जन्मदिन मुबारक: फ़िल्मी दुनिया से दूर होकर भी श्याम बेनेगल कैमरा के साथ बड़े हुए थे

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साभार: इंडिया टुडे

शिखा कौशिक/

अगर आप हिंदी में बने गंभीर सिनेमा के मुरीद हैं तो श्याम बेनेगल का नाम आपको जरुर रोमांचित करता होगा. सिनेमा में अपने काम के लिए सोलह बार राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़े गए श्याम बेनेगल ने हिंदी जगत को बड़ी संख्या में ऐसी फ़िल्में दी हैं जो धरोहर हैं. बेनेगेल की कुछ ख़ास फिल्मों में अंकुर (1974), निशांत (1975), मंथन (1976), भूमिका (1977), जुनून (1979), कलयुग (1981), मंडी (1983), मम्मो (1994) इत्यादि हैं. इसके अतिरिक्त नए ज़माने के फिल्म प्रेमियों के लिए वेलकम टू सज्जनपुर इत्यादि.

बेनेगल का आज जन्मदिन है और इस 14 दिसम्बर को यह फिल्म निर्माता 83 वर्ष के हो जायेंगे.

श्याम बेनेगल ऐसे फिल्मकारों में से हैं जो सीधे सीधे फिल्म इंडस्ट्री से न जुड़े होकर भी कैमरा के साथ ही बड़े हुए. श्याम बेनेगल  के निजी जिंदगी के बारे में ऐसा बहुत कुछ है जो उनके प्रशंसक अब तक नहीं जानते होंगे.

फिल्म अंकुर का एक दृश्य

सन् 1934 में पैदा हुए श्याम बेनेगल का शुरूआती जीवन हैदराबाद में ही गुजरा. उनके पिता श्रीधर बी बेनेगल फोटोग्राफर थे.  उनके पिता के पास 16 एमएम का एक कैमरा था जिससे वह घर के छोट्टे-छोटे उत्सव और रोजमर्रा के चीजों की शूटिंग किया करते थे.

श्याम बेनेगल कुल दस भाई-बहन हैं और सब पर उनके पिता ने फिल्म बनाई. जब तक दूसरा बच्चा नहीं पैदा हो जाता उनके पिता सबसे छोटे बच्चे के जीवन की शूटिंग करते रहते थे. इस तरह सभी बच्चों पर एक फिल्म बनी. उनके पिता घर आने वाले अतिथियों को ये सारी फ़िल्में दिखाया करते थे. अब यह कहने की बात नहीं कि जिसके घर में कैमरा को लेकर इतनी उत्सुकता हो उसे कैमरे से लगाव कब शुरू हुआ होगा.

कैमरे से इतना दोस्ताना होने के बाद, श्याम बेनेगल के जीवन में बड़ा पर्दा आया जहां उन्होंने वास्तविक तौर पर फिल्मों की दुनिया में प्रवेश किया. यह हैदराबाद का गैरिसन सिनेमा था जहां श्याम बेनेगल फ़िल्में देखा करते थे. चूंकि इनका जन्म गुलाम भारत में हुआ था तो उस सिनेमाहाल में हिंदी और अंग्रेजी सिनेमा दोनों दिखाये जाते थे. यही नहीं सप्ताह के तीन छुट्टी के दिनों में ब्रिटेन और अमेरिका में बनी फ़िल्में दिखाई जाती थीं और सोमवार से बृहस्पतिवार तक हिंदी और स्थानीय भाषाओं की फ़िल्में दिखाई जाती थीं.

फिल्म भूमिका का एक दृश्य

इस सिनेमाहाल में ढेर सारी फ़िल्में देखते हुए बड़े हुए श्याम बेनेगल सिनेमा के बारीकियों से परिचित हुए. उन्होंने प्रोजेक्टर चलाने वाले से दोस्ती कर ली थी और उसके साथ प्रोजेक्शन बूथ से भी फ़िल्में देख लिया करते थे. इस तरह सप्ताह में बेनेगल दो-तीन फ़िल्में तो कम से कम देख ही लेते थे.

गुरुदत्त की भी इनके फिल्मकार बनने में बहुत अहम भूमिका रही है. गुरुदत्त इनके दूर के भाई लगते थे और मुंबई में स्थापित फिल्मकार थे. श्याम बेनेगल को इससे भी प्रोत्साहन मिला.

इसके बावजूद भी बेनेगल ने इकोनॉमिक्स से एमए की शिक्षा ली. प्लान यह था कि अगर फ़िल्मी दुनिया में असफल हुए तो शिक्षक बन जायेंगे. अपनी पढाई पूरी करने के बाद श्याम बेनेगल शिक्षक बन भी गए थे पर कुछ ही दिन में सब छोड़छाड़ दिया.

फिल्म मंडी का एक दृश्य

मुंबई आकर श्याम बेनेगल गुरुदत्त से मिले. एक बार मीडिया से बात करते हुए श्याम बेनेगल ने बताया था कि कि जब वह मुम्बई आये तो फ़िल्मी दुनिया में जगह बनाने के लिए गुरुदत्त से मिले. इसपर श्याम बेनेगल को प्यासा जैसी चर्चित फिल्म बनाने वाले गुरुदत्त ने कहा कि जो भी बनना चाहते हो उसके लिए खुद प्रयास करो. गुरुदत्त ने उनको समझाया था कि मेरे साथ काम करने से बहुत तो सहायक बन सकोगे. इसलिए बेहतर यही है कि खुद से संघर्ष करो.

फिर श्याम बेनेगल ने एक एडवरटाइजिंग एजेंसी के साथ काम किया. करीब 12-13 साल इन एडवरटाइजिंग एजेंसी के साथ काम करने के बाद श्याम बेनेगल को फिल्म बनाने का मौका मिला.

भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 2007 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे पहले और एकमात्र ऐसे निर्देशक हैं जो पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुका है. उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे नागरिक सम्मान से भी नवाज़ा जा चुका है.

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