जन्मदिन विशेष: सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्यभाषा

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आशीष मिश्र

सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा की काव्यभाषा को भारतीय नवजागरण और स्त्री-आत्म के वैशिष्ट्य के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। इसी तरह सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवीवर्मा—दोनोंकी काव्यभाषा को साफ-साफ समझने के लिए—दोनों को आमने-सामने रखना चाहिए। नवजागरण और औपनिवेशिक आधुनिकता की परियोजना से दोनों कवयित्रियों का संबंध एक-सा नहीं है। नवजागरण से सम्बन्धों का यह वैशिष्ट्य ही दोनों कवयित्रियों के काव्य-बोध और भाषा में विपरीतमुखी अंतर का कारण है। इस तरह स्वतन्त्रता-पूर्व स्त्री-काव्यभाषा की दो सरणियाँ दिखाई पड़ती हैं और कमोबेस इसे स्वातंत्र्योत्तर काव्यभाषा में भी देखा जा सकता है। सुभद्रा कुमारी चौहान आधुनिकता और उसके द्विचर-विरुद्धों के भीतर से बोलती हैं तथा वक्तृता, व्यंग्य और विडम्बनाबोध पैदा करती हैं। इसे उनकी राष्ट्रावादी उद्बोधन से इतर कविताओं में देखा जा सकता है। महादेवी वर्मा आधुनिकता की ठस द्विचर-विरोधी संरचना को पार करने की कोशिश करती हैं फलतः एक ख़ास तरह का रहस्याभास पैदा होता है। इस संदर्भ में ध्यातव्य है कि दोनों ही कवयित्रियाँ जब तत्कालीन राष्ट्रावादी विमर्श से बाहर निकलने की काशमकश में होती हैं तो उनकी काव्यभाषा अपेक्षाकृत ज़्यादा सर्जनात्मक होने लगती है और वे स्त्री अनुभवों को रचने में भी सफलता पाती हैं, लेकिन जैसे ही वे राष्ट्रावादी विमर्श से जुड़ती हैं, वे स्वयं अपने खिलाफ़ खड़ी होने लगती हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान पर हम आगे विस्तार से बात करेंगे, लेकिन महादेवी जी के संदर्भ में संकेत के लिए ‘जाग तुझको दूर जाना’ शीर्षक कविता याद करसकते हैं। “बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?/पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?”—इस उद्बोधन गीत में जैसे ही ‘वीर’ आता है वैसे ही महादेवी जिन ओस की बूंदों और तितलियों के पंखों से खुद को अभिव्यक्त करती रहीं,उसी के खिलाफ़ खड़ी हो जाती हैं। इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि राष्ट्रावादी विमर्श में ऐसा क्या है कि उसकी अनुगूँज मिलते ही स्त्री-काव्यभाषा स्वयं स्त्री के आत्म को विस्थापित करने लगती है?

राष्ट्रवाद पर विचार करते हुए अधिकांश चिंतकों का यह मत रहा है कि राष्ट्र एक काल्पनिक समुदाय है,जो विभेद और अन्यकरण पर ही टिका रह सकता है। एडवर्ड सईद कहते हैं कि यह विभेद ‘आविष्कृत सत्त्वों’ और ‘निर्मित वस्तुओं’ के रूप में होता है, जिसका मक़सद शुद्धता और शाश्वतता क़ायम रखना होता है। इस संदर्भ में ध्यातव्य है कि ‘विशेषीकृत आत्म’(एक्सक्लूसिव सेल्फ) और ‘बहिष्कृत अन्य’(एक्सक्लूडेड अदर्स) की यही प्रक्रिया उपनिवेशवाद का भी तर्क है। अर्थात दोनों विरोधी धारणाओं का तर्क एक ही प्रक्रिया से पैदा होता है। दोनों ही जगहों पर विभेद को विरोध का लॉजिक बनाया जाता है। इस विभेद के आसपास ही साम्राज्य-विरोधी संघर्ष की क्रांतिकारी पहचान निर्मित हुई। अल्जीरियाई राष्ट्रवाद के विकास का विश्लेषण करते हुए फ्रेंज फेनॉ जोर देकर कहते हैं कि उपनिवेशक और उपनिवेशित दोनों पुरुष हैं और दोनों ही के लिए देश घर या परिवार के प्रतीक की तरह है। जैसे उपनिवेशवाद मर्दवाद की सत्ताकांक्षा और लालच का परिणाम है उसी तरह राष्ट्रवाद मर्दाना स्मृतियों, मर्दाना अवमानना और मर्दाना आकांक्षाओं से पैदा होता है। राष्ट्रवाद एक जुबान बनकर यौन नियंत्रण व दमन को जायज ठहराता है और पुरुष पराक्रम को अभिव्यक्त कर उसका इस्तेमाल करता है। यह राष्ट्रवाद की सार्वभौमिक प्रवृत्ति है।

भारतीय राष्ट्रवाद का विश्लेषण करते हुए पार्थ चटर्जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन और स्त्रीवादी संघर्ष में प्रतिलोम संबंध देखा है। उनके अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से राष्ट्रवादी आन्दोलन के मज़बूत होने के साथ स्त्री-प्रश्नों पर चुप्पी गहन होती गयी और बाद में उसका विराजनीतिकरण हो गया। चटर्जी का कहना है कि राष्ट्रवाद ने आधुनिक भारतीय समाज में स्त्रियों की समाजार्थिक स्थितियों-अवस्थितियों की जो समझ और हल प्रस्तुत किया,वह पश्चिम की सांस्कृतिक आधुनिकता से प्रत्यक्ष जुड़ाव के बजाय उससे विभेद पर आधारित था और फल यह हुआ कि औपनिवेशिक सत्ता के राजनीतिक विरोध के क्षेत्र से अलग स्त्री-प्रश्नों को राष्ट्रीय संप्रभुता के आन्तरिक क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिया गया तथा राष्ट्रीय संस्कृति के इस आन्तरिक क्षेत्र में ही परंपरा और स्त्री की पुनर्निर्मिति एवं पुनर्पुष्टि हुई। इस तरह देखें तो राष्ट्रवाद समय के एक विरोधाभासी चरित्र के तौर पर आकार ग्रहण करता है। इसका एक चेहरा धुँधले अतीत की ओर और दूसरा अनंत भविष्य की ओर देखता है। समय का यह विरोधाभास राष्ट्रावाद के भीतर हर जगह दिखाई पड़ता है। इसे एक साथ प्रामाणिक सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ना है और दूसरी तरफ़ आधुनिक परियोजना का हिस्सेदार भी दिखना है। एक तरफ़ अतीत की ओर झुकाव है और दूसरी तरफ़ भविष्य के प्रगतिशील मूल्यों को भी वहन करना है। इस विरोधाभास को राष्ट्रवाद हमेशा लैंगिक निर्मितियों में सुलझाने की कोशिश करता है। राष्ट्रावाद ‘जेंडर’ के पारंपरिक विभाजन को स्वाभाविक मानकर इस विरोधाभास को हल करने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में स्त्रियों को घर-परिवार के भीतर की जमीन, और राष्ट्रीय परंपरा की प्रामाणिक भूमि की तरह रचा जाता है। दूसरी तरफ़ पुरुष भविष्य और राष्ट्रवादी परियोजना के प्रगतिशील तथा परिवर्तनकारी बल का प्रतिनिधित्व करता है। इस तरह यह साफ है कि राष्ट्रवाद का अतीत और भविष्य के साथ एक अनियमित और अंतर्विरोधी संबंध होता है, जिसे लैंगिकता के धरातल पर हल करने की कोशिश होती है। यह विरोधाभास हर राष्ट्रीय आख्यानों में मिलेगा। यहाँ यह देखने की ज़रूरत होती है कि स्त्री-भाषा इस अंतर्विरोध को कैसे हल करती है। कहना न होगा कि सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा इसे अलग-अलग तरीक़ों से हल करती हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान की रगों में स्वतंत्रता आंदोलन की गूँज और गांधीवादी चेतनाका उग्र रूप है। मुक्तिबोध इस बात को दर्ज करते हुए कहते हैं कि “आधुनिक हिन्दी-काव्य के प्रथम भावोल्लास के काल में जिन कवि-वाणियों ने जनता को उतस्फूर्त किया, उसे प्रेम और देशभक्ति के आवेग और आह्लाद में सराबोर कर दिया, उनमें स्वर्गीय सुभद्रा कुमारी चौहान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे दिन जिन्हें याद हैं, राष्ट्रीय आंदोलन के यौवन का नवीन स्पर्श जिन्हें याद है, साहित्यिक भावोल्लास की नव-नवीन लहरियों का वह आत्मविश्वासपूर्ण सुनहला प्रभात जिन्हें याद है, वे बतला सकते हैं कि सुभद्रा जी के काव्य में अनूठापन कहाँ है, किस स्थान पर है और क्यों है। उनके चमत्कार-वर्जित काव्य में वह मौलिकता उत्पन्न हुई, वह रस ग्राहिणी और रस-प्रदायिनी शक्ति उत्पन्न हुई, जिसके द्वारा उनके साहित्य के माध्यम से युग का, और युग के माध्यम से उनके साहित्य का, अध्ययन सफलता पूर्वक किया जा सकता है।” मुक्तिबोध ठीक कहते हैं कि स्वतन्त्रता आंदोलन का ‘आवेग’ और ‘ओज’ उनकी कविता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। परंतु यदि हम सुभद्रा कुमारी चौहान की सिर्फ़ राष्ट्रवाद-संदर्भी कविताओं पर ही बात करें, जैसा कि होता आया है, तो यह भी कह सकते हैं कि तत्कालीन भारतीय राष्ट्रवाद की प्रगतिशीलता और उसका दायरा ही सुभद्रा कुमारी चौहान का दायरा है। उस राष्ट्रवादी विमर्श के भीतर स्त्री से जो अपेक्षाएँ हैं और उसकी जो छवियाँ गढ़ी जा रही हैं, वही छवियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान की भी हैं। लेकिन अगर ज़िम्मेदारी से सुभद्रा कुमारी चौहान के पूरे काव्य-कर्म को ध्यान में रखें और राष्ट्रवाद-संदर्भी वीरांगना वाली छवि से निकाल कर देखें, तो स्त्री काव्यभाषा के संदर्भ में उनकी बड़ी भूमिका उद्घाटित होगी। यहाँ सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य-भाषा पर बात करते हुए दोनों तरह की कविताओं को ध्यान में रखा जाएगा।

इस बात का उल्लेख किया गया है कि सुभद्रा कुमारी चौहान ने महादेवी वर्मा से अलग दिशाओं में जाते हुए भाषा को छायावादी आत्ममुग्धता, उलझाव और अमूर्तन से बाहर निकालकर उसे बृहत्तर जनवृत्त मे खड़ा कर दिया।स्त्री-भाषा को बड़े जनसमूह का हिस्सा बना दिया। एक तरह से नवजागरण में स्त्री-कविता को जन-मन का हिस्सा बनाने का काम सुभद्रा कुमारी चौहान से ही संभव हुआ। उन्होंनेदेश के स्वाभिमान को जगाया। कितने ही वीरों के लिए उनकी कविताएँ प्रेरक हुई होंगी। उनकी कविताएँ पढ़कर और उससे प्रभावित होकर कितने ही लोग स्वतन्त्रता-संघर्ष में कूदे होंगे। झाँसी की रानी पर कविता लिखने वाली कवयित्री उस आत्मशक्ति का जीवित अधिष्ठान बन गयी। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं ने अबला, बेचारी और लगातार सुबकती हुई स्त्री की छवि को उलट दिया। उन्होने उसे शक्ति के प्रतीक में बदलकर भारतीय संस्कृति में मौजूद स्त्री-शक्ति के रूपक में पुनः स्थापित कर दिया। लेकिन, सुभद्रा कुमारी चौहान अपनी इस शक्तिमती छवि में भाव-बोध और भाषिक संरचना में मौजूद और मज़बूत द्विचर-विरोधों(बाइनरीज़) के बीच ही गति करती हुई दिखाई देती हैं। ये द्विचर-विरोध राष्ट्रीय आंदोलन और भारतीय नवजागरण द्वारा ही निर्मित हुए थे। ये द्विचर विरोध वीरांगना और मातृत्त्व का था। ओज और वात्सल्य का था। इसमें दोनों ध्रुवीय अवस्थितियाँ विरोधी होने का आभास तो पैदा करती हैं, लेकिन होती नहीं। इस लेख में आगे देखेंगे कि सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्यभाषा में राष्ट्रवाद के प्रवेश से भाषा व बोध में क्या परिवर्तन आते हैं तथा मातृत्त्व और प्रकृति संबंधी भावबोध के आने पर कौन से बदलाव लक्षित होते हैं। विषय बदलने के साथ भाषा और बोध में परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि विषय से जुड़ी निर्मितियाँ इतनी मज़बूत हैं कि रचनाकार का आत्म इसे बदल पाने की स्थिति में नहीं है।

सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा की तरह ब्रज भाषा से होती हुई खड़ी बोली में नहीं आई थीं। उनकी तर्बियत खड़ी बोली की थी । ब्रज भाषा और खड़ी बोली का अलगाव सिर्फ़ एक भाषा का अलगाव भर नहीं है; शैली, शिल्प और यथार्थबोध का भी अलगाव है। खड़ी बोली में अपने सांस्कृतिक अतीत से जैविक संबंध का अभाव है। यदि कुछ है, तो वह औपनिवेशिक विमर्श के भीतर से अतीत की पुनर्संबद्धता है। यह उस अतीत से संबद्धता है, जिसका निर्माण सौ वर्षों के औपनिवेशिक गुलामी के दौरान हुआ था। यह वह अतीत भी है, जिसके भीतर ख़ास तरह के हिंदूवादी राष्ट्रवाद और मर्दवादी अहं की महीन निर्मितियाँ घुली हुई थीं। कहने का अर्थ यह है कि जिस खड़ी बोली को राष्ट्रभाषा के तौर पर अपनाया गया उसके साथ सिर्फ़ भाषा नहीं, बल्कि पूरा यथार्थबोध और सांस्कृतिक-सामाजिक निर्मितियाँ भी आयीं। लेकिन, प्रसाद और महादेवी जैसे कवि, जो ब्रज से विकसित होते हुए, सहज ढंग से खड़ी में आते हैं, बहुत कुछ भारतीय/जातीय यथार्थ-बोध का ही खड़ी बोली में जैविक विकास करते हैं। इसलिए उनकी कविता में औपनिवेशिक विमर्श की महीन निर्मितियाँ उतनी प्रभावी नहीं दिखाई पड़ती हैं। परंतु सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे कवि, जो सीधे खड़ी बोली में आते हैं, उनके यहाँ न सिर्फ़ यथार्थ-बोध बल्कि सांस्कृतिक बोध भी औपनिवेशिक विमर्श के भीतर से निर्मित होता हुआ दिखाई पड़ता है। आप देखें तो,जहाँ राष्ट्रवाद की बात आती है, वहाँ सुभद्रा कुमारी चौहान हिन्दू अतीत और जौहर को याद करने लगती हैं—

है आती मुझे याद चित्तौर गढ की,

धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला।

है माता-बहिन रो के उसको बुझाती,

कहो भाई, तुमको भी है कुछ कसाला?

सुभद्रा कुमारी चौहान राष्ट्रवाद को आलोचनात्मक विवेक के साथ नहीं देखतीं। उनका राष्ट्रवाद एक स्त्री-आत्म या किसी विशिष्ट आत्म द्वारा देखा हुआ राष्ट्रवाद नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवादी विमर्श की तत्कालीन निर्मिति है। यहाँ राष्ट्र याद आने पर समूचा भारत और उसकी परंपरा नहीं याद आती। उसके साथ अकबर महान नहीं,सिर्फ महारणा प्रताप याद आते हैं। उसके साथ चित्तौड़ और रानियों का जौहर याद आता है, जो राष्ट्र के साथ जुड़कर सौंदर्यीकृत हो जाता है। जहाँ-जहाँ राष्ट्र का संकेत है, वहाँ-वहाँ राष्ट्र के समेकित अतीत के बजाय राष्ट्र का हिन्दू अतीत है और इस प्रयास में कई बार स्त्री-विरोधी बातों का भी सौंदर्यीकरण हो जाता है। उपर्युक्त कविता में इस बात को चिन्हित कर सकते हैं। इसी तरह जहाँ राष्ट्र और शौर्य का भाव आता है वहाँ सुभद्रा कुमारी चौहान तत्काल पुरुष के आत्म में ‘शिफ़्ट’ कर जाती हैं। इसके साथ ही उनकी भाषा में भी तब्दीली आ जाती है। वे वीरों के वसंत को याद करती हैं तो तुरंत राष्ट्र के समेकित स्मृतियों के बजाय हिन्दू गौरव-बोध में छलाँग लगा जाती हैं। फिर कई बार अपने स्त्री-आत्म के खिलाफ ही खड़ी हो जाती हैं। उन्हें अतीत याद आते ही लंका याद आता है ! कुरुक्षेत्र याद आता है ! हल्दीघाटी, सिंघगढ़ दुर्ग, राणा का घमंड याद आता है ! अतीत की ये स्मृतियाँ औपनिवेशिक विमर्श के भीतर से हिन्दू राष्ट्रवाद को रचती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्र और हिन्दू ओज तो निखर जाता है, लेकिन एक स्त्री का अनुभव और उसकी उपस्थिती छूट जाती है। सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचा गया यह शौर्य औरओज मर्द-केन्द्रित संरचना का ही पुनरुत्पादन है—जहां वीर ही मर्द है या मर्द ही वीरता की कसौटी—

कह दे अतीत अब मौन त्याग

लंके तुझमें क्यों लगी आग

ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;

बतला अपने अनुभव अनंत

वीरों का कैसा हो वसंत

 

हल्दीघाटी के शिला खण्ड

ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड

राणा ताना का कर घमंड;

दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत

वीरों का कैसा हो वसंत

 

भूषण अथवा कवि चंद नहीं

बिजली भर दे वह छन्द नहीं

है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;

फिर हमें बताए कौन हन्त

वीरों का कैसा हो वसंत

इन ज्वलंत स्मृतियों से यदि एक स्त्री-आत्म का संवाद होता,यदि एक स्त्री अनुभव के संदर्भ में इन स्मृतियों को देखा जाता, तो इनमें नव-सृजन होता, लेकिन इस तरह की कविताओं में सुभद्रा कुमारी चौहान का उद्देश्य यह नहीं है। इस बात के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान का बार-बार उल्लेख किया जाता है कि उन्होने स्त्री की अबला और बेचारी की छवि को तोड़कर उसे वीरांगना बना दिया। लेकिन, मैं जो कहना चाह रहा हूँ, वह यह कि वीरांगना का यह भाव स्वयं स्वतन्त्रता आंदोलन में पुरुषवादी भाव-बोध का एक हिस्सा था। उस विमर्श के भीतर स्त्री से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े, बड़े-बड़े त्याग करे, लेकिन बस अपने लिए कोई बात न करे! राष्ट्र के लिए लड़े, लेकिन पुरुष से अपने अधिकारों की बात न करे! राष्ट्रवाद और स्त्री के अंतरसंबंधों पर लिखते हुए पार्थ चटर्जी ठीक कहते हैं कि “आधुनिक भारतीय राष्ट्र ने भारतीय स्त्री की स्त्रियोचित एक ऐसी छवि का प्रचार किया जो सहिष्णुता, करुणा, सेवा की मूर्ति थी और जो परिवार और राष्ट्र के हित के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर थी।”(Art and nationalism in colonial india) ये दोनों ही बातें सुभद्राजी की राष्ट्र संदर्भी कविताओं में बहुत स्पष्ट दिखाई देती हैं। ‘झाँसी की रानी’ कविता और उसकी काव्य-भाषा पर गौर करें। एक स्थिति से दूसरी स्थिति में पहुँचते ही काव्यबोध और भाषा—सब बदल जाता है। रानी लक्ष्मीबाई औरतों में ‘मर्द’ बनकर खड़ी हो जाती है। वह स्त्री, जो रानी है, जो राज्य सँभाल रही है, जो स्त्री-पुरुष सब पर शासन करती है, जिसे जनताशीश नवाती है, वह स्त्री होने के नाते हीन है और बहुत तेजवान हुई तो मर्दों जैसी हुई!! ‘मर्दानों में मर्द’ बनने का यह बोध पूरे संरचनात्मक बोध में मौजूद है। यह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही भावों में उपयोग किया जाता है। सामान्यतः यह अपमानजनक मुहावरा है। स्त्री का मर्द जैसा होना उसकी कोमलता और मृदुभाषिणी छवि को तोड़ता है, इसलिए वह असम्माननीय है। लेकिन वीरता में उसका मर्द की तरह दिखना सम्माननीय है। इन दोनों में यह निहित है कि एक स्त्री पुरुष के विपरीत और दोयम है। वह पुरुष के विपरीत है लेकिन वीरता में पुरुष ही उसका अंतिम पैमाना है।

इनकी गाथा छोड़, चलें हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं में राष्ट्रवाद किसी आख्यान के सहारे आगे बढ़ता है और यह आख्यान पुंसवादी संरचना की ही एक निर्मिति है। सुभद्रा जी का स्त्री-आत्म इससे संवाद नहीं करता, बल्कि इसे सौंदर्यीकृत करता हुआ पल्लवित करता है। इसलिए इसमें वक्तृता का उपयोग होता है। सुभद्रा कुमारी चौहान के काव्य-बोध का दृश्य राजनीतिक स्तर, जिसका विमर्श उनके कविता से जुड़ने के पहले ही मज़बूत हो चुका था,उसमें उनके हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत कम बची थी। इसलिए राष्ट्रवाद से जुड़ते ही वे बोध और भाषा-दोनों ही स्तरों पर सामान्य और लोकप्रिय विमर्श का पल्लवन भर कर पाती हैं। यहाँ उनमे भाषिक सर्जनात्मकता भी सबसे कम दिखाई पड़ती है।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में एक दूसरे तरह की भी भाषा है और यह भाषा वहाँ है, जहां वे राष्ट्र के अतिरिक्त किसी और विषय पर केन्द्रित होती हैं: जैसे,वात्सल्य और प्रकृति पर लिखी गयी कविताओं की भाषा। वे अपनी इन कविताओं में शिश्न-केन्द्रित भाषा से निकलने की भरपूर कोशिश करती हैंऔर इसके लिए वे जिन दो पद्धतियों का उपयोग करती हैं, उनमें पहली है—व्यंग्य और दूसरी—मातृमुखी भाषा। अपनी कविताओं में जब शुभद्राजी यहाँ से देखती हैं तो कुछ कविताओं में उस दौर के राष्ट्रवाद के सबसे लोकप्रिय विमर्श पर भी व्यंग्य हो जाता है। पहले एक बहुत छोटी-सी कविता देखिए। शीर्षक है—प्रियतम से’—

बहुत दिनों तक हुई परीक्षा

अब रूखा व्यवहार न हो।

अजी, बोल तो लिया करो तुम

चाहे मुझ पर प्यार न हो॥

 

जरा जरा सी बातों पर

मत रूठो मेरे अभिमानी।

लो प्रसन्न हो जाओ

गलती मैंने अपनी सब मानी॥

 

मैं भूलों की भरी पिटारी

और दया के तुम आगार।

सदा दिखाई दो तुम हँसते

चाहे मुझ से करो न प्यार॥

इस तरह का व्यंग्य हिंदी कविता में बहुत विरल है। इस कविता को पढ़ते हुए लगता है कि पुरुष के आत्ममोह और अहं को ‘कांतासम्मित’ शैली में आईना दिखाया जा सकता है। आलोचक गरिमा श्रीवास्तव इस कविता का विश्लेषण करते हुए लिखती हैं कि “परिवार के अनुशासन से राष्ट्र सेवा के नाम पर मुक्ति-भले वह कुछ ही समय के लिए हो, इस कवयित्री के लिए महत्त्व रखती है। कलम पकड़ना उसने सीख लिया है, कवयित्री के रूप में वह भी स्थापित हो रही है, लेकिन जहां गृहस्थी और पति की बात आती है, वह किसी से मुठभेड़ करने के पक्ष में नहीं है। झुक कर, विनम्रता से स्वयं को भूलों भरी पिटारी बताते हुए समझौते के पक्ष मेंहै, ज्यों वह किसी रूठे बच्चे को मना रही हो। भावुकता और विनम्रता यहाँ पर प्रतिरोध के औज़ार के रूप में समझे जाने चाहिए।”(हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ) गरिमा श्रीवास्तव जी ठीक कहती हैं कि स्त्री कविता में विनम्रता और भावुकता भी रणनीति है, लेकिन सुभद्रा जी की इस कविता में तो व्यंग्य एकदम स्पष्ट है। सुभद्रा कुमारी चौहान की यह भाषा महादेवी वर्मा से एकदम अलग सरल-सहज और खुली हुई भाषा है। यह संप्रेषणीय और संवादधर्मी भाषा है। यह जीवन के ठोस और दृश्य यथार्थ को तत्क्षण उद्घाटित करने वाली भाषा है। एक और प्रेम कविता देखिए, शीर्षक है—करुण कहानी। एक स्त्री, मर्दवादी संरचना के भीतर प्रेम नहीं कर सकती। इसमें उसके आनंद और कामना के लिए जगह ही नहीं, यह सिर्फ़ पुरुष की कामना और उसके आनंद को व्यक्त करती है। लेकिन सुभद्रा कुमारी चौहान बहुत स्वाभिमानिनी हैं, वे इस सबको अपनी नियति नहीं मानतीं, बल्कि अपनी वाणी को व्यंग्य रूप में और धारदार बनाती हैं—

यहीं रुको बस, बहुत सुन लिया

तुमने उसका करुण कलाप ।

यहीं करो इति आगे सुनकर

नाहक ही होगा संताप ।।

 

अर्थहीन है, सारहीन है

उस पगली का सभी प्रलाप ।

भूलो उसे, भूल भी जाओ

समझो उसे अरण्य-विलाप ।।

 

मुझ अकिंचना के प्रति होकर

द्रवित न होना कहीं विकल ।

मेरी उष्म उसासों से मत

झुलसा लेना अन्तस्तल॥

स्त्री समझती है कि पुरुष को उसकी चाहत और पीड़ा से कोई मतलब नहीं है। पुरुष, स्त्री-दु:ख को अर्थहीन समझता है। इसलिए ऊपर की पंक्तियों में स्त्री अपना दु:ख बताने की कोशिश करती है, लेकिन नीचे तक पहुँचते-पहुँचते उसे समझ में आ जाता है कि यह पुरुष के सामने निरर्थक है, इसलिए उसकी सजह और संवेदनक्षम भाषा व्यंग्य से वक्र हो जाती है। ठीक इसके विपरीत संभवतः महादेवी वर्मासंभवतः इस प्रताणना का सौंदर्यीकरण और आदर्शीकरण करतींयाइस स्थगन को ही अपना काम्य बना लेतीं परंतु सुभद्रा कुमारी चौहान इसपर हमला करती हैं—

अपराधी है कौन, दण्ड का

भागी बनता है कौन ?

कोई उनसे कहे कि पल भर

सोचें रह कर मौन ।

 

वे क्या समझ सकेंगे

उनकी खीजमयी मनुहार ।

उनका हँस कर कह देना, ‘सखि,

निभ न सकेगा प्यार ।

 

यहीं कुचल दो, यहीं मसल दो

मत बढ़ने दो बेल

निर्मम जग के आघातों से

बिगड़ जायेगा खेल ।

 

मेरे लिए न करना, सखि,

तुम थोड़ा सा भी त्याग ।

जलने दो, मुझ को सुखकर है

यह जीवन की आग।

यह सुभद्राजी के प्रेम कविताओं की सामान्य प्रवृत्ति है। इस अवस्था में इनकी कविताएँ व्यंग्य में बदल जाती हैं, जिसे पढ़ते हुए मीरा नहीं, सूर की विदग्धा गोपिकाएँ याद आती हैं; जो ऊधव को अपने व्यंग्य से निरुत्तर कर देती हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान इसी तरह अपनी अधिकांश कविताओं में किसी एक बंद में पूरी कविता का अर्थ बदल देती हैं। यह व्यंग्य कुछ इस तरह और इतनी मासूमियत से भरा लगता है कि सुनने वाला तिलमिला के रह जाए और कोई बात न सूझे—

 

1

कोई उनसे कहे कि मेरा

ही है सब अपराध ।

उनको अपना कहूं हृदय में

मेरी ही थी साध।

2

बोलो, अब कृपा करो, कह दो,

कह दो, अब रहा नहीं जाता

यह मौन तुम्हारा हे मानी,

मुझ से अब सहा नहीं जाता

 

हंसती हूं, बातें करती हूं

खाती–पीती हूं, जीती हूं

यह पीर छिपाए अंतर में

चुपचाप अश्रु–कण पीती हूं।

 

यह मर्म–कथा अपनी ही है

औरों को नहीं सुनाऊंगी

तुम रूठो सौ–सौ बार तुम्हें

पैरों पड़ सदा मनाऊंगी!

सुभद्राजी की प्रेम कविताओं में स्त्री की मज़बूरियां भी देखने को मिलती हैं, लेकिन वे किसी एक जगह संघनित होकर न आँसू में बलदतीं हैं न नियति में, बल्कि वे कुश की अदृश्य नोक में बदलती हुई दिखाई देती हैं। स्त्री कविता में ऐसा मार्मिक व्यंग्य दुर्लभ है। यह एक नई भाषा है, जिस दिशा में स्त्री भाषा के पल्लवन की अपार संभावनाएँ हैं।

एन. स्टीवेंशन ने कहा है कि ‘बच्चा, छोटा और अकेला, माँ को जन्म देता है।’(जननी: माँ, बेटियाँ, मातृत्त्व—रिंकी भट्टाचार्य) अर्थात सिर्फ़ माँ ही बच्चों को जन्म नहीं देती बल्कि बच्चे भी एक माँ को जन्म देते हैं। यह एक माँ का जन्म भी है। मातृत्त्व स्त्री में एक नये व्यक्तित्त्व का जन्म है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में जहाँ-जहाँ बच्चे और बालपन आता है, वहाँ उनकी भाषा बहुत खिलंदड़ी हो जाती है। वहाँ वे उस खिलंदड़ेपन के सहारे शिश्निक-केंद्र को बहुत कुछ पार करती हुई लगती हैं या कोई नई भाषा बनती हुई लगती है। एक माँ का अपने बच्चों के साथ स्मृतियाँ बहुत सघन होती हैं और वे ऐसी स्मृतियाँ होती हैं, जिन पर पुंसवाद का दबाव अपेक्षाकृत कम होता है। इस दृष्टि से ‘मेरा नया बचपन’ कविता अलग से उल्लेखनीय है। इस कविता में यही हुआ है। इसमें सुभद्रा जी मातृमुखी हुई हैं, वे बेटी के सहारे शिश्न-केन्द्रित भाषा से पूर्व तुतलेपन में पहुँच जाती हैं और अपने उस केंद्र को पा लेती हैं, जहाँ व्याकरण और भाषा का दबाव बेहद कम होता है। अगर जुलिया क्रिस्टीवा की भाषा में समझें तो उसे ऐसी अवस्था कह सकते हैं जहाँ ‘सिंबोलिक’ में ‘सिमिऑटिक’ का प्रभाव ज्यादा मज़बूत होता है। जिस भाषा में स्त्री अपने अनुभव, अपनी देह और आनंद को सबसे सहज ढंग से महसूस करती है। बेटी और माँ का संबंध इतिहास की एक दूसरी रेखा है। यह सभ्यता के विकास का अलिखित इतिहास है। इस कविता में एक साथ तीन पीढ़ियों को याद किया जाता है। कवयित्रि अपनी बेटी को देखकर अपना बचपन याद करती है और साथ ही अपनी माँ को याद करती है। कवयित्रि इसकी एक कड़ी है जो पिछली पीढ़ी के अनुभवों को अपने बेटी तक संप्रेषित करती है। वह अतीत को याद करती है, लेकिन उस अतीत के रूप में अपनी बेटी को पाती है। सभ्यता की इस मातृमुखी रेखा का इस तरह एक वृत्त पूरा हो जाता है—“मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी। नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी।” नावोमी लेविन्स्की ने जिस ‘मातृरेखा’ की अवधारणा दी, वह यही है। लेविन्स्की के अनुसार ‘किसी महिला द्वारा स्वयं की क्षमताओं को पूरी तरह समझने के लिए उसे जैविक, ऐतिहासिक/सांस्कृतिक और अचैतन्य स्त्री की विरासत से होते हुए अपनी यात्रा अवश्य पूरी करनी चाहिए जो उसे उसकी माँ से पुत्री और फिर नातिन और परनातिन तक हस्तांतरित होती रहती है। इस प्रकार, मातृरेखा की विरासत के जरिए पुनः जुड़ते हुए एक महिला अपनी रचनात्मक्ता की सम्पूर्ण क्षमता की खोज कर सकती है।’ एलिस वाकर की तरह जो अपनी माँ का बगीचा खोजने गई थी और अपने जीवन के खोज में उतर गयी। सुभद्रा जी भी बेटी को देखकर उस मातृरेखा से जुड़ गयीं हैं—

‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।

कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

 

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।

मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

 

मैंने पूछा ‘यह क्या लायी?’ बोल उठी वह ‘माँ, काओ’।

हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा – ‘तुम्हीं खाओ’॥

 

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।

उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

 

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।

मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

 

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।

भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

सभ्यता की इस मातृरेखा को हिन्दी में पहली बार रचने का काम सुभद्रा कुमारी चौहान ने किया। इस कविता की भाषा सहज और बालमुखी भाषा है। ऐसी भाषा जहाँ श्रेणीकरण और पदानुक्रम का दबाव नहीं है। जहाँ से एक नई भाषा का जन्म हो सकता है। जहाँ ओज की जगह माधुर्य और वीरता की जगह वात्सल्य प्रधान है। जहां मुखरता की जगह मार्मिकता और काल्पनाशीलता प्रभावी है। इसी तरह की एक कविता है—कोयल। माँ और शिशु के संबंध की ऐसी ही कविता है—इसका रोना। जहाँ वे कोयल से संवाद करती हैं और पूछती हैं कि यह मीठी बोली तुमने अपनी माँ से सीखी है?‘इसका रोना’ शीर्षक कविता में माँ और बच्चे के प्राकृतिक संबंध को जिस तरह रचा गया है, वह स्त्री-कविता की एक थाती है। इस कविता में पुरुष का बच्चे से संबंध और स्त्री के संबंध का अलगाव एकदम साफ है, बल्कि कविता इसी अलगाव को बताती हुई ही शुरू होती है।

तुम कहते हो – मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है |

मैं कहती हूँ – इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है ||

सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे |

बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे ||

 

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो |

यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो ||

कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है |

छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है ||

 

हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है |

पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है ||

जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है |

छुटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है ||

 

मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है |

जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है ||

मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में |

जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में ||

 

मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ |

वह मेरी प्यारी बिटिया है मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ ||

तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान |

जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान ||

शिशु स्त्री को उसके केंद्र और विशिष्ट अनुभव से जोड़ देता है—जिस अनुभव और जिस व्यक्तित्त्व को दबाकर शिश्निक संस्कृति खड़ी होती है। लेकिन मातृत्त्व उसकी प्रकृति है, उसकी छोटी-सी अनुगूँज भी स्त्री को पुंसवादी संरचना के यथार्थ को उसके सामने खड़ा कर देती है। जिससे उसकी सोई हुई मातृमुखी स्मृतियाँ जाग जाती हैं और इतिहास की एक वैकल्पिक रेखा बनती हुई दिखाई देती है। स्त्री और शिशु का नाता इस सृष्टि में विशिष्ट है परंतु वह हमारी संस्कृति और उसकी छवियों से बाहर है। वह सिर्फ़ स्थगन और शून्यता में ही मौजूद है, लेकिन इतनी सहज भाषा में सुभद्रा जी उसे कविता में जगह दिलाती हैं। इस संदर्भ में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं; जैसे—खिलौने वाला, यह कदंब का पेड़, पुत्र-वियोग, अजय की पाठशाला। माँ और बच्चे का यह संबंध कविता की नई जमीन है, जहां से चीज़ें नई दिशा में जा सकती हैं। हिंदी में इस तरह की कविताओं को सामान्यतः बाल कविताएँ कह दिया गया हैया इनका इसी तरह उपयोग किया गया है, लेकिन इन कविताओं में मातृत्त्व का सघन अनुभव बहुत उज्ज्वल ढंग से रचा गया है—

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे॥.

अगर आप इन कविताओं को ध्यान से देखेंगे तो यह पाएंगे कि ये कविताएँ ठेठ खड़ी बोली की कविताएँ नहीं हैं; इसमें ब्रज भाषा के शब्द भी मिल जाएँगे और अवधी के भी। अर्थात इसमें भाषिक बहुवाचिकता है। और इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि मातृत्त्व की जमीन पर पहुँचते ही भाषा अपनी रूढ़ और ठोस स्थापत्य के इधर-उधर भी चलनशील हो जाती है। इसी तरह कुछ प्रेम की कविताएँ हैं, जिनकी भाषा कुछ अमूर्त और छायावादी-सी दिखाई पड़ती है, लेकिन इसका कारण छायावाद नहीं, स्त्री का आत्मानुभव है; जो स्वयं की अभिव्यक्ति में कुछ रहस्याभास पैदा कर सकती है। इस तरह की आकांक्षा और पंक्तियाँ सुभद्रा जी की कविताओं में अन्यत्र दुर्लभ हैं। और यदि कहीं मिलती भी हैं ऐसी पंक्तियाँ तो ऐसी कविताओं में जहाँ राष्ट्रवाद का दबाव नहीं है।इसलिए उनकी सबसे सर्जनात्मक और स्त्री-आत्म के अनुकूल कविताएँ राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी हुई नहीं हैं, सबसे सर्जनात्मक और स्त्री अनुभवों को वहन करने वाली कविताएँ मातृत्त्व और प्रकृति से जुड़ी हैं। उनकी प्रकृति पर लिखी कविताओं में भी यही होता है। जहाँ प्रकृति आती है वहाँ सुभद्रा जी के आत्म को मुक्त उड़ान का मौका मिलता है, वे कल्पना की दुनिया में निकल पड़ती हैं और शिश्निक दायरा टूटने लगता है। भविष्य इस बात का साक्षी होगा कि सुभद्रा कुमारी चौहान की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कविताएं वे हैं जिनपर राष्ट्रवाद की छाया नहीं पड़ी है।

आलेख के शुरुआत में इस बात की ज़रूरत बताई गयी थी कि हमें  कविता के तत्कालीन परिदृश्य में सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा की अवस्थितियों को समझना चाहिए। इस प्रक्रिया में हम दोनों ही कवयित्रियों को ज्यादा ठीक से समझ पाएँगे। क्योंकि, लगभग हम-उम्र होते हुए भी दोनों कवयित्रियों की अवस्थितियाँ भिन्न हैं—महादेवी वर्मा का सौंदर्यबोध छायावादी है और सुभद्रा कुमारी चौहान का—उत्तर-छायावादी। अवस्थिति के इस बदलाव से काव्यबोध में बड़ा परिवर्तन घटित होता है। हिन्दी कविता के लिए यह परिवर्तन शुभ रहा। महादेवी वर्मा में जो करुणा की जमीन है, सुभद्रा जी के यहाँ वह वीर, ओज और वात्सल्य में बदल जाता है।रस-निक्षेप का यह बदलाव शब्द-चयन में भी दिखाई पड़ता है। महादेवी की गृहमुखी काव्यभाषा, जो स्त्री-जीवन के अंधेरे कोनों को रचने के लिए उल्लेखनीय है, लेकिन स्त्री-काव्यभाषा का परिवृत्त बड़ा करने का श्रेय सुभद्राजी को जाता है।स्त्री-काव्यभाषा कीरहस्यवादी अंतर्मुखता और आत्मबद्धता की जकड़न खोलकर उसे बातचीत की भाषा के करीब लाने का श्रेय उन्हें जाता है। सुभद्राजी द्विवेदी युगीन वाक्य-विन्यास और व्याकरणनिष्ठता पर रीझती तो हैं, लेकिन उसके तात्समिक शुद्धीकरण से बच भी जाती हैं। इनमें द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता नहीं हैं, बल्कि इनकी कविताएँ आख्यानपरक हैं। काव्यभाषा के इन दो रूपों ने स्त्री-भाषा की भिन्न दिशाओं का उन्मोचन किया, भिन्न क्षितिज-अनावरणकिया,लेकिन इसे संपूरकता और समग्रता में ही समझना जा सकता है।

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(आशीष मिश्र विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़कर रिसर्च कर रहे हैं. अम्बेडकर नगर के रहने वाले आशीष ने दिल्ली विश्वविद्यालय और काशी  हिन्दू विश्वविद्यालय से पढाई पूरी की है.)

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