‘युवा पीढ़ी’ के बाद की पीढ़ी पर कुछ टीपें

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राहुल सिंह आलोचक हैं। राहुल सिंह अध्यापक हैं। राहुल सिंह साहित्य के साथ सिनेमा में भी गहरी रुचि रखते हैं। लेकिन जो तत्व इन्हें सबसे अलग करता है, वो है इनका ‘नीर क्षीर विवेक’। कई बार आग को आग कहना, या पानी को पानी कहना, वैचारिक तैयारी और दृढ़ आत्मविश्वास की माँग करता है। इनकी आलोचना का यह तत्व इस आलेख में भी करीने से दिखलाई पड़ता है- सौतुक

 

राहुल सिंह/

किसी भी दौर में और किसी भी विधा में युवाओं के आमद की एक प्रक्रिया रही है। पर हिन्दी में खास कर कहानी के क्षेत्र में ‘युवा पीढ़ी’ के नाम से जो पीढ़ी आई, उसके आमद की कहानी थोड़ी अलहदा थी। उनकी ‘युवापने’ को ध्यान में रखकर पहली बार पत्रिकायें प्रकाशित की गईं, उनकी किताबों के प्रकाशन को बकायदा एक मंच उपलब्ध कराया गया। कहना ना होगा कि रवीन्द्र कालिया के जाने के बाद वैसी सचेत कोशिश नहीं हुई, बावजूद उसके उनकी दिखाई राह पर ‘नवलेखन’ वाला मामला चल निकला, जिससे ‘युवा पीढ़ी’ के हाथ में थमाई गई बैटन धीरे ही सही बढ़ती रही। (इस लेख में थोड़ी चर्चा युवा पीढ़ी के बाद आई कहानीकारों की पीढ़ी की करूंगा, जो मुकम्मल तो कतई नहीं है, पर इसे ठहरे हुए पानी में कंकड़ फेंकने वाले प्रयास के तौर पर भी देख सकते हैं। आनेवाले दिनों में इसकी और छूटी हुई कड़ियाँ जोड़ कर इसे पूरा करने की कोशिश की जायेगी। वैसे इसकी अपूर्णता के मूल में मेरे लिए सामग्री की अनुपलब्धता एक बड़ी वजह है।) ‘युवा पीढ़ी’ के अस्तित्व में आने से दो चीजें फौरी तौर पर हुईं थीं, अव्वल तो ‘कहानी’ ने एक विधा के बतौर केंद्रीयता अर्जित कर ली थी और दूसरे एक बड़ी संख्या में कहानी लेखन में युवाओं की दिलचस्पी बढ़ी थी। लेकिन फकत नौ-दस सालों में बहुत से नाम ‘हाइबरनेशन’ में चले गये। कुछेक ने कहानी में हाथ आजमाने के बाद कविता का रूख कर लिया (मिथिलेश कुमार राय), तो कुछेक ने अच्छी कहानियाँ लिखने के बाद खुद को रोक लिया (अरविंद)। कुछेक ने तो संग्रह भर कहानियाँ लिखने के बाद उदासीनता ओढ़ ली (मिथिलेश प्रियदर्शी, रवीन्द्र आरोही)। (नाम और भी हो सकते हैं, मैं संकेत भर कर रहा हूँ। आप इनमें नामों को जोड़-घटा सकते हैं।) लेकिन जिनका नाम ऊपर लिया है, वे सब संभावनाओं और सामथ्र्य से भरे नाम थे या हैं।

मिथिलेश कुमार राय ने ‘कनिया पुतरा’ नाम की एक बेहद संवेदनशील कहानी अपने शुरूआती दौर में लिखी थी। बाद में उनकी ‘गुलाब खिल रहे हैं’, ‘स्वर टोन’ और ‘पानी’ कहानी प्रकाशित हुई। इन कहानियों में रोजमर्रे के ही जीवन अनुभवों को टांका गया था। लेकिन उसमें बदलते समाज के स्वभाव को दर्ज करने की कोशिश थी। मसलन् ‘कनिया पुतरा’ टेलीविजन के जरिये बच्चों पर पड़नेवाले प्रभावों को संजीदगी से दर्ज करता था तो ‘गुलाब खिल रहे हैं’, प्रेमी जोड़ों के प्रति समाज और परिवार की मानसिकता को पकड़ता था। ‘स्वर टोन’ तो शिक्षित बेकारों की विकल्पहीनता और उनके छोटे अपराधों की ओर बढ़ने की कहानी थी। उनकी इसी कहानी पर ‘द इंडियन पोस्ट ग्रेजुएट’ नाम से एक फीचर फिल्म भी बन चुकी है। कहना इतना भर है कि बहुत छोटी-छोटी कहानियों के मार्फत् उन्होंने अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया था। लेकिन बाद के दिनों में वे कविता के क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय हो गये आज तो आलम यह है कि कविताओं के जरिये उनको पहचानना ज्यादा सहज हो गया है। सुखद समाचार यह है कि ‘करिया कक्का की आत्मकथा’ शीर्षक से उपन्यास जैसा कुछ उन्होंने फिर शुरू किया है जिसके दो अंश अखबारों में आये हैं। ग्रामीण संवेदना की परतों को वे उसमें एक नये मुकाम तक ले जाते दिखेंगे। मिथिलेश कुमार राय की भांति ही अरविंद ने भी गिन कर चार कहानियाँ लिखीं और उसके बाद अपनी मुहब्बत कविता और फिल्मों पर लुटाना पसंद किया। यों तो अरविंद की कहानियों के क्रम का मुझे ख़याल नहीं है लेकिन जो पहली कहानी स्मृति में दर्ज हुई थी, वह ‘रेडियो’ थी। एक बेहद सधी कहानी कथ्य और शिल्प दोनों धरातलों पर। परिपक्वता की मुनादी करती हुई कहानी। बाद में ढूंढ कर बाकी कहानियाँ पढ़ीं। उनके पास एक कहानी और मिली ‘चिट्टी’। कम से कम यह दो कहानियाँ बतौर कहानीकार उनके सामथ्र्य को रेखांकित करने के लिए मेरे जानते पर्याप्त हैं। यह अलग बात है कि उनकी अन्य दो कहानियाँ ‘दुःस्वप्न’ और ‘ईश्वर की गलती’, ऊपर गिनाई दोनों कहानियों में विन्यस्त पूर्णता को नहीं छू सके। ‘ईश्वर की गलती’ तो फिर भी अपने किस्सागोई और प्रयोगशीलता के कारण उल्लेखनीय है, बस कहानी अपने अवसान को कायदे से नहीं समेट पाती है। ‘दुःस्वप्न’ उठान के बाद बिखराव का शिकार हो जाती है। बावजूद इसके अरविंद के पास वह तमाम चीजें हैं, जो कहानी की दुनिया में परचम लहराने के लिए जरूरी समझी जाती है। मिथिलेश प्रियदर्शी भी कोई संग्रह भर कहानियाँ लिख कर चुप लगा गये थे। ‘पम्मी की लौ स्टोरी में पांडे जी की गौ स्टोरी’ से उन्होंने वापसी की है। यात्रा वृतांत और संस्मरण के सहमेल वाली कहानियों के बीच उनकी जो कहानी याद रह गई, उसका शीर्षक था ‘यह आम रास्ता नहीं है।’ मिथिलेश संभवतः इस पीढ़ी के गिने चुने कहानीकारों में होंगे जिनकी कहानियाँ हिन्दी में छपने के बावजूद, शायद मराठी में अनूदित होकर संग्रह के बतौर पहले आ जाये। केदारप्रसाद मीणा ने भी कहानी में हाथ आजमाते हुए ‘कामरेड मीणा’ जैसी शानदार कहानी लिख डाली थी, हांलाकि बाद के दिनों में उनकी इस कहानी यात्रा का क्या हुआ? इसकी बहुत जानकारी नहीं है। पर एक सुचिंतित राजनीतिक दृष्टिकोण की छाप उस कहानी में देखी जा सकती है। उस अकेली कहानी में हमारे समय के अंतर्विरोधों को समझने के कई सूत्र मौजूद थे।

अमिय बिन्दु का कहानी संग्रह ‘अमरबेल की उदास शाखें’ यद्यपि नवलेखन पुरस्कार से अनुशंसित कृति है। लेकिन उनकी कहानियों का पूरा दारोमदार कहानी में विन्यस्त रहस्य या गुत्थी पर टिकता आया है। इस रहस्य वाले टोटके के कारण कहानी में जिज्ञासा तो बनी रहती है कि आखिरकर हुआ क्या था या वजह क्या रही होगी? इस कारण कहानी तो आदमी पूरी पढ़ लेता है लेकिन एक बार जान लेने के बाद उसमें ‘सत्व’ जैसी कोई चीज रह नहीं जाती है। वह स्मृतियों में दर्ज होने से रह जाता है। यह तकरीबन वैसा ही है जैसा ‘सावधान इंडिया’ या ‘क्राइम पेट्रोल’ जैसे कार्यक्रम, जिनकी बुनियाद रहस्य के उदभेद्न पर टिकी है। रहस्य के उदभेद्न के बाद उसमें कुछ बचता नहीं है। ‘रहस्य’ कहानी का एक टूल है और हो सकता है। पर जब वह हर कहानी में बिना नागा मौजूद रहने लगे, तो यह सराहनीय नहीं अपितु चिंता की बात है। इससे बाहर आये बगैर अमिय बिन्दु के बतौर कहानीकार की स्वतंत्र पहचान थोड़ी मुश्किल है। (संग्रह के बाद प्रकाशित कहानियों के बाबत मुझे जानकारी नहीं है।)

अमिय बिन्दु का कहानी संग्रह ‘अमरबेल की उदास शाखें’ यद्यपि नवलेखन पुरस्कार से अनुशंसित कृति है। लेकिन उनकी कहानियों का पूरा दारोमदार कहानी में विन्यस्त रहस्य या गुत्थी पर टिकता आया है

श्रद्धा थवाईत की कहानियों में एक सादगी है। एक दो टूक पना है। कहानी के साँचे को लेकर उनके यहाँ कोई दुविधा नहीं है। बल्कि हिन्दी की शुरूआती कहानियों में ‘सोद्देश्यता’ जैसी जो चीज हुआ करती थी, उसकी एक मजबूत मौजूदगी श्रद्धा के यहाँ है। कम पात्रों के साथ अपनी कहानी में सफर करना पसंद है। पात्रों के जरिये जो विविधता कहानी के स्तर पर संभव की जा सकती है, उसे वे घटनाओं के मार्फत् बयां करने में यकीन रखती हैं। कहानी के मार्फत् जो कहना चाहती हैं, उस पर खुद को फोकस किये रहना आदि, उनकी कहानियों की कुछेक पहली निगाह में पहचानीं जा सकनेवाली विशेषताएँ हैं। जो कम से कम उनकी कहानियों को एक गठन, एक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। ‘शार्ट स्टोरी’ का जो फार्म होता है, उसको श्रद्धा ने जाने-अनजाने पा लिया है। कहन के स्तर पर प्रयोगों को रत्ती भर भी तवज्जो नहीं देती हैं। कथानक के जरिये अपने अनुभवों को आकार देने की कला उन्होंने सीख ली है। सादे शिल्प में कमोवेश वे अपनी बात कहानी में पिरो ले जाती हैं। कथा सूत्र के प्रति वे बराबर सजग रहती हैं, विचलन की गुंजाइशों से परहेज करती हैं। ‘टू द प्वाइंट’ या कहें ‘फोकस्ड’ रहती हैं। इस कारण कथ्य की स्वाभाविकता की रक्षा कर ले जाती हैं। बल्कि एक सरोकार भी बराबर दिखता है। पर यह सरोकार राजनीतिक धरातल से ज्यादा मानवीय धरातल से जुड़ा है। वनस्पतिविज्ञान से परास्नातक श्रद्धा थवाईत की कहानियों में वनस्पतियों की मौजूदगी को भी बराबर महसूस किया जा सकता है। मसलन् यह वाक्य देखिये “ये शहर बेरोजगारों के सपनों से सजा शहर है। जहाँ हर रिजल्ट के बाद अधिकांश के सपने सुबह जमीन पर गिरे हरसिंगार के फूलों की तरह बिखर जाते हैं।” ऐसे वाक्य कहानियों के बीच-बीच में मिलते रहते हैं। लाल सुर्ख गुलमोहर तो एकाधिक कहानियों में मौजूद है। कहानी लेखन के जिस आरंभिक पायदान पर श्रद्धा फिलवक्त है, उसमें उनकी शैली में मेरे पसंद की कहानी ‘साझा संस्कृति की कश्ती’ है। लेकिन इन कहानियों को पढ़ते हुए यह जरूर लगता है कि श्रद्धा को अपने ‘कंफर्ट जोन’ से बाहर आकर कहानी लिखने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। इससे बाहर आने के बाद ही उनका सही मूल्यांकन हो पायेगा। गर लेखन इसी भाव-बोध और जीवन स्थितियों के इर्द-गिर्द सिमटा रहा तो उनसे ज्यादा सामथ्र्य और संभावनाओं के साथ सक्रिय लेखिकाओं की कमी नहीं है। जैसे उनसे दो साल पहले ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत उपासना की कहानियों को लें तो भाषा, कहन और शिल्प के धरातल पर वे कहीं ज्यादा परिपक्व नजर आती हैं। बावजूद इसके उपासना के संदर्भ में कुछ बातें रेखांकित करना आवश्यक है। निस्संदेह उनके पास एक भाषा है और उस भाषा को बरतने की तमीज है। पर जब वे इस भाषा का बेजा इस्तेमाल कहानी में करने लगती हैं तो मामला उतनी ही तेजी से बिगड़ता भी है। इसे उनकी ही दो कहानियों के उदाहरण से समझना बेहतर होगा। उनकी एक कहानी है ‘एक कहानी…एक स्क्रिप्ट भर!’, इस कहानी के बारे में इतना भर कहना चाहूंगा कि उपासना आगे कोई कहानी ना भी लिखे, तो इस कहानी के कारण याद की जायेगी। उनकी एक दूसरी कहानी है ‘एगही सजनवा बिनऽऽऽ ए राम!’। उपासना को अपनी इन दोनों कहानियों को पढ़ना चाहिए और सोचना चाहिए कि वह क्या है जो पहले में है लेकिन दूसरे में नहीं है। ऐसे कहानी के दूसरे मोर्चों पर उपासना और श्रद्धा दोनों की कहानियों का संसार अलग है। तुलना की बहुत गुंजाइश बनती नहीं है। बल्कि श्रद्धा की कहानियों की रवानगी में कहीं-कहीं जो एक खराश-सी है, प्रज्ञा की कहानियाँ में वह रवानगी बेहद सहजता से उपलब्ध है। प्रज्ञा की कहानियाँ श्रद्धा की कहानियों से ज्यादा ‘मैच्योर’ कहानियाँ हैं। यद्यपि प्रज्ञा की कहानियाँ भी उनके रोजमर्रे के जीवन के अनुभव से उपजी हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और राजनीतिक चेतना उन्हें एक बढ़त दिला देती हैं। प्रज्ञा की कहानियों के साथ जो अच्छी बात है कि उन्हें पढ़ते हुए यह कतई नहीं लगता है कि कहानी बुनने की कोशिश की जा रही है। कहानियाँ याद रह जाती हैं। चाहे वह ‘फ्रेम’ हो, ‘बराबाद…नहीं आबाद’ हो, ‘अमरीखान के लमड़े’ हो, ‘इमेज’ हो, ‘तस्वीर के पीछे’ हो या ‘तक्सीम’ हो। प्रज्ञा की कहानियों के किरदार भी आपके निगाहों के आगे तैरने लगते हैं। अलग-अलग भाव-बोध की कहानियाँ उन्होंने दी है। ‘फ्रेम’ को पढ़ते हुए एक हूक, एक कसक सी मन में रह जाती है। ‘अमरीखान के लमड़े’ के भाई जी और ‘तस्वीर के पीछे’ की रानी दीदी तो बस आपके जेहन में नक्श हो जाते हैं। ‘बराबाद… नहीं आबाद हो’ में जो जिजीविषा है, वह आपको उम्मीदों से भर जाती है। ‘तक्सीम’ तो खैर वह कहानी है, जो उनके कहानीकार होने पर मुहर लगाती है। उस ‘तक्सीम’ के बराबर की कहानी योगिता यादव की ‘क्लीन चिट’ ठहरती है। योगिता यादव ने भी बिलकुल अलहदा तरीके से कहानियों के मार्फत् ध्यान खींचा है। उनके यहाँ छोटी-छोटी कहानियों की एक अलग दुनिया है। जैसे ‘पायल’, ‘बोनसाई’, ‘108वाँ मनका’, ‘भेड़िया’, ‘गांठें’, ‘दही’, ‘शो पीस’ आदि। अपनी आत्मा में यह लघुकथाओं के निकट है। इन कहानियों में वह ‘पंच’ या ‘किक’ जैसी चीज मौजूद है। जो अनायास आपको एक पल को ठिठकाती है। योगिता यादव के पास यों तो ‘नागपाश’ जैसी कहानी भी है। पर मेरे लिए उनकी जो कहानी अलग से रेखांकित करने योग्य है, वे हैं, ‘क्लीन चिट’ और ‘गैर बाग से’। कम से कम उनकी यह दो कहानियाँ अलग से याद करने लायक हंै।

कथावस्तु किसी कहानी की आत्मा होती है। उसे सही-सही साध ले जाने को ही ‘बरतने की तमीज’ (ट्रीटमेंट) कहते हैं। यह बरतना एक किस्म की साधना है और कहानी के अन्य तŸवों के साथ संतुलन साधना भी। उन कहानियों को जिनका गंतव्य बहुत स्पष्ट ना हो रास्ते में भटकने का डर बहुत रहता है या उनका भी जिनका गंतव्य तो स्पष्ट होता है लेकिन वहाँ पहुँचने की राह नहीं मालूम होती। दोनों में भटकाव की पूरी गुंजाईश होती है। और जब आपके पास एक समर्थ भाषा हो तो आप परिवेश की बुनावट में उसे जरूरत से ज्यादा खर्च करने लगते हैं तो एक धुंध पैदा कर रहे होते हैं, उस धुंध में सबसे पहले कथासूत्र गुम होते हैं। जिसको कई बार फिर समेट पाना कथाकार के बूते के बाहर की बात हो जाती है। कथा में जिसे ‘संरचनात्मक अन्विति’ कहते हैं अर्थात् कथा तŸवों की आवयविक एकता, जिसके सम्यक परिपाक् से कथा साकार होती है। वह उपन्यास में तो थोड़ी छूट आपको देता है कि आपने जो ढील दी हो उसे समेट लें, लेकिन कहानी में यह मार्जिन सूत बराबर होता है। हाल के दिनों में कहानी के अंत-अंत तक आते कथासूत्रों को समेट लेने की कला को हतप्रभ तरीके से जिस कहानीकार ने अंजाम दिया है वह किरण सिंह हैं। यहाँ मैं अपेक्षाकृत लम्बी कहानियों की बात कर रहा हूँ। यद्यपि उपासना ‘कहानी के दरम्यान’ शबाब पर होती है, लेकिन अवसान में समेट नहीं पाती हैं। मसलन् उनकी कहानी ‘एगही सजनवा बिनऽऽऽ ए राम!’ तकरीबन पचास पन्नों की कहानी है। मतलब एक लम्बी कहानी है। उस कहानी के दरम्यान तो वह उसे औपन्यासिक ऊँचाई की ओर बढ़ाती दिखती हैं, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। कहानी का मजा कहानी को कहानी ही रहने देने में है। लम्बी कहानी केवल आकार का मामला नहीं है। इसे समझे बगैर लम्बाई तो बढ़ाई जा सकती है पर वह कहानी भी बने जरूरी नहीं है। उपासना परिवेश को बुनने में जरूरत से ज्यादा ताकत खपा दे रहीं हैं, जबकि परिवेश का काम कथानक को संगत देना है। उपासना को अपनी भाषा पर जो विश्वास है, वह उसे फालतू में खेलने को ललचाता है और शायद ऐसा करने में उनको भी अच्छा लगने लगा है, इसलिए व्यर्थ की डिटेलिंग भी उनकी कहानियों में है। पर बावजूद इन सबके उनके पास एक निगाह है, समर्थ भाषा है, परिवेश को रच सकने की कला है, जो उन्हें बतौर कहानीकार अपनी पीढ़ी में एक बड़ी बढ़त देता है। उनके पास लम्बी कहानियों से इतर छोटी कहानियाँ भी हैं। जैसे ‘कार्तिक का फूल’, ‘नाथबाबा की जय’। दिन भर की गतिविधियों को कहानी में तब्दील करने का शगल, या अपने रोजमर्रे के जीवन में उपजे अनुभवों को कहानी में ढाल देने का चलन भी इस पीढ़ी में ही नहीं, पिछली पीढ़ी के कहानीकारों में भी रहा है। इस मामले में प्रज्ञा ज्यादा सफल हैं और छोटी कहानी के फार्मेट में योगिता यादव के मुकाबले कोई नहीं है। यद्यपि ऐसी कहानियाँ संपादकीय आग्रहों से लिखी तो जाती रहीं हैं, पर उनका कोई नामलेवा नहीं रह जाता। ‘एक जिन्दगी…एक स्क्रिप्ट भर!’ जैसी कहानी लिखने के बाद उपासना से उम्मीदें जरूरत से ज्यादा है। और यह उम्मीद भी है कि वह इस पर खरा उतरेंगी।

इनकी तुलना में कहानी की दुनिया में हैरतंगेज ढंग से किरण सिंह ने अपने पाँव जमाये हैं। सामंती परिवेश में परवरिश की स्मृतियों से आरंभ होने वाली यह कहानियाँ धीरे-धीरे अपना दायरा हर कहानी के साथ बढ़ाती चली गई हैं। हर कहानी के साथ वह व्यक्तिगत से ज्यादा सामाजिक होतीं चलीं गईं। हर कहानी के साथ प्रतिबद्धता का दावा दृढ़तर होता चला गया। राजनीतिक चेतना, लैंगिक चेतना, स्त्री चेतना को वे सान पर चढ़ाती चली गईं। उनकी कहानियों में एक कौंध पैदा होती गई है, कहानी की कौंध में एकबारगी आप रौशन हो जाते हैं, भले एक पल को ही। खुलासा इनकी कहानियों के शिल्प का भी हिस्सा है। पर अमिय बिन्दु की कहानियों में प्रयुक्त होनेवाले मूलभूत टोटके की तरह नहीं है। दरअसल यह कहानी के अंत में तब आता है जब आप उसे भूल चूके होते हैं और उसके आने से फिर से कहानी के कई हिस्से रोशन हो जाते हैं। किरण सिंह अपनी कहानियों पर काफी मेहनत करती हैं पर पढ़ते हुए लगता है कि कहानी के अंत को लेकर वह सबसे ज्यादा सजग हैं। इसलिए यदा-कदा मिलनेवाले शुरूआती ढीलेपन के बावजूद अंत तक आते-आते वे कहानी की चूलें इस कदर कस देती हैं कि उस ओर ध्यान ही नहीं जा पाता है। किरण सिंह की कहानियों में एक ‘नई स्त्री’ को रुपाकार लेते हुए देखा जा सकता है। भीषण प्रतिकूलताओं में भी हार नहीं माननेवाली, पलायन नहीं करनेवाली स्त्रियों की एक पूरी पौध है। यौनिकता को लेकर ना तो कोई कुंठा है और न गलत समझे जाने का भय। स्त्री भाषा अपने एकांत में मर्दों की यौनिकता को किस रूप में याद करती है या उसका मजाक बनाती है, इसकी गजब की समझदारी उन्होंने अर्जित कर ली है। मर्दवादी जुबान बोलती इनकी स्त्रियाँ की ‘बोल्डनेस’ देखने लायक है। कई मसलों को एक साथ अपनी कहानी में उठाने की कला भी उन्होंने साध ली है। जितना भरोसा उनको अपनी लेखनी पर है कमोवेश उतना ही भरोसा उन्हें अपने पाठकों पर भी है, इसलिए कहानी में बहुत से अंतरालों को वे पाठकीय विवेक पर छोड़ कर चलती हैं। गलत समझे जाने या ना समझे जाने का जोखिम को उठाना उन्हें ज्यादा पसंद है बजाय हर बात को खोल कर रखने के। कथ्य के स्तर पर एक पर्देदारी रहती है, जिसको खीचंने का काम बाजदफा वह आखिर में करती हैं। उपासना या सोनी पाण्डेय की तरह लोक की छौंक उनकी कहानियों में नहीं है। एक निस्पृह और अपेक्षाकृत ठंडी सी लगनेवाली भाषा से वह अपना काम लेती हैं। किरण सिंह ने तो कहानियों के बूते अपने हिस्से की जमीन दखल कर ली है, उस पर विस्तार से बात फिर कभी। पर एकाध ऐसे भी हैं, जिन्हें उनके आलस के कारण उनका हिस्सा नहीं मिला है। ऐसे ही एक सुस्त कहानीकार हैं रवीन्द्र आरोही तकरीबन संग्रह भर कहानियाँ। बिलकुल अलग मिजाज और आस्वाद की। अगर आपको पसंद आयेंगी तो बहुत पसंद आयेंगी। भाषा को बहुत प्यार और करीने से अपनी कहानी में बरतनेवाले। रवीन्द्र आरोही को पढ़ते हुए आपको हर बार कोई अलग कहानीकार याद आ सकता है और ऐसा एक कहानी में कई बार हो सकता है। बावजूद इसके उनके पास एक मौलिक कल्पनाशीलता है। दृश्यों को बुनने की शानदार क्षमता है। बिम्बों में कहानी को कहने का एक अनकहा आग्रह है। ईश्वर की मानिंद कहानी में हर जगह उनकी मौजूदगी और उसे साध ले जाने की कला है। उनकी कहानियों में वह कोई-सा भी दिन हो सकता है और उसकी घटनायें हो सकती हैं। उन घटनाओं पर हासिल प्रतिक्रियाओं का एक क्रम हो सकता है। पर इस सबमें एक नफासत और शाइस्तगी देखी जा सकती है। इनकी कहानियों में कोई क्लर्क, कोई बाबू, कोई मास्टर हो सकता है, एक पुराना-सा कस्बा और गांव के बीच का कुछ हो सकता है। उनके जीवन की छोटी-छोटी बातों का एक क्रम हो सकता है, घटनाओं की एक श्रृंख्ला हो सकती है। कथानक बहुत संक्षिप्त हो सकता है पर उसकी डिटेलिंग या स्केचिंग से वह उसे कहानी की शक्ल देने में सक्षम हैं। मुख्य चरित्र का संगत देने के लिए एक साझीदार जरुर होता है, जिससे संवादों के जरिये यह अपनी बात आगे बढ़ा सकें। पर सबसे बड़ी कमी कहानी को ‘फिनीशिंग टच’ देने की है। जहाँ वे चूक जाते हैं। बावजूद इसके रवीन्द्र आरोही की कहानियों का एक खास आस्वाद है। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि उसे जीवन में बहुत इत्मीनान, बहुत सारा वक्त चाहिए। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि मानो आस-पास के कोलाहल और भागमभाग से दूर एक ऐसे एकांत की चाह उनके भीतर है, जहाँ वक्त इफरात में हो, जिंदगी में रफ्तार न हो एक संयत गति हो। वस्तुएँ बहुत ना हो जिंदगी जीने भर की बुनियादी चीजें भर हो। इनकी कहानियों पर भी विस्तार से फिर कभी।

कहानी की दुनिया में हैरतंगेज ढंग से किरण सिंह ने अपने पाँव जमाये हैं। सामंती परिवेश में परवरिश की स्मृतियों से आरंभ होने वाली यह कहानियाँ धीरे-धीरे अपना दायरा हर कहानी के साथ बढ़ाती चली गई हैं

जितेन्द्र विसारिया का संग्रह भी ‘नये सजन घर आये’ में दलित बोध की कहानियों से इतर भी कहानियाँ मौजूद है। लेकिन पहली निगाह में जो कुछेक बातें उनकी कहानियों के बारे में फौरी तौर पर कही जा सकती है वह यह कि उसमें सवर्णाें के प्रति वह अतिरिक्त कटुता नहीं है। दलित जीवन के अंतर्विरोधों को संबोधित कर सकने का साहस है। दलित जीवन की दुश्वारियाँ तो हैं पर एक संघर्ष चेतना भी है, जो लड़ने को प्रेरित करती है। ‘पान सिंह तोमर’ में भिंड-मुरैना के आस-पास वाली जिस ब्रज और बुंदेली के सहमेल की छठा दिखी थी, वह यहाँ पूरे शबाब पर है। दलित विमर्श से चालित होना दलित जीवन पर केन्द्रित कहानियों की एक सीमा रही है। जितेन्द्र की कहानियाँ इससे मुक्त भी हैं, और कहीं-कहीं बद्ध भी। जातिवादी आग्रहों-पूर्वाग्रहों की अनुगूंज इनकी कहानियों में मौजूद है। लेकिन जितेन्द्र की कहानियों की सबसे बड़ी दिक्कत ‘कहानीपन’ के गुमशुदगी की है। कहानी को शुरू करने में उन्हें काफी ‘एफर्ट’ लगाना पड़ता है। उसके बाद विचारों को वे कहानी से फूटने नहीं देते हैं, बल्कि स्मृति, स्वगत कथन, आत्मावलोकन के क्षणों में कमेंट्री की शक्ल में बारहा लेकर आते हैं, इससे पठनीयता बुरी तरह बाधित होती है। उन्हें अपनी कहानी ‘दोहरी लड़ाई’ ही बार-बार पढ़नी चाहिए, वहीं से उनके लिए कहानीकार की राह फूट सकती है। शेष कहानियों दो-एक छोड़ दें तो संभावनायें बहुत दिखती नहीं है।

प्रवीण कुमार का ‘छबीला रंगबाज का शहर’ एक परिघटना है। भयंकर संरचनात्मक कमजोरियों के बावजूद जबर्दस्त मार्केटिंग स्किल से यह संग्रह जिस कदर चर्चा में है। कम से कम कहानियों के बूते वह उस चर्चा की हकदार नहीं थी। पर जब पूरा देश हवाबाजी की चपेट में है तो साहित्य उससे अछूता कैसे रह सकता है। सोशल मीडिया को प्रकाशक और लेखक दोनों, अब एक प्रचारात्मक मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, जब तक बात समझ में आ रही है, तब तक वह बेच कर निकल जा रहे हैं। फिलहाल तो यह नुस्खा कारगर है। आगे-आगे देखिये होता है क्या!

कई और कहानीकारों पर भी लिखने की चाह थी। जैसे सोनी पाण्डेय ‘बलमा जी का स्टूडियो’ और मनीष वैद्य के ‘फुगाटी का जूता’ आदि पर। लेकिन संग्रह उपलब्ध ना हो सकने का कारण आधिकारिक तौर पर इन पर बात करने की स्थिति में नहीं हूँ। सोनी पाण्डेय की जरूर दो एक कहानियाँ इधर-उधर पढ़ी हैं, जिनमें ‘बलमा जी का स्टूडियो’ की तुलना में ‘बुद्धि शुद्धि महायज्ञ’ ज्यादा दिलचस्प लगी। लेकिन इन दो कहानियों के आधार पर फिलहाल उन पर कोई राय नहीं दे रहा हूँ। एक बात जरूर है कि इस पीढ़ी में मौजूद स्त्री कहानीकारों का सामथ्र्य अलग से रेखांकित की जा सकनेवाली बात लग रही है। बल्कि पिछली पीढ़ी में मौजूद नीलाक्षी सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, वंदना राग, प्रत्यक्षा, पंखुरी सिन्हा, कविता, शिल्पी की कहानियों के बरक्स रख कर इनकी कहानियों को देखे जाने की जरूरत बन रही है कि आखिर इन दस वर्षों के अंतराल में कौन सी नई संभावनाओं के द्वार खुले हैं?

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