बरहज:यह कस्बा कहानियों में खेलता है

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अमन त्रिपाठी युवा हैं और ‘एसर्टिव’ हैं. बेहतरीन कविताएँ लिखते हैं और उन कविताओं के बीच ही, विराम की तरह नहीं लंबी साँस की तरह, छोटे से अपने कस्बे को ‘एसर्ट’ किया है. बरहज: सरयू के किनारे का यह कस्बा सैकड़ों वर्षों से चुप-चुप अपना योगदान भारत के इतिहास में, क्षेत्रीय समस्याओं की सुलझनों में देता रहा है. जो देवरिया से दूर हैं उनके लिए बरहज ही सबकुछ है. अमन ने बड़ी और हरी तबीयत से बरहज को रेखांकित किया है.

अमन त्रिपाठी

अमन त्रिपाठी/

उत्तर प्रदेश, देवरिया ज़िले में एक छोटी-सी जगह है, बरहज. यह कस्बा कभी बहुत विपन्न नहीं रहा. अब तो यह बड़ा नगर हो गया है, और आस-पास दस-बारह किलोमीटर के दायरे में सबसे बड़ी बाज़ार इसी नगर में है, लेकिन सौ साल पहले भी यह एक मशहूर और समृद्ध कस्बा हुआ करता था. कारण, नदी के किनारे बसा हुआ होना, और ज़िले में सबसे अधिक देशी चीनी मिलों (खांड़सारी) का इस शहर में होना. एक समय इस छोटे से कस्बे में लगभग 300 कारखाने थे. आज यहाँ जो भी छोटी-बड़ी कोठियाँ दिखती हैं, वो या तो महाजनों के घर हुआ करते थे या फिर चीनी के कारखाने.

बरहज का बना हुआ सीरा नदी के रास्ते बिहार होते हुए बंगाल-ढाका तक जाता था. साल 1957 तक यहाँ पानी की जहाज़ें चलती थीं और यहाँ घाट पर एक जहाज़-बाबू की नियुक्ति रहती थी.

यहाँ के कारखानों से जो सीरा मिलों में ले जाया जाता था, वह टीन के कनस्तर में जाता था. बैलगाड़ी से उन कनस्तरों को ले जाते हुए सीरा सड़क पर चूता जाता था. कहते हैं, औरतें उन बैलगाड़ियों के पीछे-पीछे उस गिरते सीरे को रोकने के लिए चलती रहती थीं. उसी चूते हुए सीरे को बेच-बेचकर वो सोने की हँसुली पहनती थीं. आज भी किसी को यह कहते यहाँ सुना जा सकता है कि बरहज में सवा-घड़ी सोना बरसता है. यानी, वो समय, जब बैलगाड़ियाँ सड़कों पर से निकलती थीं, उस समय यहाँ सोना बरसता था.

आज भी किसी को यह कहते यहाँ सुना जा सकता है कि बरहज में सवा-घड़ी सोना बरसता है

यहाँ एक बेचू साव थे. अनन्त महाप्रभु जिनके बागीचे में आकर तपस्या करने लगे थे और सूखा बागीचा कुछ महीनों में ही हरा-भरा हो गया था. इन्हीं अनन्त महाप्रभु के शिष्य थे बाबा राघवदास, जिनको पूर्वांचल का गाँधी कहा जाता है. उन बेचू साव के यहाँ शादी पड़ी. बारातियों की संख्या का कोई अनुमान नहीं था. तय हुआ बारातियों को शरबत पिलाया जाएगा लेकिन इतनी बड़ी बारात के लिए कितना शरबत बनवाया जाए. बेचू साव के दरवाज़े पर एक कुआँ था, उसमें उन्होंने चीनी के बोरे घुलवा दिए. उस कुएँ में से महीने भर मीठा पानी आता रहा था.

जहाज़ का आना बन्द हुआ, चीनी मिलें बन्द होने लगीं, कारखाने बन्द होने लगे. जो चीनी के साहूकार थे, अब लोहे का कारोबार करने लगे. यहाँ लोहे के व्यवसाय ने भी लम्बी मार की. यहाँ बने लोहे के सामान दूर-दूर मेलों में जाते थे.

लोहे का काम भी बन्द होने के बाद, इस शहर का कोई ख़ास चरित्र नहीं रह गया. यह बस एक ‘नगरपालिका’ रह गया. पुराने इतिहास और बाबा राघवदास के नाम पर मुग्ध भर. बचा है तो बस उन साहूकारों का नाम, लोगों की बातों में. और उन लोगों का नाम, जिनको उनके रहते यह कस्बा झुक कर प्रणाम करता रहा. व्योमेश जी की एक कविता का शीर्षक जब-तब याद आता है – ‘बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं’.

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बरहज का लिखित इतिहास बहुत पुराना नहीं है. कहते हैं, इसका नाम किन्ही ‘बरहना बाबा’ के नाम पर पड़ा. वो नदी के किनारे रहते थे. यह लगभग वही समय होगा जब दिल्ली में शाहजहां का शासन होगा. बरहना बाबा की मृत्यु बिच्छू के डंक मारने से हुई थी. मरते हुए उन्होंने बिच्छुओं की प्रजाति को बरहज से खत्म हो जाने का शाप दिया था. यह सच हो या कपोल-कल्पित, बरहज में बिच्छू सचमुच नहीं मिलते. मैंने आज तक कभी यहाँ कोई बिच्छू नहीं देखा न ही और कोई ऐसा कहता है.

कोई डेढ़ सौ साल पहले (सन 1874-76) इधर से एक ब्रिटिश आर्कियॉलॉजिस्ट Alexander Cunningham अपने सहयोगी A. C. L. Carlleyle के साथ गुज़रा था, जिसने इस जगह के बारे में लिखा है. उसने कहा है – यह ब्राह्मणों की बस्ती थी जिन्हें मुस्लिम शासकों ने इस्लाम स्वीकार करवाया था. उन्हीं ‘बिरहमनों’ में से कोई ‘बरहना बाबा’ हुए थे, जिनके नाम पर यह कस्बा बसा. ‘गोरखपुर गजेटियर – 1908’ में भी यही सब बातें दर्ज हैं.

बरहज के बारे में ज्यादा बातें उस समय के बाद की सुनाई देती हैं, जब से अनन्त महाप्रभु बरहज में आए. जब वे बरहज में आए तब उनकी अवस्था 99 साल की थी. वे 1857 की लड़ाई में भूमिगत हुए थे और कई वर्षों बाद साधुओं के वेश में 1876 में बरहज पहुँचे थे. यहाँ आकर उन्होंने तपस्या की और आश्रम की स्थापना की. उनकी मृत्यु के समय उनकी अवस्था 139 साल की थी. उस समय उनकी भौंहें इतनी लटक जाती थीं कि आँखों को ढँक लेती थीं. देखने के लिए उन्हें अपनी भौंहों को ऊपर उठाना पड़ता था. उनके शिष्य बाबा राघवदास मराठी ब्राह्मण थे जो अनन्त महाप्रभु का नाम सुन कर पंद्रह वर्ष की अवस्था में घर से बरहज भाग आए थे. बाबा राघवदास आश्रम पर कम और स्वतंत्रता आंदोलनों में ज़्यादा रहते थे. उन्होंने बरहज के कई युवकों को स्वतंत्रता-आंदोलना का रास्ता दिखाया. रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत के बाद सबसे पहले इन्हीं कुछ युवकों ने उनकी चिता से राख लाकर बरहज में उनकी समाधि बनाई. आज भी यह समाधि बरहज-आश्रम में मौजूद है. 1921 में गाँधी जी गोरखपुर आए थे, तो बाबा राघवदास के साथ बरहज से चार युवक गोरखपुर गए थे. वहाँ ये शान्ति-पाठ कर रहे थे. गाँधीजी एक नवयुवक के सामने रुके. पूछा – क्या पढ़ रहे हो ?

– शान्तिपाठ कर रहे हैं.

गाँधी जी – देश के लिए क्या करोगे ?

– खद्दर पहनेंगे, चरखा चलाएँगे, जेल जाएँगे.

गाँधी जी – यह सब तो करना, लेकिन उर्दू ज़रूर पढ़ना.

और गाँधीजी अपनी एक माला उस लड़के के गले में डाल के बढ़ गए.

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1942 में कैप्टन मूर की गोली से दो प्रदर्शनकारी, विश्वनाथ मिश्र और जगन्नाथ मल्ल, शहीद हो चुके थे. इससे पहले 1939 में बरहज में छोटे व्यापारियों के हक़ में हुए आंदोलन में कई लोग जेल जा चुके थे. बरहज की सड़कों पर किनारे-किनारे चौकी लगा के लोग सामान बेचते थे. अंग्रेजों का दमन चला तो पुलिस उन छोटे व्यापारियों को वहाँ से उजाड़ने लगी. इसके विरोध में वहाँ एक ‘तख्ता-पटरा एसोसिएशन’ बनाया गया था जिसका नेतृत्व विश्वनाथ त्रिपाठी कर रहे थे. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. फिर 1944 तक वो दो तीन बार महीने-दो महीने के लिए बाहर आते, फिर गिरफ्तार कर लिए जाते. विश्वनाथ राय, अक्षयबर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी वगैरह उसी दौर के आंदोलनों से निकले थे.

1944 में पं. नेहरू अपने देश के दौरे के सिलसिले में बरहज भी आए. विश्वनाथ त्रिपाठी तब जिला कांग्रेस के अध्यक्ष थे. पंडित जी तय समय से छः-सात घंटे लेट थे और रात के दस बजे पहुँचे थे. शहीद जगन्नाथ मल्ल और विश्वनाथ मिश्र के परिवार वालों को मुआवजा देने के लिए किसी तरह इक्यावन-इक्यावन रुपए इकट्ठा हुए थे. पंडित जी ने धीरे से कहा – हुश! इतने में क्या होगा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा – अरे इतने में छप्पर वगैरह का तो इंतजाम हो जाएगा!

बरहज के बारे में ज्यादा बातें उस समय के बाद की सुनाई देती हैं, जब से अनन्त महाप्रभु बरहज में आए

मोती बी.ए . मोतीलाल उपाध्याय के बिना भोजपुरी साहित्य की चर्चा भी कैसे हो सकती है. ‘महुआ-बारी’ और ‘तनी अउरी दउरऽ हिरना पा जइबऽ किनारा’ जैसे गीतों के रचयिता मोती बीए इस तरह गुमनाम हैं जैसे आजकल के भोजपुरी गाने चर्चित. मोती बीए बंबई फिल्मों में गीत लिखने भाग गए थे. वहाँ उन्होंने तीन फिल्मों के गीत लिखे जिनमें 1950 में आयी फिल्म ‘नदिया के पार’ भी शामिल थी. फिर वो गाँव चले आए, घर और अपनी धरती का मोह. यहीं लिखते रहे. कहते हैं, जिस मंच पर जाते वहाँ बच्चन और नीरज फीके पड़ जाते थे. यहीं इंटर कॉलेज में पढ़ाते रहे, यहीं मर गये.

बरहज के पास कोई बड़ा नेता नहीं हुआ. या कहें, देवरिया से ही कोई बड़ा नेता नहीं हुआ. 1952 के चुनाव में पंत जी विश्वनाथ त्रिपाठी को भाटपाररानी से टिकट दे रहे थे, उन्होंने कहा – बरहज से दीजिए तो लड़ेंगे वरना नहीं. 1957 में फिर टिकट मिला तो लौटा दिया. मूल्यों की राजनीति खत्म होने ने देश को न जाने कितने ही नेताओं से वंचित किया है. कोई बड़ा नेता न होने की ही वजह से देवरिया जैसे जिले नेपथ्य में चले गये.

जो बाज़ार बरहज की सबसे भीड़-भाड़ वाली जगह थी, वह अब शहर की सबसे जर्द और धुँआई जगह है. वहाँ एक ही जैसे चेहरे दीखते हैं, एक जैसा ही दृश्य दीखता है. वहाँ एक ही जैसे लोग आते हैं. वो लोग, जो रोशनी वाले हिस्से की सड़कों पर चल नहीं पाते.

“हुए नामवर बे-निशां कैसे-कैसे”

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यह कस्बा कहानियों में खेलता है. इन जैसे कस्बों के पास कहानियों और समय की कमी नहीं होती. यहाँ कुछ कहानियाँ शाश्वत हैं और ढेर सारी तात्कालिक. हालाँकि ये सारी इस कस्बे के हिसाब से बहुत व्यक्तिगत हैं लेकिन “एवरी सिटी हैज़ इट्स ओन मावलाई”. यहाँ शाश्वत कहानियाँ अनन्त महाप्रभु और आश्रम से सम्बन्धित हैं. तात्कालिक कहानियाँ स्थानीय राजनीति से सम्बन्धित.

लक्ष्मण के पुत्र चन्द्रकेतु ने मझौली में ‘मल्लों’ को बसाया. शताब्दियों-पीढ़ियों बाद मझौलीराजा ने इस इलाक़े में ‘विशेन’ लोगों को भेजा जो कि बंजारों के कब्ज़े में था. बंजारों की देवी ‘बंजारी माई’ का मंदिर आज भी इस कस्बे के जरा-सा बाहर है. यहाँ ‘विशेन’ बस गए तो यह आबादी वाला इलाक़ा हो गया.

अनन्त महाप्रभु जब यहाँ आए तो जंगलों के सिवाय यहाँ कुछ न था. बहुत थोड़ी आबादी थी. जिस जगह वह गुफा बनाकर तपस्या करने लगे थे वह उजाड़ थी. साहूकार बेचू साव को पता चला तो वह परमहंस के लिए दो समय दूध भिजवा दिया करते थे. महाप्रभु जिन दो वृक्षों के नीचे शौच किया करते थे उन दोनों पर दो गिद्ध रहते थे. वो दोनों गिद्ध उनका मल साफ कर दिया करते. जब तक परमहंस जीवित रहे, दोनों गिद्ध उन्हीं पेड़ों पर रहे. उनकी मृत्यु के बाद वो दोनों भी कहीं चले गये.

महाप्रभु से मिलने पहलवान प्रो. राममूर्ति आए थे. उन्होंने ध्यान दिया कि महाप्रभु के एक पैर का अंगूठा लगातार हिलता रहता है. प्रोफेसर ने पूछा तो उन्होंने कहा – क्या करूँ रुकता ही नहीं. प्रोफेसर ने कहा – मैं इसे रोक सकता हूँ. परमहंस ने हँसते हुए उन्हें ऐसा करने से मना किया. कहा, “शागिर्दों के सामने आपकी बेइज्जती हो जाएगी”. पहलवान नहीं माने. जैसे ही उन्होंने उनका अँगूठा छुआ, उन्हें जैसे झटका-सा लगा. वो तुरंत ही परे हट गये.

इस परम्परा में कई संत हुए. अब यहाँ मठाधीशों और राजनीति का कब्ज़ा है. पुराने मूल्य पैसा खा गया.

राजनीति में बरहज से प्रख्यात समाजवादी नेता मोहन सिंह हुए थे. प्रदेश स्तर की राजनीति में बड़ा नाम रहे दुर्गाप्रसाद मिश्र बरहज से हुए. फिर प्रदेश में हुए एनआरएचएम घोटाले की पर्याप्त आँच बरहज तक भी पहुँची जो उस समय कहानियों का सबसे बड़ा स्रोत था.

साठ के दशक में यहाँ कोई बीमारी फैली तो सरकार ने होम्योपैथ के डॉक्टर, डॉ. मोहिउद्दीन को यहाँ भेजा. उन्होंने घर-घर जाकर दवाएँ पिलाईं, ईलाज किये. इस कस्बे ने उन्हें डाक्टर मजुद्दीन बना दिया. डॉ. साब यहीं रह गये. उम्र अस्सी के ऊपर है, आज भी रोज़ मरीज देखते हैं. यह कस्बा इन्हीं जैसे लोगों की कहानी कहता है. इन लोगों और इन कस्बों की नियति है स्थानीय रह जाना और यही इनके लिए जीवित रहने का वरदान भी है.

लेकिन अब यहाँ भी सड़कों पर चलना मुश्किल होता जा रहा है. नदी हर साल घाट से और दूर हो जाती है. हर साल नदी के साथ और ज्यादा मिट्टी और रेत आती है. आश्रम में गुफा दिखायी नहीं देती. लिहाज़ अब यहाँ भी, घटता जा रहा है.

-समाप्त-

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