रोज़ का एक दिन: लोक कल्याणकारी राज्य के पराभव की दारुण व्यथा कथा

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शशिभूषण/

सिद्धहस्त कहानीकार कैलाश वनवासी की कहानी ‘रोज़ का एक दिन’ प्राइवेटाइज़ेशन, लिबरलाइज़ेशन, ग्लोबलाइज़ेशन, नई टेक्नोलॉजी, ई-गवर्नेंस, मैनेजमेंट, शाइनिंग इंडिया और उभरते अंतर्राष्ट्रीय भारतीय अमीरों के बेदर्द, आँखें चुँधिया देने वाले आलोक भरे दौर में बेकार होते जा रहे, छोटे-मोटे रोज़गार के लिए दूर-दूर मारे-मारे फिरते, बेहतर भविष्य की उम्मीद में वर्तमान का अवसाद जीते ज़िंदादिल, अपराजित, कठोर परिश्रमी शिक्षित युवाओं की विचलित कर देने वाली कहानी है।

छँटनी, बेरोज़गारी, न्यूनतम वेतन पर ओवर टाईम करने की दास्तान कहानी के मार्मिक प्रसंग हैं। कहानी का यह अंश बहुत कुछ बयान करता है-पिछले कुछ बरस से नयी नियुक्तियाँ बंद हैं। सिर्फ़ यहाँ (भिलाई स्टील प्लांट) ही नहीं, तमाम सरकारी विभागों में। मेंस पॉवर कम किए जा रहे हैं। अब ठेका सिस्टम आ गया है। अस्थाई नियुक्तियाँ हैं। प्राइवेट इण्डस्ट्रीज़ में कंपनी के फ़ायदे के हिसाब से काम हैं। कभी भी लात मारकर बाहर कर दिये जाने का असुरक्षा बोध हर समय दिलो-दिमाग़ में मँडराता रहता है। न काम के घंटे तय हैं न कोई श्रम क़ानून। न भविष्य निधि न ग्रेच्युटी।

कहानी ‘रोज़ का एक दिन’ सादगी से हमारे आज के दौर के संकटों और लोकतांत्रिक बहुराष्ट्रीय पूँजीवाद के मुनाफ़ाखोर शोषण को उजागर कर देती है। ‘रोज़ का एक दिन’ उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बाद रोज़ विकराल होते नए कंपनीराज में भारत के लोक कल्याणकारी राज्य के पराभव की दारुण व्यथा कथा है। यों तो कहानी कुछ घंटों की है यानी मुख्य पात्र मनीष के लगभग साढे छह बजे शाम को ऑफ़िस से छूटकर 20 मिनट लेट पौने सात बजे की लोकल से ढाई तीन घंटे बाद घर पहुँचने की है। मगर इसी अवधि में कहानी अपनी सघन बुनावट, कुशल वृत्तांत फ्लैशबैक शैली से कार्पोरेट तले दबे, पिसते युग जीवन की व्याप्ति को समेट लेती है। कहानी की भाषा, विवरण और पात्रों की मनःस्थिति में अप्रतिम संगति है। हँसी मज़ाक, तनाव, सपने, संघर्ष और टूटन सब साकार हो उठते हैं।

मनीष एक कंपनी में चार हज़ार रुपये मासिक पर एम्प्लॉयी है। वह ऑफिस से छह बजकर दस मिनट पर अपना काम समाप्त कर घर निकलना चाहता है। बॉस उसे एक दूसरा काम करने को दे देता है। यह रोज़ का नियम सा है। पौने सात बजे मनीष की ट्रेन है। वह कुढ़ता हुआ काम पूरा करता है। ऑफ़िस से निकलता है। ऑफ़िस से रेलवे स्टेशन तीन किलोमीटर दूर है। मनीष के पास एक पुरानी साइकिल है। यह साइकिल उसने अपनी साइकिल के चोरी हो जाने के बाद पुलिस स्टेशन में जमा साइकिल में से ली है। कुछ सौ रुपये ख़र्च करने के बाद चलने लायक सुधरवायी है।

लोकल ट्रेन में मनीष जैसे ही दूसरे युवा मिलते हैं। किसी न किसी कंपनी या होटल के एम्प्लॉयी हैं। रोज़ अप एंड डाउन करते हैं। इनमें वर्षा नाम की एक लड़की है, इकबाल है और एक मोटा युवा। सब उसे मोटा ही कहते हैं। इसी लोकल ट्रेन से मयूरा होटल की लडकिया भी आना-जाना करती हैं। इसी लोकल ट्रेन से मनीष की प्रेमिका श्रेया भी कुछ स्टेशन छोड़कर अगले स्टेशन से आती-जाती है। मनीष के घर में मां है। नेहा है। माँ मनीष के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है। लोकल ट्रेन के इस दो ढाई घंटे के नियमित सफ़र में इन युवाओं की ज़िंदगी एक दूसरे पर निर्भर सी हो गयी है। सब एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। एक दूसरे का काम करते हैं। चुहलें करते हैं और झूठ-मूठ का झगड़ते भी हैं।

कहानी ‘रोज़ का एक दिन’ बेकारी के महासागर में डूबते उस भारत की दास्तान है जिसे अब दुनिया में सबसे युवा देश कहा जा रहा है

श्रेया और मनीष एक दूसरे को प्रेम करते हैं। दोनों का परस्पर मिलना ट्रेन और प्लेटफ़ॉर्म का ही है। ऑफ़िस से चलने से पहले मनीष फ़ोन कर देता है। जब श्रेया के स्टेशन में ट्रेन पहुँचती है तो मनीष गेट पर आ जाता है। दोनों ट्रेन चलने तक परस्पर बात करते हैं। जब ट्रेन सरकने लगती है श्रेया चढ़ आती है। फिर सब साथ बैठते हैं। मनीष के सब साथियों को उनके प्रेम के बारे में पता है। वे छेड़ते भी हैं दोनों को। श्रेया ही है जिसके कारण मनीष को अपनी ज़िंदगी, ज़िंदगी जैसी लगती है। लोकल ट्रेन धीरे-धीरे गंतव्य स्टेशन पर पहुंचती, सवारियों को उतारती चलती है। पहले मयूरा होटल की लड़कियां उतरती हैं। फिर भिलाई स्टेशन आता है जिसे सब हसरत से देखते हैं। काश ! यहां रेगुलर सरकारी भर्ती शुरू हो जाए। सब अपने सपनों को उन रेगुलर नौकरियों से जोड़कर देखते हैं जो अब कदाचित कभी नहीं मिलने वालीं।

कहानी ‘रोज़ का एक दिन’ बेकारी के महासागर में डूबते उस भारत की दास्तान है जिसे अब दुनिया में सबसे युवा देश कहा जा रहा है। जो अपने युवाओं को रोजगार दे पाने के पहले ही नए कंपनी राज में विदेशी कर्ज़ में डूबा पस्त है। जहां चरमराती अर्थव्यवस्था की आँख में धूल झोंकते विकास के झूठे दावे हैं। जहां एक तरफ़ कार्पोरेट्स, कंपनियों की अंतहीन चमक-दमक और रंगीनियाँ है तो दूसरी ओर जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं के लिए चलने वाली जद्दोजहद के स्याह अँधेरे। कहानी का नायक मनीष बी कॉम ग्रेज्युएट है। उसके पास बेसिक कम्प्यूटर एप्लिकेशन का डिप्लोमा है। मनीष की ज़िंदगी की उदासी ही भारत के शिक्षित युवाओं के ‘रोज़ का एक दिन’ है।

“यहां साइकिल खड़ी करते हुए मुझे हमेशा लगता है जैसे मैं भी इसी कबाड़ में शामिल हूँ। जंग खाता। पुराना पड़ता। उपेक्षित और अनुपयोगी कि जिसके होने या न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।” (कहानी रोज़ का एक दिन से)

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वनमाली सृजनपीठ द्वारा संपादित विशाल कहानी संग्रह ‘कथादेश’ में प्रकाशित टिपण्णी

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शशिभूषण

फटा पैंट और एक दिन का प्रेम’ फेम शशिभूषण बेहतरीन कथाकार हैं। विराट जीवन की संभावनाओं के बीच एक किसी नुक्ते पर फँसा मनुष्य इनकी कहानियों में गरिमापूर्ण ढंग से वर्णित होता है। ये दूरदर्शी आलोचक हैं। सोशल मीडिया को जो कुछ लोग अपनी सामयिक और तीक्ष्ण टिपण्णी(यों) से मौजूँ बनाये रखते हैं, शशिभूषण उनमें से एक हैं। केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक कार्यरत शशिभूषण अपने स्वभाव से ही शिक्षक हैं। 

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