ी जा सकती हैं. युवाओं के सामने बेरोजगारी बहुत बड़ी समस्या है. सुमन कुमार सिंह जीवन के विविध प्रसंगों और विषयों पर कविताएँ लिखे हैं. किसान और बच्चे अनेक बार उनकी कविता के विषय बनते हैं. उनकी काव्य संवेदना की प्राथमिकता युवाओं की भयानक बेरोजगारी भी है. शिक्षित, अशिक्षित, प्रशिक्षित हर तरह के युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. उनके जीवन में नैराश्य का अँधेरा है. उनके सपने मर रहे हैं. प्रेमिकाएं छूट रही हैं. इसलिए सुमन कुमार सिंह की कविताएँ उनकी रचनाशीलता को प्रासंगिक बनाती हैं. वे जीवन का एक नया सौंदर्य बोध गढ़ते हैं. उनकी रचनाओं का वही प्रतिमान होता है. वे परंपरागत बिंबों के साथ अपनी अनुभूतियों को भी बिंब योजना में शामिल करते हैं. वे अपने समय की पहचान मनहूस समय के रूप में चिह्नित करते हैं. ‘हर किरण ने शुरू कर दिया है/खून चूसना नस-नस से’ और ‘गुलाबों की जगह कपास के फूल, छुई-मुई की जगह नागफनी उग आये हैं’ युवाओं के जीवन में. परिस्थितियाँ इतनी भयावह है कि ‘बहुत लोगों ने/शुरू किया है माँगना/भर पेट भोजन/रहने को घर/पहनने को कपड़े’.

स्वाभाविक है कि ये आदमी की तीन बेसिक जरूरतें हैं और हम इतने वर्ष से आजाद हैं और हमें समाजवाद का सपना दिखाया जाता है.

जीवन इतना कठिन है तो लोग जीते कैसे हैं? लोग जीने का बहाना ढूँढ लेते हैं. सुमन कुमार सिंह की कविताओं में नगरों महानगरों का जीवन अनुपस्थित है. कोई छद्म सहानुभूति का दिखावा नहीं. शहरों-महानगरों में चैत का महीना आता है और गुजर जाता है. उनके पास मनोरंजन के आधुनिक साधन हैं. उनकी व्यस्तताएं हैं जिसमें वे डूबे रहते हैं. लेकिन किसान का जीवन चैत से आरंभ होता है. ठंड बीत चुकी होती है अगहनी फसल घर आँगन में आ चुकी होती है. चैत खरीफ के आने का समय है. आम के पेड़ मंजरित हो महमह करते हैं. गरीबी परेशानी अभाव में भी किसान के कंठ से चइता के बोल फूटते हैं ‘चैत के दिन’ कृषक सौंदर्य बोध की कविता है. जलते पेट और सूखते कंठ भी गा उठते हैं क्योंकि—

‘ये दिन रब्बी की उम्मीदों के
पकी बालियों के खनकते खेतों के
हँसिये के चमचमाते धारों के
अपने ही ताप से तपते सूरज के’

इसलिए-‘ये दिन चैता के सुरीले सूरों के/झूमती रातों के/मटकती जोगनों के/बौर से लदे आमों की डालियों के ..ये दिन/ढोलक के थपक थपक थापों के/व्याह और गौने के/शुभ शुभ शगुन के.’

ऊपर का ग्रामीण जीवन का ऐहिक वर्णन सुमन कुमार सिंह को संपूर्ण कवि बनाता है. उनके प्रथम कविता संग्रह में बसंत, वर्षा, शिशिर का वर्णन ऊँट के मुँह में जीरा के बराबर है. लेकिन उनकी क्षमता से इंकार नहीं किया जा सकता.

सुमन कुमार सिंह कि अनुभव संसार बेरोजगारों से बहुत आशान्वित है. क्योंकि वे अधिकांशतः मिट्टी से जुड़े लोग हैं. वे गगनचारी नहीं हैं ‘सबसे ज्यादा जानकार वह/नौजवान ही होगा/बेरोजगारी ने जिसे सैकड़ों हाथ/सैकड़ों पाँव, सैकड़ों आँखें दीं/…हर दिन उसे ही खोदने हैं कुएँ/अपने रास्ते, अपने ठिकाने/ढ़ूँढने हैंउसे ‘ वही है सबसे पारखी. सबसे मेहनती. प्यास के संबंध में. सबसे अनुभवी(समय पारखी).

सुमन कुमार सिंह ने पिता, माँ, बहन(रक्षा सूत्र), बेटा(स्याही पुते हाथ तुम्हारे), गंगा(ओ अविरल गंगे), मजदूर(एक मई दो हजार) पर उल्लेखनीय कविताएँ लिखी है.

लेकिन युवा वर्ग के लिए लिखी कविताओं की चमक देखते बनती है. हर गति शील युवा को अपने समय की जड़ताओं से संघर्ष करना पड़ता है. जितना बाहर संघर्ष करना पड़ता है उतना ही अंदर भी. इसलिए कवि की काव्यात्मक अपील है—

‘पता नहीं कब/तलाशोगे/सठियाई प्रकृति से अलग/अपनी प्रकृति/कब सँवारोगे/सपनों के लिए पंख/कब कूदोगे छपाक से/चकोह में/…कभी अंजाम भी दोगे/उन रिश्तों को/जिसका प्रस्फुटित रूप/किसी रक्ताभ सूर्य से/कम नहीं होता/’.

सेज के अंतर्गत पश्चिम बंगाल में नैनो कार उद्योग के लिए किसानों की जमीन अधिगृहित की गई.”बहुरिया आ रही है”कविता में सुमन इस आर्थिक नीति की आलोचना करते हैं.

सुमन की कविताओं मे काव्य वस्तुओं का का विविध काव्य संसार है. ‘घर’ संकलन की उल्लेखनीय कविता है. अतिवादी-पुनरूथानवादी शक्तियाँ एकाएक शक्तिशाली हो चली हैं.

सुमन की कविताओं मे काव्य वस्तुओं का का विविध काव्य संसार है. ‘घर’ संकलन की उल्लेखनीय कविता है. अतिवादी-पुनरूथानवादी शक्तियाँ एकाएक शक्तिशाली हो चली हैं. वे रामराज्य की पुनर्स्थापना चाहती हैं. निश्चित यह स्त्री विरोधी अलोकतांत्रिक समाज व्यवस्था होगी. कवि इस स्थिति से चिंतित है और अपनी वैचारिक स्पष्टता सामने रखता है. इससे उसकी काव्य दृष्टि भी स्पष्ट होती है. एक ओर रामराज्य पुनर्स्थापित करने का उपक्रम है तो दूसरी ओर ठाकुराना का अस्तित्व मिट भी रहा है (किसी ईश्वर के किसी अस्तित्व की तरह).

सुमन कुमार सिंह छोटे छोटे सार्थक वाक्यांशों से अपनी कविता का शिल्प गढ़ते हैं. विद्यालय के छोटे छोटे बच्चे खेल रहे हैं. कवि का दृश्य वर्णन देखिए—‘देखना चाहता हूँ जी भरके/तुम्हारी कुलाँचे/तुम्हारी चौकड़ी/सुनना चाहता हूँ किलकारियाँ/’ इसी तरह के छोटे छोटे सार्थक वाक्य से कवि की कविता बनती है.

लोकभाषा के शब्दों पर सुमन कुमार सिंह की पकड़ अच्छी है, यथा, मूढ़ी, बतकही, खप, कड़क धूप, मछर, मछियार, बाट जोहना, सठियाई, चकोह, बहुरिया, आटे की लोई, बिग्घा, कट्ठा-कुट्ठी, मुँह बाय, भाँय-भाँय, पधारो, गोहराते, पुरबारी, हदहदिया, ढिबरी, ठीये आदि अनेक शब्द आधुनिक हिन्दी का शब्द भंडार भरने में समर्थ हैं.

23 जनवरी, 1972 को जन्मे युवा कवि सुमन कुमार सिंह की कविताएँ लोकसंवेदना को समृद्ध करती हैं और समकालीन हिन्दी कविता की संवेदनाओं के क्षितिज को विस्तार देती हैं

(जितेन्द्र कुमार स्वतंत्र लेखन करते हैं. बिहार के भोजपुर जिले में जन्मे कुमार अब तक दो कविता संग्रह और दो कहानी संग्रह ,एक हिंदी और एक भोजपुरी में लिख चुके हैं. समाज में चल रहे तत्कालीन उठापटक पर इनकी अपनी एक दृष्टि है जो गहरे अध्ययन और परिश्रम से अर्जित की हुई है.)

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