जिंदगी सिखाती ‘टॉय स्टोरी’

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

राजेश खन्ना की एक गैर रोमांटिक फिल्म ने इस मई माह में अपनी रिलीज़ के अड़तालीस बरस पूर्ण किये है। परिवार के बुजुर्ग बताते हैं कि यह फिल्म बच्चों और बड़ों में लोकप्रियता के सभी रिकॉर्ड धवस्त कर गई थी। बहुत बाद में इंटरनेट पर इस फिल्म को देखा था। फिल्म का नाम था ‘हाथी मेरे साथी’। सलीम जावेद की  लिखी यह पहली फिल्म थीजो 1971 में रिलीज़ हुई थी। एक अनाथ बच्चे को हाथियों का सहारा मिलता है। साथ रहते रहते वे भावनात्मक रूप से इस कदर जुड़ जाते है कि एक दूसरे के लिए अपनी जान भी जोखिम में डाल देते है। कथानक में नायक नायिका की चुहल बाजी से ज्यादा बच्चों को हाथियों ने लुभाया था। उस दौर में बच्चों के बीच काका से ज्यादा लोकप्रिय रामु हाथी हो गया था। कहा जाता है कि जब स्क्रीन पर रामु हाथी की मौत होती है तो सिनेमा हाल में बैठे बच्चे रोना शुरू कर देते थे।

बच्चों का मन कोमल भावनाओ से भरा होता है। किसी भी चीज के प्रति उनका लगाव निश्छल प्रेम से भरा होता है। उम्र बढ़ने के साथ भावनाओ का कठोर होते जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है परंतु जब तक ऐसा नहीं होता तब तक उनका हर चीज को देखने का नजरिया अलहदा होता है। बच्चे अपने खिलौनों को लेकर भी अपनी कल्पना में एक अलग ही दुनिया बना लेते है।

एक समय था जब बाल मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर फिल्मे बनाई जाती थी परंतु भारत में इस क्षेत्र में दशकों से कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं आई है जिसे विशुद्ध बाल फिल्म की श्रेणी में रखा जा सके। हमेशा की तरह हम यहाँ भी पूरी तरह से हॉलीवुड की कृपा पर निर्भर हैं।

वर्ष 1928 में वाल्ट डिज्नी नाम के चित्रकार ने अपनी कल्पना से एक ऐसे पात्र ‘मिकी माउस’ का निर्माण किया जो आज भी अपनी नटखट शैतानियों से हर उम्र के लोगों के चेहरे पर हंसी  बिखेर देता है। इन्ही वाल्ट डिज्नी की कंपनी ने नब्बे के दशक में स्टीव जॉब की कंपनी ‘पिक्सर’ को कंप्यूटर जनित दृश्यों से एक ऐसी फिल्म बनाने का आग्रह किया जो बच्चो के खिलोनो के माध्यम से अपनी कहानी कहे।  इस आग्रह की वजह थी 1988 में पिक्सर द्वारा बनाई शार्ट फिल्म ‘ टिन टॉय’ जोकाफी सराही गई थी।

इससे पहले सभी कार्टून चित्रकारों द्वारा बनाये जाते थे। ये कार्टून द्विआयामी हुआ करते थे।   पिक्सर ने कंप्यूटर पर निर्मित छवियों की मदद से वह कर दिखाया जिसने एनीमेशन फिल्मों की दुनिया ही बदल दी। उन्होंने अपने  कार्टून चरित्रों को त्रिआयामी (3 D) रूप में गढ़ा। पिक्सर से पहले यह काम किसी ने नहीं किया था।1995 में पिक्सर ने ‘टॉय स्टोरी’ का निर्माण किया।

भारत में बच्चों को ध्यान में रखकर दशकों से कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं आई है जिसे विशुद्ध बाल फिल्म की श्रेणी में रखा जा सके

इस फिल्म का कथानक बच्चों के खिलोनो पर आधारित है। खिलोनो की अपनी दुनिया है जहाँ उनके अपने सपने है, डर है, स्नेह भी है और ईर्ष्या भी है। ये खिलोने मनुष्यों के सामने बेजान हो जाते है और उनके हटते ही जीवंत हो उठते है। इन खिलोनो को वॉइस ओवर दिया था हॉलीवुड के लोकप्रिय सितारों ने। महज तीन करोड़ के बजट में बनी ‘ टॉय स्टोरी’ ने बॉक्स ऑफिस पर 373 करोड़ रुपये कमाये थे। यह फिल्म हर लिहाज से ट्रेंड सेटर रही। पूर्व में सभी एनीमेशन फिल्मे परिकथाओ पर आधारित होती थी लेकिन टॉय स्टोरी ने इस ट्रेंड को भी बदल दिया। टॉय स्टोरी के बाद  ‘ कार्स’,  ‘ लायन किंग’, ‘ हाउ टू  ट्रैन योर ड्रैगन’, ‘श्रेक’, ‘कुंग फु पांडा’,’आइस ऐज’ जैसी रोमांचक और हर उम्र के दर्शक को बाँध लेने वाली फिल्मों के आने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

खिलौनों में जान नहीं होती, यह हम बड़ी उम्र के लोग समझते है। लेकिन बच्चों को इनमे भरपूर जिंदगी नजर आती है। मासूम चेहरे वाले खिलोने बचपन को क्रूर होने से बचाये रखते है, यह बात बड़े होने के काफी बाद समझ आती है। ऐसी फिल्मे सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती वरन कतरा कतरा लुप्त होती संवेदना को संजोये रखने का काम भी करती है।

टॉय स्टोरी श्रंखला की दूसरी फिल्म 1999  में और तीसरी 2010 में प्रदर्शित हुई। पिक्सर ने पहली फिल्म की सफलता को हर बार दोहराया है अब वे इसी कहानी में कुछ नए पात्रों को शामिल कर ‘टॉय स्टोरी 4’ जून माह में प्रदर्शित कर रहे है। वाल्ट डिज्नी और पिक्सर की सफल जुगलबंदी को देखते हुए पूरी उम्मीद है कि यह फिल्म भी दर्शकों के रोमांच को एक अलग ही स्तर पर ले जाएगी।

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