समीक्षा: युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताएँँ

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स्रोत-विकिपीडिया

जितेंद्र कुमार/

कविता जिस जमीन से उगती है उसका रंग और गंध लेकर उगती है. युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्र के प्रथम कविता-संग्रह ‘पुनपुन और अन्य कविताएँ’की कविताएँ’ मध्य बिहार की माटी के द्वंद्वों, अंत:संघर्षों, रंगों और गंधों से सराबोर है.

प्रत्यूष स्मृतिमूलक कविताओं के माध्यम से अपने अविभाज्य अनुभव संसार से सहृदय पाठकों को परिचित कराते हैं जिनसे उनके काव्य-संग्रह की निर्मिति हुई है. वे नब्बे के दशक को याद करते हैं जब मध्य बिहार (हमारी धरती) खून से लाल थी लेकिन बचा हुआ था उसका हरापन. लोग रगेदे जा रहे थे अपने खेतों से, खलिहानों से, इच्छाओं से, सपनों से. ऐसे में अगर लोग खून के धब्बे मिटाते तो धरती का हरा रंग मिट जाता. हत्याओं, नफरतों, निराशाओं के दौर को काटने का सबसे बेहतर औजार था स्मृतिओं के गीत गाकर संवेदना को बचाना.

अकारण नहीं है कि प्रत्यूष कविता लिखते हुए बार बार स्मृतियों में लौटते हैं. कवि मनुष्य बने रहने की बुनियादी शर्त्त के साथ अपना सांस्कृतिक संघर्ष जारी रखता है. वह प्रतिज्ञा करता है कि ‘सबकी लड़ाई लड़ते हुए उसे अपनी लड़ाई भी लड़नी होगी’. वह अपना सच भी कहना चाहता है, सबकी आवाज बनते हुए. लेकिन सच के संघर्ष में वह अपने कंधे पर किसी दूसरे की बंदूक नहीं ढोना चाहता. वह हमेशा दूसरे की लड़ाई नहीं लड़ना चाहता. वह अपनी माटी के संघर्ष का गीत गाना चाहता है.

कवि के अनुभव संसार में कवि मित्र सत्येन्द्र कुमार की ‘प्रेत-छाया’ है. दक्षिण बिहार के भूगोल में पहाड़ नंगे और नदियाँ सूखी हैं. क्या वे मृत संवेदनाओं के प्रतीक हैं?  नब्बे के दशक में वहाँ डर में जीता एक समाज है. हत्याएँ और घृणा फैली हुई है. जीने की तमाम दुश्वारियां हैं वहाँ. जाति इस समाज का सबसे बड़ा सच है जिससे दोनों कवि लड़ते
और हारते हैं. कवि मित्र कविताओं का लोबान जलाता है और तैर कर पार करना चाहता है रक्त की नदी. उनके कंधे थक गये. आवाज गुम हो गयी. उनके सपने खो गये.

देश के स्तर पर पुनपुन कोई महत्त्वपूर्ण नदी नहीं है लेकिन प्रत्यूष के लिए ज्ञान और सूचना के इस अराजक काल में मनुष्य की संवेदना को सींचने वाली नदी की प्रतीक है

जैसे सिक्कों के इतिहास से किसी देश समाज के आर्थिक-राजनैतिक-वैज्ञानिक-सांस्कृतिक इतिहास को लिखा जा सकता है उसी तरह किसी मौलिक रचनाकार की रचनाओं यथा कविताओं कहानियों आदि से उस समाज की प्रवृत्तियों, संघर्षों, पतनों, गिरावटों, ठहरावों, क्षुद्रताओं, को भी बखूबी समझा जा सकता है. यथार्थवादी कविता सामाजिक अध्ययन का बहुआयामी फलक प्रस्तुत करती है.

युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताओं से गुजरिये और उनके समकालीन बिहार के अन्य कवियों की कविताओं को पढ़िये, उनमें अंतर साफ दिखेगा. प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताओं का अपना स्वर, काव्य-विषय, शिल्प और तेवर है. एक स्वायत्त अनुभव संसार है. ईमानदारी और निर्भीकता है. गहरी स्थानीयता है. अपने गाँव, नदी, पेड़, पहाड़, माँ, पिता, बेटा, बेटी, दफ्तर के सहकर्मी, कवि मित्र, हरख बाबा की स्मृतियों का अद्भुत रचनात्मक संसार है. इनको वे अपनी कविताओं का नायक बनाते हैं. इन काव्य नायकों के सापेक्ष अपने काव्य संसार की रचना करते हैं. सभी कवि तो इन्हीं उपकरणों से अपनी कविताएँ रचते हैं लेकिन सबकी रचनात्मक दृष्टि अलग अलग है. देश के स्तर पर पुनपुन कोई महत्त्वपूर्ण नदी नहीं है लेकिन प्रत्यूष के लिए ज्ञान और सूचना के इस अराजक काल में मनुष्य की संवेदना को सींचने वाली नदी की प्रतीक है.

‘तुम्हारा पानी किनारों को तोड़ कर आता था
हमारे गाँव की सरहद पर
पानी लाता था ढेर सारा उल्लास

तुम्हारे बाढ़ को लेकर कोई गुस्सा नहीं था

पुनपुन अपनी उफनती बाढ़ के लिए भी याद की जाती है. प्रत्यूष पुनपुन की बाढ़ को किसान की संवेदना से देखते हैं. पुनपुन की बाढ़ को लेकर स्थानीय लोगों में कोई गुस्सा नहीं है. क्योंकि पुनपुन का पानी लाता था ढेर सारा उल्लास/छोटी छोटी मछलियाँ, सीप और घोंघे/बहुत मुलायम और नरम मिट्टी का कोई छोटा सा हिस्सा’./और धान के अधडूबे खेतों में पानी.

यहाँ पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को नदियों की बाढ़ और जल-संकट के बारे में याद कर सकते हैं. कवि पुनपुन की विरासत को लोक में प्रचलित गाथाओं से जोड़ते हुए उसे पांडवों और महाकवि वाणभट्ट की स्मृतियों से जोड़ता है.

कवि के जीवन में गाँव से शहर में आजीविका की तलाश में वांछित विस्थापन है. ऐसा वांछित विस्थापन बिहार जैसे गैर-औद्योगिक प्रदेशों से लाखों की तादाद में होता है. आत्मपरक शैली में लिखी इन कविताओं में हजारों कामगारों की पीड़ा का अक्स है जो अपना गाँव छोड़कर आजीविका के लिए शहरों में जाते हैं और विस्थापितों सा भटकते रहते हैं अपना तम्बू लिए धरती के इस कोने से उस कोने तक. शासकों की भाषाओं से इन विस्थापितों का कोई ख्वाब पूरा नहीं होता. इनके लिए देश का हर शहर शरणार्थी शिविरों से भरा शहर है. जहाँ निराशा की धूल उड़ती है. मैंने अभी तक किसी कवि को विस्थापितों के शरणार्थी शिविरों के रूप में चित्रित करते हुए नहीं पाया है. यह एक अनोखा बिम्ब है उनके दुखों का वर्णन करने के लिए.

शासक अपने भाषणों में विकास का चाहे जितना ढिंढोरा पीटें, सपना दिखायें, कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्र की दृष्टि विकास के यथार्थ का अलग चित्र दिखाती है

शासक अपने भाषणों में विकास का चाहे जितना ढिंढोरा पीटें, सपना दिखायें, कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्र की दृष्टि विकास के यथार्थ का अलग चित्र दिखाती है.’अगरबत्ती’ शीर्षक कविता में चार मासूम बच्चे अगरबत्ती बनाने वाले कारखाने में काम करते हैं. दूर से किसी स्कूल में तीसरी घंटी बजने की आवाज आती है. स्कूल के समय बच्चे अगरबत्ती कारखाने में अगरबत्ती बनाने में लगे हैं. यह उनके लिए एक खेल है. पारिश्रमिक के रूप में माड़ पीने को मिलता है. ‘छोटा बच्चा तेजी से चलाता है हाथ/पीढ़े पर तेजी से फिसलती है सींक/.

कवि अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता के अनुरूप कविता की जमीन खोज लेता है और उसका काव्य नायक बाल श्रमिक बनता है. बाल श्रम के खिलाफ कानून है लेकिन कोई अप्रत्यक्ष सत्ता है जो शासकों को भी शासित करती है. असली सत्ता उसी के हाथ में है. वह कानून और संविधान से ऊपर है. इसलिए युवा कवि प्रत्यूष की काव्य-संवेदना संकल्प करती है कि “सबकी लड़ाई लड़ते हुए मुझे अपनी लड़ाई भी लड़नी होगी (बाँस के गीत)”.

“अगरबत्ती”  फैक्टरी में काम करनेवाले चार छोटे बच्चों के त्रासद जीवन पर कविता है तो स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों पर भी कवि की निगाह है. “बच्चे स्कूल से लौट रहे हैं. बच्चे देश के भविष्य हैं. देश के भविष्य इन बच्चों को स्कूल जाने आने के लिए सुविधाएं नहीं हैं. बसों और ऑटो रिक्शों में यात्रा के लिए मजबूर हैं. फिर भी बच्चे खुश हैं. बसों और ऑटो रिक्शों की यात्राओं से दिन भर की थकान लिए बच्चे घर लौटते हुए खुश हैं. इन बच्चों का वर्गीय आधार समझना मुश्किल नहीं है. इस क्रम में “बेटे के लिए दो कविताएँँ” और “बेटी की मुस्कान” कविताएँँ पढ़ी जा सकती हैं. यहाँ एक आत्मीय संसार का सुखद ताप है. प्रत्यूष पारिवारिकता का मूल्य रचते हैं. योग, संन्यास और ब्रह्मचर्य का ढोंग नहीं रचते. गार्हस्थ्य जीवन का मूल्य रचते हैं. इक्कीसवीं सदी के इस डिजिटल समय में जब 2 गुणा 3 बराबर 5 होता है और जहाँ ‘उपभोग’ सबसे पुनीत कार्य है, जहाँ नैतिकता, शुचिता, ईमान सब हाशिये की चीज हैं, वहाँ छोटे बच्चों, परिवार, दफ्तर के मित्रों और प्रेम को कविता का विषय बनाना मूल्यों के क्षरण का प्रतिरोध रचना है.

यह अंकों, अक्षरों, और संकेतों के पासवर्ड का समय है. इसमें बहुत कम प्यार है/बहुत कम करुणा है/बहुत कम जीवन है/और है बहुत कम कविता. ऐसे समय में परिवार में जीवन की तलाश है. परिवार में उष्मा की तलाश है. छोटी बेटी की मुस्कान से दिन की थकान हवा हो जाती है. उसकी तुतलाती भाषा और शरारत में गूँजने लगता है चाची, बुआ और बहनों का ठहाका. ढाई साल के बेटे की मुस्कान दफ्तर की थकावट और बॉस की डाँट को सोख लेती है. छह प्रेम कविताएँ हैं. उसके बाद जीवन साथी आती है जीवन में संजीवनी की तरह जिसको आश्वासन है कि चंद रोटी के टुकड़ों और दो जोड़ी लत्ते उसके सपनों पर परदा नहीं डाल सकेंगे. कवि दाम्पत्य के मूल्य की रक्षा करेगा. टूटते दाम्पत्यों के बीच प्रत्यूष की कविता उसे बचाने के पक्ष में खड़ी है. यही इसकी सार्थकता है.

प्रत्यूष छोटी कविताएँ लिखने में उतना ही सफल हैं जितना बड़ी कविता लिखने में. गाँव, बरगद, बबूल, ताड़, चीख, पत्थर, समंदर, सच, सच्चाई, फर्क, जलता हूँ, कविता की भाषा, साथ रहे, रेत, चाह, रोटी, समय,जख्म, परिवर्त्तन, सुनना, इच्छा, यथार्थ, स्त्री, तकनीक, त्रिशंकु, मेरी भी आवाज, आवाज छोटी छोटी कविताएँँ हैं. इनकी तुलना में 2 गुणा 3 बराबर 5, प्रेत-छाया, नेपाल में भूकंप, बनजारे, तीन बेटियों वाला घर, पीले पन्नों की कविता, हरख बाबा की स्मृति के साथ, और ‘पुनपुन’ बड़ी कविताएँँ हैं. ‘रोटी’ बारह शब्दों की छोटी किन्तु महत्त्वपूर्ण कविता है. छोटी कविताएँँ कठिन साधना की माँग करती हैं. कविता की सार्थकता तभी है जब वह मुकम्मल कथ्य बन जाये. उसमें एक मुकम्मल बिंब जीवन का उभरे. विज्ञान और तकनीक के विकास के युग में भूख की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है. रोटी का सवाल उठाने वाले हमेशा से खतरनाक घोषित किये जाते रहे हैं—“रोटी का सवाल था/बेहद जरूरी/लेकिन/खतरनाक था…/यह सवाल पूछना.”

प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताओं में लोकजीवन के शब्द सहज ढंग से आते हैं. फगुआ, बिहान, गोदी, भोगी, औंऊछां, करमजरूआ, अधडूबे, डोड़वा, पैकार, भूंसी, बोंकड़ी, छांटी, रगेद, चहुँओर, कोहडौरी आदि अनेक स्थानीय शब्द हैं जो संप्रेषणीयता को बाधित नहीं करते.

प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताएँँ रास्ते की धूल और मिट्टी में ढंके किसी पक्षी के कटे हुए पंख सदृश हैं जिनपर हवाओं से संघर्ष के निशान हैं. धूल और मिट्टी में ढंके इन कविताओं से मनुष्य के सपने रिस रहे हैं.

 

संदर्भ: “पुनपुन और अन्य कविताएँँ” (कवि:प्रत्यूष चंद्र मिश्र)
बोधि प्रकाशन

(जितेन्द्र कुमार स्वतंत्र लेखन करते हैं. बिहार के भोजपुर जिले में  जन्मे कुमार अब तक दो कविता संग्रह और दो कहानी संग्रह,एक हिंदी और एक भोजपुरी में लिख चुके हैं. पाठक उनसे उनके फ़ोन नम्बर : 07979011585 पर संपर्क कर सकते हैं)

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