हम बेवफा हर्गिज न थे: सिनेमा और साहित्य में बेवफाई की भूमिका

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

फिलहाल देश मे बहुत से निर्णय अचानक से लिये जा रहे हैं. बेवफाई अचानक से जायज़ हो गई है. देश की सर्वोच्च अदालत ने कलम चलाई और एक अपराध, जिसके लिए अधिकतम पांच साल जेल में गुजारने  पड़  सकते थे, अचानक से अपराध नहीं रहा.

देश भर में लोग आवाक् हैं कि इस निर्णय को किस रूप में आत्मसात करें. प्रेम कहानियों से लबरेज साहित्य, सिनेमा और संगीत में बेवफाई, प्रेम जितना ही महत्वपूर्ण रहा है.

काल, संस्कृति, भाषा और भू-भाग की विभिन्नताओं के बावजूद इस भाव ने समग्र मानव समाज को प्रभावित किया है. अक्सर छोटे शहरों और कस्बों में बेवफाई से जुड़े किस्सों को चटकारे ले कर सुनाये जाने का रिवाज रहा है. अनादि काल से समाज को इस तथ्य से जूझना पड़ता रहा है. लिखित इतिहास और ‘कनसुनि’ कहानियों में इस तरह के प्रसंगों की भरमार रही है. कोई आश्चर्य नहीं कि ये अफ़साने साहित्य में प्रवेश कर कालजयी हो गए.

‘वॉर एंड पीस’ के रचयिता लियो टॉलस्टॉय के एक परिचित को अपनी पत्नी की बेवफाई की वजह से आत्महत्या करनी पड़ी थी. इस घटना ने उनसे ‘अन्ना करेनिना’ जैसा अजर अमर उपन्यास लिखवा दिया. प्राचिन ईसाई आख्यानों में मनुष्य के सात गुणों और सात पापों का ज़िक्र विस्तार से आता है.  इन सात पापों में बेवफाई को भी शीर्ष स्थान पर रखा गया है.

दुनिया के जितने भी देशों में फिल्में  बनती हैं वहां सामाजिक रूप से  प्रतिबंधित इस विषय पर भरपूर फिल्में  बनीं

बेवफाई के रेशों को फिल्मों में आना ही था. और वे धूम-धड़ाके से आये भी. दुनिया के जितने भी देशों में फिल्में बनतीं हैं, वहां सामाजिक रूप से  प्रतिबंधित इस विषय पर भरपूर फिल्में बनीं.  इस तरह अनदेखे और सिर्फ सुने रिसालों पर बनी फिल्मों में कुछ ‘क्लासिक’ का दर्जा पा गईं और कुछ ने लोकप्रियता के मापदंड स्थापित कर दिए.

हॉलीवुड की, बेवफाई पर बनी  कुछ अच्छी फिल्मों को न सिर्फ हिंदी वरन दुनिया की अन्य भाषाओ में भी जी भर कर ‘रीमेक’ किया गया. फेटल अट्रैक्शन (1987), इंडीसेंट प्रपोज़ल (1993), अमेरिकन ब्यूटी (1999), व्हाट लाइज बेनेथ (2000), अनफेथफुल (2002)  आदि इस विवादास्पद विषय पर निर्मित फिल्मों के ढेर से चुने हुए कुछ  दानो से ज्यादा नहीं है.

‘अनफेथफुल’ की नक़ल एक स्पैनिश फिल्म ने की और उस स्पेनिश फिल्म  की फोटो कॉपी  महेश भट्ट ने ‘मर्डर’ के रूप में कर दी. मोरक्कन गायक की धुनों को उठाकर फिल्म का संगीत तैयार कर दिया गया. इस फिल्म ने अभिनय शून्य मल्लिका शेरावत को आसमान पर बैठा दिया था. यहां यह तथ्य भी महत्वपूर्ण रहा है कि महेश भट्ट इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाने के लिए काफी प्रसिद्धि बटोर चुके हैं.

फ़र्ज़  कीजिये कि बेवफाई की यह धारा देश की स्वतंत्रता के साथ ही खत्म कर दी गई होती  तो आज सामाजिक ताना बाना क्या रूप ले चुका होता? कमांडर केएम नानावती के गुस्से से शायद देश नहीं दहलता, (काफी बाद में 2016 में नीरज पांडे के निर्देशन में अक्षय कुमार अभिनीत ‘रुस्तम’ ने इस पुराने बेवफाई के किस्से के कुछ पन्नों को नई पीढ़ी से रूबरू कराया). सिलसिला, थोड़ी सी बेवफाई, अगर तुम न होते, आपकी कसम, सौतन, आखिर क्यों’  जैसी सैंकड़ों हिंदी और क्षेत्रीय भाषा की फिल्मे, टीवी सीरियल और उनके सुमधुर गीतों का शायद अस्तित्व ही नहीं होता.

एक उलझे देश की बड़ी जनसँख्या युवाओ की है. वे इस निर्णय को किस रूप में ग्रहण करते हैं, इसके प्रभावों का असर कितना व्यापक रहेगा, जैसे बिंदुओं पर अभी बात करना जल्दबाज़ी होगा.

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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