खलनायक: पिता के सुनियोजित बेदर्द निर्वासन की गंभीर कथा

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शशिभूषण/

‘खलनायक’ मध्यवर्गीय खुशहाल परिवार में पिता के सुनियोजित बेदर्द निर्वासन की गंभीर कथा है।

यह अपने यथार्थपरक प्रभाव में आज की कहानी है भले प्रकाशित दशकों पूर्व हुई। कहानी शिक्षक रहे पिता, नौकरीशुदा बेटे, कम पढ़ी-लिखी बहू, बच्चों, पड़ोस को केंद्र में रख कर सूक्ष्म दृष्टि, तीव्र भावबोध, तटस्थ वर्णन और पारिवारिक जीवन की बारीकियों के ताने-बाने में कुशलता से बुनी गयी है।

बेटा चाहता है कि पत्नी बर्दाश्त करते हुए उसके बुजुर्ग पिता के साथ सामंजस्य बिठाकर चले। जब पत्नी की शिकायत उसे लाजवाब कर देती है तब भी वह पत्नी को भावनात्मक रूप से सहमत करना चाहता है। वह समझाते हुए कहता है- “जानती हो, बाबूजी तुम्हें खुद पसंद करके लाये हैं- तुम्हें तक़लीफ़ देने की बात वे कैसे सोच सकते हैं।“ पत्नी के पास निरुत्तर कर देने वाला जवाब तैयार है- “जानती हूँ, और यह भी जानती हूँ कि मैं तुम्हारी पसंद नहीं हूँ।“

बेटा पिता से गहरे असंतुष्ट है। पिता उसे शिक्षा-दीक्षा के बल पर वह बनाना चाहते थे जो वे नहीं बन सके। इस संबंध में वे पूर्णत: सामंती हैं- पिता ने सारी उम्र स्कूल मास्टरी की थी, पर वे चाहते थे- वह(बेटा) खूब पढ़े। वे जो चाहते थे- उसे बेंत की भाषा में व्यक्त करते थे। बेटे का एक हमेशा दुखता हुआ भीतरी घाव भी है। वह मधु नाम की जिस लड़की से प्रेम करता था, उससे शादी करना चाहता था, जिसके साथ जोखिम उठाकर भागकर शादी कर लेता तो शायद बेहतर होता। उससे पिता के कारण शादी न कर सका।

पिता ने उसके(बेटे) लिए अपनी पसंद की लड़की चुनी। जिसके साथ अब वे असह्य रुप में रहने को विवश हैं। परिणाम जानते हुए भी बेटे को ताकीद करते रहते हैं कि पत्नी को समझाओ। लेकिन बहू उनकी आदतों से बेहद तंग है। वे बाहर खड़े-खड़े पेशाब करते हैं जबकि घर में दो-दो बाथरूम हैं। बच्चों को पढ़ाई से उठाकर सिगरेट लेने भेज देते हैं। भरी सड़क में घुमाने निकल जाते हैं। ट्रैफिक की परवाह किए बिना बच्चों को छोड़कर किसी से भी गप लड़ाने लगते हैं।

बेटे के लिए भी पिता का व्यवहार अशोभनीय औऱ नाकाबिले बर्दाश्त हो चला है। वे बुढ़ापे में प्रेम में पड़ गये हैं। उनका यह व्यवहार किसी रोज़ समाज में प्रकट हुआ तो शर्मिंदगी की कल्पना ही की जा सकती है।

वे बुढ़ापे में प्रेम में पड़ गये हैं। उनका यह व्यवहार किसी रोज़ समाज में प्रकट हुआ तो शर्मिंदगी की कल्पना ही की जा सकती है

एक शाम उसने उन दोनों को हँसते देखा। वह दफ्तर से लौट रहा था औऱ मोड़ पर पुलिया पर बैठे वे दोनों एक-दूसरे का मुँह जोहते हँस रहे थे। उनकी आँखों में मोह की तरलता थी। पृष्ठभूमि  में नाला था और उसके ठहरे हुए पानी से बदबू का भभका उठ रहा था। लेकिन उनकी तन्मयता अबाधित गति से बह रही थी। इसके बाद बेटे के लिए पिता घर में अस्वीकार्य से हो गये।

पत्नी की सहन शक्ति अधिकतम स्तर तक पहुँच चुकी थी- “देखो, बहुत दिन हो गये हैं, यह सब झेलते, मैं बहुत पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, तुम्हारी रुचि के अनुकूल नहीं हूँ, तो क्या अपने बच्चों का भला-बुरा सोचने का हक़ भी नहीं है ? तुम तो सब देखकर भी कुछ नहीं करते, लेकिन मैं आज अंतिम फैसला दे रही हूँ, इस घर में या ये रहेंगे या मैं।“

भीरु बेटा मानो बलपूर्वक इसी निर्णायक क्षण के इंतज़ार में था। यद्यपि पहले वह कहता था- “कहाँ भेज दूँ इन्हें, आख़िर पिता हैं मेरे, इसे झुठला दूँ, ऐसा विकल्प तो नहीं है मेरे पास।“  लेकिन पिता के प्रेम प्रसंग से अन्तत: वह पत्नी की तरफ़ हो गया। उसने पिता जी की मर्ज़ी के खिलाफ़ उनकी ना नुकुर के बावजूद फैसला सुना दिया – आप कुछ दिन के लिए चाचा जी के यहाँ चले जाइए। मेरे पास छोड़ने जाने का समय नहीं है। नौकर आपको छोड़ आयेगा। वहाँ अधिक दिन नहीं रहना पड़ेगा आपको। जल्द बुलवा लूँगा।

कहानी का अंत होता है ट्रेन में बैठे पिता के एक थप्पड़ से जो उन्होंने सच में नहीं मारा लेकिन बेटे को भरपूर पड़ा। पिता ने टूटे कमानी वाले चश्मे से झाँकती आँखों से केवल इतना ही कहा था- “कोई आता–जाता हो, तो एक नया चश्मा बनवा कर भेज देना।“

‘खलनायक’ सधी हुई, ब्यंजक औऱ प्रभान्विति में बेजोड़  कहानी है। इसमें एक भी वाक्य अतिरिक्त या संवाद भर्ती का नहीं लगता। इसकी व्याप्ति लंबी कहानी सरीखी है। कहानी के भीतर तीन प्रेम कहानियों की अंतर्धारा है। पहला असफल प्रेम बेटे का जिसे पिता ने उसकी शादी करके मार दिया। दूसरा प्रेम पिता का जो वृद्धावस्था का है। उसे बेटे ने उनके निर्वासन से मार दिया। तीसरा प्रेम कदाचित बहू का है जो पति के प्रति एकतरफ़ा है और यथार्थ की आँच में क्रूर होकर रोज़ रोज़ मर रहा है। कहानी का शीर्षक इन्हीं प्रेम के परिदृश्य में प्रकाशित होता है।

‘खलनायक’ एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें प्रेम के विरुद्ध पूरी समाजिक संरचना अपनी जर्जर बर्बरता के साथ उजागर होती है। निर्वासन कहानी का संदेश है। इस कहानी में समय समाज और ऐसा प्रेम व्यंजित है जो इस हद तक अपूर्ण रहता है कि फौरी सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए भी सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।

कहानी ‘खलनायक’ अचला शर्मा की परिपक्व कथाकार दृष्टि औऱ  कथा कौशल के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण कहानी है। भाषा औऱ युगबोध पर कहानीकार की पकड़ अचूक है। अवसाद हो, अन्तर्द्वंद्व हो या तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी विनोद कहानीकार का चित्रण मर्मभेदी है। व्यक्ति का निर्वासन ही हमारे समय का खलनायक है।

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वनमाली सृजनपीठ द्वारा संपादित विशाल कहानी संग्रह ‘कथादेश’ में प्रकाशित टिपण्णी 

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शशिभूषण

फटा पैंट और एक दिन का प्रेम’ फेम शशिभूषण बेहतरीन कथाकार हैं। विराट जीवन की संभावनाओं के बीच एक किसी नुक्ते पर फँसा मनुष्य इनकी कहानियों में गरिमापूर्ण ढंग से वर्णित होता है। ये दूरदर्शी आलोचक हैं। सोशल मीडिया को जो कुछ लोग अपनी सामयिक और तीक्ष्ण टिपण्णी(यों) से मौजूँ बनाये रखते हैं, शशिभूषण उनमें से एक हैं। केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक कार्यरत शशिभूषण अपने स्वभाव से ही शिक्षक हैं। 

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