शशि कपूर को श्रद्धांजलि: एक था गुल और एक थी बुलबुल

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शतरंज के खिलाड़ी का जुनूनी “शशि कपूर” गुजर गया। 

संदीप नाईक/

बहुत साधारण सा संवाद था “मेरे पास माँ है” , कोई भाषाई बाजीगरी नही ना ही चमत्कार परंतु जिस शिद्दत से भारतीय समाज मे यह संवाद स्थापित हुआ कि आज भी विज्ञापनों या सामान्य बातचीत में इसे कई संदर्भ और प्रसंगों ने इस्तेमाल किया जाता है – क्या दीवार के इस संवाद के लिए शशि कपूर को याद नही रखा जाना चाहिए ? अप्रतिम और अविस्मरणीय अभिनेता सह इंसानी मूल्यों से लबरेज शख्स।

लेखक

मेरे पसंदीदा कलाकार थे , वे पदमभूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से नवाजें गए थे।

राजेश खन्ना, ऋषि कपूर, जितेंद्र, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों की पीढ़ी में “दीवार” की तरह अड़े रहे और एक पुलिस वाले की ईमानदाराना अच्छी भूमिका स्थापित करने के साथ प्रेम , रोमांस को कभी कभी जैसी फिल्मों से उन्होंने मध्यवर्गीय नायक का एक गजब एवम विश्वसनीय  चरित्र स्थापित किया जो प्यार, संघर्ष और सहयोग का परिचायक था।

अच्छे निर्देशकों के साथ काम करके उन्होंने कमर्शियल के साथ समानांतर और कला फिल्मों में बेहतरीन किरदार निभाएं। शशि कपूर, कपूर खानदान के अदभुत प्रतिभा के धनी थे,  सहज और सौम्य शख्सियत के शशि कपूर का गुजर जाने का अफसोस हमेंशा रहेगा क्योकि वे बेहद अपने से लगते थे और कभी लगा ही नही कि वे सिलसिलेवार अभिनय कर रहे है।

मुझे डर लग रहा है कि इस साल ने जाते जाते दिसम्बर को अपने काम पर लगा दिया है, और आज चौथे ही दिन एक प्यारे और पगे हुए इंसान को लील लिया। अब खौफ़ का समय है , वैसे ही यह दिसम्बर बहुत घात देकर जाने वाला है और ऊपर से मौत के इस तांडव नृत्य का शुरू होना अंदर तक झकझोरता है।

नमन और श्रद्धांजलि शशि कपूर को, भारतीय जनमानस में आप हमेशा रचे बसे रहेंगें।
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परदेशियों से ना अखियाँ लड़ाना, परदेशियों को है एक दिन जाना।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.)

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