अलीगढ़: पुरुष गिरोह के निशाने पर समलैंगिक, महिला, नपुंसक सब

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सारिका श्रीवास्तव/

अलीगढ़- ये शहर की नहीं, यूनिवर्सिटी की भी नहीं फ़िल्म की बात है। जो शुरू होती है एक प्रोफेसर की निजी जिंदगी से। जो समलैंगिक है। मतलब ‘गे’। गे होने का मतलब केवल और केवल गे होना ही रह जाता है? बाकी कुछ नहीं? कोई वजूद नहीं? बुद्धि, ज्ञान, विवेक, सहजता और सरलता, साहित्य या संगीत सरोकार और गहरी जानकारी और यदि ये सब भी छोड़ दें तो इंसान भी नहीं?

बिल्कुल वैसे ही जैसे स्त्री। पूरा समाज लैंगिक दासता में जकड़ा हुआ है। अपना पावर भला कोई क्योंकर गँवाना गवाना चाहेगा?

बहरहाल हम अलीगढ़ फ़िल्म की बात कर रहे थे। विश्वविद्यालयों की राजनीति। पद पाने की हवस रचती है षड्यंत्र और घुसती है निजी जिंदगी में। निजी जिंदगी की नग्नता को शर्मसार करती है। हमसे कहती है कि हम्माम में भी बुरका पहन कर रहो। वरना ये समाज तुम्हारे सारे वजूद को केवल जिस्म ही साबित कर देगा और तुम्हारे गुणों को केवल जिस्मानी सम्बन्ध पर सिकोड़ कर रख देगा। केंद्रित कर देगा। तुम केवल एक लिंगधारी ही रह जाओगे। सत्ता की हुकूमत में प्रतिस्पर्धा करता हुआ और अपने लिंग के साथ अट्टहास करते हुए यौन उत्सव मनाता पुरुष समाज अपने समान लिंगधारी को भी नहीं बख्शता। समलैंगिक, स्त्री और नपुंसक एक ही तरह से पीड़ित हैं और एक ही गिरोह द्वारा- *पुरुष गिरोह*। सिवाय लिंग के इनकी और कोई पहचान नहीं आंकी जाती।

इस समाज में यदि महिला कईं पुरुषों के साथ सम्बन्ध रखे या पुरुष-पुरुष से सम्बन्ध रखे या नपुंसक यौन इच्छा पूरी करे तो समाज में गन्दगी फैलती है। जैसे समाज को साफ रखने का ठेका केवल इन तीनों ने ही ले रखा हो। पर होता उल्टा ही है जो अपने पुरुषत्व के मद में चूर है वही अपने से इतर सबको हीन और तुच्छ समझता है और अपने ही बनाये कायदों को नकारता सबको कुचलता जाता है। ये मद अर्थ का है और उसे डर है इस अर्थ मतलब सम्पत्ति के छिन जाने का। उसे डर है अपनी सत्ता के ह्रास होने का। इसे बनाये रखने के लिए तरह-तरह के कायदे बनाता है। और उसके अलावा कोई और इन कायदों को नुकसान पहुंचाए तो डर जाता है और अपनी शक्ति का उपयोग कर उस क्षति पहुंचाने वाले को कुचल कर रख देता है फिर चाहे उसे इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। वह साम, दाम, दंड, भेद सबका प्रयोग करता है।

बहरहाल हम हिंदी फिल्म अलीगढ़ की बात कर रहे थे। तो फ़िल्म का हीरो जो एएमयू में मराठी भाषा का प्रोफेसर है, एएमयू याने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जिस पर उसे भरोसा है, विश्वास है। उसकी जिंदगी में जो भी बुरा हो रहा है उसके लिए वह एएमयू को हर्गिज जिम्मेदार नहीं मानता है। लेकिन सारे सरकारी संस्थानों की तरह शिक्षा संस्थान भी आपसी षड्यंत्रों और राजनीति के गन्दे दाँव-पेंचों का अड्डा बन चुके हैं। केवल एक डॉयलॉग था जो शिक्षा के बाज़ारीकरण को हल्के से छू गया- *अरे यहाँ कोई नहीं झांकता। मराठी और कर्नाटक भाषा को कोई नहीं पूछता। इक्का-दुक्का स्टूडेंट ही एडमिशन लेते हैं सो वे भी नहीं आते अब।* पहले शिक्षा ज्ञान अर्जन करने का साधन थी अब पैसा कमाने का। लोग पढ़ते या बच्चों को पढ़ाते ही इसलिए हैं की बड़ी से बड़ी नौकरी पा सकें,  जिसमें अधिक से अधिक पैसा कमाया जा सके। खुद सरकारें ही साक्षरता मिशन जैसी योजनाएँ लॉन्च कर रही हैं जिनका उद्देश्य शिक्षित करना नहीं केवल साक्षर करना ही है। ऊपर से अभी-अभी लॉन्च हुई नई पढ़ाई- स्किल्ड एडुकेशन मतलब प्रशिक्षित मजदूर तैयार करने वाली पढ़ाई। मतलब लोग केवल मजदूर बनने लायक ही पढ़ें, दिमागी रूप से खाली ही रहें। जिससे ये पूंजीवादी सरकारें पूंजीपतियों, कॉरपोरेट सेक्टर के साथ मिलकर शोषण करती रहें और इसके खिलाफ आवाज़ उठाने वाला कोई न रहे। अच्छा षड्यंत्र है।

जब बात फ़िल्म की हो रही हो ऐसे में महिला चरित्र की बात न हो ये थोड़ा ज्यादती हो जाएगी। दो तरह का चरित्र दिखाया है अलीगढ़ में स्त्री का। एक जो व्यापारिक सोच रखने वाली वकील है और दूसरी जो एक बड़े अखबार की एडिटर। ये सोचना भी जरूरी है कि फिल्मी चरित्र में आरोपी की तरफ या अपोजिशन में हर बार महिला वकील ही क्यों? क्योंकि खुली सोच नहीं रख पातीं? सदियों की दासता का अंकुश सोच को भी जकड़ देता है। कैद रहने से सोच भी संकुचित हो जाती है। सदियों की बेगारी का दुष्परिणाम इस तरह ही तो सामने लाया जाएगा जो अपोजिट लिंगधारियों को कमअक्ल साबित कर सके। फ़िल्म या टीवी सीरियल्स में महिलाओं को इस तरह मूर्ख साबित करना भी समाज में उनका स्थान और कमतर कर देता है। वहीं दूसरी ओर एक बड़े अखबार की एडिटर। बॉस। जो दिन भर उबाऊ काम में लगी रहती है। और शाम के धुंधलके में, ऑफिस की सूनी टेरिस पर जाकर शराब पीती है। साथ ही अपने सहकर्मी के साथ सेक्स की पहल करती है। जब तक सोच लिंग से ऊपर न उठेगी इस तरह के चरित्र महिला को पतित साबित करते रहेंगे और अन्य स्थानों के अलावा देर रात तक काम से लौटने वाली महिलाओं पर यौन उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार होने का खतरा मंडराता ही रहेगा। इधर मोदी सरकार विदेशों में घूम-घूम कर पूंजीपतियों और मल्टीनेशनल कम्पनियों को हल्दी रंगे चावल दे और सस्ता मजदूर, सस्ती जमीन का लालच दे आमंत्रित कर आई। महिला तथा बच्चे ही सस्ते मजदूर होते हैं और इनसे संगठित हो विरोध की आवाज़ उठाने का खतरा भी कम होता है सो लेबर एक्ट में बदलाव करके महिलाओं की रात की पारी में काम करना चुपचाप मुहाल कर दिया गया। सो औरत तो देर रात काम से लौटेगी ही। जो औरत देर रात तक घर से बाहर रहती है सो बदचलन तो होगी ही। और बदचलन औरत का बलात्कार तो होना ही चाहिए ऐसा औरतें खुद भी मानती हैं।

बहरहाल हम फ़िल्म अलीगढ़ की बात कर रहे थे जिसमें नायक जो गे(अब वह प्रोफेसर नहीं रहा क्योंकि वो गे मतलब समलैंगिक है) है उसकी मदद समाज के प्रगतिशील समझ और समलैंगिक सम्बन्ध रखने वाले लोग करते हैं। केस लगाया और लड़ा जाता है जिसमें एक नाज़ुक मिज़ाज़, साहित्य सरोकार और संगीत से लगाव रखने वाला गे कोर्ट रूम में खुद अपने केस पर चल रही कार्यवाही में ही ऊबने लगता है और मराठी में खुद के द्वारा लिखी कविताओं का अंग्रेजी में तर्जुमा कर अपने समय का सदुपयोग करता है। क्योंकि कोर्ट और वकील की जुबान उसकी समझ के परे है। लेकिन न्याय मिलने की उम्मीद में वह इस सब को झेलता है।

एक साधारण इंसान की तरह कोर्ट के दाँव-पेंच उसे नहीं भाते और न ही समझ ही आते हैं। लेकिन समय के सदुपयोग के लिए कविता का तजुर्मा ही क्यों? क्योंकि कविता प्यार और सुकून का खूबसूरत अहसास है जो मौका पड़ने पर लड़ने की ताकत देती है तो हथियार भी बनती है और प्यार को समझना है तो कविता को समझो। प्यार की कोई जुबान नहीं होती। लेकिन प्यार खुद बोलता है। आज की पीढ़ी प्यार को समझ ही नहीं सकती। क्योंकि वो पढ़ती ही नहीं है। कविताओं को समझती नहीं, महसूस नहीं करती। प्यार तो वही समझ सकता है जो कविता समझता हो। तो ये आज के युवा जो जाने किस जल्दबाजी में होते हैं कविता, कहानी, साहित्यिक रचनाओं से सरोकार ही नहीं रखते तो वे प्यार को भी कैसे समझेंगे। उसकी खूबसूरती, उसके अहसास से परे ये युवा अब केवल रिलेशन में होते हैं प्यार में नहीं। ये भी एक किस्म की राजनीति ही है जिसमें इंसानों के अहसासों को मारा जा रहा है उसे अकेला कर तोड़ने के लिए। जिससे वह असुरक्षित महसूस करे और पैसा कमाने के लिए जी तोड़ मेहनत करे। बंधुआ मजदूर की तरह। बढ़ती उम्र का अकेलापन कविताओं की ओर ले जाता है और कविताएँ प्यार की ओर। प्यार तो किसी से भी हो सकता है। लेकिन ये तो बिल्कुल व्यक्तिगत भावनाएँ हैं जिन्हें सार्वजनिक क्यों करना। ये नितांत निजी ही होता है।

बहरहाल हम अलीगढ़, जो एक फ़िल्म है पर बात कर रहे थे जिसका नायक जो गे होने के साथ ही साथ मुस्लिम भी है। और आज के समय में मुसलमान होना मतलब डर और भय के साथ दब कर जीना है। जहाँ-जिस जगह जन्म लिया उस जगह के लोगों द्वारा निज स्वार्थ के लिए हलाल किए जाने वाले प्राणी की तरह चिन्हित हो अपनी बारी आने का इंतजार करना मुसलमान होना होता है।

एक सीन में उसके साथ होटल में लंच ले रहे युवा के ये बोलने पर की आप दाल क्यों नहीं ले रहे? जवाब देता है कि मैं मुस्लिम हूँ, मांसाहारी और तुम शाकाहारी तो मैं इस दाल को कैसे हाथ लगा सकता हूँ? बड़ा सुंदर लेकिन छोटा सा दृश्य है ये जो समाज की पूरी बखिया उधेड़ कर हमारे सामने रख देता है।

फ़िल्म का अंत बहुत उम्दा है जिसमें न्याय तो मिलता है लेकिन इंसान को नहीं गे को। जीत गे की होती है इंसान की नहीं। समलैंगिकता जीतती है इंसानियत नहीं और इंसान खुद को खत्म कर लेता है।

शुरू से लेकर आखिर तक अनेक पड़ावों से गुजरती हुई फ़िल्म अपने मौजूं से नहीं भटकती। और न ही दर्शक को ऊबने ही देती है। मनोज वाजपेयी का बेजोड़ अभिनय उनके निभाए किरदार से बरबस ही लगाव पैदा कर देता है। राजकुमार राव अन्य फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़कर अपने को साबित कर चुके हैं।

कविताओं की बात करने पर आंखों में जो चमक आती है और चेहरे पर जो दमक आती है वही तो प्यार है जिसे मनोज वाजपेयी ने बखूबी निभाया है। जिसे देख बरबस ही उनके उस रूप पर प्यार हो जाता है।

बहरहाल हम फ़िल्म अलीगढ़ की बात कर रहे थे…जिसका हर पहलू हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है।

(सारिका श्रीवास्तव भारतीय महिला फेडरेशन की राज्य सचिव हैं। प्रगतिशील लेखक संघ मध्य प्रदेश, तथा भारतीय जन नाट्य संघ मध्य प्रदेश से भी इनका सक्रिय जुड़ाव रहा है।)

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