नौवाँ दशक और हिन्दी कहानी

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मृत्युंजय पाण्डेय/

मृत्युंजय पाण्डेय

कहानी हिन्दी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है । समय की कोई भी धुंध इसकी लोकप्रियता को कम नहीं कर पायी है । समय और समाज के सत्य को प्रस्तुत करने के लिए हिन्दी कहानी ने अलग-अलग काल में अलग-अलग तरीके अख्तियार किए हैं । समय के सत्य को खोलने के लिए कभी डायरी, कभी संस्मरण तो कभी रिपोर्ताज के रूप में भी कहानियाँ लिखी गयी हैं । आज कहानी का रूप काफी बदल चुका है, साथ ही कहानी के कहन शैली में भी अभूतपूर्व परिवर्तन आया है । प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र या अज्ञेय की कहानियों से बहुत भिन्न लिखी जा रही हैं आज की कहानियाँ । कहानी के रूप, कथन, शैली या कथानक की यह भिन्नता अनायास नहीं है । बदली हुई परिस्थितियाँ और जीवन मूल्यों में आये बदलाव की वजह से कहानी का रूप भी बदला है ।

भूमंडलीकरण, विश्व व्यापार संगठन पर हस्ताक्षर और बाबरी मस्जिद का विध्वंस आदि घटनाओं ने कहानी को बहुत गहरे रूप से प्रभावित किया है । यह सही है कि ‘नयी कहानी’ के कहानीकारों ने कहानी में बहुत परिवर्तन किया और वह परिवर्तन/बदलाव अच्छे रूप में आया । उन्होंने कहानी के स्वाद को बदलकर रख दिया । पर, 1990 के बाद की घटनाओं ने कहानी के पूरे ढाँचे को बदलकर रख दिया है । हिन्दी कहानी ही क्यों 1990 के बाद साहित्य की हर विधा प्रभावित हुई है । इस समय की छाप समाज, साहित्य और राजनीति तीनों पर देखी जा सकती है । कविता, कहानी और उपन्यास में भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पूँजीवाद और सांप्रदायिकता को बड़े पैमाने पर रेखांकित किया जा रहा है या यूँ कहें इन विधाओं में ये सारी चीजें अपनी घुसपैठ बनाती जा रही हैं । बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भारत में सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक दंगे बढ़े हैं । हिन्दू-मुसलमानों में भेद-भाव बढ़ा है । विश्वास और भरोसे की दीवार कमजोर हुई है । बहुत आसानी से भूमंडलीकरण, बाजारवाद और सांप्रदायिकता ने हमारे जीवन और साहित्य को प्रभावित किया है । बाजार का आलम यह है कि आज घर ही बाजार हो गया है और सांप्रदायिकता के विषय में तो कुछ कहना ही बेकार है । कहानीकार रवीन्द्र कालिया के शब्दों के सहारे से कहूँ तो आज ‘दुकानों-मकानों की छतों पर छोटी-छोटी पताकाओं के रूप में फहरा रही है सांप्रदायिकता, इश्तिहारों की शक्ल में दीवारों पर चस्पाँ दी गई हैं सांप्रदायिकता’ । आज हिन्दी कहानी में कहीं बाजार का कोलाहल है तो कहीं बाबरी मस्जिद के बिध्वंस की गूंज सुनी जा सकती है । 6 दिसम्बर, 1992 की उस मन्दिर-मस्जिद की घटना ने भारतीय समाज और इतिहास को बदलकर रख दिया । बाबरी मस्जिद की टूटन सारे देश की टूटन बन गई है । आतंकवाद इस देश में शामिल हो गया । 1992 की घटना ने मुसलमानों के साथ-साथ देश के दूर-दराज हिस्सों में बैठे, जीवन के लिए संघर्ष कर रहे, हिन्दुओं के जीवन को भी बदलकर रख दिया । उनके जीवन में यह टूटन आज भी दिखती है । प्रियदर्शन अपनी कहानी घर चले गंगाजी! में इस टूटन को बहुत बारीकी से दिखाया है ।  हम यह भी देख रहे हैं कि कहीं विकास की नीतियाँ बनाई जा रही हैं तो कहीं किसान भूख, गरीबी और कर्ज से तंग आकार फाँसी लगा रहे हैं । कहने का तात्पर्य है कि समकालीन हिन्दी कहानी अपने भीतर समाज के हर यथार्थ को समेटे हुए है । समाज का कोई भी यथार्थ, कोई भी सच उससे छूटने नहीं पाया है । 1900 से 2018 तक की अपनी विकास यात्रा में हिन्दी कहानी कई मोड़ों और कई पड़ावों से होकर गुजरी हुई है । यदि यह कहा जाए कि अपनी इस यात्रा में समाज और मनुष्यता के साथ वह भी लहूलुहान हुई है तो कुछ गलत नहीं होगा ।

सत्ता लेखक को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती है । वह चाहती है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ाई नहीं बल्कि उसके विचारों का प्रचार-प्रसार हो

आज लगभग देश के हर हिस्से में सांप्रदायिक विचारधारा पनप रही है। हिन्दुत्व और मुसलमनत्व के नाम पर इस विचारधारा का प्रचार-प्रसार भी खूब हो रहा है । कहीं बीफ पार्टी मनाई जा रही है तो कहीं चेहरे पर स्याही फेंकी जा रही है । कहीं गुलाम अली जैसे गजलकार को जगजीत सिंह की स्मृति में गाने नहीं दिया जा रहा है तो कहीं किसी लेखक को अपने विचार रखने के जुर्म में गोली मार दी जा रही है । सत्ता लेखक को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती है । वह चाहती है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ाई नहीं बल्कि उसके विचारों का प्रचार-प्रसार हो । हिन्दुत्व की रक्षा ने नाम पर हिन्दू आतंकवादियों को तैयार किया जा रहा है और सरकार उन्हें गले भी लगा रही है । आज समाज में मनुष्य से ज्यादा महत्त्व गाय की जान का है । ये सांप्रदायिक लोग कहीं भी भीड़ का रूप लेकर आपकी हत्या कर सकते हैं । समाज में एक डर का माहौल बना दिया गया है । सुभाष चन्द्र कुशवाहा ही ‘हूजी आतंकी’ कहानी में इसी समस्या को उठाया गया है । उस डर की ओर सिर्फ संकेत किया गया है । पर यह संकेत ही सारे सच को खोलकर रख देता है ।

भूमंडलीकृत इस युग में अपनी पहचान को बचाए-बनाए रखना अत्यंत कठिन कार्य है । भूमंडलीकरण और बाजारवाद की भीड़ में कच्ची और कमजोर रचनाएँ तुरंत दम तोड़ देंगी, बल्कि तनिक आगे बढ़कर कहें तो दम तोड़ दे रही हैं । इस बाजारवादी समय में लेखक की पहचान का संकट सबसे बड़ा संकट है । यांत्रिकता के इस युग में यथार्थ से जिस किसी का भी दामन छूटेगा वह इस कोलाहल में खो जाएगा, उसकी रचनाएँ दम तोड़ देगी । समय के सारे सच को समझने के बाद, समय के यथार्थ को प्रमुखता से उजाकर करना ही लेखक का प्रथम उद्देश्य है । उसे अपने प्रति, समाज के प्रति, मनुष्यता के प्रति प्रतिबद्ध होना पड़ेगा । उसे किस रास्ते जाना है उसे पता होना चाहिए ।

1990 के बाद कहानी की दुनिया में कुछ भाषा के बाजीगर भी आये हैं । पर, ये भूल जाते हैं कि यदि आपके पास अनुभव की कमी है तो सिर्फ भाषा की बाजीगरी से काम नहीं चलेगा । विडंबनाओं से भरे इस समय में लेखक को यह पता होना चाहिए कि उसे क्या कहना है । उसे कहाँ से खड़े होकर चीजों को देखना है । यदि चीजों को देखने-समझने की उसकी अपनी दृष्टि या जमीन नहीं है तो फिर आप भाषा की कितनी ही गुलाटियाँ क्यों न मारें आपका कुछ नहीं हो सकता । पाठक आपको उठाकर दरकिनार कर देंगे । यानी, भाषा के साथ-साथ आपकी दृष्टि और दिशा स्पष्ट होनी चाहिए । क्योंकि भटकाने वाली चीजें यहाँ बहुत हैं । इसी दौर में कुछ ऐसी कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं, जिनके लिखने का कारण समझ में नहीं आ रहा । कहानी की दुनिया में कुछ ऐसे लोगों का भी प्रवेश हुआ है जो रातों-रात प्रसिद्धि पाना चाहते हैं । वे क्या लिख रहे हैं, किसके लिए लिख रहे हैं, क्यों लिख रहे हैं, यह समझ में नहीं आ रहा । कुछ लोगों का उद्देश्य निश्चित रूप से ‘साहित्यिक सिद्धि’ नहीं है और ऐसे लोग हर समय में रहे हैं । इनसे घबराने की बजाए इन्हें नजरअंदाज करना चाहिए, जो साहित्य के नाम पर अनाप-सनाप पाठक को परोस रहे हैं । पाठक को छल रहे हैं । पर ये सारी चीजें बहुत दिनों तक नहीं चलतीं । संभव है उनका उद्देश्य भी बहुत दूर का न हो ।

इधर लम्बी कहानियाँ लिखने का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ा है । हर कहानीकार लम्बी कहानियाँ लिखने को इच्छुक दिख रहे हैं और लिख भी रहे हैं । प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्या वजह है कि हर कोई लम्बी कहानियाँ लिख रहा है, बगैर यह सोचे कि उसकी कहानियाँ कितने लोग पढ़ रहे हैं । जाहीर-सी बात है मनोरंजन के उद्देश्य से या समय काटने के उद्देश्य से कहानियाँ पढ़ने वाले लोग इन लम्बी कहानियों के पाठक नहीं हैं । आज की लम्बी कहानियाँ सामान्य नहीं बल्कि बौद्धिक वर्ग की कहानियाँ हैं । ‘काम धंधा से छुट्टी पाकर आराम से’ पढ़ने वालों के लिए अब कहानी नहीं रही । इन बौद्धिक वर्ग की कहानियों को आप ‘वैचारिक कहानियाँ’ भी कह सकते हैं । विचार से संबन्धित ये कहानियाँ समकालीन राजनीति एवं सरकारी नीतियों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रही हैं । यह बता रही हैं कि कैसे यह तंत्र हमारे सपनों से खेल रहा है । राजू शर्मा की ‘नोटिस’ और योगेंद्र आहूजा की ‘खाना’ कहानी ऐसी की कहानियाँ हैं । इन कहानियों को पढ़कर पाठक स्तब्ध और निशब्द हो जाता है । अति सामान्य घटनाओं को लेकर लिखी गई यह कहानियाँ हमें जड़ीभूत कर देती हैं । हमारे पास कहने के लिए कुछ नहीं बचता । ‘नोटिस’ या ‘खाना’ कहानी मामूली व्यक्ति की कहानी है पर इस मामूली व्यक्ति की मामूली घटना को कहानी में लाते ही कहानी का विस्तार हो जा रहा है । और इस विस्तार की वजह लेखक नहीं बल्कि बदली हुई परिस्थितियाँ है । तंत्र ने उस मामूली व्यक्ति के सामने सैकड़ों समस्याएँ खड़ी कर दी हैं । उस मामूली आदमी का जीवन उतना सहज-सरल नहीं है जितना हम आप सोचते हैं ।

हिन्दी में लम्बी कहानी लिखने की शुरुआत मुख्य रूप से 1990 के बाद होती है । संभवतः लम्बी कहानियाँ लिखने की शुरुआत उदय प्रकाश से होती है । भूमंडलीकरण, बाजारवाद और बाबरी मस्जिद के बिध्वंस के बाद उदय प्रकाश लम्बी कहानियों की ओर रुख करते हैं, सिर्फ रुख ही नहीं करते बल्कि उसे लोकप्रिय भी बनाते हैं । यह संभव है कि उदय प्रकाश से पहले लम्बी कहानियाँ लिखी गई हों पर उसे चर्चित और लोकप्रिय उदय प्रकाश ही बनाते हैं । उन्होंने कहानी की पूर्व प्रचलित कथा शैली को तोड़कर रख दिया । कहानी की दुनिया में वे एक नयी शैली के साथ प्रवेश करते हैं ।

इन लम्बी कहानियों के कुछ कहानीकार कहानी के नाम पर विवरण भर रहे हैं । सूचनाओं से कथा का विस्तार कर रहे हैं, पर वे भूल जाते हैं कि कहानी विवरण या सूचना नहीं है । आज कहानी लिखी नहीं जा रही बल्कि कहानी पर किसी प्रोजेक्ट की तरह काम किया जा रहा है । किसी कहानीकार से पूछिये, आजकल क्या हो रहा है तो वह यह नहीं कहता कि कहानी लिख रहा हूँ, वह यह कहता है कि कहानी पर काम कर रहा हूँ । आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अच्छी कहानी शोध से नहीं, जीवन अनुभव से आती है । शोध के द्वारा आप लम्बी-लम्बी कहानियाँ तो लिख सकते हैं, पर पाठक के हृदय पर राज नहीं कर सकते । कोई बहुत धैर्य से पच्चस-साठ पन्नों की लम्बी-लम्बी कहानियाँ पढ़ता है और अंत में उसे सिर्फ बतकही लगे तो फिर क्या कहना ! ऐसी कहानियों को हम ‘फार्मूलाबद्ध’ कहानी कह सकते हैं ।

लम्बी कहानियों के साथ एक और चीज दिख रही है । शुरू में कुछ कहानियाँ पत्रिकाओं में लम्बी कहानी के रूप में प्रकाशित हुईं, केलिन बाद में उसे उपन्यास का रूप दे दिया गया । हमें यह याद रखना होगा कि कहानी कहानी है और उपन्यास उपन्यास । आप दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं कर सकते । कहानी के मिजाज और उपन्यास के मिजाज में फर्क है । किसी भी तरह और कहीं से भी उदय प्रकाश की ‘मोहनदास’ और कृष्ण सोबती की ‘ऐ लड़की’ उपन्यास नहीं लगता । इसे कहानी ही माना जाए । एक लम्बी कहानी, जो निस्संदेह बहुत अच्छी हैं ।

समकालीन परिदृश्य पर यदि नजर डालें तो हम देखते हैं कि इधर कविता से अधिक कहानियाँ लिखी जा रही हैं और अच्छी कहानियाँ लिखी जा रही हैं । कहानी की दुनिया में नये-नये स्वर उभरे हैं । आज अधिकांश कहानीकार कविता लिख रहे हैं या अधिकांश कवि कहानीकार हैं, कुछ आलोचना भी लिख रहे हैं पर वे अपनी आलोचना में अपनी कहानियों का पक्ष नहीं लेते । यह कहानी के लिए एक शुभ संकेत हैं । वे बहुत कुछ पाठक के लिए छोड़ देते हैं । जबकि ‘नयी कहानी’ के अधिकांश कहानीकार कहानी लिखने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार भी करते थे । मार्कण्डेय, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, जैनेन्द्र आदि प्रमुख कहानीकारों ने कहानी पर पूरी की पूरी पुस्तक लिख डाली है ।

1990 के बाद हिन्दी साहित्य में दलित और स्त्री स्वर भी सुनाई देता है । इस समय भारत में काफी कुछ परिवर्तित हो रहा था । हमारी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संरचना तेजी से बदल रही थी । भारतीय राजनीति में कांसीराम और मायावती जैसे दलित नेताओं का आगमन हो रहा था । सिर्फ आगमन ही नहीं हो रहा था बल्कि बहुत तेजी से उनका प्रभाव भी बढ़ रहा था । अंबेडकर जो काम राजनीति में करना चाहते थे, वही काम समाज में, दलितों के लिए कांसीराम ने किया । वे उन्हें सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर और मजबूत बना रहे थे । हिन्दी साहित्य में दलित स्वर सुनाई देने में राजनीति का विशेष योगदान है । हाशिये की यह लड़ाई (दलित और स्त्री) आज साहित्य की मुख्य धारा में शामिल हो चुकी है ।

हिन्दी में लम्बी कहानी लिखने की शुरुआत मुख्य रूप से 1990 के बाद होती है । संभवतः लम्बी कहानियाँ लिखने की शुरुआत उदय प्रकाश से होती है

स्त्री और दलित के साथ-साथ आज हिन्दी कहानी में आदिवासी और थर्ड जेंडर की पीड़ा का स्वर भी सुनाई दे रहा है । मुख्य धारा के लेखकों ने इनकी पीड़ा को जन-जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है । आज तक इन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ी थी, आज पहली बार ऐसा हुआ है कि उनकी लड़ाई समाज के बिद्धिजीवी लड़ रहे हैं । उनके साथ कदम बढ़ाकर चल रहे हैं । दलित और स्त्री की तरह आज आदिवासी भी अपनी पीड़ा को साहित्य के माध्यम से दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं । आनंद हर्षुल की ‘मौत पर छलांग’ और योगेंद्र आहूजा की ‘खाना’ आदिवासी जन-जीवन की कहानी है । सूरज बड़त्या ने ‘कबीरन’ कहानी हिजरों के जीवन पर लिखी है । इस कहानी में हिजरों के प्रति समाज की असंवेदनहीनता और उनकी पीड़ा को शब्द दिया गया है ।

समाज के यथार्थ के साथ-साथ व्यक्ति का यथार्थ भी बदला है । चीजों को, समस्याओं को देखने का नजरिया बदला है । बाजारवाद की इस दुनिया में मनुष्य बेबस और बेरोजगार खड़ा है । वह बाजार का शिकार हो रहा है । उस पर चीजें थोपी जा रही हैं । बहुत चालाकी से हमारे पसंद-नापसंद पर कब्जा किया जा रहा है । बाजार हमारी आवश्यकताओं को पूरी करने की बजाए हमारी आवश्यकताओं को बढ़ा रहा है । आज मानवीय मूल्यों पर बाजार का प्रभाव बढ़ता जा रहा है । अखिलेश, उदय प्रकाश और कैलाश बनवासी जैसे कथाकारों ने इस क्रूर यथार्थ को बखूबी व्यक्त किया है । कैलाश बनवासी की कहानी ‘लोहा और आग…और वे…’ में बखूबी देख सकते हैं कि कैसे बाजार मनुष्य को अप्रासंगिक बनाता जा रहा है । बाजारवाद की इस दुनिया में पारंपरिक चीजें मजाक की वस्तु बनकर रह गई हैं । इस बाजारवाद का अत्यंत क्रूर रूप हमें संजय कुन्दन की कहानी ‘बॉस की पार्टी’ में भी देखने को मिलता है । कहानी का नायक मजाक, सहानुभूति और दया का पात्र बनकर रह जाता है । इस मध्यवर्गीय नायक की इच्छाएँ बहुत बड़ी नहीं, बल्कि छोटी-छोटी हैं । वह अपने परिवार को बुनियादी सुविधाएं देना चाहता है । पर वह भी मुहैया नहीं करा पाता । वह बाजार के चालाक भेड़ियों के बीच घिरा हुआ है । उसे चापलूसी या चमचागीरी नहीं आती । नतीजतन उसका प्रमोशन नहीं होता । वह चाहकर भी बॉस की चमचागीरी नहीं कर पाता । समय की विडम्बना उसे जोकर बनने पर भी बाध्य करती है ।

नव उदारवादी अर्थव्यवस्था की विडम्बना को रेखांकित करती हिन्दी में एक महत्तवपूर्ण कहानी है, ‘टावर ऑफ सायलेंस’ । संभवतः यह फारसी समाज पर लिखी गई हिन्दी की इकलौती कहानी है । यह कहानी फारसी समाज की अंतर्कथा को रेखांकित करती है । भारत में नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के आगमन के बाद छोटी-छोटी मिलें बंद हो गईं । इन मिलों के बंद हो जाने से इन मिलों पर आश्रित लोगों का जन-जीवन बहुत प्रभावित हुआ । इस नयी आर्थिक नीति और व्यवस्था ने आम जीवन को कठिन के साथ-साथ बदतर भी बना दिया है ।

आज ज्ञान से अधिक सूचनाओं का महत्त्व है । जिसके पास जितनी अधिक सूचनाएँ हैं वह उतना ही बड़ा ज्ञानी माना जा रहा है । पंकज मित्र की ‘क्विजमास्टर’ कहानी एक ऐसे युवक की कहानी है, जो जगह-जगह घूम कर क्विज कराता है । दरअसल यह वही समय है जब टेलीविजन पर कौन बनेगा करोड़पति आ रहा था । अनजाने में ही सही वह युवक उसी बाजार का हिस्सा बन जाता है, जिसका वह ट्यूशन न बढ़ाकर विरोध करता है ।

समय ने गाँव के चेहरे को भी बदला है । उसने लोगों की सोच में, मूल्यों में सेंध लगाया है । आज गाँवों में न तो प्रेमचंदयुगीन आदर्श रह गए हैं और न ही मूल्य । मानवीयता और मनुष्यता की भी विदाई गाँवों से हो चुकी है । देवेंद्र की कहानी ‘क्षमा करो हे वत्स!’ में इसी अमानवीयता और क्रूरता को दिखाया गया है । लेखक के जीवन की सत्य घटना पर आधारित यह कहानी अंदर से बेचैन कर देती है । कोई इतना अमानवीय और निर्दयी भी हो सकता है, सहसा मन इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता । पर यह उतना ही सत्य है जितना हम और आप । यह धरती और यह आकाश । अंशुल को गाँव में, उसी के पड़ोसी बड़ी बेरहमी से टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर मार देते हैं । उसकी लाश सूरजमुखी के खेत में क्षत-विक्षत अवस्था में मिलती है । इस अमानवीय समय के संदर्भ में, इस कहानी से, नामवर सिंह की सिर्फ दो पंक्तियाँ देखिए-— “क्षमा करो हे वत्स आ गया युग ही ऐसा / आँख खोलती कलियाँ भी कहती हैं पैसा ।” कहानी के अंत में अंशुल के शब्दों में एक कविता लिखी गई है, जो कविता कम यथार्थ अधिक है । आप बस उस यथार्थ को देखिए—

कुत्तों और बिल्लियों को भी

कब मारा गया था इस तरह इस गाँव में

हाथों में दूध के गिलास लेकर

किसे खोज रही हो माँ

सूरजमुखी के फूलों में

फेंक दिया गया हूँ मारकर ।

 

मृतात्माओं के इस प्रांगण में

क्या खोज रहे हैं आप सब

राख़ और हवा हो चुका हूँ पापा !

भयावह अट्टाहासों और अनंतकाल तक चलाने वाली

झूठ की इस अंत्याक्षरी में

हारना ही है आपकी नियति ।

 

रेत के इस बवंडर में

चक्कर खाते हुए, कुछ भी नहीं आएगा आपके हिस्से

आपकी थकान रह जाएगी

मरीचिका की इस यात्रा में

हम अब कभी और कहीं नहीं मिलेंगे पापा ।

गाँव के यथार्थ से रू-ब-रू कराती एक और कहानी है, ‘पालवा’ । भालचन्द्र जोशी की यह कहानी किसान जीवन की दुख भरी दास्तान है । यह कहानी कृषक परिवार की स्त्री के जीवन की कथा भी कहती है । साथ ही इस कहानी में बालक (बच्चा) के मनोविज्ञान का सुन्दर संजोजन किया गया है । यहाँ भालचन्द्र जोशी मनोविज्ञान के मामले में जैनेन्द्र से आगे बढ़ गए हैं । इसके अलावा इस कहानी में सामाजिक जड़ता और उस जड़ता के टूटन की आवाज भी सुनी जा सकती है ।

भाषा पर बात करें तो, भाषा के मामले में नयी सदी के ये कथाकार काफी सावधान हैं । कुछ कहानीकारों के यहाँ काव्यात्मक भाषा भी देखने को मिलती हैं । उनकी यह भाषा मन को मोह लेती है । कथाकार आनंद हर्षुल के यहाँ काव्यात्मक और संवेदनशील भाषा देखने को मिलती है । एक नमूना देखिए–- “आकाश कमरे के भीतर आये-बादलों और चिड़ियों सहित / बादल आयें तो नमी ले आयें और चिरिया आयें / तो पंखों में रखकर हवा ले आयें / हवा आये तो साथ-साथ पेड़ और पेड़ों का हरापन भी ले आये / पेड़ आयें तो अपनी जड़ों में मिट्टी ले आयें / और कमरा उस सोंधी महक से भर जाये / जो सूखी धरती पर पहली बारिश में धरती देती है / एक दृश्य के साथ, पीछे-पीछे आएंगे, न जाने कितने दृश्य / और स्त्री का कमरा दृश्यों से जगमग हो जाएगा / दृश्यों से जगमग कमरे की दीवारें भी / दृश्य में शामिल हो जाएंगी / और तब उनके पार जाना संभव होगा / बंद दरवाजे चाहे सदियों तक बंद रहें / दृश्य में शामिल दीवार को पार कर स्त्री कमरे के बाहर के दृश्य तक जा सकेगी / बाहर के दृश्य रात में बादल जाएंगे / रात अगर चाँदी की हुई तो दृश्य में चाँदी चढ़ी होगी / और रात गहरी होगी तो दृश्य उसकी गहराई में डूबे हुए होंगे / डूबे हुये दृश्यों को निकालना थोड़ा मुश्किल हो सकता है / पता नहीं वे कितने गहरे डूबे हों / स्त्री डुबकी लगाएगी / और साँस-भर दृश्य, आँखों में समेटकर ऊपर आ जाएगी ।” प्रियदर्शन के यहाँ भी ऐसी काव्यात्मक भाषा दिखती है— “बाहर धारासार बारिश हो रही है / आसमान में जैसे काले हाथी दौड़ रहे हैं / एक छोर से दूसरे छोर तक कड़कती बीजलियों के पीछे / धरती से आकाश तक मोटी-मोटी बूँदों की एक तूफानी झालर टंगी हुई है / वह झालर कभी-कभी हमारे चेहरों तक चली आती है / हमारी उँगलियाँ कभी-कभी उस झालर को छु लेती हैं / हमारी निगाह आसमान पर है ।” प्रियदर्शन के यहाँ ऐसी भाषा इफरात में मिलती है । इस पीढ़ी के कठकारों की भाषा सहज-सम्मत है । भालचन्द्र जोशी की भाषा का नमूना देखिए— “जैसे यह उदासी की सड़क है, उसी तरह हँसी की सड़क भो होगी । वहीं कहीं मेरी हँसी भी बिछी होगी ।”  कहानी के बीच काव्य का सुख इस सदी के लेखकों की खास पहचान बन गई है ।

अंत कथाकार राजेन्द्र यादव के शब्दों के सहारे से करना चाहूँगा, नयी सदी के ये कथाकार ‘नयी दुनिया के अन्वेषक’ भी हैं ।

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(चौबीसवें  ‘देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान’ से पुरस्कृत युवा आलोचक मृत्युंजय पाण्डेय बिहार के गोपालगंज कस्बे के रहने वाले हैं। हिंदी आलोचना में अपना गंभीर हस्तक्षेप रखने वाले मृत्युंजय पाण्डेय, कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी करने के बाद, इसी विश्वविद्यालय से सम्बंधित सुरेन्द्रनाथ कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक हैं।)

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