बीच का रास्ता नहीं होता: कृष्णमोहन

2

आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर कृष्णमोहन का यह आलेख केदारनाथ सिंह की चुनिन्दा कुछ कविताओं पर है। 

परिचयात्मक लेखन तक सिमट चुकी हिंदी आलोचना के इस दौर में, जहाँ बकौल आलोक धन्वा, आलोचनात्मक ‘बहस चल नहीं पाती/ हत्याएं होती हैं/फिर जो बहस चलती है/ उनका भी अंत हत्याओं में होता है’, कृष्णमोहन का लिखा पढ़ना समृद्ध करता है। ऐसी आलोचना, जिस तक बार बार पहुँचने की, उसे नए नए अर्थों में समझने की इच्छा बनी रहती है, जो नई सूझ पैदा करती है। जहाँ हिंदी में समग्र मूल्यांकन के प्रयासों में रचनाकार-सम्बंधित किसी आखिरी निर्णय तक पहुँचने तक अधीरता दिखती है, वहाँ कृष्णमोहन चुनिंदा रचनाओं को अपने मूल्यांकन का केंद्र बनाते हैं। 

उनकी चारों पुस्तकें मुक्तिबोध : स्वप्न और संघर्ष, आधुनिकता और उपनिवेश, कहानी समय और आईनाख़ाना धीरे धीरे आलोचना और भाषा से जुड़े धीर-गम्भीर लोगों के सेल्फ में जगह बना रही है। गालिब की रचनाओं पर उनकी टिप्पणियों की किताब बहुप्रतीक्षित है।।

कृष्णमोहन

कवि केदारनाथ सिंह की एक प्रसिद्ध कविता है, ‘ठण्ड से नहीं मरते शब्द’। इसकी शुरूआती पंक्तियाँ हैं:

“ठण्ड से नहीं मरते शब्द
वे मर जाते हैं साहस की कमी से
कई बार मौसम की नमी से
मर जाते हैं शब्द”

ज़ाहिर है, यहाँ ‘साहस की कमी’, शब्द का प्रयोग करने वालों की विशेषता है, जबकि ‘मौसम की नमी’ स्पष्ट कथन के बजाय दुविधा की सुविधाजनक भाषा के आम चलन का बयान है। जिस तरह नमी सूखे और भीगे, ठण्डे और गर्म के बीच की अवस्था है वैसे ही भाषा में बीच का रास्ता चुनने वालों की ओर इशारा है। बीच का यह रास्ता भी, अक्सर, साहस की कमी की वजह से ही चुना जाता है। इसलिए यहाँ साहस की कमी को ‘शब्द’ की मृत्यु का प्रमुख कारण मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। यह बात बिल्कुल सही है कि किसी भी बाहरी या आंतरिक निषेध के चलते जब किसी शब्द का प्रयोग उसके वास्तविक अर्थ में नहीं होता तो वह अपनी शक्ति खो देता है। भाषा का अविष्कार ही किन्हीं रहस्यों को प्रकट करने की मनुष्य की अदम्य इच्छा के चलते हुआ है। जब इससे किसी सचाई को उजागर करने के बजाय उसे छिपाने का काम लिया जाता है तो भाषा बेजान हो जाती है। यही वह मार्मिक बात थी जिसने इन पंक्तियों को हिंदी कविता में किसी मुहावरे जैसी लोकप्रियता दिलाई। यह कविता अपने शुरूआती अभिप्राय का आगे चलकर कैसे निर्वाह करती है, इसे देखना ज़रूरी है। आगे की पंक्तियां देखें:

“मुझे एक बार
एक ख़ूब लाल
पक्षी जैसा शब्द
मिल गया था गाँव के कछार में
मैं उसे ले आया घर
पर ज्यों ही वह पहुँचा चौखट के पास
उसने मुझे एक बार
एक अजब-सी कातर दृष्टि से देखा
और तोड़ दिया दम”

यहाँ एक ‘शब्द’ के ‘दम तोड़ने’ की घटना का उल्लेख है। निश्चय ही उसने साहस की कमी की वजह से दम तोड़ा होगा। उसकी कातर दृष्टि का कारण भी यही होना चाहिए। उस शब्द का प्रयोग करने वाले लोगों का साहस के साथ रिश्ता ही इस त्रासदी का कारण जान पड़ता है। इस शब्द की पहचान पर ग़ौर करें तो उसके लाल रंग की तरफ़ ध्यान जाता है।

‘लाल’ शब्द का राजनैतिक निहितार्थ वामपंथ के लिए रूढ़ हो चुका है। मूलतः यह लाल झंडे यानी तमाम मज़दूर-किसान संगठनों के झंडे से आया है। यह लाल रंग ऐतिहासिक रूप से मज़दूरों के ख़ून से रंगे हुए झंडे से भी जुड़ा हुआ है। इस तरह ‘लाल’ का निहितार्थ स्पष्ट है। इशारा भारत के वामपंथियों में साहस की कमी की तरफ़ है, जिसके चलते उनके प्रयोग किए हुए शब्द और नारे खोखले और बेजान होते चले जा रहे हैं। अगर यह आलोचना परिवर्तन की पक्षधर शक्तियों की तरफ़ से है तो इसका स्वागत ही किया जा सकता है, लेकिन अगर परिवर्तन के विरोधी वामपंथ की यही आलोचना करते हैं तो इसके मायने अलग होंगे। देखना होगा कि  परिवर्तन के प्रति कवि का अपना नज़रिया क्या है।

कविता में  अपने पक्ष और प्रतिपक्ष के प्रति अपनाया गया रुख़ कवि के भावबोध को जाँचने का संभवतः सबसे विश्वसनीय पैमाना है। इस कविता में शुरूआत की घटना के बाद कविता का वाचक शब्दों से ‘डरने’ लगता है। ख़ासतौर पर अगर कोई ‘चटक’ रंग वाला शब्द उसकी तरफ़ आता है तो वह प्रायः आंख भी मूँद लेता है। यहाँ ‘चटक’ शब्द की लाल रंग से संगति ग़ौरतलब है। बात यहाँ तक बढ़ गई कि वह एक ‘ख़ूबसूरत’ शब्द को पत्थर दे मारता है। फिर धीरे-धीरे उसका डर कम होता है और शब्दों से कहीं मिल जाने पर ‘पूछा-पेखी’ भी हो जाती है।

यहाँ इस डर के अभिप्राय को भी समझते चलें। लाल शब्द की मौत से डरने का जो एकमात्र तर्कसंगत कारण दिखाई पड़ता है वह ‘लाल’ की प्रतिनिधि शक्तियों में साहस की कमी है। इसकी वजह जैसे उनके शब्द असमय काल कवलित हो रहे हैं, वाचक उसमें अपनी भी नियति देख लेता है। यानी वह ख़ुद को वाम का साथी मानता है और वाम की कमजोरियों के चलते ख़ुद को ‘शहीद’ होने से बचाना चाहता है। उसके सामने दो विकल्प थे। अपने विचारों के अनुरूप साहस की पुनर्स्थापना की कोशिश, या फिर मौक़े का फ़ायदा उठाकर अपना अलग रास्ता लेना। उसने दूसरा विकल्प चुना। ‘डरने’ की राह चुनकर वह साहस से कुछ और दूर हो जाता है। फिर वह ‘ख़ूबसूरत’ शब्द को पत्थर मार बैठता है, यानी साहस के साथ-साथ सौंदर्य से भी दूर हो जाता है।

इस बिंदु पर वाचक की पहचान और कवि के भावजगत में उसकी अवस्थिति का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। वाचक कवि के अपने पक्ष का प्रतिनिधि है या विरोधी पक्ष का यह देखना ज़रूरी है, क्योंकि कौन किसकी, और किस वजह से आलोचना करता है, इसी से तय होता है कि वह आलोचना कितनी जायज है। कविता में आगे चलकर वाचक की समझ का जैसा उल्लेख मिलता है उससे पता चलता है कि उसे कवि का समर्थन हासिल है। वह उसके अपने पक्ष का प्रतिनिधि है, प्रतिपक्ष का नहीं। कविता में आगे शब्दों की अनेक विशेषताओं की चर्चा करते हुए वाचक एक मार्मिक बात कहता है:

“जिन्हें हम बचा कर रखते हैं
अपने सबसे भारी
और दुखद क्षणों के लिए
अक्सर वही ठीक मौक़े पर
लगने लगते हैं अश्लील”

किन्ही आगामी काल्पनिक दुखों को व्यक्त करने के लिए सहेजे गए शब्दों का वास्तविक परिस्थितियों में दुख से सामना होने पर बनावटी, आडंबरयुक्त और इसलिए अश्लील हो जाना हमारे अनुभव-जगत का एक ऐसा सच है जिस से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन अभी वह वक्तव्य बाक़ी है जो वाचक को कवि से समीकृत कर देता है:

“अब इसका क्या करूँ
कि जो किसी काम के नहीं होते
ऐसे बदरंग
और कूड़े पर फेंके हुए शब्द
अपनी संकट की घड़ियों में
मुझे लगे हैं सबसे भरोसे के काबिल”

ख़ासा आत्ममुग्ध बयान है। ‘अब इसका क्या करूँ’ का मैनरिज़्म ख़ुद कवि की नज़रों में इस दावे की अहमियत का पता देता है। बहरहाल, इस दावे को कथित तौर पर पुष्ट करने वाली घटना भी अगली ही पंक्तियों में घट जाती है और कविता ख़त्म होती है:

“अभी कल ही की बात है
अँधेरी सड़क पर
मुझे अचानक घेर लिया
पाँच-सात स्वस्थ और सुंदर शब्दों ने
अपनी तो भूल गई सिट्टी-पिट्टी
पसीने से तर मैं कुछ देर खड़ा रहा
उनके सामने अवाक
फिर मैं भागा
अभी मेरा एक पाँव हवा में उठा ही था
कि न जाने कहाँ से
एक ख़ून से लथपथ छोटा-सा शब्द
हाँफता हुआ आया
और बोला—
‘चलो पहुँचा दूँ घर’ “

जैसा कि हम जान चुके हैं, सौंदर्य की अभिव्यक्ति के आग्रह को निभा पाना अब वाचक के बस की बात नहीं रह गई है। इसलिए उसे पलायन करना पड़ता है। लेकिन असली रहस्य ख़ून से लथपथ शब्द में छुपा है। कवि की बात मानें तो यह कूड़े पर फेंका हुआ, बदरंग, और किसी काम का नहीं है। लेकिन वास्तविक तस्वीर कुछ और है। अपनी विषम अवस्था के बावजूद यह लहूलुहान शब्द जिस तरह एक पराजित और भागने को तैयार व्यक्ति को  समर्थन देता है उससे उसके चरित्र का पता चलता है। बहुत संभव है कि वह हमारे समय में जारी न्याय और अन्याय की बीच संघर्ष से लौटा हो। तब फिर कवि के आशय को कैसे समझें। क्या वह यह कहना चाहता है कि उस शब्द को इस्तेमाल करने की ज़िम्मेदारी जिन पर थी उन्होंने उसका परित्याग कर दिया, जिसके चलते उसकी यह हालत हो गई। अगर ऐसा है तो निशाने की जद में एक बार फिर वाम है, जिसके ऊपर समझौतापरस्ती और अपने अंदर की लड़ाकू शक्तियों को अलग-थलग करने का आरोप है। ऐसे में कवि को जुझारू, प्रतिरोधी शक्तियों का हमदर्द मानना ही होगा। यहाँ तक कि यह अभिव्यक्ति परिवर्तनकामी शक्तियों में भी सबसे रैडिकल धाराओं के समर्थन के समतुल्य होगी। कविता में अब तक जो लक्षण दिखे हैं, ये बातें बहुत आश्वस्तकारी तो नहीं लगतीं। अधिक संभावना इसी बात की दिखती है कि वाचक ने उस ख़ून से लथपथ शब्द को दुर्दशाग्रस्त शब्द के एक उदाहरण के बतौर लिया हो, जिसकी सार्थकता उसके काम आना है। इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि इस घायल अवस्था में भी शब्द ही वाचक की मदद करने का प्रस्ताव रखता है, वाचक उसकी मदद करने के बारे में सोचता तक नहीं। केदारनाथ सिंह चीज़ों का मानवीकरण तो करते हैं, लेकिन उनके साथ मनुष्योचित व्यवहार नहीं कर पाते, ‘ऑब्जेक्ट’ को ‘सब्जेक्ट’ में नहीं बदल पाते। मानवीकृत होने के बाद भी वे बस्तुएँ उनके इशारे पर नाचने वाली कठपुतलियाँ ही बनकर रह जाती हैं। यहाँ ‘शब्द’ के साथ ऐसा ही बर्ताव हुआ है।

बहरहाल, देखना यह है कि केदारनाथ सिंह प्रतिरोध की प्रवृत्तियों के प्रति क्या नज़रिया रखते हैं। इस बात को समझने के लिए कवि की एक और कविता ‘ज़िद’ देखते हैं, जिसमें ‘लाल’ के प्रति उसका रुख़ कुछ और स्पष्ट होता है। इस कविता का वाचक ‘मैं’ यह हठ पाल लेता है कि उसके उठकर शहर पार करते ही कँटीली झाड़ियों पर लाल-लाल फूल दिख जाएंगे। आगे वह कहता है:

“वे क्योंकर वहाँ होंगे
मैं नहीं जानता
होंगे तो क्यों होंगे लाल ही
कहना कठिन है
पर ज़िद है तो फिर है
कि वे होंगे
और होंगे तो लाल ही होंगे”

कहना अनावश्यक है कि यहाँ इस तथाकथित ज़िद का इस क़दर अतार्किक दुहराव इसे निरर्थक और बचकाने हठ में तब्दील कर रहा है। वाचक का इस ज़िद से अलगाव भी स्पष्ट है। यह आत्मव्यंग्य न होकर उन लोगों पर व्यंग्य है जो वाचक की नज़र में ऐसी ज़िद करते हैं। ग़ौरतलब है कि कविता का वाचक इस हठधर्मिता को ‘लाल’ के साथ अनिवार्यतः जोड़ देता है। अगर वह किसी और को इस का परिचय देते हुए देखता और ख़ुद को या किसी तीसरे पात्र को इससे अलगाता तो यह कहा जा सकता था कि वह ‘लाल’ की किसी ख़ास प्रवृत्ति की आलोचना कर रहा है, लेकिन ख़ुद की ज़िद के रूप में व्यक्त करके उसने ‘लाल’ पर समग्रता में व्यंग्य किया है। कविता की अंतिम पंक्तियों के सतहीपन से इस व्यंग्य की ग़ैररचनात्मकता उजागर होती है:

“पर अब ज़िद है
मुझे जाना तो होगा ही
और फूल चाहे जिस रंग के भी हों
मेरा ख़याल है मेरे जाते-जाते
हो ही जायेंगे लाल-भभूक!”

‘मेरे जाते ही किसी भी रंग के फूल, सिर्फ़ लाल नहीं, लाल-भभूक हो जाएंगे’, यह ख़याल, जिस पर व्यंग्य किया जा रहा है उसके प्रति पर्याप्त अवमानना से भरा हुआ है। आत्मसमीक्षा तो यह कविता कदापि नहीं है, किसी विरोधी की दमदार आलोचना भी नहीं है, क्योंकि यह जिसकी आलोचना करती है उसके सबसे कमजोर पक्ष का ही मुकाबला कर पाती है। कहने का आशय यह नहीं है कि ऐसी ज़िद पालने वाले लोग नहीं होते, बल्कि यह कि ऐसे लोग अपने अलावा किसी और की नुमाइंदगी नहीं करते। ऐसी अप्रासंगिक हठधर्मिता को हमले का निशाना बनाकर कवि यह साबित करता है कि वह जिसका विरोध कर रहा है उसकी बराबरी में नहीं पहुंच पा रहा है। बहरहाल, अगर इस ज़िद को अक्षरशः सत्य न मानें तो ‘लाल’ के ऊपर सारी तोहमत बस यह है कि वे अपने विचारों के अनुरूप दुनिया को बदलना चाहते हैं और उनमें से कुछ लोग यह भरोसा करते हैं कि यह बदलाव जल्द ही हो जाएगा। अपने विचारों में भरोसा करना और उसका आग्रह करना कोई ऐसी बात भी नहीं जिस का मज़ाक उड़ाया जाए। लेकिन सुविधाभोगी और अवसरवादी जमातों को इस आग्रह से बड़ी परेशानी होती है। वे परिवर्तनकामी शक्तियों की आकुलता और उनके आवेग को छिछले मज़ाक का विषय बनाते हैं। इस कविता में कवि केदारनाथ सिंह इसी जमात के दृष्टिकोण को व्यक्त करते जान पड़ते हैं।

यह मुद्दा साहस और शब्द के प्रति कवि के सरोकार से सीधे जुड़ा है, इसलिए इसकी थोड़ी और परीक्षा ज़रूरी है। देखना यह चाहिए कि बदलाव के प्रति उसका नज़रिया क्या है। वह बदलाव का समर्थक है या यथास्थिति का पोषक है। इसकी जांच किए बिना महज़ ‘लाल’ की आलोचना करने के कारण उसके सरोकारों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। कवि की एक अन्य कविता ‘कूड़ा’ कुछ इस तरह शुरू होती है:

“जबकि सड़कों पर
एक आहट थी
और हवा में
मौसम को बदलने की
हल्की-सी गरमाहट
वह व्यग्र
और उदग्र
क्रोध से थर-थर काँपता हुआ
फ़र्श पर खड़ा था
और कमरे की चीज़ों पर
मेघों की तरह
बरस रहा था”

मौसम के बदलने की गरमाहट में ‘व्यग्र और उदग्र’ यह व्यक्ति आगे चलकर कमरे में लगे शीशे तोड़ डालता है, फूलदान को पटक देता है, और कुर्सियों को बाहर फेंकने लगता है। इसके बाद आई कवि की टिप्पणी देखने योग्य है:

“मुझे लगा
अब वह मानेगा नहीं
जहां तक पहुँचेगा उसका हाथ
वह दुनिया की
एक-एक क़ीमती और चमकती हुई चीज़ को तोड़ता चला जाएगा”

यहाँ आकर कविता एक तरीक़े से पूरी हो जाती है। कवि का आशय व्यक्त हो जाता है, बल्कि कुछ ज़्यादा ही खुल जाता है। परिवर्तन के क्षणों में क्रमिक परिवर्तन और गुणात्मक परिवर्तन की धाराएँ सक्रिय होती हैं। पहली बदलाव की प्रक्रिया को आहिस्ता चलाना चाहती है, दूसरी तेज़ रफ़्तार में। ये दोनों परस्पर भी एक दूसरे की आलोचना करती हैं, लेकिन ‘कूड़ा’ जैसी कविता में कवि का दृष्टिकोण इनसे अलग एक अन्य प्रवृत्ति के नज़दीक है जो हर तरह के परिवर्तन की खिल्ली उड़ाती है। ख़ास बात यह है कि यह प्रवृत्ति परिवर्तन की विरोधी बन कर नहीं बल्कि समर्थक बन कर ऐसा करती है। वह परिवर्तन को ‘तर्कसंगत, मानवीय और यथार्थवादी’ बनाने का स्वांग भरती है। इस कविता में अलग से कोई वाचक नहीं है, इसलिए मानना होगा के कवि का दृष्टिकोण इसमें कुछ अधिक प्रत्यक्ष तौर पर प्रकट हुआ है। परिवर्तन की धारा पर कठोर टिप्पणी करने के बाद उसकी अपनी बदलाव विरोधी पहचान के उजागर हो जाने का संकट खड़ा हो जाता है। इस पहचान पर लीपापोती करने के लिए आगे कुछ पंक्तियां और आती हैं:

“मैं सोचने लगा
आख़िर क्या बात है
क्या वह डर गया है
या दुनिया में ही
इतना अधिक कूड़ा
भर गया है”

यहाँ एक बार फिर ‘डर’ को लाया गया है। ऊपर उल्लिखित कविता में यह परिवर्तनकामी शक्तियों की कथित साहसहीनता से उपजा था। लेकिन यहाँ बदलाव की घड़ी में इस ‘व्यग्र और उदग्र’ व्यक्ति की तोड़फोड़ को उसके किसी डर का नतीजा नहीं माना जा सकता। ख़ास तौर पर तब जब ख़ुद कवि उसे दुनिया की हर क़ीमती और चमकदार चीज़ को तोड़ देने वाला घोषित कर चुका है। अगर किसी को डर की संभावना है तो वह कवि को ही है क्योंकि बदलाव की शक्तियाँ उसकी सुखद दुनिया में ख़लल डाल सकती हैं। इसी वजह से वह उस अकेले व्यक्ति की तुलना ‘मेघों’ से करता है, जबकि इसके लिए अकेला ‘मेघ’ ही पर्याप्त और उचित होता। उस व्यक्ति में डर की कल्पना करके कवि ने अपनी इन टिप्पणियों की ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश की है। यह दिखाने का प्रयास है कि सब कुछ ठीकठाक रहा तो कवि की सहानुभूति के द्वार उसके लिए भी खुल सकते हैं। इससे थोड़ा बहुत भ्रम उपज सकता था, लेकिन अगली ही पंक्ति में दुनिया में कूड़ा भरा होने की बात कहकर उसने अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी। दुनिया की ‘क़ीमती और चमकदार चीज़ों’ को कूड़ा कहना कितना भी अतिवादी हो, असम्भव नहीं है; लेकिन शीशा, फूलदान और कुर्सी को कूड़ा नहीं कहा जा सकता। कवि का अभिप्राय स्पष्ट है। उसकी समूची प्रतिक्रिया परिवर्तन की प्रक्रिया के विरुद्ध, चिढ़ से भरी हुई है। इस प्रकार दो नावों की सवारी का यह प्रयोग सफल नहीं होता और यथास्थितिवाद के प्रति कवि की पक्षधरता उजागर हो जाती है।

केदारनाथ सिंह की कविताओं में साहस, संघर्ष, खून, हिंसा, हत्या वगैरह अनुपस्थित नहीं हैं, लेकिन इन चीज़ों के प्रति उनकी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया अलग होती है। ‘धब्बा’ शीर्षक कविता की शुरुआत देखें:

“सुबह से पड़ा था
सड़क के बीचोबीच
लाल दमकता हुआ ख़ून का धब्बा
अब वह सूखकर
लाल से भूरा
और भूरे से धीरे-धीरे काला होता जा रहा था”

आगे यह ज़िक्र आता है कि उधर से गुज़रने वाले लोग धब्बे से आंख बचाकर ‘दाएं’ या ‘बाएं’ से निकल जाते हैं और धब्बा ‘हाथ उठाए हुए’ सड़क पर पड़ा रह जाता है। जब दिन भर कोई नहीं आता तो शाम को ‘झूमकर झमाझम बारिश’ आ जाती है, जो पहले सहला कर फिर गले लगा कर धब्बे को रगड़-रगड़कर धोती है और धब्बा साफ़ हो जाता है। इस घटनाक्रम पर कवि की प्रतिक्रिया कविता की अंतिम पंक्तियों में देखें:

“इस तरह क़िस्सा ख़त्म हुआ
ख़ून के धब्बे का
अब बारिश ख़ुश कि उसने धो डाला धब्बे को
धब्बा ख़ुश कि जैसे वह कभी सड़क पर
था ही नहीं!”

सड़क पर पड़ा हुआ लहू का यह धब्बा किसका था, कौन मारा गया था, इसकी परवाह किए बिना कवि ने उसकी सफ़ाई का उत्सव मना डाला मानो वह सड़क पर नहीं उसकी आत्मा पर पड़ा हुआ धब्बा हो। खून के बहने से पड़े हुए धब्बे दुनिया के हर हिस्से और हर युग में कविता के बेहद संवेदनशील विषय रहे हैं। लेडी मैकबेथ के हाथों पर पड़े ख़ून के धब्बों को अरब का सारा इत्र भी साफ़ नहीं कर पा रहा था। फ़ैज़ ने गहरे अफ़सोस के साथ कहा था— ‘ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद।’ जबकि हमारे कवि को ख़ून के धब्बे के वजूद को मिटा देने की इतनी हड़बड़ी है कि जो काम ख़ून बहाने वालों को ख़ुश कर सकता है, उसे वह धब्बे की ख़ुशी का कारण बताने में पलक तक नहीं झँपकाता। बारिश आती है, वह भी झमाझम, गले लगाकर, पुचकारकर बड़े प्यार से धब्बे को धुल डालती है, और धब्बा ख़ुश हो जाता है। यह जो गुनाह के हर साक्ष्य को मिटा देने की प्रक्रिया का आदर्शीकरण है, यह कवि केदारनाथ सिंह की कविता की एक प्रमुख विशेषता है।

इस बिंदु तक आकर कविता का कोई संवेदनशील पाठक विचलित हो सकता है। केदारनाथ सिंह संघर्ष के कवि तो कभी नहीं माने गए लेकिन सौंदर्य और संवेदना से उनके जुड़ाव कि आमतौर पर ताईद की गई है। लेकिन यहां पूरा क़िस्सा ही उलटता दिखाई पड़ता है। उनके संवेदनात्मक स्रोतों की छानबीन के क्रम में ‘एक कविता–निराला को याद करते हुए’ शीर्षक कविता की इन मशहूर पंक्तियों की ओर ध्यान जाता है, जिसमें कवि अपने बुनियादी सरोकार का उल्लेख करता-सा प्रतीत होता है:

“उठता हाहाकार जिधर है
उसी तरफ़ अपना भी घर है”

इसके बाद की सिर्फ़ दो पंक्तियां और देख लें तो कवि के स्वभाव का अच्छा परिचय मिल जाता है:

“ख़ुश हूँ–आती है रह-रहकर
जीने की सुगंध बह-बहकर”

‘हाहाकार’ की आवाज़ भी हवा के साथ बहकर ही आती है। अब अगर वह ख़ुद ‘जीने की सुगंध’ है जो ख़ुशी का कारण है तो मानना होगा कि कवि को हाहाकार शब्द के अर्थ का ज्ञान नहीं है। अगर ‘हाहाकार’ के साथ कोई और चीज़ ‘बह-बहकर’ आती है और ख़ुशी का कारण बनती है तो भी वह कविता में ‘हाहाकार’ की वेदना और संताप का सोख लेती है। कुल मिलाकर कवि की विडंबना यही जान पड़ती है कि वह अपने को आम लोगों  के दुख के साथ जुड़ा हुआ दिखाना भी चाहता है, और जैसे ही ऐसा कोई संकेत कर पाता है तुरंत घबराकर उस दुख के लिए ज़िम्मेदार शक्तियों की हां में हां मिलाने लगता है। ऐसी ही एक अन्य कविता ‘काली मिट्टी’ है जिसमें कवि की ज्ञानात्मक संवेदना का अच्छा परिचय मिलता है। कविता कुछ इस प्रकार हैं:

“काली मिट्टी काले घर
दिन भर बैठे-ठाले घर

काली नदिया काला धन
सूख रहे हैं सारे बन

काला सूरज काले हाथ
झुके हुए हैं सारे माथ

काली बहसें काला न्याय
ख़ाली मेज़ पी रही चाय

काले अक्षर काली रात
कौन करे अब किससे बात

काली जनता काला क्रोध
काला काला है युगबोध”

कविता के आरम्भ में आई ‘काली मिट्टी’ का कालापन कोई मूल्यबोधक विशेषता नहीं है। इसके बाद आए ‘काले घर’ के बैठे-ठालेपन में सुकून का एहसास है। ‘काला सूरज’ ज़रूर एक साहसिक बिम्ब है जो सत्ता के विरुद्ध जाता है, लेकिन तुरन्त ही कवि को यह बताना ज़रूरी लगता है कि सभी सिर इस सत्ता के आगे झुके हुए हैं। यह सुविधापरस्त यथास्थितिवाद का सबसे प्रचलित तर्क है कि सभी सत्ता के आगे नतमस्तक हैं, कोई विरोध नहीं करता, इसलिए परिवर्तन की आशा करना व्यर्थ है। इससे पहले ‘धब्बा’ शीर्षक कविता में भी कवि ने बताया था कि धब्बा दिन भर हाथ उठाए पड़ा रहा और लोग दाएँ बाएँ से गुज़रते रहे, उसके पास कोई नहीं आया तो बारिश आई। रोज़मर्रा के जीवन में आम लोगों द्वारा विभिन्न तरीक़ों से किये जाने वाले प्रतिरोध और कुर्बानियों को नकारने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। बहुत से भलेमानस इसके प्रभाव में रहते हैं। वे अंत तक यह नहीं समझ पाते कि असहमति और प्रतिरोध का पक्षधर लगने वाला यह विचार दरअसल जनता के प्रतिरोध को नकारता है, और सत्ता की अपरिवर्तनीयता का स्टीरियोटाइप बनाता है। ‘काली बहसें’ और ‘काला न्याय’ के साथ ‘काली कोट’ लिख दें तो भी उससे व्यवस्था की कोई सचाई  नहीं खुलती। ‘काले अक्षर’ और ‘काली रात’ का मामला भी मिलाजुला है। यूँ तो अक्षरों का और रात का काला होना बिल्कुल सामान्य बात है लेकिन मुहावरे में सुनहरे अक्षरों की उपस्थिति और दिशाहीनता के रूपक अंधकार की गहराई के कारण आई कालिमा के चलते ये दोनों भी कालेपन को एक अवगुण की तरह ही धारण करते हैं। वाकचातुर्य के इस प्रदर्शन के अंत में जो पंक्तियां हैं वहां जनता और क्रोध का काला होना भी असामान्य नहीं है लेकिन ‘युगबोध’ का काला होना वाकई ग़ौरतलब है। यह कालापन, अपने समय की सचाई पर कोलतार पोतने के अलावा और किसी काम नहीं आने का। कवि ने काले रंग को सामान्य के साथ-साथ नकारात्मक विशेषण के रूप में इस्तेमाल किया ताकि अंत में युगबोध को काला कहने पर एक बच निकलने की राह खुली रहे। दूसरे शब्दों में कवि ने न्याय और अन्याय के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की और नतीजा वही हुआ जो ऐसी स्थिति में हो सकता था। अन्याय को संदेह का लाभ मिला।

यह ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए कि किसी कविसुलभ भोलेपन में केदारनाथ सिंह से ये कविताएं लिख गई हैं, और उनका आशय शायद ये सब न रहा हो। यह उनकी विचारशीलता को कम करके आँकना होगा। दरअसल, उन्होंने कवि के रूप में सचेत रूप से अपने लिए इसी भूमिका का चुनाव किया था और इसमें पर्याप्त खरे भी उतरे।उनकी एक छोटी सी कविता है ‘दुख-1’ देखें:

“दुख!
वह तो है  
वह तो है ही 
पिछली रात वही 
ठांय-ठांय
बजता रहा मेरे सीने में 
अगली सुबह उसीको 
एक आदमी के 
भव्य ललाट पर 
चमकते हुए देखा 
वह तो है 
वह तो है ही
शिकायत क्या करूं?”

आशय यह कि सबके अपने-अपने दुख हैं। यह एक अपरिहार्य स्थिति है। इस पर ज़्यादा हायतौबा मचाना व्यर्थ है।

दूसरे शब्दों में, यह सीने में ‘ठांय ठांय बजने और भव्य ललाट पर चमकने वाला’ जो दुख है वह तो है ही। और जो है ही उसकी शिकायत क्या करना! नहीं होता तो कोई बात भी थी। मुश्किल यह है कि कवि के शिकायत न करने के बावजूद लोग दुखी होते हैं और शिकायत भी करते हैं। इस चुनौती का सामना करने के लिए कवि ‘दुख तो है ही’ से ‘दुख तो है ही नहीं’ तक की यात्रा करता है। देखें अगली कविता जिसका शीर्षक है, ‘दुख-2’:

दुख का कोई पहाड़ नहीं होता 
कोई समुद्र नहीं होता दुख का 
सिर्फ हाथ होते हैं 
छोटे-छोटे 
जो दिन भर रस्सी की तरह 
बुनते रहते हैं दुख को 

इस तरह छोटे-छोटे दुखों की 
एक महान चारपाई 
न जाने कब से बुनी जा रही है 
मेरे शहर में 
और तुम्हारे शहर में 

जब शाम होती है 
तो बुनते-बुनते थक जाते हैं हाथ 
और फिर सो जाते हैं 
उसी अछोर-अनन्त चारपाई पर 
जो आज तक 
बुनी नहीं गई”

कवि गोरख पांडेय की ‘आँखें देखकर’ शीर्षक एक छोटी सी कविता है:

“ये आँखें हैं तुम्हारी 
तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर 
इस दुनिया को जितनी जल्दी हो 
बदल देना चाहिए” 

दुख की विशाल और संगठित राशि का होना यथास्थिति को बदलने की प्रेरणा देता है, जबकि दुख की उपस्थिति से ध्यान हटाने की कोई भी कोशिश बदलाव की आवश्यकता को कम करती है। इसीलिए बुद्ध ने प्रथम आर्यसत्य दुख के होने को माना था। दुख को मानकर आप उसके कारणों की तह में जा सकते हैं और फिर उन्हें बदल सकते हैं। कबीर ने भी कहा था ‘दुखिया दास कबीर है जागे और रोए’। मुक्तिबोध ने इसी समस्या से जूझते हुए सत-चित-वेदना का नया समीकरण प्रस्तुत किया था। लेकिन केदारनाथ सिंह के लिए दुख न तो किसी के सिर पर पहाड़ की तरह टूटता है, न कोई इसके समुन्दर में डूबता है, यह तो बस सीने में ठांय ठांय बजता है, या फिर भव्य ललाट पर चमकता है। आशय स्पष्ट है, यह फ़क़त महसूस करने की चीज़ है, अपने आप में इसका कोई ख़ास वजूद नहीं है। जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। केदारनाथ सिंह की यह पंक्ति अज्ञेय के कथन ‘दुख सबको माँजता है’ की परंपरा में, उसके आगे की कड़ी है।

आधुनिक भौतिकवाद का मुकाबला करने के लिए उत्तरआधुनिकतावादी ज्ञानमीमांसा ने सत्य की अवधारणा को नकार दिया था और उसकी जगह आख्यान'(नैरेटिव) को दे दिया था। आशय यह कि कोई भी चीज़ वस्तुगत  रूप से सत्य नहीं हो सकती। हर व्यक्ति अपने दृष्टिकोण से किसी घटना को प्रकट करता है। यानी यह उसका आख्यान होता है, उसके द्वारा प्रस्तुत कथा। उसका विरोधी भी अपने नज़रिए से उसी घटना का कोई वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत कर सकता है। ये दोनों आख्यान समान रूप से वैध होते हैं। सत्य की अवधारणा दमनकारी है क्योंकि यह सत्ताधारी के हाथ का औजार बन जाती है और हाशिये की शक्तियों और उनके नज़रियों का दमन कर देती है। इस तरह यह विचारधारा व्यवहार में पीड़ित और उत्पीड़क दोनों के नज़रियों को समान रूप से वैध क़रार देकर अपनी पक्षधरता स्पष्ट कर देती है। उत्तरआधुनिक ज्ञानमीमांसा में सत्य की हैसियत आख्यान की होती है और उस आख्यान को भी तन्हा होना होता है। दूसरे आख्यानों से जुड़कर कोई विकल्प देने के बारे में उसे सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करते ही वे ‘महाख्यान’ (ग्रैंडनैरेटिव) की तरफ बढ़ने लगते हैं। महाख्यान अपने चरित्र में ही दमनकारी होता है। पूंजीवादी जनतंत्र एक महाख्यान है जो दमनकारी है। उसका मुकाबला करने के लिए जो समाजवादी महाख्यान आया वह और भी दमनकारी साबित हुआ। इसलिए छोटे-छोटे तबको को अपनी पहचान बनाए रखते हुए इस व्यवस्था में राहत पाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। लेकिन उन्हें दूसरी अस्मिताओं के साथ जुड़कर इस व्यवस्था का विकल्प बनने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे फिर एक नया महाख्यान अस्तित्व में आ सकता है जो पुराने वाले से भी अधिक दमनकारी हो सकता है। इस प्रकार इस दर्शन की व्यावहारिक परिणति यथास्थिति के पक्ष में जाती है। साम्राज्यवाद अकेला महाख्यान बना रहता है, और प्रतिरोध की शक्तियां अलग-अलग, छोटे-छोटे संघर्षों के माध्यम से जनता को थोड़ी बहुत राहत दिला कर सेफ़्टी वाल्व की भूमिका बख़ूबी निभाती रहती हैं।

केदारनाथ सिंह की यह कविता इसी विचार से प्रेरित है। छोटे-छोटे हाथ जो दिन भर दुख को बुनते रहते हैं और एक ‘महान’ चारपाई हर शहर में बुनने लगते हैं। यहाँ बुनने की क्रिया पर ग़ौर करें। यह ‘देखने’ और ‘कहने’ के बजाय ‘नया रचने’ के समतुल्य है। दरअसल, यह वैकल्पिक महाख्यान को खड़ा करने की प्रक्रिया का ही काव्यान्तरण है। जनता के दुखों से पैदा हुए असंतोष को चैनेलाइज़ करके प्रतिरोधी शक्तियां मौजूदा व्यवस्था के विकल्प का एक ढाँचा हर शहर हर गांव में खड़ा करने की कोशिश करती हैं। परिवर्तन का यह वैकल्पिक स्वप्न अनिवार्यतः समग्रतामूलक होता है। जागृति और प्रतिरोध के ‘महाख्यान’ के रूपक के बतौर चारपाई, जो सिर्फ़ सोने के काम आती है, का प्रयोग भी अर्थपूर्ण है। कवि ने दुख की व्यापकता और सघनता के प्रतीकों समुद्र और पहाड़ को नकार कर उसे अकेले और निहत्थे व्यक्ति के दुख में बदलने की कोशिश की। छोटे-छोटे हाथ इन्हीं छोटे-छोटे दुखों को बुनकर ‘महान’ संरचना में बदलने की कोशिश करते हैं। अब ज़ाहिर है, जो चीज़ है ही नहीं, उसका प्रतिफलन संभव नहीं। इसलिए वह महान चारपाई नहीं बुनी जा पाती। चारपाई का बिम्ब आया ही इसलिए है कि वो बुनने वालों के आराम का साधन बन सके, अन्यथा बुनने के लिए कबीर की चादर से लेकर ख़ुद केदारनाथ सिंह के स्वेटर ( ‘एक दिन हँसी-हँसी मे’ शीर्षक कविता ) तक कोई भी चीज़ हो सकती थी। इस प्रकार भारत में परिवर्तन के किसी सर्वांगीण और मूलगामी अभियान का परवान न चढ़ना असंतोष का नहीं, राहत का विषय बनता है। लगे हाथ इस कोशिश में लगे लोगों की मंशा भी इस आरोप के घेरे में आ जाती है कि अपने आराम के लिए वे इस चारपाई का उपयोग किये ले रहे हैं।

तत्वज्ञान कोई कुछ भी बघारे, लेकिन परिवर्तन का झूठा-सच्चा तरफ़दार बने बिना किसी कवि का काम नहीं चल सकता। केदारनाथ सिंह के सामने भी यह स्पष्ट करने की समस्या आती है कि आख़िर वे किसके पक्ष में हैं। तब वे ख़ुद को किसानों के पक्ष में बताते हैं। उनकी एक कविता ‘रास्ता’ है जिसमें कविता का वाचक एक किसान से रास्ता पूछता है और जवाब में किसान एक घास चरती काली गाय की तरफ़ ढेला उछाल देता है। शाम का समय है। गाय चलने लगती है, सम्भवतः गाँव की तरफ़। घास में उसके खुरों के निशान देखकर वाचक की समझ में आ जाता है कि यही रास्ता है। कुछ पंक्तियाँ देखें:

“अब दृश्य बिल्कुल साफ़ था 
अब हमारे सामने 
गाय थी 
किसान था 
रास्ता था 
सिर्फ हमी भूल गए थे 
जाना किधर है।” 

ज़ाहिर है, यह रास्ता गांव और किसान की ओर जाता है। लेकिन सही सरोकारों के अभाव में कवि इस रास्ते को भी किसी फ़ार्मूले की तरह इस्तेमाल कर सकता है, जैसा कि ‘बोझे’ नामक कविता में होता है। कविता में प्रसंग फ़सल के कट जाने के बाद बोझे बांधने और उन्हें उठाकर किसी सुरक्षित जगह पहुंचाने का है। हवा में चील उड़ रही है, आसपास तीन-चार मेमने चर रहे हैं। कुछ हाथ ‘झूल रहे हैं बगल में’ जबकि ‘कुछ हाथ ताबड़तोड़ बाँध रहे हैं बोझे’। यहाँ मालिक और मज़दूर का फ़र्क़ दिखाकर कवि ने अपनी ‘वर्गचेतना’ का परिचय दे दिया है। आख़िरकार बोझे बँध जाते हैं। कुछ लोग अपने बोझे उठा कर चल देते हैं जबकि कुछ लोग इंतज़ार में खड़े रहते हैं। वाचक उन्हें देखकर परेशान हो जाता है क्योंकि ‘बोझे अब धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं।’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं:

“सोचता हूँ
जब सारे बोझे उठ जायेंगे 
जब किसी के पास 
ढोने के लिए नहीं कुछ होगा 
सिवा अपने सिर के 
तो कितनी ख़ाली-ख़ाली
लगेगी दुनिया 
कितने सूने-सूने दिखेंगे सिर”

ज़ाहिर है, कवि यहाँ अपनी ‘वर्गचेतना’ के अनुरूप श्रम की महत्ता में अपना विश्वास व्यक्त करना चाहता है, लेकिन वास्तविक सरोकारों के अभाव में उसकी अभिव्यक्ति हास्यास्पद होकर रह जाती है। बोझे ढोने वाले मज़दूर हैं जो मालिक का अनाज उसके खलिहान या भंडार में पहुंचाएंगे और अपनी मज़दूरी का बोझा लेकर घर जाएंगे। यह काम न तो उनके लिए आनंददायक है न इसकी उचित क़ीमत ही उन्हें मिलने वाली है। इसके बावजूद यह कार्य-व्यापार चल रहा है, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन कवि इसका आदर्शीकरण करता है। उसे बोझ के बिना सिर सूने मालूम पड़ते हैं। मज़दूर के सिर का बोझ बना रहना चाहिये। वह अगर कला, साहित्य, संगीत में रुचि लेने लगेगा तो बोझा कौन ढोएगा। इन सब तुच्छ मानसिक कामों के लिए दुनिया में मध्यवर्गीय निठल्लों की कमी है क्या!

कहना अनावश्यक है कि यह चिंतन उसी तबक़े का हो सकता है जो सिर्फ़ अपने सिर को ही ढोता है, और जिसने जीवन में कभी बोझे ढोने का सुख प्राप्त नहीं किया। अगर इस बात को दूरगामी अभिप्रायों में देखें तो किसानी के हाड़तोड़ श्रम से निजात मिलने की किसी संभावना का स्वागत करने के बजाय उस श्रम का आदर्शीकरण करके केदारनाथ सिंह इस कविता से लगभग पचास साल पहले लिखी गई प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ के किसान हल्कू से भी पीछे चले जाते हैं। इससे पता चलता है कि अगर आपकी निष्ठा सच्ची नहीं है, तो गांव और किसान का रास्ता पकड़ने से भी किसी का कोई भला नहीं होता।

नोट: इस लेख में चर्चित सभी कविताएँ केदारनाथ सिंह के संग्रह “अकाल में सारस” (1988, राजकमल प्रकाशन) से ली गई हैं। संग्रह पर दी सूचना के मुताबिक़ इन कविताओं का रचनाकाल 1983–1987 है।

 

2 COMMENTS

  1. सचमुच कृष्णमोहन को पढ़ना आलोचना कर्म का शऊर सीखना है। किसी रचना में प्रवेश का विनम्र कौशल और रचना के भीतरी तत्व के साथ जिरह की जिद उन्हें अलग ऊँचाई देती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि वे किसी रचनाकार की कमजोर रचनाओं के आधार पर अपनी राय नहीं बनाते बल्कि इसके लिए वे सबसे ताकतवर रचनाओं का चुनाव करते हैं और चुपचाप अपना काम करते हैं। वे उन गिने-चुने आलोचकों में से हैं जिन्हें पढ़ते हुए आलोचना के प्रति वह भरोसा पुन: जागता है जो न जाने कब से गुम सा है। यहाँ वे केदारनाथ सिंह की कविताओं का जो पाठ प्रस्तुत करते हैं वह पूरी तरह से तार्किक और विश्वसनीय है। खुशी की बात यह भी है कि वे केदारनाथ सिंह के कद के प्रति किसी सम्मोहन से पूरी तरह से मुक्त हैं अन्यथा बड़े रचनाकारों पर लिखते हुए यह सम्मोहन कई बार अनायास ही आलोचकों पर सवारी गाँठने लगता है।

  2. बहुत शानदार लेख।
    केदारनाथ जी को अबके जब पढ़ूँगा तब इस लेख के संदर्भ को ध्यान में रख के पढ़ूँगा!!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here