मनमौजी मिजाज़ का दर्शक!

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रजनीश जे जैन/

एक अच्छी और लोकप्रिय फिल्म में क्या अंतर है? अक्सर यह सवाल दर्शकों   के साथ फिल्म समीक्षकों को भी हैरान करता रहा है। अच्छी फिल्म को लोकप्रिय होना चाहिए परन्तु अमूमन होती नहीं है. ठीक वैसे ही लोकप्रिय फिल्म एक बड़े दर्शक वर्ग को लुभा जाती है परन्तु समीक्षक उसे नकार चुके होते हैं। हाल ही में संपन्न हुए ऑस्कर समारोह के बाद ‘बेस्ट फिल्म’ को लेकर भी प्रतिकूल टिप्पणियों ने ऑस्कर ज्यूरी पर सवाल खड़े करना आरम्भ कर दिए हैं। इस वर्ष ‘ग्रीन बुक’ ने इस श्रेणी में सम्मान पाया है परन्तु कयास ‘रोमा’ के लगाए जा रहे थे।

वैसे यह पहली बार नहीं हुआ है जब ऑस्कर इस तरह से विवादों में आया है। इस समारोह के शुरूआती दिनों से लेकर अब तक दस बार इस तरह की घटना हो चुकी है जब आम दर्शकों और सिने समीक्षकों की राय ऑस्कर ज्यूरी से अलहदा रही है। 1941 में ‘सिटीजन केन’ के बजाए ‘हाउ ग्रीन वास् माय वैली’ चुनी गई थी। साल 2010 में फेसबुक के जनक मार्क ज़करबर्ग के जीवन पर बनी ‘द सोशल नेटवर्क’ को दरकिनार कर ‘द किंग्स स्पीच’ विजेता घोषित की गई। इसी प्रकार प्रतिभाशाली क्रिस्टोफर नोलन की ‘द डार्क नाईट’ के बदले ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ को नवाज़ा गया। इस जैसे  सैकड़ों उदाहरण ऑस्कर के अलावा भी मौजूद है जब बेहतर फिल्मों को पार्श्व में धकेलकर औसत फिल्मों को मंच दिया गया। इस तरह से  यद्यपि अच्छी फिल्मों को तात्कालिक नुकसान जरूर हुआ परन्तु देर से ही सही वे सराहना हासिल करने में सफल भी हुई और कालजयी भी साबित हुई।

ऐसा नहीं है कि इस समस्या से सिर्फ हॉलीवुड ही ग्रस्त है, हमारा देसी सिनेमा भी इसी तरह के विकारों से ग्रसित रहा है। हमारे पुरस्कारों के बारे में  बात करना इसलिए  बेमानी है क्योंकि सबको पता होता है कि किसको क्या मिलने वाला है ! यहाँ प्रतिभा के बजाए शक्ल देखकर तिलक लगाने का रिवाज रहा है।

अच्छी फिल्मों को सराहना न  मिलने के एक से अधिक  कारण रहते रहे हैं। जो दिखता है, वही बिकता है या शोर मचाकर कुछ भी बेचा जा सकता है के सिद्धांत फिल्मों की मार्केटिंग पर भी लागू होते है। निर्देशक का विज़न दर्शक से जुदा होना, कहानी का दर्शक के सर पर से निकल जाना, कथानक का मौजूदा समय या परिस्तिथियों से तार्किक सम्बन्ध न होना, दर्शक का सब्जेक्ट को लेकर परिपक्व न होना, नए विषय को सही ढंग से समझा न पाना या समय से आगे निकल जाने का दुस्साहस करना कुछ ऐसे कारण रहे हैं जो अच्छी फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं दिला पाए हैं।

इस परिभाषा के दायरे में आने वाली बहुत सी फिल्में राष्ट्रीय पुरुस्कारों से लादी गयीं व विदेशी फिल्मोत्सवों में देश के झंडे फहरा आईं,  परन्तु घरेलु जमीन पर दर्शकों को सिनेमाघरों तक नहीं खींच पाईं। ज्यादा पीछे जाने की आवश्यकता नहीं है, सन् 2000  से लेकर अब तक की फिल्मों को ही सूचीबद्ध किया जाए तो हमें अहसास होगा कि दर्शक कितने कीमती सिनेमाई माणिकों से वंचित रह गया है। रघु रोमियो (2003), द ब्लू अम्ब्रेला (2005), 15 पार्क एवेन्यू (2005), मानसून वेडिंग (2001), मिस्टर एंड मिसेज अय्यर(2002), रेनकोट (2004), फंस गए रे ओबामा (2010), ऐसी ही फिल्में हैं जो चलताऊ व्यावसायिक फिल्मों के सामने  असफल मानी गईं हैं।परन्तु इनका कंटेंट इतना पावरफुल था कि संजीदा  दर्शक आज भी इन्हें यूट्यूब पर तलाशते नजर आ जाते हैं।

‘सौ करोड़ का आंकड़ा’ सफलता का पैमाना मान लिया गया है। एक सौ पांच करोड़ की लागत से बनी ‘टोटल धमाल’ ने सौ करोड़ कमा लिए ! इस बात का इस तरह प्रचार किया जा रहा है मानो अनूठी घटना घट गई हो। कई बार दोहराये हुए कथानक पर आधारित उबाऊ कॉमेडी अगर अपनी लागत भी निकाल लेती है तो रूककर सोचने की आवश्यकता है। दर्शकों के मिजाज पर सर्वेक्षण करने की जरुरत है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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