क़िस्सा क़िस्सा लखनउआ: तेरा बयान ग़ालिब…

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गुंजन श्री/

आबिदा कबीर को गातीं हैं और गुलज़ार कहते हैं — “नशे इकहरे ही अच्छे होते हैं ।” एक तो कबीर, ऊपर से आबिदा । इस्स… ! अद्भुत ! आवाज, कि जिसमें एक पुकार है, जो समेटती है कबीर की आंतरिक पुकार । वो पुकार जिसे आबिदा से बहुत पहले बनारस की ज़मीन पर कबीर ने पुकारा था । अक्षर और स्वर एक साथ मुखर हो उठते हैं । कानों के माध्यम से मस्तिष्क में कबीर चहलकदमी करने लगते हैं । मतलब ये कि वर्तमान के माध्यम से हम पहुँचते हैं भूत में । और हरेक बार ये जरूरी नहीं है कि आवाज ही करे ये करिश्मा । कई बार ये कारस्तानी हर्फ़-दर-हर्ख हो जाया करती है । हर्फ़ पन्नों में खुलते हैं । पन्ना किस्सा बनता जाता है । और ऐसे ही किस्सों से सजा है ‘किस्सा किस्सा लखनउवा” । किस्सा ज़्यादातर (यूँ कहें कि आजतक) बड़े लोगों के लिए लिखे गए या यूँ भी कहा जा सकता है कि बड़े लोगों के ही किस्से लिखवाए गए । आम जनता महरूम रही इन अफसानों से । आम जनता के हिस्से में सिर्फ किस्से सुनना है और सुन कर ये भी ना सोचना है कि यार किस्से तो हमारे यहाँ भी हैं। आम आदमी तो बस राजेश रेड्डी का शेर हो जाता है —

“शाम को जिस वक़्त खाली हाथ घर जाता हूँ मैं,
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं ।”

हिमांशु बाजपेयी की ये किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें मूलरूप से जनश्रुतियों के किस्से हैं । जनता के लिए जनता के किस्से हैं । नवाबों के किस्से भी हैं तो जनता के चाक पर से पवित्र होकर आयें है वो। एकदम अपने ‘स्टाइल’ में । पढ़ें तो ऐसा लगे कि सुन रहे हैं, देख रहे हैं । किस्सागोई करना अलग बात है और किस्सागोई लिखना बिलकुल अलग बात है । और हिमांशु बाजपेयी किस्सागोई लिखने में सफल हुए हैं ।

किसी बड़े महानगर के बड़े से ड्रॉइंग-रूम में बैठकर किसी शहरों के ‘ग्रह-नक्षत्र’ लिखने वाले समय के विपरीत कालखण्ड में उसी शहर के बारे में लिखना जिसमें आप जन्म से लेकर अभी तक भींगे हों, एक उल्टी चलती घड़ी को सीधा करना है । तो हिमांशु बाजपेयी, जाहिर सी बात है कि लखनऊ से हैं । और अगर लखनऊ में रहना है तो चौक से उम्दा जगह क्या हो सकती है ? आप तो जानते ही होंगे कि ये चौक सिर्फ चौक नहीं है; यूनिवर्सिटी है, यूनिवर्सिटी । वही यूनिवर्सिटी जिसके वाईस-चान्सलर कभी ‘मानस के हंस’ और ‘खंजन नयन’ आदि उपन्यास और हिन्दी के उम्दा लेखक अमृतलाल नागर हुआ करते थे । हिमांशु भी खुद को उसी यूनिवर्सिटी का छात्र मानते हैं और कहते हैं कि “पुराने लखनऊ की गलियों में बेसबब भटकना ऐसे है जैसे आप महबूबा की ज़ुल्फ़ों के ख़म निकाल रहे हों ।

बहरहाल किताब पे लौटिये । किताब की कुल जमा-पूँजी में 72 किस्से आते हैं । लखनऊ के ‘मिज़ाज़’ से परिचय करवाते हुए। ये अलग बात है कि ज्यादातर किस्सों में जाने-अनजाने ये बात उभर कर आई है कि तत्कालीन लखनऊ के लोग मेहनतकश होने से ज्यादा गप्पें मारना पसंद करते थे या फिर नवाब लोग बिल्कुल भी दिमाग से काम नहीं लेते थे । हालाँकि मैं व्यक्तिगत तौर पर ये नहीं मानता हूँ ,मगर लोगों में किस्सा मशहूर है और आवामी किस्से आवाम के पास से ही आते हैं । इनकी प्रामाणिकता इतिहासकारों की पुस्तकों के पन्ने पलट कर नहीं सिद्ध की जाती है । ये जनश्रुतियों में अपने पूर्ण प्रमाण और विश्वास के संग मौजूद होते हैं । जनता स्वंय एक विराट प्रमाण है ।

कई कथाएँ आपको बाँधती हैं , बेधती हैं , गुदगुदाती हैं और कई मुखर रूप से कहती हैं कि जमाने में ‘ऐसा हुआ करता था मैं’ । हालाँकि आज भी बहुत लोग हैं जिन्होंने लखनऊ के लज़्ज़त को बचाये रखा है; स्वंय हिमांशु ही उन चन्द लोगों में से हैं । हालाँकि आप तो ये जानते ही हैं भारत के कई राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के प्रमुख केंद्रों में से है ज़माने का साहित्यिक और सांस्कृतिक लखनऊ ।

यही वो शहर है जहाँ एक साथ होली और मुहर्रम आ जाने से हिन्दू इसलिए चिंतित थे कि इस ग़मज़दा होने वाले दिन में होली जैसे खुशियों का त्योहार कैसे मनाएं और मुसलमान इस बात को लेकर दुःखी थे कि साल में एक ही बार तो आता है होली तो कैसे ना खुशियाँ मने

हिमांशु के लेखन का एक गुण जो मुझे बेहद खूबसूरत लगा वो ये कि इनकी कथाओं में नकारात्मक पात्र भी जब आते हैं तो आपको ये नहीं लगता कि इस पात्र से घृणा की जानी चाहिए; जैसे कि अंग्रेज ऑफिसर हडसन , आदि-आदि । बहुत संजीदे तरीके से हरेक पात्र के साथ न्याय होते चलता है । हरेक पात्र अपने सम्पूर्ण गुण-अवगुण के साथ उपस्थित होता है, अपनी बात कहता है और शांतिपूर्ण तरीके से अपने निर्धारित गंतव्य की ओर गतिमान हो जाता है । ये गुण कथा के कई बेहतरीन गुणों में से एक है । बहुत मुश्किल है लेखक का हरेक पात्र के साथ न्यायपूर्ण तरीके से पेश आना । ये लिखते हुए अतिरिक्त प्रसन्नता है कि हिमांशु ये कर पाए हैं ।

रेयान होलीवेल अपनी किताब ‘व्हाट मैक्स अ ग्रेट सिटी’ में लिखते हैं कि वो शहर शहर होता जिसमें कुछ खास गुणधर्म हो । जैसे वो शहर सबके लिए खुला हो, उसके पास सबके लिए कुछ ना कुछ जुगाड़ हो, सामाजिक महौल अच्छा हो, आदि-आदि । लखनऊ इन सब मामलों में इस किताब के किस्सों के समय में एकदम खड़ा उतरता है । सत्ता की महत्ता बढ़ने से निश्चय कुछ आवरण मैला हुआ है । नहीं तो ये उन बड़े दिल वाले बादशाहों का शहर है जहाँ बादशाह संगीत की बस एक तान भर सुनने के लिए घंटों उस्ताद का लोटा मांजते रहे । यही वो शहर है जहाँ एक साथ होली और मुहर्रम आ जाने से हिन्दू इसलिए चिंतित थे कि इस ग़मज़दा होने वाले दिन में होली जैसे खुशियों का त्योहार कैसे मनाएं और मुसलमान इस बात को लेकर दुःखी थे कि साल में एक ही बार तो आता है होली तो कैसे ना खुशियाँ मने । और बड़ी बात ये है कि तत्कालीन सत्ता ये कहती है कि आधे दिन होली की खुशी और आधे दिन मुहर्रम का ग़म मनाया जाए । और नवाब खुद भी शामिल होते हैं । सद्भाव का ऐसा अद्भुत राजनैतिक सामंजस्य का परिचय शायद लखनऊ ही दे सकता था उनदिनों ।

ये वही शहर है जहाँ दिल्ली में शहजादों को मारकर कोतवाली के आगे लाश टांगने वाले अंग्रेज अफसर हडसन को लखनऊ आने पर भीड़ द्वारा ऐसा कर दिया गया कि उसकी मृत्यु हो गयी। बहुत दिनों तक लोग कहते रहे कि दिल्ली का बदला लखनऊ ने ले लिया जबकि तारीखें गवाह है कि दिल्ली और लखनऊ घोर प्रतिद्वंदी हुए हैं एक-दूसरे के । उस्ताद जी का सरोद, ख़लीफ़ा आबिद हुसैन के तबले का जादू, कई उस्तादों गायिकी और उनकी मस्त जीवनशैली, कब्बन मिर्ज़ा के गीत, नौशाद और नाशाद के किस्से से भरी हुई ये 183 पेज की किताब पढ़कर आप ये तो मान ही सकते हैं कि लखनऊ तहज़ीब का शहर था क्यूँकि हिमांशु बाजपेयी ने इसे इतना ही संजीदा होकर पाकीज़गी से जमा किया है जितना कि ये था ।

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गुंजन श्री

(लोयोला से कंप्यूटर में मास्टर्स गुंजन श्री मूल रूप से मिथिला के हैं; संप्रति हैदराबाद में रहते हैं। मूलतः अपनी मातृभाषा मैथिली में लिखने वाले गुंजन श्री संगीत और रंगमंच में भी सक्रिय हैं। दर्जनों नाटकों में अभिनय और संगीत-निर्देशन के अलावे मैथिली में इनकी एक समवेत कथा-संग्रह और एक कविता-संग्रह ‘तरहत्थी पर समय’ प्रकाशित-प्रशंसित है। कविता, कथा, आलोचना और भारतीय शास्त्रीय संगीत गायन में विशेष रुचि रखने वाले गुंजन श्री मूल रूप से कवि हैं और आई.टी प्रोफेशनल हैं । सम्प्रति ‘ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी’ (वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की एक संकाय ), ‘पटना हब’ के क्यूरेटर और ‘दी क्लाइमेट रियलिटी प्रोजेक्ट’ के सम्बद्ध होकर पर्यावरण के लिए काम करते हैं । लेखक से उनके मोबाइल: +91-9386907933 या ईमेल : gunja[email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है। )

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