इरफ़ाने-ग़म हुआ मुझे, दिल का पता मिला: नंदिता का मंटो

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अंचित/

“सआदत हसन 42 साल  की उम्र में नहीं रहे मंटो अभी भी ज़िंदा हैं.”

अंचित

कैमरा मंटो को देखता था, हम लोग मंटो को देखते थे और पता भी नहीं चलता कि कब कैमरा मंटो की आँखें हो जाता और हम लोग मंटो के भीतर देखने लगते, मंटो की आँखों से बाहर को देखते – हिंदुस्तान, पाकिस्तान, दोस्ती, मोहब्बत, ग़म, बेहिसी, दुनिया और जो दुनिया के पार है वह भी.  अफ़सानानिगार मंटो जिसके मुक़द्दमे में उसके लिए गवाही देने फ़ैज़ चले आते हैं , कहते हैं कि मंटो अश्लील नहीं है और यह भी कह देते हैं कि ‘ठंडा गोश्त’ लिटरेचर के कई पैमानों पर बहुत ऊँचा नहीं नापा जा सकता. कई दिनों तक मंटो यह सोचता रहता है जैसे वह सोचता रहता है कि वह हिंदुस्तान का है कि पाकिस्तान का. वह दंगाईयों का तो नहीं ही है और प्रगतिशीलों का भी नहीं हो पाता.

सरमद ने जैसे मंटो को जिया है और जैसे दिखाया है, उन्होंने पैमाना बहुत ऊपर उठा दिया है. पाकिस्तानी धारावाहिक तफ़सील से मंटो के आसपास घूमता रहा और उसके बीस एपिसोड में शाहिद नदीम ने ख़ून के आँसू कई बार रोए. एक बार आप वह देख लें तो फिर उसको अपने दिमाग़ से मिटा नहीं सकते. ज़ाहिर है फ़िल्म के लिए जाते हुए सरमद और नवाज़ के बीच तुलना तो होनी ही थी- देखना यह भी था कि नंदिता उसी बात को अलग ढंग से कैसे कहेंगी. सबसे पहले तो ‘मंटो’ नंदिता की इसी कहन के लिए देखी जानी चाहिए.

कला का सुख उसके सटल (subtle) होने में है – उसके शब्दों से ज़्यादा उसके शब्दों के बीच की ख़ाली जगहों के बोल पाने से है – उसके बता देने से ज़्यादा उसका इशारा भर कर देने से है. जिसको हम सुंदर कहते हैं और जो सभ्यता का सबसे ऊँचा और सबसे महान क्षण है, वह इन्हीं ख़ामोशियों का बना हुआ है और हमेशा  मानवीय वजूद में मौजूद दुखों (suffering) में पाया जाता है.  ऐसा मुझको लगता है. नंदिता इन ख़ामोशियों को बरतना जानती हैं – लिखने में भी और निर्देशन भी – उनका सिनेमा यहीं बहुत बड़ा हो जाता है. वह रौशनी से खेलती हैं, अंधेरे से भी. सामानों से और लोगों से भी. पतंग सा कुछ उड़ाती हुईं – कविता सा कुछ करती हुईं – एक वाइड शॉट धीरे धीरे क्लोज़ शॉट में बदल जाता है और आम तौर पर कैमरा जितना थमता है उससे कुछ दस सेकंड ज़्यादा थमा रहता है.

आप इंतज़ार करते हैं, आपको उस ठहराव  को समझने के लिए मेहनत करनी होती है जैसे आपको महान लिखे हुए की तलहटी में कुछ देर बैठना पड़ता है. मुझे नहीं लगता कि पिछले कई दिनों में मैने कोई इतनी कसी हुई हिंदी फ़िल्म देखी होगी. कोई एक फ़्रेम फ़ालतू नहीं. बहुत नुक़्ताचीनी करूँ तो एक मिनट के एक सीन में से बीस सेकेंड हटा सकता हूँ- मंटो और सफ़िया जहाँ पार्क में बैठे हैं!

आप इंतज़ार करते हैं, आपको उस ठहराव  को समझने के लिए मेहनत करनी होती है जैसे आपको महान लिखे हुए की तलहटी में कुछ देर बैठना पड़ता है

सरमद वाले मंटो के मैंने साढ़े सोलह एपिसोड देखे. उसके आगे देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई थी. उतनी दूर पहुँचा था, वही बड़ी बात थी. मंटो को पहली बार पढ़ने के बाद मैं कई दिनों तक परेशान रहा. जो मंटो को पहली बार पढ़ते हैं उनका अमूमन यही हाल होता है. उनके अफ़साने नंदिता ने भी फ़िल्माए और भले ही लोकप्रिय कहानियाँ चुनीं और उनमें लोकप्रिय कलाकार थे – वे छोटे छोटे ऐक्ट कभी लाउड नहीं हुए. हर सफ़हे पर एक अफ़साना – अपनी जगह जमा हुआ, अपने भर और आगे साथ रहने को हाज़िर. नंदिता के चयन पर भी मैं सोचता रहा. उन्होंने जिस तरह फ़िल्म को लिखा, जो क़िस्से उन्होंने दिखाए- उनका साहित्यिक जुनून दिखाई दे गया. एक मेज़ पर आमने-सामने बैठे इस्मत-मंटो, सवाल करता कृष्ण चंदर – मुझे कई बार “मिडनाइट इन पेरिस” की याद आयी. हिंदी की मुख्यधारा से इतनी क़रीब की फ़िल्म में यह दृश्य सुखद है – कई बार मेरे रोएँ खड़े हुए – पढ़े हुए को सामने यूँ देखना भी बड़ा अनुभव है.

मंटो को बम्बई नहीं छोड़ना चाहिए था. मैं बार बार सोचता रहा. मैं बार बार अफ़सोस करता रहा.फिर लगा भारत पाकिस्तान को एक ही होना चाहिए था. मंटो टोबा टेक सिंह था, नंदिता को लगा. नंदिता ने मुझसे भी यह मनवा लिया. उन्होंने फ़िल्म यहीं ख़त्म करने की सोची. मंटो से बार बार कहा गया कि उनके अफ़साने सिर्फ़ ग़म और निराशा से भरे हुए हैं. मंटो बार बार कहता रहा कि उसको सिर्फ़ सच्चाई दिखानी है. उसकी निराशा बिलकुल ग़ालिब के पास पहुँच जाती है- अव्यवहारिक लगने लायक लेकिन अपने आसपास के हालात में धंसी हुई – कंकाल के ऊपर गोश्त की तरह. संगीत के साथ स्नेहा के प्रयोग भी शानदार रहे. गीत भी कैमरे के पीछे चलते हुए. पार्श्व भी क्यू पर ख़ामोशियों के बीच ही धँसा हुआ- जैज़ और पारम्परिक भारतीय ग़ज़ल के बीचों-बीच – जैसे मंटो था – आधुनिक और पारम्परिक के बीच एक कड़ी.

अभिनय के लिए नंदिता ने सब विश्वासी लोगों को चुना- पारम्परिक भूमिकाओं से अलग भूमिकाएँ दीं – कई को उनके कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर भी निकाला और रोज़ घटती जा रही सम्भावनाओं में थोड़ी उम्मीद खोजी. किसी ने निराश नहीं किया. ज़ाहिर है कि नवाज़ ही फ़ोकस थे. फ़िल्म शुरू होने के पहले यह कई बार चर्चा हुई है कि नंदिता इरफ़ान को मंटो बनाना चाहती थीं – मुझे भी भारत में सबसे पहले वही याद आते- नवाज़ तक पहुँचने के पहले शायद मैं और कुछ नामों से गुज़रता. इरफ़ान की फ़िल्म ना करने की जो वजह रही हो, नवाज़ गम्भीर दर्शकों में अपनी पूर्व-भूमिकाओं की सब छवियाँ तोड़ सकते थे. उन्होंने बहुत मेहनत की है. उर्दू के उच्चारण, उनके हाव-भाव और उनके स्वाभाविक मैनरिज़म को बदलने-दबाने-तोड़ने की कोशिश वो करते हैं और ज़्यादातर सफल भी होते हैं . लेकिन जिस तरह के रोल वे करते रहे हैं और जो उनका स्वाभाविक मैनरिज़म है, वह कुछ कठिन दृश्यों में बाहर आता है. इंटर्वल के पहले एक बार और इंटर्वल के बाद कुछ-एक बार. तब वह नवाज़ हो जाते हैं मंटो नहीं रहते.

मंटो उसी तरह के मुक़दमों से घिरे रहे, जिस तरह के मुक़दमों से गिंज़्बर्ग, जोएस, लॉरेन्स जैसे लोग. अश्लीलता के मुक़दमे . फ़िल्म में मंटो एक जगह कहते हैं कि बुरा दिखने वाले लोगों को आइने से शिकायत हो जाती है. मंटो उर्दू माडर्निज़म की पीठ पर खड़े अफ़सानानिगार हैं. आधुनिकोत्तर कम से कम माडर्निज़म के अपने नायकों पर बात करना जानता है और इससे कतराता नहीं – फ़िल्म यहाँ भी जीत जाती है.

क्या यह बायोपिक फ़िल्मों की श्रेणी में ‘पान सिंह तोमर’ के आसपास पहुँचेगी या अपने एस्थेटिक्स में ‘रेनकोट’ या ‘लंचबॉक्स’ के क़रीब जाएगी- इस पर फ़ौरी राय बनाने से बचना चाहिए. हाँ, इतना तो तय है कि मंटो के कहानी-संग्रह पर कवर बन जाने जैसे हल्के प्रचार से इसे बचना चाहिए- कम से कम इसका विरोध तो करना ही चाहिए.

अंत में इतना कहूँगा कि एक ऐसा समय है जब काले और सफ़ेद के बीच का ग्रे इलाक़ा बहुत बड़ा हो गया है. स्टैंड लेने वाले लोग कम होते जा रहे हैं. सुविधा को विचार पर तरजीह देना समझदारी की परिभाषा हो गयी है. राजनीति का मतलब ही बँटवारा हो गया है. फ़िल्म को एक ऐसे अफ़सानानिगार की कहानी जानने के लिए देखना चाहिए जो अपने स्टैंड पर अड़ा रहा , लड़ता रहा – अपने समय से बहुत आगे, अपने समय के लोगों से बहुत ऊपर – ग़लतियों से बना हुआ इंसान ही – कुर्सी पर टाँग चढ़ाए बैठा हुआ, पेंसिल से उर्दू में अफ़साने लिखता हुआ- बदनाम, नशेड़ी – मंटो. मंटो. मंटो.

(अंचित कविताएँ लिखते हैं और बीते दिनों मार्केस के अजर-अमर पात्रों पर लिखीं इनकी कविताओं ने सबका ध्यान खींचा था. सौतुक पर अंचित कि कुछ कविताएँ  उपलब्ध हैं. अंचित से उनके मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

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