महेंद्र सिंह धोनी: जिसका कोई विकल्प ही नहीं

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उमंग कुमार / 

रविवार को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ऊपरी क्रम के सारे धुरंधर बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे. टीम को उबारने की जिम्मेदारी हार्दिक पंड्या के साथ महेंद्र सिंह धोनी ने ली. माही के नाम से मशहूर रांची के इस खिलाड़ी न केवल भारतीय टीम को जीत दिलाई बल्कि अपना अर्ध-शतकों का सैकड़ा भी पूरा किया. इस तरह वह उस चौकड़ी में शामिल हो गए जिनके पास अर्ध शतक का सैकड़ा मारने की उपलब्धि है. उनके नाम देखकर इस उपलब्धि का आपको अंदाजा लग जाएगा. सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली.

याद कीजिए श्रीलंका दौरे से पहले इनको लेकर कैसी बाते होती थी. माही को चूंका हुआ खिलाड़ी मान लिया गया था. इस खिलाड़ी ने चुप्पी साधे रखी और सही समय का इंतज़ार किया, जैसा यह अमूमन अपने कप्तानी के दिनों में खेल के मैदान में किया करते थे. सही मौके पर सही हथियार चलाने की रणनीति, ना कि भावुक होकर बयानबाजी करना.

धोनी के इस बिना आवाज जवाब से अब सभी लोग सहमत होते दिख रहे हैं. हाल में आया भारतीय टीम के कोच रवि शास्त्री का बयान इसका साक्षात् उदहारण है. शास्त्री को ऐसा कहना पड़ा कि माही तो अभी आधे भी खर्च नहीं हुए हैं.

लगभग 14 साल से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के बाद धोनी आज 300 से अधिक एक-दिवसीय मैच खेल चुके हैं . बिना किसी किताबी तकनीक के इस खिलाड़ी का इतने मैच खेलना भी एक उपलब्धि है.

न केवल अर्ध-शतक के सैकड़े में बल्कि सबसे अधिक रन बनाने में भी वो उन दिग्गज खिलाडियों के साथ खड़े नज़र आते हैं. धोनी भारत के चौथे सबसे अधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी है. पर उनकी यह उपलब्धि उन्हीं के अन्य कारनामों की वजह से पीछे छूट जाता है. जैसे यह बल्लेबाजी के लिए कम देश के सबसे सफल कप्तान के तौर पर अधिक याद किये जाते हैं.

बल्लेबाजी की उपलब्धि पर बात करें तो धोनी का कारनामा इसलिए भी अधिक मायने रखता है क्योंकि बाकी के तीन अव्वल खिलाड़ी तो सिर्फ बल्लेबाजी करते थे दूसरे वे उपरी क्रम में बल्लेबाजी करने आते थे. इधर बल्लेबाजी में भी धोनी का क्रम तय नहीं रहा है. सामान्यतः वे पुच्छले बल्लेबाजों के साथ बल्लेबाजी करते हैं. सफल कप्तान, सफल बल्लेबाज के पीछे उनका सफल विकेटकीपर होना तो दब ही जाता है.

याद रहे कि धोनी के पहले भारतीय टीम में महज़ विकेट कीपिंग के नाम पर एक खिलाड़ी की जगह रिज़र्व हुआ करती थी.

बतौर बल्लेबाज धोनी को जब जिस स्थान पर खेलने का मौका मिला उन्होंने अपनी क्षमता साबित की. इंडिया टुडे के एक लेख के अनुसार अपने कुल 9,608 रन में धोनी ने नंबर 6 पर खेलते हुए 115 मैच में 3,738 रन बनाए. नंबर 5 पर बल्लेबाजी कर उन्होंने 67 मैच में 2,693 रन बनाए हैं. अब 302 एक-दिवसीय मैच खेलने के बाद उनका स्कोर बढ़कर कुल 9,737 रन हो चुका है.

अपने कुल दस शतक में धोनी ने दो शतक नंबर तीन पर खेलते हुए बनाए हैं जिसमे श्रीलंका के खिलाफ उनकी 183 रन की सर्वश्रेष्ठ पारी भी शामिल है. नंबर चार पर खेलते हुए भी उन्होंने 26 मैच में 1,223 रन बनाए.

लेकिन जब कप्तानी उनको मिली तो वे जानबूझ कर अपने को निचली क्रम में ले आये और अक्सर उस स्थिति में खेलने आये जब भारतीय टीम कठिन स्थिति में खेल रही हो. यूँही नहीं है कि वीरेंद्र सहवाग जैसे खिलाड़ी को यह कहना पड़ा कि अभी माही को हटा उनकी जगह खेलने लायक खिलाड़ी मौजूद नहीं है. खासकर 2019 के विश्वकप के मद्देनजर.

उनकी इस लम्बी और सफल यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि बड़े बाल वाले झारखण्ड के विकेटकीपर-बल्लेबाज जब भारत की जर्सी पहली बार पहने मैदान में उतारे थे तो कत्तई किसी को उनसे इतने की उम्मीद नहीं थी. भारतीय टीम की कप्तानी भी उनको महज इसलिए मिली क्योंकि कप्तानी के लिए टीम मैनेजमेंट के पास बहुत विकल्प नहीं थे. वीरेंदर सहवाग एक-दिवसीय फॉर्मेट में परफॉर्म नहीं कर पा रहे थे तो युवराज का टेस्ट में खेलना तय नहीं था. धोनी ही थे जिनकी टेस्ट और एक-दिवसीय मैच में जगह पक्की थी. इसलिए उन्हें कप्तान बनाया गया.

दो साल पहले तक उनके खेलने को लेकर कोई सवाल नहीं उठा पा रहा था. तब जब उनके खेलने में कुछ ऐसा नहीं था, जैसे उस समय के अन्य दिग्गज सचिन, राहुल द्रविड़ या सौरव गांगुली में था. यहाँ तक की युवराज की भी तकनीक उनसे बेहतर थी. पर अपने ईजाद किये हुए तरीकों से धोनी ने कुछ ऐसी पारियां खेलीं जो हमेशा याद कि जायेंगी. हेलीकाप्टर शॉट की मदद से श्रीलंका के खिलाफ उनकी 183 रन की पारी को कौन भूल सकता है.

पर पिछले कुछ सालों में उनका बल्ला वो कमाल नहीं कर पा रहा था और लोग जो हर बुरे मैच पर बुरा और अच्छे मैच पर अच्छा बोलने लगते हैं, उन्होंने मान लिया था कि धोनी के दिन अब पूरे हो गए हैं. धोनी ने इन सबको अब बिना कुछ बोले अपना जवाब दे दिया है.

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