काले सच का कलात्मक उपन्यास : मेरा यार मरजिया

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आलोक रंजन/

मेरा यार मरजिया , अमित ओहलाण का यह उपन्यास उस समाजशास्त्रीय बहस को हिन्दी में लेकर आता है जिससे स्वयं समाजशास्त्र अब तक निबट नहीं पाया है। हरियाणा में प्रति हज़ार पुरुष पर लड़कियों की संख्या 750 के करीब है। मतलब चार लड़कों पर तीन लड़कियां, एक लड़के को लड़की नहीं मिलनी। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो यह स्थिति बहुत कुछ स्पष्ट नहीं करती। चार लड़कों में एक ही लड़के को लड़की नहीं मिलेगी न और हज़ार में ढाई सौ लड़के ऐसे होंगे। इससे मामले की भयावहता का पता नहीं चलता। शादी से वंचित लड़के जब लड़कियाँ लाने अलग-अलग जगहों का रुख करते हैं और वहाँ से लड़कियाँ लाते हैं तब असली स्थिति सामने आती है।

फौरी तौर पर यह बात किसी को भी नागवार गुजर सकती है कि शादी के लिए लड़कियों की ख़रीदफ़रोख्त होती है। लेकिन सतही विमर्शों से नीचे उतरकर देखें तो इस मामले के कई स्तर मिलेंगे जिसका कोई हल समाज खोज नहीं पाया और समाजशास्त्र जिसे अबतक सैद्धांतिक रूप नहीं दे पाया है। इसे खरीदफ़रोख्त मानते हुए ही बात करें तो भी यह दो जरूरतों को पूरा करने वाली स्थिति के रूप में सामने आता है। एक ओर देह की जरूरत है दूसरी ओर गरीबी, जहालत में भूख से लड़ने की जद्दोजहद करने वाले परिवार की जरूरत। ये दो ऐसी जरूरतें हैं जिनका आवश्यक मेल दिखता है। बिहार , झारखंड, उड़ीसा, उत्तराखंड , दक्षिण के राज्यों से लड़कियों को लाया जाता है। इन लड़कियों का परिवार आवश्यक रूप से बहुत गरीब होता है। उस गरीबी के बीच परिवार के लिए यह एक संजीवनी ही है।

यहाँ इसके विरोध में एक तर्क, लड़की की मर्ज़ी का दिया जाता है। कहा जाता है कि लड़की की मर्जी के विरुद्ध है इसलिए अपराध है। यहाँ दो बातें ठीक से देखने की जरूरत है। पहली बात, लड़की की मर्ज़ी को समझने के लिए उस समाज-मनोवैज्ञानिक भाव को समझना पड़ेगा जिसमें लड़की अपने परिवार को उस दुर्दम गरीबी से निकालने के लिए ‘कुछ भी’ करना चाहती है या कर सकती है। उस उस जहालत भरी दुनिया में जी रही लड़की की मर्जी भी इसी में होती है कि वह परिवार के काम आ सके। उन परिवारों की लड़कियों की यह समझ उन विमर्शों से बिल्कुल अलग है जहाँ बात ‘नो मेक-अप सेल्फ़ी’ लेकर   फोटो सोशल मीडिया पर डालने और उसे केंद्रीय स्त्री विमर्श ठहराने की कवायद होती है। दूसरी बात यह कि बड़े पैमाने पर इस तरह की घटनाएँ होने के बाद भी इक्का-दुक्का एफआईआर की खबर  हो पायी है। दूसरी बात पहली बात के प्रमाणस्वरूप कही जा सकती हैं।  यह तय करना अब तक कठिन ही रहा  है कि, यह अपराध है भी या नहीं और यदि है तो किसका अपराध है और इसकी प्रकृति क्या है।

उपरोक्त समाजशास्त्रीय बहस से बाहर निकलते हुए देखें तो यह उपन्यास मूलतः खरीदी हुई लड़की और उस अंजान लड़के की प्रेमगाथा है। लेकिन उससे पहले की एक बात भी जाननी जरूरी है कि लड़का नीम बचपने से एक रूह से प्यार करता है। उसी प्यार के वशीभूत उस रूह को शरीर देने के लिए वह एक स्त्री देह की तलाश करता है। अपने परिवेश के अनावश्यक नियम कायदे बनाने वाली समितियों की बैठकों में बचपन से ही बार-बार बेहोश होने वाला लड़का शादी के लिए अयोग्य ठहरा दिया जाता है। उसे प्रति हजार बचे हुए 250 लड़कों में डाल दिया जाता है जिनकी शादी नहीं होनी। शादी के लिए उपयुक्त लड़कों को ही लड़की दी जाएगी। पूरा उपन्यास उस लड़के का नाम नहीं बताता क्योंकि वह तो हर चार में से कोई एक हो सकता है। यदि वह योग्य होता तो कोई और अयोग्य।

लड़का नीम बचपने से एक रूह से प्यार करता है। उसी प्यार के वशीभूत उस रूह को शरीर देने के लिए वह एक स्त्री देह की तलाश करता है

अपनी जरूरत के अनुसार वह लड़की खरीदने की सोचता है। इसका विरोध उसे हर स्तर पर झेलना पड़ता है लेकिन वह अपनी जरूरत के प्रति आश्वस्त है। वह लड़की खरीदने के क्रम में उस प्रक्रिया से भी गुजरता है जिसे दलाली कहते हैं। अंततः वह लड़की को ख़रीद कर ले आता है लेकिन उस लड़की की देह और उस रूह के एकाकार होने का वह लंबे समय तक इंतज़ार करता है। अंततः लड़की हाँ कर देती है।

जब उसकी दुनिया में रूहानी और शरीरी प्रेम एकाकार हो रहा होता है उसी समय सामाजिक सच्चाइयाँ मुंह उठाने लगती हैं। समाज की इज्जत के ठेकेदार, प्रेम, अपने समुदाय से बाहर के प्रेम, अपने समुदाय से बाहर जाकर लायी गयी लड़कियों से विवाह आदि को समाज के लिए खतरा और अपनी झूठी शान के खिलाफ मान लेते हैं। गांवों गांवों में बैठकें होती हैं। फरमान पे फरमान जारी होते हैं। जोड़े मारे जाने लगते हैं, लड़कियाँ मारी जाने लगती हैं। हत्याओं, आत्महत्याओं का भयानक दौर चलता है। बात इस अंजान लड़के और उस खरीदी हुई लड़की के नए नए प्रेम तक भी आ जाती है। उनके सुनहरे दिनों पर ग्रहण लग जाता है। लड़के पर कई हमले होते हैं और उस पर लड़की को छोड़ देने का दबाव बनाया जाता है। फिर एक दिन वह लड़की गायब हो जाती है। इस बौखलाहट में लड़का हथियार उठा लेता है और अपने गाँव के उन लोगों की हत्या कर देता है जिन्होंने उसके प्रेम के खिलाफ होकर उसकी जिंदगी खराब कर दी।

यहाँ तक की कथा बहुत सरल रेखीय रूप में चलती है लेकिन इससे पहले और इसके बाद का हिस्सा खासा जटिल और बहुस्तरीय है। इससे पहले और इसके बाद की स्थिति में लड़का अपनी रूहानी प्रेमिका का हो जाता है। लड़के की मृत्यु भी कुछ इन्हीं स्थितियों में होती है। तबतक वह हत्याओं से ऊब चुका होता है।

इस उपन्यास की विशेषता इसके कथानक की बुनाई है। यथार्थ को समेटने के लिए गहन मनोवैज्ञानिक रास्ता लेते हुए  लेखक ने इसे गंभीरता से बरता है। बाल मन पर एक छोटी लड़की की लाश देख कर इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि वह उससे रूहानी प्रेम स्थापित कर लेता है। वह रूह कथनयाक के आल्टर ईगो की तरह चलती है, उसी के सोच के हिसाब से।  हिन्दी में इस तरह के उपन्यासों की संख्या बहुत कम रही है जो ऐसी मानसिक स्थितियों को व्यक्त भी कर सके। मेरा यार मरजिया यह काम करता है। उपन्यास में कीकर और रूह के से मानसिक स्थितियाँ जिस प्रकार का संबंध बनाती है वह इस कथानक को नए आयाम देती है।

अमित ओहलाण की यह किताब अपने समाज की उन स्थितियों को उघाड़कर रख देती है जहाँ केवल और केवल झूठी शान है। खाप पंचायतों का नाम लिए बिना यह उपन्यास उनके काम को सामने रखते हुए उनकी खुलकर धज्जियां उड़ाता है। उस समाज में जो है बस समाज की इज्जत है उसके सामने इंसान और इंसानी जान की कोई कीमत नहीं। हरियाणा की खाप पंचायतें इसी के लिए प्रसिद्ध भी हैं। मेरा यार मरजिया इसका एक दस्तावेज़ है।

अमित ओहलाण की यह किताब अपने समाज की उन स्थितियों को उघाड़कर रख देती है जहाँ केवल और केवल झूठी शान है

इस उपन्यास का क्राफ्ट और उसकी भाषा शुरू से ही आकर्षित करती है। कहानी के अंत से पहले ही यह पता चल जाता है कि यह किताब केवल उसके क्राफ्ट और भाषा के लिए भी पढ़ी जा सकती है। यथार्थ और कल्पना के ब्लेन्ड को प्रदर्शित करने के लिए कई बार भाषाई जटिलता का सहारा लेना पड़ जाता है बावजूद इसके या उपन्यास सरल भाषिक संरचना का उपन्यास है।

भाषा सहजता के माध्यम से लेखक कई बार ऐसे व्यंग्य करने में सफल रहा है जो केवल स्थितियों से पैदा नहीं हो सकती थी। जहाँ तक क्राफ्ट की बात है तो वह इस उपन्यास का अपना है जिसमें मूल कथा से बाहर – भीतर आने जाने के समय रचनाकार की कला और उसका कौशल प्रकट होता है। लेखक को स्मृति और पौराणिक आख्यानों को अपनी कथा के साथ पिरोना था उसके लिए एक रेखीय संरचना किसी काम की नहीं होती। उपन्यास में अंत से थोड़ा पहले ऐसा लगता है कि लेखक अपनी पकड़ थोड़ी देर के लिए खोता है उस समय, जो सघनता शुरू से बनी हुई थी उसका अभाव आ जाता है लेकिन एक झटके में लेखक उसे पुनः लौटा लेता है।

अंततः यह कि उपन्यास मेरा यार मरजिया एक जरूर पढ़ने लायक उपन्यास है जो हरियाणा की सच्चाई को अखबारों , टीवी और सुनी सुनाई खबरों के सतहीपन से आगे ले जाकर उसकी बारीकियों के एक मासूम प्रेम और उसके टूटने के आवेश की अति के माध्यम से अपनी बात कहता है।

(आलोक रंजन केरल में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं)

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