पुरबियों का लोकवृत्त वाया देस-परदेस

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अमरदीप कुमार/

यह पुस्तक अतीत की लोक स्मृतियों और इतिहास के बीच तनाव से निर्मित होती है। इसकी निर्मिति के दौरान लेखक पीछे लौटते हुए क़रीब दसवीं सदी तक की मौखिक लोकगाथाओं, कथाओं, लोकोक्तियों और मुहावरों एवं लोक मिथकों को उपजीव्य के रूप में लेने की कोशिश करता है। आल्हा-ऊदल, शोभनायक बनजारा जैसे शौर्य और प्रेम लोकगाथा से लेकर बिहुला विषहरी, लचिमा रानी आदि मौखिक लोककथाओं से होते हुए बिदेसिया और समकालीन लोकगीतों तक की स्मृति-निर्भर इतिहास लिखने की कोशिश की गई है। इस दौरान बनिजिया लोकसंस्कृति, सिपहिया लोकसंस्कृति और बिदेसिया लोकसंस्कृति की भरपूर खोजबीन कर पुरबिया लोक संस्कृति विस्तृत परिचय को पाठक के सामने रखने की कोशिश की गई है। अंतिम इकाई में बेहद संवेदनात्मक तरीके से देस-परदेस की स्त्रियों की भूमिका, स्थिति और सशक्तिकरण का ब्यौरा पेश किया गया है। इसे एक वाक्य में कहा जाय तो लेखक ने साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और प्राद्यौगिकी के सहारे औद्योगिक क्रांति के कारण पुरबिया यानि पूर्वांचल के लोक की बनती-बिगड़ती और बिगड़ती-बनती संस्कृति का विश्लेषणात्मक ब्यौरा पेश किया है।

इस किताब की सबसे खूबसूरत बात यह है कि लेखक ने हर इकाई के शुरुआत में कुछ प्रश्न रखा है और उन्हीं सवालों के जवाब ढूँढते हुए शोध की परिणति हुई है। इसके कारण पाठक को अध्ययन में कोई अस्पष्टता नहीं रह जाती है।

पहली इकाई में लेखक ने प्रवसन के चक्र सिद्धांत को स्पष्ट की है। लेखक बताते हैं कि लोक एक सामूहिक संस्कृतिक संरचना है। इसमें व्यक्तिगत जैसा बहुत कम कुछ है। किंतु, ग्लोबलाइजेशन ने इस सामूहिकता को संदेह की दृष्टि से देखा है। जिसके कारण मास कल्चर एवं लोक संस्कृति के बीच हुए संघर्ष को उल्लेखित किया है। जिसे श्रम और श्रम संगठित प्रौद्योगिकी के संघर्ष के रूप में देखा जा सकता है। इसे रामविलास शर्मा ने व्यापारिक पूंजीवाद और औद्योगिक पूंजीवाद के रूप में पहचाना है। व्यापारिक पूंजीवाद में किसान, काश्तकार और शिल्पकार हुआ करते थे। जिसके कारण पूंजीवाद छोटे स्तर पर था। यह दौर उपनिवेशवाद के पहले या शुरुआत में था जब सर्वहारा वर्ग विकसित हो रहा था। पर औद्योगिक पूंजीवाद ने सर्वहारा वर्ग को विकसित किया और पूँजीवाद चरम पर पहुँच गया। इस दौरान लोकसंस्कृति का ख़ूब ह्रास हुआ। इस पतन को लोक के मौखिक कथाओं के माध्यम से अनुभूति किया जा सकता है। एक कहावत उद्धरित करता हूँ- “आब आब कहि पिया मोर मुअले।” इस कहावत के पीछे छिपे हुए अर्थ को समझने पर पता चलता है कि प्रवसन के कारण लोक ने क्या-क्या खोया। इस कहावत के पीछे मिथक यह है कि एक प्रवासी अरब से अपने देस में लौटा है। रात को उसे बहुत जोर से प्यास लगी है। वह आब-आब कहता है। घरवाले समझ नहीं पाते हैं कि आब क्या चीज होती है। अन्ततः वह लौटा हुआ प्रवासी मृत्यु को प्राप्त होता है। जबकि उसके खाट के नीचे ही भर लोटा पानी रखा हुआ है। इस विडंबना से पता चलता है कि औपनिवेशिक दौर में लोक ने अपनी भाषा को किस कदर खोया है और हम तो जानते ही हैं कि भाषा के बिना हमारी संस्कृति संरक्षित नहीं हो सकती।

लोक संस्कृति-संरक्षण को लेकर कुछ चेते हैं पर लोक और मास का जो संघर्ष है उसके कारण संरक्षण वादियों में लोक के प्रति हीनता या पिछड़ापन का भाव है। इन संरक्षणवादियों में तीन तरह की विचारधारा है। एक संरक्षणवादी, ये लोक को लेकर पूर्वानुग्रह से ग्रसित हैं। इनसे लोक संरक्षण को लेकर कोई उम्मीद नहीं दिखती है। दूसरे हैं नियतिवादी, इनका मानना है कि लोक की संस्कृति जिस रूप में बच गयी है उसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए। दरअसल, इनसे भी कोई उम्मीद नहीं है। तीसरे हैं बहुभाषिकतावादी, इनसे ही कुछ उम्मीद है। क्योंकि इनकी जड़ में भाषा और संस्कृति की विविधता स्वीकार्य है।

पुस्तक: पुरबियों का लोकवृत्त वाया देस-परदेस; लेखक: धनंजय सिंह;  राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित

अवध क्षेत्र जो कि अब पूर्वांचल के नाम से जाना है। इसे पुरबिया कहे जाने के पीछे कहानी भी किताब के माध्यम से जान लेना चाहिए। अवध क्षेत्र मानचित्र में तो न पूर्व में है न पश्चिम में। इसे पूर्व और पश्चिम के मध्य में समझा जाता है। फिर इस क्षेत्र को पुरबिया क्यों कहा गया? दरअसल, साम्रज्यवाद के बाद भारत में औपनिवेशिक दौर आया। भारत का व्यापार कलकत्ता से हटकर पश्चिम के राज्यों में केंद्रित हो गया। दरअसल, जूट का व्यापार के लिए कलकत्ता प्रसिद्ध था। पर औद्योगिक क्रांति ने इस व्यापार को लगभग खत्म कर दिया और गुजरात और महाराष्ट्र के शहर व्यापार के केंद्र के रूप में विकसित होने लगे। अब प्रवसन बंगाल से हटकर पश्चिम के शहरों में होने लगा। देस से परदेस का सर्कुलेशन इसे ही कहा गया। इसी कारण पश्चिम के राज्यों मजदूरों को पुरबिया कहा जाने लगा।

लेखक लिखता है- “वैचारिकी के इस संक्रमण शील दौर में जहाँ एक तरफ प्रत्येक चीज़ की अंत की घोषणा कर के भूमंडलीकृत सांस्कृतिक साम्राज्य वाद को मजबूत किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ दबी अस्मिताएँ न केवल अपने अतिति की खोज कर हैं बल्कि अपना इतिहास भी रच रही हैं।” दअरसल लेखक का मानना है कि सत्तर के दशक के बाद पुरबियों ने अपनी अस्मिता के प्रति रुचि दिखाना शुरू कर दिया। यह बाद के तमाम लोकगीतों में प्रतिध्वनित होती है। आगे की समीक्षा में उदाहरणस्वरूप तमाम लोकगीतों की पंक्तियां देखने को मिलेगी।

अब हम पाठ में उपस्थित तत्वों की ओर चलते हैं। सबसे पहले हम मौखिक परंपरा में उपस्थित संवादों के माध्यमों के विकास को देखेंगे।

“देबऊ रे कगवा, दुधा भात दोनिया हो रामा।

खबर ला दे बलम परदेसिया हो रामा।

 “छोटका देवरवा बदबो कयथवा चिठी लिखी भेजब।

 “लिख के ना भेजा एको पाति, सुधि बिसरइले हो।

 

सुंदरी बटोही से-

“करिया गोर बाटे, लामा नाहीं हउवन नाटे,

मझिला जवान साम सुंदर बटोहिया।

 

“तोहे फ़ोनवा केतना बताई, तोहरा मनमा के कैसे मनाई।

 “गिरा ता बिल, जाना ता दिल

हम जाना तानी मंहगाई बा

“सइयाँ छुट्टी ले के आवत बाड़े घरवा, टेलीफोन आइल ह।

उपर्युक्त तमाम लोकगीत-उद्धरण से संवादों के माध्यमों के परिवर्तन को समझा जा सकता है।पहले पशु-पक्षी ही संवाद के माध्यम होते थे। बटोहिया, यात्रियों को कहा जाता था। इनके माध्यम से भी संवाद तथा कुछ वस्तुओं का लेन-देना होता था। उसके बाद चिट्ठी का ज़माना आया। चिट्ठी लिखने और पढ़कर सुनाने के लिए कायस्थ हुआ करते थे। जब शिक्षा घर तक पहुँची तब यह कायस्थों का काम देवर से करवाया जाता। धीरे-धीरे शिक्षा का स्तर बढ़ता गया और फिर प्रौद्योगिकी ने संवाद को और ज्यादा आसान कर दिया। टेलीफोन, मोबाइल इत्यादि ने वॉइस और वीडियो कॉल तक की सुविधा दे दिया। इससे सूचना एवं संवाद की सीमा नहीं रह गयी। पर इन संवादों वाले उद्धरणों से सामाजिक बदलाव के बारे में पता चलता है। संवाद देने वाले बटोही और चिट्ठी लिखने वाले कायस्थ या देवरों की छेड़खानी और प्रलोभनों के बारे में भी पता चलता है।

प्रवासियों का प्रतीक रेल हो गया था। दरअसल शुरुआत में जब रेल की व्यवस्था भारत में नहीं हुई थी तब यात्राएँ बैलगाड़ियों से या पैदल की जाती थी। उसके बाद पानी वाला जहाज और रेल ने यात्रा की कठिनाइयों को सुविधा से दूर कर दिया। इस औपनिवेशिक दौर के बारे में बताने के लिए प्रसिद्ध लोक गीत देखते हैं जिसे मालिनी अवस्थी ने बहुत बेहतरीन गाया है। उस गीत का बोल है- “रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे, रेलिया बैरन। दूसरे गीत का बोल- “रेलिया से उतरे जहजिया पर चढ़ले, पिया रंगुनमा गइले ना/ हमरी झुलनी के नागिनमा पिया रंगुनमा गइले ना। शिव जी के चरित्र का भी प्रयोग लोकगीतों में सामान्य जन के लिए खूबसूरत तरीके से किया जाता रहा है। एक गीत का बोल देखते हैं- “पहले घुमत रहना बसहा बैल पा, अब खोजत बाड़न मोटर करवा हो ना।”

एक गीत का बोल देखिए- “लइके से लइका के होई अब शादी, कोट से आजादी हो गइल। हालांकि अपना लोक इतना लचीला नहीं है कि नए बदलाव को तुरंत स्वीकार कर ले, पर लोकगीतों का हस्तक्षेप देखिए। ऐसे मुद्दे को अपने मौखिक गीतों में शामिल करता हुआ लोक भी न जाने कैसे आभिजात्य वर्गों को अभी तक असभ्य ही दिखता है।

अब मौखिक लोकगीतों की परंपरा का परिचय देखें। हिरनी-बिरनी लोकगाथा, यह आल्हा गाथा का एक अंश है। सती बिहुला और लचिया रानी का गीत, यह खंजड़ी और तुंतुनि वाद्य यंत्रों के साथ गाया जाता था। बनिजिया लोक गीत, यह बनिजिया संस्कृति का द्योतक था। वाणिज्य से बनिजिया बना। दअरसल यह लोकसंस्कृति औपनिवेशिक व्यापार से पहले की है। उस दौर में पूंजीवाद ने सर्वहारा वर्ग उत्पन्न नहीं किया था। इन गीतों से उस दौर के श्रमिक और व्यापारियों का परिचय एवं जीवन-व्यापार की जानकारी मिलती है। यह लाचारी एवं ठुमरी विधाओं में है। एक उदाहरण देखते हैं। “पिया मोरे गइले हो पुरबि बनिजिया।आहो रामा दे गैलन ना/एक सुगना भदेसवा,से देइ गैलन ना। इन गाथाओं में स्त्रीहरण की कहानी ज्यादा होती है। प्रेम लोकगाथा शोभनायक बंजारा के अलावे बिदेसिया सबसे अधिक प्रसिद्ध लोकगाथा है। दरअसल इसे भोजपुरी साहित्य के जनक कहे जाने वाले नाटककार भिखारी ठाकुर ने समृद्ध किया। कुछ उदाहरण देखते हैं- “बारहो बरिस पर लवटल बनिजरवा।  इस वाक्य में प्रवसन के कारण उपजी करुणा निहित है। पति घर छोड़कर कलकत्ता शहर गया है और कई वर्षों के बाद लौटा है। इतने वर्षों तक पत्नी इंतज़ार करती रही। एक तरह विदेसिया अपनी बहू को भूल ही गया था। उसकी अनुपस्थिति में स्त्री के कंधों पर जिम्मेवारी आ गयी है और ऊपर से पारिवारिक-सामाजिक बंधनों का निर्वाह करना है सो अलग। इसलिए तमाम स्त्रियाँ अपने पति को परदेस न जाने के लिए समझाती है तो कभी वहाँ की लूट की सूचना देती है।

“सइयाँ गए लदनी, लदाइन झाड़ाझड़,

सौ के पचास किए चले आये घर।

किन्तु स्थिति बदलती गयी और पेट के कारण प्रवास करने से मना न करने की भी मजबूरी होती गयी। कुल मिलाजुला कर कह सकते हैं कि पूंजीवाद चरम पर पहुँच गया और सर्वहारा वर्ग अपने भीषण गरीब रूप में आकार ले चुका था। ऐसे में तमाम शिल्पकार, काश्तकार और छोटे-किसान और व्यापारी मजदूर बनने को मजबूर थे। ऐसे में कोई स्त्री अपने पति को रोके भी तो किस तरह! एक लोकोक्ति देखें- “मारे मन सुखावे पेट,तब होई टका से भेंट।

मध्ययुगीन भोजपुरी लोकगाथाओं के नायकों की वीरता ने ही भोजपुरी जवानों के शौर्य मानसिकता के निर्मिति में मुख्य भूमिका निभाई। यहाँ तक कि शादी-विवाह के संस्कार गीतों में भी शौर्यभाव की अभिव्यक्ति होती थी और अब तक होती है। इतिहासकार बिपिन चंद्र ने बताया है कि सन संतावन की क्रांति के समय अंग्रेजों की सेना में कुल दो लाख बत्तीस हजार दो सौ चौबीस सैनिक थे, उनमें से क़रीब पचहत्तर हजार सैनिक अवध के थे। एक कहावत में बहुत दिलचस्प तरीके से इनकी वीरता को बयाँ किया गया है- “सगरे के सौव गो, भोजपुर के नव गो। एक समकालीन भोजपुरी गीत है- “आरा जिला घर बा कवना बात के डर बा गिरधर कविराय ने अपनी कुंडलियों में  ‘लाठी का गीत’ गाया है। इसका बोल है-“लाठी में गुन बहुत है, सदा रखियो संग। ग्रियर्सन ने इसे भोजपुरियों का राष्ट्रीय गीत की संज्ञा दी है। “अमरसिंह के कम्मर टूटल, कुँवरसिंह के बाँहीं, पूछ आव अमरसिंह से लड़िहैं कि नाहीं।

“रामा भइले अस्सी बरिस के उमरवा रे ना

रामा देसवा में उठल गदरवा रे ना।

हथियाहथिया सोर कइले, गदहो ना ले अइले रे।

तोरा बहिन के सोटा मारो फलन गाँव हँसवले रे।।

खाए को माँगेले पूड़ीकचौड़ी,लड़ने को माँगे मैदान।

सिपहिया लोक संस्कृति का मूल भाव वही शौर्य और वीरता है। ब्रिटिश कंपनी के चार प्रमुख बटैलियन था। कलकत्ता वाले बटैलियन में ज्यादातर अवध के ही सैनिक हुआ करते थे। इसमें सभी वर्णों के लोग शामिल किए जाते थे पर, उच्च वर्णों वालों ने अपनी जातीय और धार्मिक उच्चता को बरकरार रखा। इसलिए इन वर्गों को अपनी जातीय भिन्नता के साथ नियुक्त किया जाता था। एक टेंट में अलग निम्न वर्गों का प्रवेश वर्जित था। इस संस्कृति के पीछे जो शौर्य का भाव था वह आल्हा-ऊदल, विजयमल, लोरिक पसन सिंह, वीर क्षत्री घुघुलिया, छंदवा चोर, चूहड़मल, कुँवर सिंह जैसे पुरबिया लोकनायकों के कारण उदीप्त हुआ था। कुछ उदाहरण देखें।

“बारह बरिस लैं कुकर जीयें, तेरस ले जीयें सियार/

बीस अठारह छत्री जीयें, आगे जीवन को धिकार”

रानी लचिया का गीत भी शौर्य एवं वीरता का प्रतीक है।

“रामा तब कुँवर दिहले ललकारवा रे ना/

रामा घोड़ी उड़े लगली आकाशवा रे ना।

पूर्वी गीतों में मजदूर सिपाहियों की भ्रमनशीलता को दर्शाने वाला एक गीत देखें।इसे शारदा सिंह ने गाया है।

“पनिया के जहाज से पलटनिया बनी आइहा पिया/

ले ले आइहा हो पिया सेनुरा बंगाल से//”

 इस गीत में अलग-अलग शहरों का जिक्र है। भारतीय सेना में भोजपुरिया जवानों को तीन तरह की क्षेत्रीय पहचान मिली है। पुरबिया, तिलंगवा और बक्सरिया। बाद में रोजगार की कमी के कारण ये मजदूर सिपाही एग्रीमेंट पर विदेशों को जाने लगे। जहाँ इनके साथ अक्सर धोखा होता था। कुछ कुली बन जाते तो कुछ कम वेतन पर मजबूरी में काम करते। इसी रूप को बंधुआ मजदूर के नाम से जाना जाता है। एग्रीमेंट के तहत तमाम स्त्रियाँ को नही ले जाया जाता था। एग्रीमेंट करनेवाले वहाँ जाकर छोड़ देते और स्त्रियों को सस्ती मजदूरी करनी पड़ती और यहाँ तक कि वेश्यावृत्ति के धंधे में भी जाने को मजबूर होती। एक उद्धरण देखें जिसे रसूल ने गाया था:

“छोड़ गोरकी के अब तू खुशामी बलमा/एकर कहिया ले करब तू गुलामी बलमा//”

अंत में कुछ अलग तरह के तथ्य जो इस किताब से प्राप्त हुए। स्त्रियों में उढ़री नारी के रूप में उस स्त्री को जाना जाता था जो परपुरुष के साथ घर छोड़ के चली जाती थी। ऐसी स्त्रियों को लोक में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। साथ ही पितृसत्तात्मक समाज सारा दोष उसी स्त्री के ऊपर मढ़ दिया करता था। यह स्थिति किसी न किए रूप में आज भी बनी हुई है। एक कहावत देखें: “उढ़री मेहरारू, टटीहर घर टेम्पोररी नौकरी के ओर छोर ह। ऐसी ही स्त्री की दूसरी पहचान रखैल के रूप में होती थी। पर भिखारी ठाकुर ने ऐसी स्त्रियों को अपने नाटकों में सम्मान के साथ स्थापित किया है। इससे भिखारी ठाकुर की प्रगतिशीलता दिखती है।

अंत एक बहुत ही मजेदार प्रतीकात्मक कहन से करना चाहता हूँ। “तसलवा तोर कि मोर?” दरअसल, यह भोजपुरी व्यापारिक चोरों की तरकीबें हुआ करती थीं। यह तरक़ीब पशु मेला में उपयोग की जाती थी। किसी व्यापारी को ठगना हो तो उनसे जाकर कहेंगे कि “तसलवा तोर कि मोर?” अगर व्यापारी तोर कह देता था तब पशु मुफ़्त में देना पड़ता।

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(बिहार के शेखपुरा के रहने वाले अमरदीप कुमार ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से परास्नातक की शिक्षा ली है। उनसे उनके ईमेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।)

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