मध्यवर्ग का शोकगीत-कहानी की प्रचलित धारा के बरक्स खड़ी होती रघुनन्दन त्रिवेदी की कहानियां

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पाब्लो पिकासो की पेंटिंग- दी ट्रेजेडी

श्रुति कुमुद/

श्रुति कुमुद

जब कोई आन्दोलन खड़ा होता है तब अनिवार्यत: उस आन्दोलन के भीतर की ताकतों के बीच उस आन्दोलन को मजबूत बनाने हेतु आतंरिक विवेचना भी समानांतर में खड़ी होती है. उस विवेचना या आत्मालोचना से सबक लेते हुए वह आन्दोलन अग्रसारित होता है. कई बार यह आंतरिक विवेचना की अपनी शक्तियां इतनी प्रभावशाली होती हैं कि आन्दोलन को अपनी दिशा और दशा बदलनी पड़ती है.

सत्तर के दशक के उत्तरार्ध और अस्सी के दशक तथा उसके बाद भी हिन्दी कहानी ने अपने समय के संघर्षों को न सिर्फ आत्मसात किया है बल्कि उन्हें बेहतरीन तरीकों से दर्ज किया है और कई बार नई राह सुझाती भी प्रतीत होती हैं. जिन बड़े बदलाओं से यह चार दशक गुजरें हैं उनमें हर बदलाव समुचित व्याख्या के लिए ब्यौरों की आवश्यकता दिखती है: आपातकाल, १९८४, मंडल कमीशन, अयोध्या, डंकल प्रस्ताव, विश्व बाजार की ओर उन्मुख अर्थतंत्र, २००२, रोजगार के अवसरों पर प्रभु वर्ग की जमघट और सबसे बढ़कर फासीवाद का महीन उभार. जब सूचनातंत्र ने अपने ‘बायस’ के कारण हकीकत से निगाह मोड़ लिए तब साहित्य से ही उम्मीद लगाई जा सकती थी.  वैसे में ये कहानियां समय और समाज की जटिलताओं को एकरेखीय अंदाज में नहीं बल्कि उनकी बहुरेखीयता को जज्ब करते हुए आगे बढ़ती हैं. सफ़ेद-स्याह के प्रचलित रंगों से आगे बढ़ती हुई अस्सी के दशक तथा उसके बाद की हिन्दी कहानी हर तरह के शेड्स बिखेरती है. आर्थिक और समाजिक मोर्चों पर अलग थलग पड़े हुए मनुष्य का अपने को बचाए रखने का संघर्ष जहाँ इन कहानियों की आत्मा है वहीं ब्यौरे इन कहानियों का सिर्जना ( ढांचा ) हैं. खूब वक्त है कि ‘क्या कहा जाए’ और ‘कैसे कहा जाए’ बराबर का महत्व पाए हुए हैं.

अगर एक निगाह इन तीस-चालीस वर्षों की प्रतिनिधि कहानियों पर दौडाई जाए तब यह समझना आसान होगा कि ब्यौरों का हासिल कितना कुछ है! शुरुआत हालांकि ‘अनुभव’ ( ज्ञानरंजन ) या  ‘मौसाजी’ ( उदय प्रकाश ) नामक कहानियों से हो चुकी थीं लेकिन प्रतिनिधित्व की बात करें तो ‘तिरिछ’ और ‘मैन्गोसिल’ ( उदय प्रकाश ), ‘शापग्रस्त’ और ‘ग्रहण’ ( अखिलेश ),  ‘भगदत्त का हाथी’ और ‘अतीत से आगे’ (सृंजय), ‘केसर-कस्तूरी’, ‘तिरिया चरित्तर’ और ‘ख्वाजा ओ मेरे पीर’ ( शिवमूर्ति ), ‘साज-नासाज’ ( मनोज रूपड़ा ), ‘कदाशय-सदाशय’ और ‘नोटिस’ ( राजू शर्मा ), ‘अधेड़ औरत का प्रेम’ ( प्रियंवद ), ‘निष्कासन’ ( दूधनाथ सिंह ), ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ ( काशीनाथ सिंह ), ‘एक पुरानी कहानी’ और ‘मर्सिया’ ( योगेन्द्र आहुजा ), मानपत्र ( संजीव ), ‘विश्वबाजार का ऊंट’ ( जयनंदन ), चक्रवात ( लवलीन ), ‘क्या तुम नहा चुके’ ( तेजिंदर ), ‘शाल के पेड़’ ( ॐ प्रकाश वाल्मीकि) ‘क्षमा करो हे वत्स’ ( देवेन्द्र ), जैसी कहानियों ने हिन्दी को कहानी के रूप में जितना भी दिया, उसमें ब्यौरों की महत्ता एक महत्वपूर्ण बिंदु है. इनमें से कई कहानियां हंस में या अन्य पत्रिकाओं में ‘लम्बी कहानी’ नामक विधा के अंतर्गत प्रकाशित हुई.

इससे आगे की पीढी ने भी, जिसे वरिष्ठ आलोचक कृष्णमोहन ‘समकालीन कहानी’ की श्रेणी में रखते हैं,  कहानी के इस ख़ास ‘फॉर्म’ को बनाए रखा. वहाँ बहुतेरे बदलाव हैं लेकिन ब्यौरे वहाँ भी एक टूल हैं. मसलन पंकज मित्र की ‘क्विजमास्टर’, नीलाक्षी सिंह की ‘परिंदे का इन्तजार सा कुछ’, अनिल यादव की ‘गोसेवक’, कुणाल सिंह की ‘शोकगीत’ और ‘डूब’, राकेश मिश्र की ‘बाकी धुंआ रहने दिया’, मनोज पाण्डेय की ‘पानी’, वन्दना राग की ‘यूटोपिया’, प्रेम रंजन अनिमेष की ‘एक मधुर सपना’, कविता की ‘भय’, विमलचन्द्र पाण्डेय की ‘प्रेम-पखेरू’,आशुतोष की ‘अगिनस्नान’, शिल्पी की ‘पापा तुम्हारे भाई’, गौरव सोलंकी की ‘ब्लू फिल्म’, चन्दन पाण्डेय की ‘भूलना’, किरण सिंह की ‘यीशू की कीलें’, उपासना की ‘जिन्दगी एक स्क्रिप्ट भर’ आदि सभी कहानियों को ब्यौरों ने कई गुना संभावनाशील बना दिया है.

इन लम्बी कहानियों ने सार्वजनिक सूचनाओं से लेकर समाज के गहरे में दबी ढकी हकीकत को अपना विषय बनाया है. कहें तो कह सकते हैं कि पिछले चार दशक हिन्दी साहित्य में लम्बी कहानी को बतौर विधा स्थापित करने वाले दशक रहे हैं.

एक पल के लिए, अगर ये विधा, महज एक पल के लिए, यानी ‘लम्बी कहानी’ किसी आन्दोलन के रूप में देखी जाए तब जो इसके समानांतर रचनात्मक संसार बनेगा, उसके रचयिता हैं: रघुनन्दन त्रिवेदी. यह विचारणीय है कि जब लम्बी कहानी बतौर विधा हिन्दी में स्थापित हो रही थी उन्हीं वक्तों में रघुनन्दन त्रिवेदी कहानी के इस प्रचलित हो रही धारा के विरुद्ध लिख जाकर कहानी लिख रहे थे. आकार में छोटी कहानियां और वो कहानियां कहानी की परिभाषा को स्थापित करती हुई कहानियां नहीं थीं अपितु हर उस मोर्चे पर तैयारी से भिड रही थीं जिनसे ‘लम्बी कहानी’ मुखातिब थी. यह एक समानांतर शिल्प रचने जैसी बात है.

यहाँ दो विधाओं का टकराव नहीं हैं. इसे ऐसा न पढ़ा जाए कि लम्बी कहानी के ‘स्ट्रक्चरल’ विरोध में रघुनन्दन त्रिवेदी कहानियां लिख रहे होते हैं. ऐसा हरगिज नहीं हैं. अगर कोई भेद खड़ा ही करना हो तो कहा जा सकता है कि एक पूरे दौर में जब अच्छी कहानियां मर्म पर चोट करती थीं उसी समय में रघुनन्दन त्रिवेदी ऐसी कहानियां लिख रहे थे जो किसी तीर की मानिंद छू कर निकल जाए.

यह एक सायास कोशिश रही होगी.

लेकिन यह कोशिश महज आकार तक सीमित हो ऐसा नहीं है. उनकी कहानियां अवतल दर्पण की तरह है जिसमें दूर दिख रही चीजें दरअसल अपनी हकीकत में बेहद करीब होती हैं. कहानी के इस ढाँचे को अद्यतन बनाए रखने के लिए उनके प्रयोग भी अनूठे हैं. उनकी सबसे प्रचलित कहानियों में से एक ‘हमारे शहर की भावी लोककथा’ को देखें तब शिल्पगत तैयारियों का पता चलता है.

‘वे प्रतीक्षा के धुंधलके में थीं’, इस बहुवाचानात्मक वाक्य से कहानी शुरु होती है और दो स्तरों पर चलती है. एक पाठ वह जो किसी ख़ास नवयौवना के लिए रचा गया लगता है, जिसमें उसके नैन-नक्श, उसका इतिहासबोध, अपना सौन्दर्यबोध, मन पर अमिट छाप छोड़े फिल्म का एक दृश्य, उसकी आदतें, बारिश के दिनों में उसकी इच्छाएँ, उसके त्यौहार, उसकी गली, उसके स्वप्न आदि का वर्णन है. लेकिन लेखक का ध्येय किसी एक ललिता की जीवनचर्या बताने की नहीं है. उसे एक भरे पूरे शहर की लोककथा रचनी है. जिसके लिए अनेकों ललिताएं चाहिएं जिनमें से कोई एक दूसरे के समान नहीं हैं. रघुनन्दन त्रिवेदी यहाँ नाम का इस्तेमाल बतौर शिल्प करते हैं. वहाँ से कहानी शहर की हर लड़की की हो जाती है. और वो भी अलग अलग. यह सायास है जहाँ एक कहानी एक ढांचें में अनेक कहानियां चलती रहती हैं. ये उन ललिताओं की कहानी भी है जो ‘धूप’ में झुलस गईं, उन ललिताओं की कहानी भी है ‘रौशनी जिनसे बर्दाश्त नहीं हुई’ और फिर उन ललिताओं की तो है ही ‘जो धूप में तप कर निखर जाने वाली थीं’. अलग नियति लिए हर ललिता के लिए एक न एक महेन्द्रनाथ हैं. जो धूप में तप कर निखर जाने वाली ललिता है वो कभी प्राईमरी की शिक्षिका हैं तो कभी कुछ और लेकिन उनके महेंद्र हैं भी तो दूर हैं.

“यकीनन इस मास्टरनी और इस महेन्द्रनाथ जैसे और भी कुछ लोग होंगे, परन्तु इस भागमभाग में इनका मिलना मुश्किल. मिल जाए तो पहचानना मुश्किल. पहचान लें तो ऐसों के बारे में कहना मुश्किल. इसलिए तो ये कथा में सिर्फ आखिर में आए और चंद जुमलों के बाद हमारी पकड़ से छूट भी गए. एकाएक आने और चले जाने के कारण ये लोग कथा में जबरदस्ती ठूंसे गए पात्र मालूम हों तो दोष इनके चरित्र का है, जो किसी साँचें में फिट नहीं बैठता , वैसे यह कथा दरअसल इन्हीं की है”

इस तरह हमारे शहर की भावी लोककथा के केंद्र में एक उम्मीद जन्म लेती है.

‘वह लडकी अभी ज़िंदा है’ हमारी आदिम इच्छाओं और उनके प्रकट करने के तरीकों से जूझती कहानी प्रतीत होती है लेकिन वह समाज द्वारा रची गई विडंबनाओं की कहानी बेहतर तरीके से कहती है. वर्ष १९८७ में यह कहानी लिखी गई है. समाज ने चाहें जितनी प्रगति कर ली हो लेकिन प्रेम की अभिव्यक्ति और उस पर अदृश्य पाबंदियों को लेकर आज तीस बत्तीस वर्षों बाद भी कहानी का मूल ‘ज्यों का त्यों’ है.

“लेकिन आप शायद ताज्जुब करेंगे, बरसों बाद अभी थोड़ी देर पहले मैंने उस लडकी को जीवित देखा है. न केवल ज़िंदा बल्कि उसी रूप में. उम्र का जैसे कोई असर ही नहीं था जैसे उस पर. मेरे सिर पर आधे से ज्यादा बाल सफ़ेद से हो चुके और चेहरे की चमड़ी ढीली होकर थोड़ी लटकने लगी है, परन्तु वह अभी ज्यों का त्यों थी.

आप भले ही यकीन न करें; परन्तु मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वह लडकी अभी ज़िंदा है. अभी थोड़ी देर पहले जब मैं एक सादे कागज़ की तलाश में विपुल ( अपने बच्चे ) के कमरे में गया, वहीं मैंने इस लडकी की आहट सुनी. मुझे देखते ही वह हवा में घुल गई लेकिन उसका अधूरा-सा चित्र विपुल की गणित की कॉपी में बना हुआ था”

लेखक का समाज से और समाज के इतिहास रिश्ता गझिन है और इसे वह बार बार जतलाना नहीं चाहते. माहिर रचनाकार की तरह सूत्र छोड़ते जाते हैं. रूपकंवर सती काण्ड अगर आपको याद हो तो आपको रघुनन्दन की कहानी ‘एक दिन रामबाबू झाडी लांघ जायेंगे’ याद आ सकती है. उस दारुण ह्त्याकाण्ड, जिसे सती का दर्जा देकर मामला रफा दफा कर दिया गया था, में और इस कहानी के प्रकाशन का वर्ष लगभग एक है. यह कहानी रामबाबू की है और झाडी की है. झाड़ी वह भीड़ है जो हमें चौतरफा घेरे हुए है. कहना न होगा कि इन बीते वर्षों में झाड़ी का आकार, ताज्जुब है कि लम्बी कहानियों की तरह, बढ़ा ही है लेकिन लेखक की मनुष्य जीवन में यह विराट आस्था है कि झाड़ी लांघनी है. इस विराट आस्था से पहले लेखक झाड़ी के दवाब को स्वीकारता है. हर वो आदमी जो भीड़ के साथ जबरिया खड़ा है, भीड़ से डर कर भीड़ के साथ खड़ा है, उसकी घुटन उसे जीने नहीं दे रही और हत्यारों की भीड़ मरने भी नहीं दे रही, राम बाबू बनने के लिए अभिशप्त है.

“उस दिन रामबाबुओं की भीड़ एक मैदान में खड़ी थी, जहाँ कुछ लोग एक औरत को ज़िंदा जला रहे थे. वह औरत चीख रही थी और मैं उसकी चीखें बर्दाश्त नहीं कर पाया. मैंने वहाँ मौजूद एक-एक रामबाबू के कानों में लगभग चीखते हुए उस तमाशे को रोक देने की फ़रियाद की, तरह तरह से उन्हें उकसाया. और तो और वे खुद भी जानते थे कि कुछ गलत हो रहा है. लेकिन एक हल्का-सा जम्प नहीं ले पाए. मैदान में गूंजने वाले जय-जयकार के शोर से घबराकर मुझे वहाँ से हटना पड़ा.”

यहाँ इस बात का उल्लेख जरुरी है कि रचनावर्ष और रूप कुंवर हत्याकांड के वर्ष की साम्यता से यह आरोपित करना कि उसी घटना से प्रभावित हो कर कहानी लिखी गई है, इसका कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. लेकिन रघुनन्दन भी राजस्थान के थे और सती प्रथा के मामलों में राजस्थान की तारीख किसी से छिपी नहीं है. यह कहानी पढ़ते हुए कहीं से नहीं लगता कि लेखक जिस झाड़ी का जिक्र कर रहा है वो आखिर है क्या. लेकिन धीरे धीरे स्थिति स्पष्ट होती है और तब हमारा सामना जलाई जा रही औरत से होता है. उस जलाई जा रही औरत की चीख से नहीं, हमारा सामना भीड़ के शोर से होता है.

आज के इस मॉब-लिंचिंग वाले इस समय में यह कहानी प्रासंगिक है. हममे से कई हैं जो रामबाबू की तरह है जो ह्त्या नहीं चाहते लेकिन वह साहस हम नहीं जुटा पा रहे कि हत्यारों को रोक सके, वह झाड़ी लांघ सकें.

हिन्दी कहानी में दैनंदिन सूचनाओं के प्रयोग का इस्तेमाल आए दिन देखने को मिल जाता है. उदय प्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ हो, ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ हो या कुणाल सिंह की ‘इति गोंगेश पाल वृत्तांत’ या फिर संजय कुंदन की ‘केएनटी की कार’ नामक कहानी हो. यहाँ दी जाने वाली सूचनाएं पाठकों को आक्रान्त करने के लिए नहीं दी गई होती हैं वरन एक ख़ास मकसद से दी गई होती हैं कि जिन दिनों दुनिया में इस कदर आधुनिकता पसर रही थी, या इस तरह के विकास हो रहे थे ठीक उन्हीं दिनों, कहानी में वर्णित यथार्थ, जो कटु है, भी घटित हो रहा था. इन कहानियों में सूचनाओं की अधिकता इसलिए भी दिखती है कि वह ‘कंट्रास्ट’ उभर कर आ सके जो लेखक का मंतव्य है. ये सूचनाएं विस्तृत समय यानी दस वर्ष बीस वर्ष के दायरे में फ़ैली हुई होती हैं.

अब देखते हैं कि इसी शिल्प को रघुनन्दन त्रिवेदी ने कैसे बरता है. उनकी एक कहानी ‘चन्दर, किन्नी, मैं, सुनंदा और टूटा हुआ पुल’ है. कहानी के लिखे जाने वाले वर्ष की सूचना सम्पूर्ण कहानियों वाली पुस्तक में नहीं है लेकिन कहानी के भीतर जो समय, जो तारीख, जो वर्ष दर्ज है वो १९९० का है. वैसे तो इनके पास कई कहानियां हैं जो प्रतिनिधि कहानी होने का दम-ख़म रखती हैं लेकिन अगर किसी एक कहानी को ही रघुनन्दन त्रिवेदी की प्रतिनिधि कहानी चुनने की जिम्मेदारी दी जाए तो वो कहानी होगी – चन्दर, किन्नी, मैं, सुनंदा और टूटा हुआ पुल.

कहानी में ‘मैं’ वाचक है और कहानी में नायक का दर्जा यों तो चंदर को मिला है, नायिका का दर्जा किन्नी को मिले या सुनंदा को इसकी कशमकश है लेकिन वास्तविक नायक या नायिका डायरी है. डायरी भी नहीं अपितु वह लेखन है जो डायरी के भीतर है. यही वो शिल्प है जो बाकी लेखकों द्वारा किये गए सूचनाओं के इस्तेमाल को इनके प्रयोग से बिलगाती है. यहाँ ‘मैं’ चन्दर की डायरी पढ़ रहा है और पढ़ते हुए सोच रहा है कि ठीक इसी दिन दुनिया में और क्या और कहाँ चल रहा होगा. व्यक्ति पर समाज को लादने की कोशिशें ऐसे ही हुआ करती हैं. ‘मैं’ यह स्थापित करने में लगा हुआ है कि चंदर जो लिखने पढने का भ्रम पाले हुए है किस कदर अपने प्रेम या जीवन में मुब्तिला है जो अपनी डायरी में महज अपने और किन्नी से जुड़ी बातों को दर्ज किए हुए है. यह ‘मैं’ एक दिन चन्दर की डायरी लेकर सावर्जनिक पुस्तकालय जाता है और हर उस दिन का अखबार निकालता है जो तारीखें डायरी में दर्ज हैं. अपने नोट्स में वह सबसे पहले चंदर द्वारा लिखी बातों को तृतीय पुरुष में दर्ज करता है और फिर अखबार से उस दिन की बड़ी ख़बरों को दर्ज करता है. नमूना देखें:

“ ५ जनवरी १९९०

उस दिन जब चंदर ने किन्नी को देखा तो देखता रह गया. वह सुन्दर थी. बहुत सुन्दर. चंदर को ताज्जुब हुआ कि कई बार मिलने के बावजूद उसने पहले कभी किन्नी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया. वह मौसम का सबसे ठंढा दिन था. शाम होते ही लोग घरों में दुबक गए थे, जबकि वह चकित-सा किन्नी के बारे में सोचता हुआ घूम रहा था.

अखबार के मुख पृष्ठ पर खबर थी ‘पाकिस्तान में रेल दुर्घटना. २५० मरे, ७०० घायल’

मुझे कुछ भी याद नहीं आया”

यहाँ दो महत्वपूर्ण टेक हैं. एक तो सूचना के आधार पर ‘मैं’ की यह साबित करने की कोशिश कि जिस दिन इन चंदर महाशय को नायिका जंच रही थी उस दुनिया के हिस्से में कितने लोग मारे जा रहे थे! मृत्यु दुखद है, वह सबको शोकाकुल कर देती है. किसी की भी मृत्यु हो उसके बारे में सुनते ही हर आदमी ठिठक जाता है, जीवन की नश्वरता का ख्याल घेर लेता है. लेकिन यह भी एक ट्रेंड देखा गया है कि दूसरों के सुख में बाधा डालने के लिए किसी दूसरे दुःख की सूचना दे देते हैं. यही वो टेक है, जिसके जरिये ‘मैं’ बढ़त बनाना चाहता है. हाँ एक मार्के की बात यह है कि इस ‘मैं’ के भीतर इतनी नैतिकता बची है कि खुद के लिए भी स्वीकारता है – मुझे कुछ भी याद नहीं आया.

जिस दूसरे टेक का मैं जिक्र कर रही थी वह इसी याद से जुडी है. आग के अलावा स्मृति उन कुछ कारकों में से है जो मनुष्य को न सिर्फ बेहतर बनाती है बल्कि अन्य जीवों से बेहतर स्थान पर रखती है. स्मृतियाँ हमारे सीखने समझने का सर्वश्रेष्ठ औजार हैं. कल की स्मृति आज कुछ नया सीखने का मोहलत देती है. लेकिन इस ‘मैं’ नामक किरदार को कुछ भी याद नहीं क्योंकि न उसने अपनी कोई बात किसी डायरी में दर्ज की है और दुनिया को जानने में उसकी दिलचस्पी भी नहीं होनी थी अगर चंदर की डायरी में दर्ज घटनाओं को एक दर्जा नीचे दिखाने की उसकी जिद न होती.

यह दर्ज करना औजार है. इसमें आप चीजों को दुबारा जीते हैं और भाग्यशाली लोग तो दर्ज करते हुए कई बार कोई पल पहली बार जी रहे होते हैं क्योंकि तभी उन्हें याद आता है कि यह भी उस पल का हिस्सा था. यह भी संभव है कि पाकिस्तान में रेल दुर्घटना के जिस खबर से वो चंदर के जीवन की एक कोमल घटना को कमतर बना कर देखना चाहता हो उससे भी बड़ी कोई घटना दुनिया में उसी दिन घटी हो लेकिन अखबारों ने इसे दर्ज न किया हो. आखिर अखबारों के भी अपने हिसाब किताब हैं, उनकी भी अपनी रुचियाँ है और कौन नहीं जानता कि उनके भी अपने व्यावसायिक ध्येय हैं. इस तरह ‘मैं’ जिन सूचनाओं से मन ही मन चंदर को आक्रान्त करना चाहता है वह पूरी कवायद एक व्यक्ति पर धौंस जमाने की कवायद से अधिक नहीं है.

कहानी आगे बढ़ती है. ‘मैं’ हर उस दिन का अखबार निकालता है जिस जिस दिन चंदर ने डायरी ने अपने और किन्नी से जुड़े ख्यालों को लिख रखा है. लेकिन आखिर में यह मैं नामक किरदार अपने बनाए शिल्प में उलझ जाता है, जब उसकी याददाश्त सकारात्मक किस्म का धोखा देती है यानी कुछ याद आ जाता है. वह टूटे हुए पुल वाली दुर्घटना है जो १२ अगस्त १९९० को घटती है. यह खबर पढने मात्र से उसके सामने पूरा दिन तैर जाता है. पल पल की बात याद आ जाती है और सुनंदा का चेहरा भी याद आ जाता है जिसकी एक झलक उसने अखबार में ही देखी थी जो उसी पुल टूटने वाली दुर्घटना में जान गँवा बैठी थी. क्योंकि वह पुल तक गया था और उस त्रासदी को नजदीक से देख कर आया था इसलिए उसका जुड़ाव सघन है, उसका दुःख समझ में आता है. यहाँ जाकर उसकी मंशा से उलट यह बात स्थापित होती दिखती है कि न सिर्फ घटना बल्कि उससे आपकी नजदीकी के मायने भी अधिक हैं, वरना जहाँ वो सैकड़ों लोगों के मरने की खबर महज एक पंक्ति में लिख देता है, सूचनात्मक अंदाज में लिख देता है, वहीं जब पुल टूटने की छोटी सी खबर पढता है तो उसे विस्तार से याद करता है और दर्ज करता है. जीवन के बरक्स जीवन की यह कहानी और उस जीवन को आक्रान्त रखने की कवायदों वाली यह कहानी बेहद प्रभावशाली बन पड़ी है.

सूचनाओं के शिल्प में लिखी इनकी एक और कहानी है: पॉश एरिया. शीर्षक से इस कहानी का ‘लोकेल’ स्पष्ट है. शहर कोई भी हो सकता है लेकिन पॉश एरिया में रहने वालों की कहानी लगभग एक जैसी होती है और यह एक जैसा होना ही इस कहानी का शिल्प है.

‘उस लडके का नाम सतीश था. उसका रंग गेहुआं और आँखें थोड़ा-सा भूरापन लिए हुए खुली-खुली-सी थीं. वह साधारण था, इतना कि आसानी से भीड़ में खप सकता था. मेरी मौजूदगी में वह बहुत कम बोलता, पर उसे देख कर लगता था कि वह उन लोगों में से है जिनके पास कहने लायक बहुत सारी बातें होती हैं.

सतीश के कमरे से लौटते हुए मैंने बानी से पूछा कि क्या वह उस कमरे में रह लेगी और बानी ने इनकार करते हुए मुझसे कहा था कि उसे जो हासिल है उससे कम में उसकी बसर नहीं हो सकती इसलिए वह दूर रहते हुए इस कमरे के बारे में सोचती रहेगी. बानी ने सचमच यही किया. वह शादी करके मुम्बई चली गई. सतीश अब भी नौकरी पाने के लिए अर्जियां लिख रहा होगा. बानी के बाद इस कॉलोनी में मेरी कोई दोस्त नहीं. इस कॉलोनी को शहर का पॉश एरिया माना जाता है. ऐसा शायद यहाँ के शानदार बंगलों के कारण हो पर लोग … लोगों के बारे में तो मैं आपको बता ही चुकी’

दसियों चरित्र इस कहानी में हैं और सबके वर्णन में एक ख़ास किस्म की निसंगता लेखक ने बरती है लेकिन अंत तक पहुँचते पहुचंते कहानी उदास कर देती है.

काफ्काई तेवर में रची बसी इनकी ढेरों कहानियाँ अपने समय का प्रतिपक्ष रचती हैं. ‘रोने वाला कमरा’ और ‘गुड्डू बाबू की सेल’ ऐसी ही कुछ कहानियां हैं. ‘रोने वाला कमरा’ नामक कहानी बंटवारे जैसे ठोस विषय पर लिखी गई बेरुखी कहानी बन जाती अगर वहाँ रोने वाले कमरे की कहानी न होती. वह कमरा माँ और पिता के अनुपस्थिति में उनके होने का रूपक है.

गुड्डू बाबू की सेल का अंदाज कबीराना है. कहानी इसी पेंच से शुरु और ख़त्म होती है कि जो है उसकी वजह कोई दूसरी बात है या जो दूसरी बात है उसके होने की बात मौजूदा हालात हैं. गुड्डू बाबू की चतुराई पैसे से आई है या चतुराई से पैसा आया है.

ऐसी ही एक कहानी है: छुअन. रघुनन्दन त्रिवेदी ने अपनी तेज धार कलम के शाने पर इस बार सिनेमा की दुनिया को लिया है. यह इत्तफाक से इनकी एकमात्र लम्बी कहानी है. नयना, निखिल, नेगी के बाहर और भीतर घूमती इस कहानी में मानव जीवन के चक्करदार गोलंबर हैं.

इनकी सभी कहानियां मध्यवर्ग के शोकगीत की तरह हैं. ‘स्मृतियों में पिता’ में पिता के इर्द गिर्द घूमता परिवार और पिता का स्वप्नलोक में होने का मसला है. ‘यह ट्रेजडी क्यों हुई’ में ज्ञान से उपजती समझ और उस समझ को खरीदने वाले समाज की कहानी है. सही अंत, कुत्ते, पता नहीं कैसे, नजरिया, इंद्रजाल आदि अनेक कहानियां विस्तृत उल्लेख का मांग करती हैं.

महज ४९ वर्ष की उम्र में, वर्ष २००४ में, रघुनन्दन त्रिवेदी इस दुनिया से विदा हो गए. इसी उम्र में ६६ कहानियां और २० लघु कहानियों के मार्फ़त इन्होने सायास एक नया पैटर्न रचा. इस बदलते समय में इनकी कहानियों को मानीखेज होते जाना है. यह पैट्रन किन्हीं कहानियों के विरोध में नहीं था. क्रिकेट के उदाहरण से कहें तो कहा जाएगा कि इन्होने उस बल्लेबाज की जिम्मेदारी ली जिसे रन-गति तेज रखनी हो. इस जिम्मेदार से वो चूके नहीं. शानदार कहानियां लिखीं. हर कहानी कई कई पाठ सामने रखती है. इनकी स्मृति में प्रकाशित कथादेश के अंक से यह बात समझ में आती है कि साथी लेखकों के मन में इनके लिए कितना गहरा सम्मान था. असामयिक मृत्यु ने अगर इन्हें छीन न लिया होता तो हिन्दी कई गुणा समृद्ध हुई होती.

नमन.

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इस आलेख में जिन कहानियों का जिक्र आया है वो सत्यनारायण द्वारा संपादित और रचना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक “रघुनन्दन त्रिवेदी – सम्पूर्ण कहानियां’ में संकलित हैं.

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श्रुति कुमुद विश्व भारती, शान्तिनिकेतन में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं. उनसे  (श्रुति कुमुद, सबुज-पत्र, दक्खिन गुरुपल्ली, शान्तिनिकेतन, बोलपुर, जिला-बीरभूम, पिनकोड- ७३१२३५) या उनके ई-मेल: [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.

 

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