ईरानी सिनेमा में चुप्पी का शांत और उद्विग्न वितान हैं सोहराब शाहिद

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अरविंद/

कविता और कहानी  में  बराबर रुचि रखने वाले अरविंद का विश्व सिनेमा के प्रति शौक और नज़र दोनों काबिलेतारीफ है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनको फॉलो करने वाले जानते हैं कि उन्होंने विश्व सिनेमा के कुछ जरुरी फिल्मों से हजारों लोगों को रूबरू कराया है. यहाँ वह ईरानी सिनेमा के बहुत कम चर्चित पर जरुरी नाम सोहराब शाहिद से हम सबका परिचय करा रहे हैं.

 

सोहराब शाहिद

सोहराब शाहिद, ईरान की सिनेमाई दुनिया में एक ख़ामोश सा नाम है . वह यूँ कि इनकी चर्चा मैंने ब्लॉग, विकी और अन्य संजालीय तकनीकों की दुनिया में नहीं के बराबर देखा सुना है. इनकी फिल्मे संवेदनशीलता,अर्थों, कथ्य, कैमरे के कहन और सबसे जरुरी नवीनताओं में ईरान के किसी निर्देशक की फिल्मों से कम नहीं है. अब्बास कियारोस्त्मी के बाद मेरे देखे में अभी गैर ईरानी सिनेमा इन्हें (जिसमे ईरानी कलाकार एकदम न हों) बनाने को मिले हैं. ऐसे मौके शायद इनकी प्रतिभा और रहनवारियों की अलग अलग वजह से भी मिले होंगे.

सन 2006  में चीन के एक और प्रिय निर्देशक Jia Zhangke की एक खूबसूरत फिल्म आई थी -‘still life’ .  हांलाकि जितना इसका नाम हुआ, उससे कहीं ज्यादा खुबसूरत फिल्म इस निर्देशक के खाते में पहले से थीं . जैसे कि पहली ही फ़िल्म ‘पिक पॉकेट’. लेकिन कम लोग जानते हैं कि सन 1974 में इसी नाम से सिनेमा में इतिहास गढ़ते हुए एक और ईरानी फिल्म आई थी. जो देखने के बाद देर तक, महीनों तक, अपनी छाप छोड़े रखती थी. इस फ़िल्म में बेहद कम संवाद थे. एक पन्ने से भी कम.  पर लायक संवाद. सोहराब की फ़िल्में ऐसी ही रहीं. कम और जरूरी संवाद धारण करने वाली. एक बार फिर से रोबर्ट ब्रेस्सों कि याद दिलाती हुई. कुछ ऐसे निर्देशक हुए जो फिल्मों में संवाद को एक तरह से उपेक्षित करते हुए चलते थे. दृश्यों के कोहरे में बात करते थे.  सोहराब उसी परम्परा में थे.

स्टील लाइफ, बुजुर्गों के निचाट एकाकीपन जीवन को दर्शाती है. बुजुर्गों के दर्द की दास्तान कम करके देखी गयी है सिनेमा में. खासकर दुनिया के सिनेमा में प्रेम और युवा पक्ष बाजी मारता दिखता है. जब भी बुजुर्गों की बात सिनेमा में होगी इस फ़िल्म को देखने वाले याद जरूर करेंगें. यहाँ, इस फ़िल्म में यह उत्तर उम्र का जीवन निर्वासित से भी गया हुआ है. यह जीवन अभावमय और कष्टकर है.  शोरगुल से कहीं दूर एक पठार सी -चुप्पी का इतना शांत और उद्विग्न वितान हिंदी कहानी कि दुनिया में जैसे निर्मल वर्मा रच पाते. और अभाव का वितान और उसके वैभव का आख्यान जैसे विनोद कुमार शुक्ल रच पाते हैं.  कुछ कुछ कहूँ तो वैसा ही. यह फिल्म लगभग उसी एकसार धुन में चलती रहती है. इस फ़िल्म की विशेषता हमारे ज़ेहन में खामोशी के सघन सुघड़ और सन्नाटेदार वर्णमालाओं में अंकित होती रहती है.

इसके अलावा सन 1976 में उनकी फिल्म आई “coming of age ‘.  फ़िल्म के निर्देशक यही हैं पर यह मूलतः’ ईरानी फिल्म नहीं है . यह एक वेश्या और उसके सात साला पुत्र के जीवन और उसके अन्तर्सम्बन्धों पर एकाग्र है. इस फिल्म में दोनो के सम्बन्धों का द्वंद की खूबी उभर कर आती है. माँ दिन भर सोती है. रात में जागती है. ठीक भोर में आकर वह बच्चे के लिए टिफिन तैयार कर सो जाती है. इस फिल्म का अंत बड़ा ही शॉकिंग और उसी खामोशी से भरा है जिसके लिए सोहराब जाने जाते हैं. माँ ग्राहक को जगह न मिलने पर घर में ले आई है. बच्चा स्कूल से जल्दी लौट आया है. जैसे ही वह कमरे में पहुचता है, दृश्य देखकर सन्न रह जाता है. वह बस्ता फेककर भागता है.  माँ उसके पीछे भागती है. बाद में एक अँधेरी सुरंग की तरह काली खामोशी दर्शक के अंदर भागने लगती है. यह उन फिल्मों में से एक है जिनके अंत का अनन्त मन मे लगातार दौड़ता रहता है.

सोहराब को हमे देखना चाहिए. खासकर ये दोनों फिल्में  जो जीवन के चक्षुओं को कमाल के अनुभवों से भर देंगीं.

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