सिमरन: सही मायनों में स्वतंत्र स्त्री की कहानी

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श्रुति कुमुद/
‘सिमरन’ में अंत की ओर बढ़ते हुए एक दृश्य है जहाँ एक अद्भुत नायिका कंगना जिसे प्रफुल्ल या सिमरन कुछ भी कह लें, अपने सम्भावित पति समीर से बात करते हुए पूछती है-चारित्रिक कमियों के बारे में तुम्हारे क्या ख़याल हैं? जवाब में वह शालीनता से समाज के उच्चतम दर्जे के प्रेमी का विचार प्रस्तुत करते हुए कहता है कि तुम्हारा विवाह पूर्व व्यतीत कैसा है मुझे इससे रत्ती भर का भी मतलब नहीं है. तुम्हारे प्रेमी और उनसे संबंध रहे होंगे ,उनसे भी गुरेज़ नही. एक इच्छा जरूर है कि विवाह के बाद एकनिष्ठता बनी रहे.[spacer height=”20px”]
जिस समाज में हम हैं उसमें इससे बेहतर प्रतिउत्तर की कल्पना पुरुष की ओर से संभव नही है. इस पर तालियाँ मिलती भी हैं तब तक,जब तक कंगना या सिमरन या प्रफ़ुल्ल अपना आश्चर्य प्रकट नही करती. बेबाक़ सिमरन कहती है कि प्रेम करना कबसे चारित्रिक कमियों में शामिल हो गया, प्रेमी बनाना तो टैलेंट है. मैं तो वास्तविक कमियों की बात कर रहीं हूँ. नायक अकबका जाता है पूछता है, जैसे? [spacer height=”20px”]सिमरन कहती है जैसे जुआ खेलना, जैसे चोरी करना, जैसे झूठ बोलना. एक सेकेंड ठहर कर वो कहती है कि मान लो ये सब कमियाँ मुझमे में हो.
इसके बाद कहानी अपने रफ़्तार में बढ़ती है लेकिन यह दृश्य ही कहानी का प्रस्थान बिंदु है और यही वो बिंदु है जहाँ यह फ़िल्म अपनी समकालीन फ़िल्मो को पीछे छोड़ देती है. फ़िल्म के भीतर और बाहर इस संसार में चरित्र, चारित्रिक कमियां और तदनुसार भरष्टाचार की परिभाषा कमोबेश यही है.[spacer height=”20px”]
अगर समाज का नियंता पुरुष है तो प्रेम करना, वैवाहिक संबंधों में कोई मामूली सा विचलन ही चारित्रिक पतन है. वही सामाजिक भ्रष्टाचार की जड़ है. यानी जिस आर्थिक और सामाजिक भ्रष्टाचार ने वायवीय धरातल पर कितने आंदोलन चला दिए, कितने केजरीवाल खड़ा कर दिए, सरकारें बदल दी, ईमानदारी का स्वांग रच कर लोग सरकार बन गए, नेहरू खानदान पर दाग की तरह चस्पां हो गया, वो सारे विचलन, सारी कमियाँ पुरूष प्रवीण इस समाज में चारित्रिक पतन है ही नहीं. वास्तव में वह भ्रष्टाचार है ही नहीं.[spacer height=”20px”]
यूँ ही नहीं हमारे समाज में वास्तविक भ्रष्टाचारियों का चतुर्दिक स्वीकार है. चारित्रिक कमियों के बारे में चले एक कोमल संवाद के जरिए फ़िल्म का यह बड़ा हस्तक्षेप है.[spacer height=”20px”]
स्त्री के आत्मनिर्णय और उसकी सफलता असफलता को आधार बनाकर रची गई यह फ़िल्म ‘सिमरन’ एक बार तो देखने लायक है. कमियाँ हैं, निसंदेह हैं लेकिन हंसल मेहता और कंगना ने समां बांधने की कोशिश की है.[spacer height=”20px”]
अकेले जीवन संघर्ष के संकल्प वाली एक स्त्री को उसका समाज जाने अनजाने कैसे निहत्था करता जाता है, इसकी बानगी है यह फ़िल्म. झूठे आकर्षण(साथ) का फ़लसफ़ा रचता हमारा ये समाज अमूमन साथ कभी होता ही नहीं. फ़िल्म में सिमरन अपने संघर्षों को निभाती ही है साथ मे उसका मुठभेड़ समाज द्वारा पैदा किये गए मुश्किलों से होता है. ज़्यादातर उसके करीबी ही हैं. उसका बॉस, उसकी चचेरी बहन, जो अपने प्रेमी से मिलने के लिए सिमरन का इस्तेमाल करती है. यहीं से कहानी शुरू भी होती है. उसके माता-पिता, जो अपनी अपेक्षाओं का दबाव हमेशा बनाये रखते हैं. यहां पर चरित्रिक पतन में प्रेम को ही बड़ा भ्रष्टाचार मानने की बात फिर एक बार सामने आती है.[spacer height=”20px”]
एक दृश्य में पिता कहता है कि मैं जानता हूँ तुम हमसे अलग घर क्यों चाहती हो, ताकी तुम अपने प्रेमियों को बुला सको. पिता के लिये उसका (घर ख़रीदने का, जो वह अपनी ही सेविंग से खरीदना चाहती है) सपना माखौल भर है. अकेले जीवन जीने के निर्णय में उससे भी भूल-गलतियाँ होती हैं, उसी प्रकार की विभिन्न भूलें किसी के साथ रहते हुए भी होती हैं या हो सकती हैं. ग़लतियो से अलग उसका आत्मस्वीकार औऱ मानवीयता कमाल की है।जैसे अपने संभावित पति से वो कुछ नही छिपाती. सहज स्वीकारती है जुए, दारू,चोरी की बात. फ़िल्म में यह पहलू असीमित संभावनाओं को विस्तार दे सकता था लेकिन निर्देशक या निर्माता का इरादा शायद कुछ और रहा होगा.[spacer height=”20px”]
जिन वजहों से यह फ़िल्म एक बार देखने लायक भर हो पाई है. उसमें सबसे बड़ी कमजोरी निर्देशक की है। हर बार से उलट इन्होंने एक बड़े अपवाद को कहानी का मुख्य चरित्र बनाया है, जो कि बड़े निदेशकों की पहचान नही है. खुद हंसल मेहता ने आम जीवन से उठाये गए सामान्य चरित्रों (जो हर गली नुक्कड़ पर मौजूद होते हैं) को लेकर फ़िल्म बनाई है, जिनमें शाहिद,सिटी लाइट्स है. संवाद चुस्त हैं.[spacer height=”20px”]
संवाद की चुस्ती की क्या कहिये एक जगह कंगना एक अजनबी के साथ क्षणिक मोह में पड़ते हुए गुजराती अंदाज पूछती है-‘आर यू टायर्ड? वो कहता-नो, व्हाई?  सिमरन कहती-‘यू आर रनिंग इन माई माइंड’ और हँस देती है. इससे ग़ालिब का वह शेर याद आ जाता है.[spacer height=”20px”]
‘शब को किसी के ख़्वाब में आया न हो कहीं
दुखते हैं आज उस बुत-ए-नाज़ुक-बदन के पाँव'[spacer height=”20px”]
संगीत सामान्य है. अदाकारी में सब बेहतर हैं. समीर के किरदार में सोहम शाह की सादगी लुभावनी है और अव्वल तो कंगना ही हैं. इतनी कि अदाकारी को लेकर पूर्व में बुने सारे मुहावरे फ़ीके लगते हैं.[spacer height=”20px”]
लेकिन कॉमेडी फिल्मो के दौर वाले इस हड़बोम में ‘सिमरन’एक बार देखी जानी चाहिए.[spacer height=”20px”]

 

(श्रुति कुमुद, विश्व-भारती, शान्तिनिकेतन में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं.)

1 COMMENT

  1. बहुत ही सघनदार टिप्पणी है आपकी। इसे मैं कोई सामान्य टिप्पणी नहीं कह सकता हूँ। बिलकुल फ़िल्म की तरह आपने बात रखी है। सारा दृश्य उभरकर सामने आ जाने के बावजूद रोमांच बरकरार रहता है।

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