‘पूस की रात’ से आगे: नो नेशन फॉर वीमेन

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चन्दन पाण्डेय/

कहानी के हर आयाम पर प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ कालजयी है. भविष्यकथन में भी. प्रेमचंद की विश्वप्रसिद्ध अधिकाधिक कहानियों को लेकर यह ख्याल आता है कि इनके आगे की कहानी कैसी होती? मसलन ‘नमक का दरोगा’ अपनी ईमानदारी मुसलसल रख पाया होगा? ‘पूस की रात’ कहानी को हल्कू जहाँ बेजार सी स्वीकारोक्ति पर खत्म करता है कि रात को ठंढ में यहाँ सोना तो न पड़ेगा, आगे का जीवन कैसे कटा होगा जिस रात पूरा खेत नीलगाय चर गई थी? कहानी के मूलभूत तत्व रहस्य को आदि से अंत तक बनाए रखते हुए भी सामाजिक सरोकार को बतौर कथ्य बरकरार रखना, यह प्रेमचंद की खूबी है. यह कठिन भी है शायद इसलिए इन कहानियों से आगे की बात दर्ज करने की जो उम्मीद वो कथाकारों से पूरी न हुई लेकिन युवा पत्रकार प्रियंका दुबे रिपोर्ताज की अपनी किताब ‘नो नेशन फॉर वीमेन’ में दर्ज करती हैं.

इससे पहले की पूस की रात को आगे बढाती हुई इस किताब में दर्ज घटनाओं तक चलें, एक बात बता देनी जरुरी है कि यह परेशान कर देने वाली किताब है. आपके पुस्तकालय में हो न हो लेकिन एक बार पढ़ लेने के बाद इस किताब की ‘स्पाइन’ आपके ‘स्पाइन’ में सिहरन पैदा कर देगी और आपके मन-मस्तिष्क में किसी चोट की तरह बैठ जायेगी.लेकिन मुझे जोर देकर यह आग्रह करने की इजाजत दीजिए कि यह किताब आपके निजी पुस्तकालय में होनी चाहिए. क्यों? इसकी वजह आखिर में बताने की इजाजत दीजिए.

यह किताब बलात्कार को युद्ध कौशल की तरह इस्तेमाल करने वाली जातियों वाले इस स्वर्ण-देश में स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्म और उन जुल्मियों को बचाने में लगे हुए समाज का लिटमस टेस्ट रिपोर्ट है.

क्यों जरुरी है यह पुस्तक, इसकी एक बानगी यह कि, इस पुस्तक के एक अध्याय को, जो मानव तस्करी में अपने आस पड़ोस के लोगों और पुलिसिया संरक्षण पर है, मैं दो ढाई घंटे की एक यात्रा में पढ़ रहा था. उस अध्याय को पढ़ चुकने के बाद का अनुभव डरावना था, इतना डरावना कि मेरे भीतर अपने घर, परिवार, बच्चे की खबर लेने की तीव्र इच्छा हुई लेकिन मेरे पास डेढ़ दो घंटे इन्तजार करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था.

पूस की रात से बात आगे बढ़ती है. स्थितियां हू-ब-हू वैसी नहीं है लेकिन वर्ष 2013 की यह रात हरियाणा के हिसार जिले के भगाना गाँव पर काल-रात की तरह उतरी है.  यह रात भी पूस या शुरुआती माघ की वज्र-ठंढी रात है, बेगार जितने पैसों में मजदूरी पर लगा एक आदमी सरपंच के खेतों में पानी पटा रहा है, उसे भी नींद आ जाती है या जाने क्या होता है कि पानी खेत के मेड तोड़ कर बाहर बह जाता है, जैसा अमूमन किसान-घरों में सुनने को मिलता है कि बहुत पानी बर्बाद हो गया. यही वो बिंदु है जहाँ प्रेमचंद जैसे सशक्त कथाकार ‘फिक्शन’ को अंत करते हैं. कहानी के क्राफ्ट के इतने बड़े मास्टर कि अगर इसे कहानीकार की सीमा के बजाय कहानी विधा की ही सीमा मान लिया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. लेकिन जीवन उसके बाद शुरु होता है जिसे लेखिका दर्ज करने का साहस करती है.

उस मजदूर को ग्राम-प्रधान पानी बह जाने के कारण सिर फूट जाने तक पीटता है और उसकी पत्नी से बदतमीजी करता है. अस्पताल उस मजदूर का इलाज करता है लेकिन कुछ भी लिखित में इसलिए नहीं देता है कि कहीं यह मजदूर प्रधान के विरुद्ध पुलिस में मामला दर्ज न कर दे. पुलिस पहले तो मजदूर की सुनती नहीं है और जब सुनती है तब ग्राम प्रधान को बुलाकर उनके बीच सुलह करा देती है.

और आपको लगता है, कहानीनुमा यह सच्ची घटना यहीं खत्म हो गई?

नहीं.

पूस की रात से आगे की बात यहाँ से शुरु होती है. सुलह करने के बाद ग्राम-प्रधान उन्हें पुलिस तक पहुँचने के अपराध पर सजा देने की धमकी देता है. ग्राम-प्रधान की जाति जाट है, वह जाति जिनका उस क्षेत्र के लगभग हर संसाधन पर कब्जा है और मजदूर धानुक जाति से है, दलित, सर्वहारा लेकिन खोने के लिए उसके पास बेड़ियाँ नहीं बेटियाँ हैं. एक रात धानुक समाज की चार बेटियाँ अपहृत हो जाती हैं और उन्हें बेहोश करने के पश्चात पूरी रात उनका सामूहिक बलात्कार होता है. उन चार निरपराध युवतियों में तेरह वर्ष की बच्ची भी है. उस ठंढी और क्रूर रात के बाद जब उन युवतियों को होश आता है तब वे अपने आपको अजनबी शहर के रेलवे स्टेशन पर पाती हैं. यह भटिंडा है. हिसार के भगाना गाँव से सैकड़ो किलोमीटर दूर. जघन्य बलात्कार और बेहोशी की दवा ने उन्हें तोड़ दिया है.

और आपको लगता है कि ओह, यह दुःखभरी दास्ताँ यहाँ खत्म होनी थी!?

जी, नहीं. यह ‘फिक्शन’ नहीं है. इस बलात्कार के बाद समाज और क़ानून की चक्की में उनका पिसना शुरु होता है. पुलिस यहाँ भी मामला दर्ज नहीं करती है, लड़कियों के बयान लेने से मना करती है, शुरु होता है अपराधियों को बचाने का टिपिकल भारतीय प्रपंच जिसमें अपराधियों को बेचारा कहा जाता है, जिसमें अपराधियों के अपराध को भूल गलती कहा जाता है, जिसमें पीड़ित पर ही सारे दोष डाले जाते हैं, जिसमें पीड़ित से मुकद्दमा वापस लेने को कहा जाता है, इसलिए पुलिस पहले तो मामला दर्ज नहीं करती है और जब करती है तब रात के डेढ़ बजे लगभग नीम-बेहोशी की हालत में पड़ी ‘बलात्कार-पीड़ितों’ का बयान लेती है. उन्हें तोडती है, मरोड़ती है, और कानून के अन्य रखवालों के साथ मिल कर तब तक क़ानून को गींजती है जब तक कि सारे बलात्कारी बरी नहीं हो जाते.  धानुक समाज, जिसका गाँव वाले इस अपराध में जीना हराम कर देते हैं कि उन लोगों ने अपनी बेटियों के साथ हुए बलात्कार को लेकर मुकद्दमा क्यों दर्ज कराया, के लगभग सभी लोग गाँव छोड़ देते हैं, हिसार और दिल्ली में कनात डाल कर रहते हैं, न्याय की भीख, शब्दश: भीख, मांग रहे होते हैं, आन्दोलन की अगुआई करते पच्चीस वर्षीय जगदीश कजाला कहते हैं कि जो भी संगठन, एन.जी.ओ. उनकी मदद के नाम पर आए सबने उनका इस्तेमाल कर लिया, मदद किसी ने नहीं की. पीड़िताओं का वकील इस किताब की लेखिका से कहता है: वो जी, जरुर इन लड़कियों की ही गलती रही होगी. हैरान लेखिका पूछती है: जब आप अपने मुवक्किल की बातों पर यकीन भी नहीं कर रहे तो उनका मुकद्दमा कैसे लड़ेंगे?

 

पत्रकार प्रियंका दूबे और उनकी पुस्तक का कवर

इस किताब में जुल्म की ऐसी अनगिन दास्तान है जो भारत के हर राज्यों की स्त्री पर बीती है. ऐसे जुल्म जो हमें अब याद भी नहीं आते. क्यों? क्योंकि पुरुषों से अटी पड़ी सत्ता संरचना चाहती है कि अपराध भले होते रहें लेकिन हम उन्हें भूलते जाएँ. लेखिका ने सत्ता संरचना की उस पूरी कवायद के खिलाफ एक दस्तावेज तैयार किया है. भूलने और याद रखने की इस जंग में लेखिका ने इस किताब के बतौर एक उपकरण रख दिया है जो याद रखने वालों और भुला देने वालों, दोनों के लिए जरुरी हैं.

सीतापुर की वह बच्ची जो खेल खेल में थाने की तरफ चली जाती है, अपने तीन साल के भाई के साथ, और फिर थाने में एक पेड़ से टँगी उस बच्ची की लाश मिलती है, बाद में यह भी सत्यापित होता होता है कि उस बच्ची का बलात्कार हुआ था, पुलिस वाले पकडे जाते हैं, लेकिन उस बच्ची के लिए न्याय की आकांक्षा लिए संघर्षरत माँ पर मुकद्दमा वापस लेने के लिए दवाब बनाया जाता है, माँ के नहीं मानने पर उसका पति, यानी उस बच्ची का पिता, अपनी पत्नी पर इस आशय के शक करना शुरु कर देता है कि पत्नी न्याय के लिए नहीं बल्कि इसलिए बाहर आना जाना कर रही हैं कि कहीं कोई दूसरे सम्बन्ध हैं.

त्रिपुरा की वह अधेड़ स्त्री जो कमुनिष्ट पार्टी की कार्यकर्ता थी लेकिन अब इसी और बैनर तले चुनाव लड़ना चाहती थी, कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े युवक सरे राह उसका बलात्कार करते हैं.

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, लड़कियाँ प्रेम आग्रह ठुकरा देती है तब उन्हें सबक सिखाने के लिए उसका बलात्कार होता है और जलाकर मार दिया जाता है, लड़कियों के पिता जब पुलिस में जाते हैं तो उन्हें सबक सिखाने के लिए कभी गाँव बाहर कर दिया जाता है, कभी उनके रास्ते रोक दिए जाते हैं, कभी समाज बाहर कर दिया जाता है और यह सब जाति-गौरव के नाम पर होता है.

मध्यप्रदेश के वो गाँव जहाँ अपने जानने पहचानने वाले लोग ही बच्चियों को बरगलाकर बेच दे रहे हैं. क्यों? ताकी पड़ोस के राज्यों में युवक लडकी खरीद कर शादी कर सकें, उन्हें देह व्यापार में लिप्त कर सकें.

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में हुए दोहरे हत्याकांड के वर्णन को पढ़ कर आदमी घबरा जाए. दो बहनों का बलात्कार और उनकी हत्या. जाति-दम्भ में पगी हत्या. मुख्यमंत्री का बयान कि इस मामले को मीडिया तूल दे रही है. इस अध्याय को पढ़ते हुए आप खुद को यह तय करता हुए पायेंगे कि अखिलेश यादव जैसों को तो दुबारा सत्ता में सिर्फ इस बयान के लिए नहीं आना चाहिए.

असम का लखीमपुर क्षेत्र जो डरावना रेकॉर्ड अपने नाम किये हुए है: हर महीने करीबन चालीस लड़कियाँ यहाँ से गायब हो जाती हैं जो या तो बड़े शहरों के माननीयों के घर बंधुआ मजदूर जैसी नौकरानी बन कर रह जाती हैं जिनकी तनख्वाह दलाल उठा ले जाते हैं या फिर वो किसी अमानवीय धंधे में बेच दी जाती हैं.

बिहार के भोजपुर जिले के डुमरिया क्षेत्र की वो छ: बच्चियां जिनका बलात्कार सिर्फ और सिर्फ जातीय वर्चस्व बनाए रखने के लिए कर दिया जाता है और जो इस क्षेत्र में चलन की तरह मौजूद है.

उत्तर प्रदेश के ही बुन्देलखंड में एक बसपा नेता की नीयत पार्टी कार्यकर्ता के बेटी पर बिगड़ जाती है और फिर शुरु होता है उस अठारह वर्षीय लडकी के जीवन को नर्क बना देने का खेल.

सांस्कृतिक तौर पर विकसित कहा जाने वाला राज्य बंगाल! लड़कियों की लाशें घर के बगल से गुजरते नालों में मिलती है. जिस जगह पर बैठ कर मैं यह लिख रहा हूँ उसके पड़ोस यानी बर्दमान में वहाँ २०१४ में एक सामूहिक बलात्कार और ह्त्या का मामला दर्ज होता है और कुछ दिनों बाद अपराधी छोड़ दिए जाने की कगार पर पहुँच जाते हैं.

यह चंद मोटे तथ्य हैं जिनकी ब्यौरेवार प्रस्तुति लेखिका ने की है. सोच कर दिल डूब जाता है कि जिन ब्यौरों को पढ़ना इस कदर हौलनाक है उन्हें लिखना कितना कठिन रहा होगा. ऐसे कई प्रसंग आते हैं जब सताई गई स्त्रियों के साथ लेखिका अपने रोने का जिक्र करती है और वो घबरा देने वाली बाते हैं.

यह किताब पहली ऐसी कोई कोशिश है जो स्त्रियों, बच्चियों की हत्याओं, बलात्कार और उनके परिवार की प्रताड़ना को एक जगह दर्ज करती है. सबसे बड़ी बात यह कि लेखिका ने उन्हीं घटनाओं को दर्ज किया है जहाँ वो पहुँच पाई. जिन लोगों से वो मिल पाई. यह दुर्गम यात्रा साहसिक रही होगी. एक जगह, मणिपुर में शायद, लेखिका के पहुँचने पर क्षेत्रीय लोग समझाते हैं: अभी तो हालत ठीक हैं मैडम, छ: सात महीने पहले आप यहाँ आई होंती तो अब तक आप खुद ही गायब हो चुकी होतीं. यह किताब ऐसे दुखों से लबरेज है कि इसमें दर्ज घटनाओं के बजाय लेखिका के प्रयत्नों की और सामना की गई कठिनाईयों के लिए उनकी तारीफ़ करना एक खराब कवायद लगेगी, फिर भी लेखिका को सामूहिक धन्यवाद बनता है कि उन्होंने ऐसी किताब मुमकिन की जो आँखों के पानी को आईना बना कर रख देती हैं जिसमें आप रोज खुद को देख सकते हैं.

दरअसल यह किताब इसलिए भी हमारे पास होनी चाहिए क्योंकि इसकी झलक मात्र से इसके भीतर के हर सफे आपके सामने खुलते जायेंगे. हर वो अपराध, जो पुरुष समाज अनवरत किए जा रहा है, आपके सामने दीवार की तरह खड़ी हो जाया करेगी.

इस किताब से शिकायत यही है कि यह हिन्दी में क्यों नहीं है? या उन भाषाओं में क्यों नहीं जिन्हें बोलने वाली दुनिया में इस किताब में दर्ज वो सारे अपराध हुए हैं.

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