ज़िंदगीनामा

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तस्वीर-मलयाला मनोरमा से साभार

कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ पर प्रस्तुत आलेख शिल्पी ने लिखा है। प्रसिद्ध कहानियाँ ‘क्वालिटी लाईफ’ और ‘पापा तुम्हारे भाई’ की लेखिका शिल्पी ने यह आलेख रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित युवा -2017 नामक कार्य्रकम के लिए तैयार किया था। यह आलेख, उपन्यास के जाहिर कथ्य से अलग उसकी भाषा, उसके शिल्प और उससे जुड़े कुछ दुखद प्रसंगों पर है। मसलन् कृष्णा सोबती जो त्रयी रचना चाहती थीं उसका पहला उपन्यास जिंदगीनामा को होना था और दूसरी तरफ वो इसके शीर्षक को लेकर छब्बीस वर्ष तक मुकदमा लड़ी।

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शिल्पी/

सहज विलक्षण लेखन और शैली की चमत्कृत करने वाली जीवंतता कृष्णा सोबती की पहचान है और उनकी यह सम्मोहक पहचान हमारे समय की महान कृति “ज़िंदगीनामा” के हर शब्द, हर प्रसंग में हम से रूबरू होती है। यह तो निर्विवाद है कि इस  महान लेखिका को प्राप्त होकर पुरस्कार खुद सम्मानित होते हैं और निर्णायकों की सनद रह जाती है। संदर्भ जब “ज़िंदगीनामा” का हो तो यही पर्याप्त नहीं है कि इसे जिंदादिली, अलमस्ती और जीवन से जूझते रहने की सहज कथा बताया जाए, जिसमें न तो नायक हैं और न ही खलनायक। यह कथा देश और समाज की अनेक अद्यतन उलझनों, और आतंक पर आयोजित बहसों, चौतरफा दबावों से छुटकारे की आड़ में आयोजित वीरता के स्वांग के समक्ष मौजूद भारतीय समाज का ऐसा कथा-चित्र खींचती है जिसमें पांच नदियों से सिंचित भूमि की उर्वरता के लाड और दुलार के बीच कई सभ्यताएं पलती हैं, अलग-अलग आस्थाएं जीती हैं, पांडव या पंचप्यारे और पंजपीर के अक्स पलते हैं। पर जब ये आस्थाएं आपस में ही जूझती हैं तो अपनी वीरता में प्राणों का समर्पण लेने और देने दोनों में उतनी ही उन्मत्त हैं। उपन्यास का एक प्रसंग देखें जिसमें कानूनी मसले अंग्रेज हाकिम के हाथ में हैं लेकिन वे चलते उतने ही हैं जितने समाज के गले उतरते हैं:

” ब्लोच पठान के भाने तो मरना-मारना राह-रस्म हुई न।”

‘शाहजी बोले, “उस इलाके में अंग्रेजी कानून चलना जरा मुश्किल है। हुआ यह कि एक ब्लोच ने किसी बंदे के साथ बीवी जा पकड़ी अपनी। बस आनन-फानन में दो कत्ल हो गए। जिरगे की माजूदगी में मामला पेश हुआ। अंग्रेज हाकम ने अपनी जानकारी और कानून के मुताबिक तीन साल ठोक लिए। इधर हाकम ने फैसला दिया उधर हास्सा पड़ गया। अंग्रेज डिप्टी ने सोचा, कोई होगी मखौल की बात। चिट्ट दाढ़ियों को बुलाकर पूछा, ” माजरा क्या है?”

“उन्होंने समझाया, साहिब इस जुर्म पर तो दो या तीन दिन या जुर्माना रुपए पचास का। जनाब को यहां के कायदे-कानून धीरे-धीरे सब पता लग जाएंगे।”

इस अंश से न केवल लेखिका की भाषाई प्रांजलता और उन्मुक्तता स्पष्ट होती है बल्कि संप्रेषण की जीवंतता पात्रों को हमारे सम्मुख ला खड़ा करती है। कहा जाता है कि कथ्य की सार्थकता अर्थ की स्पष्टता और संप्रेषण में सन्निहित होती है। भाषाई स्तर पर कृष्णा सोबती पंजाबी, राजस्थानी शब्द और खुरदरे मुहावरों से दूर तक अटेे होने के साथ ही अपने मुक्त किन्तु सुडौल वर्णन के कारण साहित्य की ऐसी सफल परिभाषा गढ़ती हैं जहाँ उनकी पृथक शैली कथा के सौंदर्य से मोहती हुई आगे बढ़ती है और अनेक प्रकार की जिंदगियों के साथ-साथ चलते यथार्थ के कटु , सौम्य और सम्मोहक चित्रण उसे प्रवाहमयता देते हैं।

कृष्णा जी के साक्षात्कारों में कहीं यह बात पढ़ी थी कि “जिंदगीनामा” के माध्यम से वे ट्राइलॉजी लिखना चाहती थीं जो उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो सका। लेकिन यह जो कुछ लिखा गया है वह हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए अक्षुण्ण धरोहर है

“ज़िंदगीनामा” को पढ़ते हुए लेखिका की कलम से उपजे कथानक को नजर की ओट नहीं किया जा सकता। यहाँ कथा
का निश्छल प्रवाह सागर की उच्छल तरंगों के समान कथानक को सौंदर्य से जुड़ाता रहता है। अपने अध्ययन के दौरान पुस्तक के लगभग चार सौ पृष्ठों में मुझे कभी नायक या खलनायक की अनुपस्थिति का खालीपन नहीं महसूस हुआ, बल्कि छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, किसान, दरवेश, लालाजी, तायाजी, जंगीलाट, बलूच, हिंदी फौज के जवान, अंग्रेज अफसर, शाहनी, भोली, शहजादी-सी खूबसूरत फतेह, मियां अल्लारक्खा, बेबेजी इत्यादि के रूप में इतने सारे नायक-नायिकाओं से भेंट हुई कि खलनायकी का असल रूप भी सामने आ गया। वही परिस्थिति और देशकाल एक की नायकी को दूसरे के लिए खलनायकी बना देते हैं। “ज़िंदगीनामा” की कहानी इंसानों को ही नहीं क्षितिज, आकाश, आग और पानी को भी कथा के आंचल में ऐसे समेटती है कि अग्नि की उत्पत्ति सुनहले जल से होती है, सुंदर पवित्र जल से। सूरज और चांद, अग्नि और शीतलता के चरम स्रोत एक ही मां के दो लाडले हैं। ये बातें कहानी के नन्हे नायकों को सिर्फ किस्सों की तरह सुनाई नहीं जातीं बल्कि समय की विरासत के रूप में यह भी बताती हैँ कि दिन और रात जितने सच्चे-झूठे हैं उतना ही सहज नजदीकी संबंध अग्नि और शीतलता का भी आपस में है। कहानी का एक अंश देखें:

“पुत्रो, ध्यान से सुनो। अगनकुमार सूरज वड्डे का धोत्रा और समुद्रों का पोत्रा।”

“जल का पुत्तर अगनकुमार कैसे हुआ लालाजी?”

“अगनकुमार का पिता अंतरिक्ष और समुद्रों का स्वामी। सो जब जन्मा न अगनकुमार तो नद-नदियां बह-बह निकलें। पुत्तरजी, यह अगनकुमार सब देवताओं का सारथी है। और यही अग्नि और यज्ञ का पिता भी।”

“पर जी अग्नि कहां से उपजी?

“पुत्रो, अग्नि की उत्पत्ति सुनहले जल से हुई। सोने जैसे रंग वाले सुथरे पवित्र जल से।”

‘भाई को कंधे से लगाए भोली बड़ी सोचों में पड़ गई—“लाला जी यह सुनहला जल गागर में था कि घड़े में? घट काँसी का था कि मिट्टी का?”

लेखिका की भाषा मे उसका रचनात्मक संघर्ष भी अपनी प्राकृतिकता में यहां दिखता है। एक सशक्त ह्रदय कैसे सभी परिस्थितियों, संघर्षों और सफलताओं की मिसालों से अटकर कथा का रूप लेता है जिसमें भावनात्मक संबल और संवेदनशीलता अपनी जमा-पूंजी के रूप में रचना को पोषित करते हैं। यह यथार्थ उपन्यास के संवाद-अंशों में लब्धित होता है। उपन्यास के एक अंश पर ध्यान दें:

“पुत्रो, चंद्रमा अकेला है। इसका कोई संगी-साथी नहीं। इसके कोई आगे-पीछे नहीं। जो मनुक्ख अकेला है, वही इसे साथी मान लेता है।

“चंद्रमा ऊपर से धरती को देखकर दिल में बड़ा संताप पाता है। पर अपना दुख-दर्द किसी को नहीं दिखाता। सारे दुख-दर्द अंदर ही अंदर पीता रहता है। सो,चांद का कालजा शिलाखंड बन गया है।”

जिंदगी से भरी-पूरी कथा-वस्तु को संजोए इस उपन्यास के शीर्षक के लिए कृष्णा सोबती को लंबा कानूनी विवाद झेलना पड़ा था। हिंदी की एक अन्य सुपरिचित लेखिका अमृता प्रीतम ने कॉपीराइट एक्ट के तहत इस शीर्षक के लिए मुकदमा कर दिया था। छब्बीस साल चले इस मुकदमे में एक पेशी के दौरान जज ने कहा था, ‘बहुचर्चित लेखिका अमृता प्रीतम को तो मैं जानता हूं लेकिन यह कृष्णा सोबती कौन हैं?” कृष्णा जी ने जवाब दिया था, ‘यहां दिल्ली में हिंदी के लेखकों को कौन पहचानता है?’

कृष्णा जी के साक्षात्कारों में कहीं यह बात पढ़ी थी कि “जिंदगीनामा” के माध्यम से वे ट्राइलॉजी लिखना चाहती थीं जो उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो सका। लेकिन यह जो कुछ लिखा गया है वह हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए अक्षुण्ण धरोहर है जो अपनी विविधता और विपुलता में संपूर्ण है। ऐसे मौके भी आये जब हिंदी के विद्वानों ने लेखिका की मुहावरेदार भाषा और कई बार बिना श्रम के कम समझ में आने वाली विभिन्न भौगोलिक पृष्ठभूमि की भाषाई विरासत पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह ‘संगमी मेल’ हिंदी में नहीं चलेगा। यहां तक कि कुछ लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों ने “जिंदगीनामा” की भाषा पर आक्षेप करते हुए उसके ‘हिंदी’ अनुवाद की आवश्यकता पर भी बल दिया। कृष्णा जी ने अपने उत्कृष्ट लेखन की सहजता में व्यस्त रहते हुए इन बातों के जवाब में सिर्फ यह कहा कि समय की प्रतीक्षा करो, किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कभी उन्होंने भाषा-शैली की पारंपरिक संकीर्णताओं में बंधने नहीं दिया। आकाश की तरह विस्तृत अपने लेखन में उन्होंने जिस पृष्ठभूमि को जहां से उठाया उसकी नैसर्गिकता से छेड़छाड़ किए बिना उसका पोषण किया। उनकी यह विशेषता “ज़िंदगीनामा” में आदि से अंत तक लक्षित होती है। जहाँ तक भाषा का प्रश्न है इतना और कहना आवश्यक है कि भाषाएँ परस्पर अंतःक्रिया करते हुए साहित्य को उसके अंग और आयुधों की तरह समृद्ध करती हैं।अन्य भाषाई शब्दों के मेल से लिखी गई रचना को हिंदी के सहज विकास और संवर्धन में सहायक मानना चाहिये।

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