सादगी का ब्यौरा है सेवाग्राम

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चैतन्य चन्दन/

इन दिनों महाराष्ट्र के वर्धा जिले में स्थित सेवाग्राम काफ़ी चर्चा में है. दरअसल विगत 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक सेवाग्राम में आयोजित की गई. इसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शिरकत करने सेवाग्राम पहुँचे. वहां दोपहर के भोजन के बाद उन्हें भी ख़ुद की थाली धोते देखा गया. वैसे मीडिया ने इस थाली धोने पर भी राजनीतिक रिपोर्टिंग कर दी. लेकिन हम आपको बताएँगे कि वहाँ सिर्फ राहुल गाँधी ही नहीं बल्कि जो भी जाता है वह अपनी थाली खुद धोता है. अमूमन नीचे बैठकर खाता है.

नागपुर के निकट वर्धा जिले में सेगांव नामक एक गांव था. वर्ष 1930 में गांधीजी ने जब नमक सत्याग्रह के तहत दांडी यात्रा की शुरूआत की तो उन्होंने निश्चय किया कि जबतक स्वराज की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक वे वापस साबरमती आश्रम नहीं लौटेंगे. इसी क्रम में उद्योगपति जमनालाल बजाज के आमंत्रण पर वर्ष 1934 में गांधीजी सेगांव आए. उन्हें यहाँ की आबोहवा इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने अपना आश्रम यहाँ बनाने का निश्चय कर लिया. गांधीजी ने यहाँ अपना आश्रम बनाया और गांव का नाम बदलकर ‘सेवाग्राम’ रख दिया.

सेवाग्राम के बारे में कुछ इसी तरह की विशेष बातों से आज हम आपको परिचित कराएँगे. आईये हम आपको बापू द्वारा बसाए गए गांव सेवाग्राम की सैर पर लिए चलते हैं.

  • आख़िरी निवास: इस कुटिया को उद्योगपति जमनालाल बजाज ने अपने रहने के लिए बनवाया था. सेवाग्राम आने पर वह यहीं ठहरते थे. वर्ष 1946 में जब गांधीजी की तबियत बिगड़ी तो डॉक्टरों ने उन्हें अलग रहने की सलाह दी. तब से अपने जीवन के अंतिम दिनों तक गांधीजी इसी कुटिया में रहे.

  • सूर्यस्नान: गांधीजी के आख़िरी निवास वाली कुटिया के ठीक सामने एक पेड़ लगा है. गांधीजी प्राकृतिक चिकित्सा के पक्षधर थे और उन्होंने इसे अपने जीवन में भी उतारा था. वे अपनी देह की मालिश के बाद यहीं बैठकर धूपस्नान करते थे.

  • बापूकुटी: यह गांधीजी का मुख्य निवास कक्ष था, जिसके एक हिस्से में उन्होंने एक कार्यालय बना रखा था. कुटिया के बाहर एक पीपल का विशाल पेड़ है जिसे गांधीजी ने वर्ष 1936 में रोपा था. कुटिया में गांधीजी द्वारा अपनाए गए 11 व्रतों (सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, असंग्रह, शरीरश्रम, अस्वाद, निर्भयता, सर्वधर्म समभाव, स्वदेशी, अस्पृश्यता निवारण) के बारे में बताते हुए एक बोर्ड लगा है और आश्रम आने वाले लोगों से इन व्रतों का पालन करने की अपील भी की गई है.

  • तराज़ू: आख़री निवास के बाहर एक वज़न तोलने का तराज़ू रखा है, जिसके माध्यम से बापू अपने वज़न के उतार-चढ़ाव पर नज़र रखते थे.

  • बा कुटी: आख़िरी निवास के निकट एक और कुटिया है, जिसमें कस्तूरबा गांधी यानी बा निवास करती थीं. कुटिया के सामने तुलसी के कुछ पौधे लगे हैं. आगा खां पैलेस में नज़रबंदी के दौरान जब कस्तूरबा गांधी और महादेवभाई देसाई शहीद हो गए थे, तब बा द्वारा लगाए गाए तुलसी के पौधे को बापू वर्ष 1944 में आश्रम लेकर आए और उसे अपने हाथों से यहाँ लगाया.

  • बा का चरख़ा: यह बिलकुल अलग डिज़ाइन का चरख़ा है. गांधीजी और बा नियमित तौर पर चरख़ा चलाते थे. लेकिन गांधीजी पारम्परिक चरखे की उत्पादकता से ख़ुश नहीं थे और इसके डिज़ाइन में बदलाव के लिए बहुत बेचैन थे. 29 जुलाई 1929 को चरखा संघ की ओर से गांधी जी की शर्तों के अनुसार चरखा बनाने वालों को एक लाख रुपया पुरस्कार देने की घोषणा की गई. लेकिन शर्तों के अनुसार कोई भी डिज़ाइन प्राप्त नहीं हुआ. किर्लोस्कर बंधुओं द्वारा एक चरखा बनाया गया था, लेकिन वह भी पूरी तरह से गांधीजी की शर्तों पर खरा नहीं उतर सका. इस चरखे के डिज़ाइन को देखकर लगता है कि शायद यह उसी प्रतियोगिता में प्राप्त हुआ हो.

  • प्रार्थना स्थल: बा कुटी के ठीक सामने एक बड़े से चौकोर आकार की भूमि है. यहाँ गांधीजी प्रतिदिन सुबह और शाम प्रार्थना करने के लिए बैठते थे.

  • गांधी स्मारक: सेवाग्राम आश्रम से क़रीब चार किलोमीटर की दूरी पर धाम नदी की धाराओं के बीच एक स्तम्भनुमा संरचना दिखाई पड़ती है. यह गांधी स्मारक है. यहाँ गांधीजी की अस्थियाँ विसर्जित की गई थी.

  • यात्री निवास: सेवाग्राम में गांधी आश्रम के ठीक सामने सड़क के दूसरी तरफ़ पर्यटकों और गांधी अध्ययन के लिए आने वाले लोगों के ठहरने के लिए यात्री निवास का निर्माण किया गया है, जिसमें न्यूनतम आवश्यकता की सुविधाओं सहित कमरे उपलब्ध करवाए जाते हैं.

(लेखक एक अंग्रेजी पत्रिका में वरिष्ठ पत्रकार हैं. तस्वीर उन्ही की ली हुई है.)

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