सतहत्तर बरस पुरानी एक फिल्म जो आज की कहानी बयान करती है

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रजनीश जे जैन/

रोजमर्रा के जीवन में मीडिया की दखलंदाजी और उसके प्रभावों पर विस्तृत विश्लेषण की संभावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं। अखबार, रेडियो, टीवी और सोशल मीडिया एक हद तक हमारी दिनचर्या एवं वैचारिक प्रक्रिया को प्रभावित करने पर आमादा है, कई बार वह सफल होते भी नज़र आता है। समय का एक दौर ऐसा भी था जब यह माना गया था कि ‘तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो.’ निसंदेह समाज को चेतन करने में अखबार रेडियो और दूरदर्शन ने संजीदा प्रयास किये और उनके बेहतर परिणाम एक पूरी पीढ़ी पर महसूस भी किये गए। अखबार और टीवी ने श्वेत श्याम युग से रंगीन समय में लगभग एक साथ ही प्रवेश किया है। दोनों ही माध्यमों में रंगों के आगमन के साथ कल्पना का विस्तार हुआ और विचारशीलता नेपथ्य में जाती गई। आज दो दशक पूर्व से कहीं अधिक अखबार और टीवी चैनल हैं परन्तु अधिकांश की स्थिति वैचारिक दरिद्रता वाली है। अब दोनों ही माध्यम एक ऐसी काल्पनिक दुनिया गढ़ रहे हैं जिसमें उनके बनाये नायक, खलनायक देश की बड़ी आबादी को अपनी सोच से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में इटली में जन्मे और शरणार्थी बनकर अमेरिका आये ‘फ्रैंक कापरा’ ने उस समय के संमाज में फैली विचार शून्यता को अपनी फिल्मों का विषय बनाया। उनकी दर्जन भर उल्लेखनीय फिल्मों में से एक ‘मीट जॉन डो’ (1941) इक्कीसवी सदी में हमारे देखे-भोगे अनुभव की भविष्यवाणी करती है। फिल्म का कथानक कुछ इस तरह है – बुलेटिन अखबार के नए मालिक पुराने स्टाफ को निकाल कर नयी भर्ती करना चाहते हैं। युवा पत्रकार नायिका (बारबरा स्टान्स्की) की नौकरी भी खतरे में है।  नौकरी बचाने के लिए नायिका एक जाली पत्र सम्पादक को भेजती है जिसे जॉन डो नाम के युवा ने लिखा है। जॉन डो समाज में भेदभाव और अन्याय के विरोधस्वरूप क्रिसमस की रात टाउन हाल की छत से कूदकर आत्म हत्या करने वाला है। पत्र के छपते  ही सनसनी  फ़ैल जाती है। सब लोग जॉन डो को ढूंढने लगते है।  नायिका एक बेरोजगार युवक (गेरी कूपर) को जॉन डो बनाकर मीडिया के सामने पेश कर देती है। जॉन डो अपनी सादगी और सहजता से धीरे-धीरे पूरे देश को प्रभावित कर देता है। जॉन डो की वजह से अखबार का सर्कुलेशन बढ़ जाता है। बड़े-बड़े राजनेता जॉन डो को अपने हित में उपयोग करने लगते है। अंत में जॉन डो को असलियत समझ आती है।

जॉन डो की कहानी सतहत्तर  साल पुरानी है परन्तु एक दम ताज़ी लगती है। पिछले एक दशक में हमने मीडिया के दुरूपयोग की दर्जनों कहानियां सुनी हैं। अफ़सोस हमारे देश में इन कहानियों को कोई फ़िल्मी परदे पर लाने का साहस नहीं करता। वैसे ‘मीट जॉन डो’ से प्रेरित होकर टीनू आनंद ने 1989 में अमिताभ बच्चन को लेकर ‘मैं आजाद हूँ’ बनाई थी। इस फिल्म की स्क्रिप्ट जावेद अख्तर ने लिखी थी। मीट जॉन डो ‘जहाँ बॉक्स ऑफिस पर सफल होकर कालजयी हो गई, वहीं ‘मैं आजाद हूँ ‘ अमिताभ के करिश्माई गेटअप और उन्ही की आवाज में गाये ‘इतने बाजू इतने सर, गिनले दुश्मन ध्यान से’ के बावजूद असफल हो गई।

‘मीट जॉन डो’ सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती वरन हमें किसी और के हाथ का खिलौना बनने के खिलाफ आगाह भी करती है। फिल्म हमारे सामूहिक  खालीपन की और भी इशारा करती है। हाथ पर हाथ धरे बैठकर मसीहा का इंतजार करना दुनिया की हर नस्ल के चरित्र का हिस्सा बन गया है। ‘मीट जॉन डो’ मनुष्य के इस स्वभाव को शिद्दत से उजागर करती है। सूचना और रूपकों के अंधड़ में हम अपने आप को किस तरह एकजुट रखते हैं, हमारा मार्गदर्शन करती है। मीडिया हमारा माध्यम बना रहे, हमारा मालिक नहीं, यह याद दिलाती है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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